बुधवार, 21 मई 2014

सहानुभूति के बहाने

चित्र साभारः गूगल
सहानुभूति के मामले में मैं बेहद 'सजग' रहता हूं। कोशिश मेरी यही रहती है कि मैं हर उस व्यक्ति के प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट कर सकूं, जिसके साथ कुछ न कुछ 'अफसोसजनक' हुआ है। किसी के दुख को अपना समझ सहानुभूति व्यक्त करना भी एक ‘कला‘ है प्यारे। यों भी, आज के जमाने भला कौन किसके दुख में शरीक होता है, वो भी सहानुभूति के साथ!

चूंकि अभी-अभी चुनावी नतीजे आकर चुके हैं, इस नाते आजकल मैं अपनी सहानुभूतियों के साथ बहुत व्यस्त हूं। अब तलक न जाने कित्ते नेताओं (हारे एवं जमानत जब्त हुए) को अपनी सहानुभूतियां लिखित एवं शाब्दिक तौर पर दे चुका हूं। फिर भी, कुछ को दिया जाना अभी बाकी है। जिन तलक मैं स्वयं अपनी सहानुभूति प्रकट नहीं कर पाया, उनके तईं मैंने एक पीए रख रखा है। वो मेरे कहे और लिखे को उन तलक पहुंचा देता है। मेरा मानना है, दुखी बंदे तलक मेरी सहानुभूति कैसे या किसी भी रास्ते पहुंचनी चाहिए। यह मेरी 'ड्यूटी' भी है।

मुझसे सबसे ज्यादा सहानुभूति प्रकट करने में मजा उन नेताओं के प्रति आया है, जिनकी जमानतें जब्त हुई हैं। चुनाव में हार को तो चलो बंदा एक दफा पचा लेगा लेकिन हार के साथ-साथ जमानत जब्त होना, बेहद ‘लज्जामय‘ बात है। हारने वाला एक दफा अपनी शक्ल जनता को दिखला भी सकता है लेकिन... जमानत जब्त हुआ, बेचारा, शक्ल दिखलाने लायक भी नहीं रह पाता। हार के बावजूद जमानत का जब्त हो जाना मतलब धड़ का शरीर से अलग हो जाने जैसा है।

अब ऐसे दुखी बंदे के साथ भी अगर मैं अपनी सहानुभूति प्रकट नहीं कर पाता, तो मेरे मनुष्य जीवन पर ‘लानत‘ है प्यारे। सहानुभूति के दो मीठे शब्दों से अगले को कित्ता सुकून मिलता होगा, इस अहसास को केवल वही समझ सकता है।

इस दफा सहानुभूति प्रकट करने में मुझे थोड़ा कठिनाई का भी सामना करना पड़ा। जित्ती संख्या में नेताओं की जमानतें जब्त हुईं हैं, मेरे कने सहानुभूति के शब्द और भावनाएं तक कम पड़ गईं। वो तो जैसे-तैसे गूगल कर-करके खानापूर्ति की गई। कुछ पिछले चुनाव में व्यक्त की गईं सहानुभूतियों को उधार लेना पड़ा। सच बताऊं, इत्ता मैंने भी नहीं सोचा था कि नेता लोग 'ऐसे' हारेंगे। राजनीति का बड़े से बड़ा धुरंधर या तीसमारखां हार कर अपनी जमानत जब्त कराए बैठा है। जनता के बीच 'खिल्ली' उड़ रही है, सो अलग। अब करती रहे पार्टी आत्म-मंथन या चिंतन, हार गए तो हार ही गए। साथ-साथ, जमानत की तौहमत और चिपक गई।

हारे हुए से सहानुभूति रखो अच्छी बात है किंतु यों किसी की खिल्ली नहीं उड़ाई चाहिए। सुना है, 'पाप' लगता है।

इसीलिए मैं जीन-जान जुटा हूं, जहां तलक हो पा रहा है कर भी रहा हूं अपनी सहानुभूतियों को बांटने-बांटवाने में।

यों, मेरे भीतर और तो कोई 'अच्छा गुण' नहीं- ले दे के सहानुभूति ही है, जिसे मैं हर दुखी, हर पीडि़त पर व्यक्त कर दिया करता हूं। क्या करूं, बचपन से आदत ऐसी पड़ी है कि छूटने का नाम ही नहीं लेती है। सहानुभूति के मामले में न मेरे परिवार और न मेरे मोहल्ले में मेरे जैसा दू-दूर तलक कोई नहीं है। लोग बताते हैं, मेरी सहानुभूति में उत्ती ही ‘शक्ति‘ होती है, जित्ती निर्मल बाबा की 'किरपा' में।

खैर, बहुतों तक अपनी 'सहानुभूतियां' प्रकट कर चुका हूं, फिर भी, जिन्हें नहीं मिल पाई हैं, इस लेख के माध्यम से ले लें। यकीन रखें, सहानुभूति का असर 'सेम-टू-सेम' ही रहेगा।

4 टिप्‍पणियां:

Amrita Tanmay ने कहा…

बढ़िया कहा है..

Datta Ghosh ने कहा…

WELL SAID, NICE TO READ GOOD HINDI WRITING AFTER SUCH A LONG TIME

अंशुमाली रस्तोगी ने कहा…

शुक्रिया आप दोनों का।

हरमिन्दर सिंह चाहल ने कहा…

सहानूभुति चीज ही ऐसी है दूसरे को कम लग सकती है। हमारे यहां तो 13 लोगों की जमानत जब्त हुई। उन्हें सहानुभूति के लिफाफे हमने भी भिजवा दिये।