गुरुवार, 22 मई 2014

इत्ते ईमानदार, इत्ते क्रांतिकारी बस 'आप' हैं

चित्र साभारः गूगल
अब उनके बारे में क्या कहूं और कैसे कहूं! उनके बारे में कुछ भी कहना, सिर में से जूं निकालने समान है। साथ-साथ, वे इत्ते ईमानदार हैं, इत्ते ईमानदार हैं कि ईमानदारी भी उनके आगे घुटने टेकती है। और तो और विश्व के महान ईमानदारों के बीच वे एक अकेले ऐसे ईमानदार हैं, जो सुर्खियां बटोरने में सबसे आगे रहते हैं। बस उन्हें मौका मिलना चाहिए फिर वे खांसने से लेकर जेल जाने तक पर कमाल की सुर्खियां बटोर सकते हैं। मैं उनकी इस 'सुर्खियां-बटेरू' कला का कायल हूं।

भीषण ईमानदार होने के साथ-साथ वे भीषण किस्म के क्रांतिकारी भी हैं। लोग बताते हैं- भगत सिंह के बाद वे दूसरे ऐसे क्रांतिकारी हैं, जिनकी क्रांतिकारिता के चर्चे गली-मोहल्ले से ज्यादा बुद्धिजीवियों के बीच होते हैं। वे बुद्धिजीवियों के 'रोल-मॉडल' हैं। अक्सर बुद्धिजीवि लोग उनकी क्रांतिकारी छवि को इसीलिए महिमामंडित करते रहते हैं ताकि उनके क्रांतिकारी दल में उन्हें भी कोई कोना मिल सके। इसीलिए बुद्धिजीवियों की कोशिश रहती है, उनमें भगत सिंह से लेकर लाल बहादुर शास्त्री तक की छवि को गढ़ना। लेकिन प्यारे महज छवि गढ़ लेने से न कोई क्रांतिकारी हो जाता है न सादगी-पसंद।

नेता के तईं जेल जाना कोई नई बात नहीं होती है। अक्सर जन-हित में नेता लोग जेल की सैर कर आ चुके हैं। लेकिन ये मियां तो जेल सिर्फ इसीलिए गए हैं ताकि मीडिया और जनता के बीच अपने चेहरे को चमका सकें। धीरे-धीरे कर जो जन उन्हें भूलने लगे थे, उनके ध्यान में आ सकें। अब कोई अगर जेल जाने की जिद पर ही अड़ा जाए तो भला कोर्ट भी क्या कर सकता है! आखिर इच्छा तो पूरी करनी ही पड़ेगी। किंतु उनकी तो जिद ही अनूठी है, ठीक उनके व्यक्तित्व के जैसी।

अब सुर्खियों में बने रहने के लिए कुछ तो चाहिए चलो जेल ही सही। यों भी, उनका राजनीति आधार इन चुनावों में ही मिट्टी में मिल गया। जो बचा था, उसे जेल जाने के स्वांग ने कचरे में मिल दिया। बड़े क्रांतिकारी। बहुत ही बड़े क्रांतिकारी।

मुझे उनकी जगह राजनीति से कहीं ज्यादा नौटंकी में बेहतर लगती है। क्योंकि मियां नौटंकी गजब की कर लिया करते हैं। मुद्दा चाहे 49 दिन में पीठ दिखाकर मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़कर भागने का हो या बनारस से चुनाव लड़ने की जिद का, नौटंकी मियां ने हर जगह 'जबरदस्त' की है। चाहे गाल पर थप्पड़ खाए हों या स्याही पुतवाई हो, सबको मीडिया ने भी मस्त होकर भुनाया है। आंदोलन ऐसे किए हैं मानो अराजकता की स्क्रिप्ट लिख रहे हों। हर सरकारी सुविधा पाने के बाद भी यह कहना कि मेरा किसी भी सुविधा में विश्वास नहीं। वाकई बड़े क्रांतिकारी। बहुत ही बड़े क्रांतिकारी।

सच बोलता हूं, अगर ऐसे 'नौटंकीनुमा-क्रांतिकारी' हमारे यहां और हो जाएं फिर कहीं और नाटक देखने जाने की जरूरत ही नहीं। सारा का सारा मसाला अपने ही घर में मौजूद। मनोरंजन के लिए ऐसी नौटंकियां जरूरी हैं।

फिलहाल, (इन पंक्तियों के रचे जाने तक) मियां अभी जेल में ही हैं। कब तलक जेल के भीतर-बाहर नौटंकियां करते रहेंगे कहना मुश्किल है। पर मुझे क्या, मेरा मनोरंजन तो हो ही रहा है। मियां जब भी ऐसी कोई नौटंकी करते हैं, मैं भरपूर 'आनंद' लेता हूं। वो मेरे लिए, दरअसल, सिर्फ 'मनोरंजन की वस्तु' हैं। जय हो।

2 टिप्‍पणियां:

संजय बेंगाणी ने कहा…

क्रांतिकारी, बहुत क्रांतिकारी

parmeshwari choudhary ने कहा…

महान नेता बनने के लिए जेल का अनुभव बहुत जरुरी है। क्रन्तिकारी जी 6 जून तक तिहाड़ में रहेंगे और वहाँ बंद आदमियों की परेशानियाँ मिटने के लिए धरना भी देंगे। देख लीजियेगा। :)