बुधवार, 28 मई 2014

शपथ-ग्रहण के बाद

चित्र साभारः गूगल
चलिए, शपथ-ग्रहण भी हो गया। नरेंद्र मोदी विधिवत प्रधानमंत्री भी बन गए। जिन्हें जो पद दिए जाने थे, वो भी लगभग दे ही दिए गए। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ-साथ सार्क देशों के नेताओं से भी मेल-मुलाकात हो गई। जित्ती भव्यता की उम्मीद की जा रही थी, उससे कहीं ज्यादा ही हो ली। अव्वल तो थी नहीं किंतु जिनकी जरा-बहुत भी नाराजगियां थीं, उनको भी सुलटा लिया गया। साथ-साथ, वरिष्ठों को कायदे से किनारे कर केवल मार्ग-दर्शक ही बने रहने को कहा गया। मीडिया ने भी भरपूर कवरेज देते हुए, शपथ-ग्रहण को 'बेशकीमती समारोह' बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चाहने वालो और समर्थकों ने भी जमकर दीवाली मनाई। मिठाइयां बांटी-बंटवाईं। नाच-गाने भी खूब हुए।

भव्य-जश्न के बाद अब बारी अच्छे दिनों को अच्छे से लाने की है। जित्ती मात्रा में वायदे किए गए थे, उन्हें अब निभाने की है। छप्पन इंच के सीने को अब दिखाने की है। साठ साल बनाम साठ महीने के फासले को सफलता में तब्दील करने की है। पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते मजबूत और व्यवहारिक बनाने की है। किसानों-गरीबों को समर्पित सरकार के वास्तव में वैसा ही लगने-दिखने की है।

हालांकि किए गए वायदे न एक दिन में पूरे हो जाएंगे न ही एक रात में मगर फिर भी जनता को ऐसा महसूस तो होना चाहिए कि हां प्रधानमंत्रीजी उन्हीं रास्तों पर चल रहे हैं। वरना अब तलक तो जित्ते भी नेता-मंत्री जिन-जिन रास्तों पर चले हैं- सब ने अपना ही अपना भला किया है। सत्ता के सहारे मिली कुर्सी की मलाई केवल खुद ही छक कर खाई है और जनता को बाबाजी का ठुल्लू दिया है। किसी मंत्री ने कोयले की दलाली में अपना चेहरा काला किया तो कोई टूजी-थ्रीजी से अपनी झोली भरता रहा। चलो मलाई खुद ही खाता तो ठीक था- पर साथ-साथ अपने दामादों-संबंधियों को भी खूब खिलाई। और महज तीन साल में ही करोड़ों कमाकर डकार भी न ली प्यारे ने।

बाकी की कसर एक तरफा महंगाई ने पूरी कर दी। मंत्रीजी के मुंह से निकलने की देरी थी और महंगाई सरपट-सरपट दौड़ लेती। फिर भी तमाम मंत्रियों-नेताओं का दावा था कि जनता महज पांच रुपए या पच्चीस रुपए में भरपूर पेट भर सकती है और गुजारा भी कर सकती है। बावजूद इसके जनता ने इन्हें भी झेला और जब झेलते-झेलते थक गई तो अपने मत से तगड़ा फैसला भी सुना दिया।

खैर, अब देश और जनता की बागडोर नई सरकार के हाथ है। नई सरकार क्या नया और क्रांतिकारी काम करती है, समय बताएगा। पर ज्यादा समय तक 'आत्ममुग्धता' में जीना भी ठीक नहीं। विराट जनादेश के बदले में जनता को कुछ विकास-प्रधान मिले तो है बात प्यारे। यह न हो कि बातें-वायदे केवल खाली-मूली में ही हवा बनकर रह जाएं। लंबी-लंबी तो 'आप' ने भी बहुत छोड़ी थी लेकिन मियां महज 49 दिनों में ही मैदान छोड़कर भाग लिए। बस ऐसा मजाक जनता के साथ न हो। जो शपथ ली है, नई सरकार का जोर उसे पूरा करने में हो नाकि भूल जाने में।

थोड़ी लगाम अगर चेलों-चपाटों पर भी कस ली जाए फिर तो सारे काम आसान ही आसान। क्योंकि सरकार, देश और जनता की ऐसी-तैसी करने में चेले-चपाटे ज्यादा सक्रिय रहते हैं। पिछली सरकार के अनुभव नई सरकार के लिए काफी हैं, ज्यादा बतलाने की जरूरत नहीं।

सरकार का अच्छे दिन लाने का समय शुरू हो चुका है अब।

2 टिप्‍पणियां:

Yogi Saraswat ने कहा…

bahut sahi

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को ब्लॉग बुलेटिन की आज कि फटफटिया बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।