बुधवार, 14 मई 2014

लहर पे सवार सेंसेक्स

चित्र साभारः गूगल
अभी तलक तो वे ही 'लहर' पे सवार थे, अब हमारा प्यारा सेंसेक्स भी 'लहर' पे सवार हो गया है। लहर का सहारा पाकर सरपट-सरपट दौड़े चला जा रहा है। आखिर क्यों न दौड़े... इत्ते लंबे टाइम बाद दौड़ने का मौका जो हाथ आया है। यों भी, दौड़ना स्वस्थ सेहत के लिए जरूरी भी है।

सेंसेक्स की यह 'संकेतिक लहर' बताती है कि अब अच्छे दिनों को आने से कोई नहीं रोक सकता। अच्छे दिन आने भी चाहिए। बहुत रह लिए बुरे दिनों के बीच। बेचारे सेंसेक्स ने तो इत्ते-इत्ते बुरे दिन देखें हैं- कभी किसी दुश्मन को भी न देखने पड़ें। बुरे दिनों में फंसकर दलाल पथ तो एकदम बेदम-सा हो गया था।

लेकिन वक्त कभी भी एक जैसा नहीं रहता प्यारे। कल तलक बुरे दिनों को झेला अब अच्छे दिनों का स्वागत है।

वैसे हमारा सेंसेक्स रहता बहुत 'सकारात्मक मूड' में है। कभी किसी का न बुरा सोचता है, न चाहता। पर क्या कीजिएगा, जब सामने वाले ने ही ठान रखी हो 'पटखनी' देने की। दबाव में फिर सेंसेक्स भी 'धराशाही' हो जाता है। गिरावट न होने के बावजूद गिर जाता है। दरअसल, सेंसेक्स अपनी संवेदनाओं पर कंट्रोल नहीं कर पाता। जहां किसी ने जरा छींक मारी नहीं कि सेंसेक्स धड़ाम। लेकिन जब उठता है तो फिर किसी के रोके बैठता नहीं।

मगर अब कुछ ऐसी सकारात्मक उम्मीदें बंधने लगी हैं कि सेंसेक्स आसानी से किसी की छींक का शिकार नहीं होगा। छींकने वाले को ही अपनी लहर में ऐसा लपेटेगा कि अगला चारों खाने चित्त नजर आएगा। यही होना भी चाहिए।

हमारा सेंसेक्स जनता से अलग थोड़े सोचता है। जैसे जनता को दरकार है एक स्थिर सरकार की, वैसे ही सेंसेक्स को भी। इसी आशा में ही तो सेंसेक्स अनुमानों के पार निकलकर खिलखिला रहा है। इस वक्त हमारे प्यारे सेंसेक्स की खिलखिलाहट देखते ही बनती है।

सेंसेक्स का जोर हमेशा देश की अर्थव्यवस्था को 'गुलाबी' बनाए रखने में रहा है। जब भी यह मौका उसके हाथ आया है, उसने कसर कोई नहीं रख छोड़ी है। जरा याद कीजिए सन् 2008 से पहले के समय को। सेंसेक्स अपनी पूरी 'जवानी' पर था। क्या सरकार, क्या दलाल पथ, क्या निवेशक सब एक सुर में बल्ले-बल्ले कर रहे थे। डॉलर दबा हुआ था, रुपया मजबूत था। लेकिन कहते हैं न, बुरा समय आते वक्त ही कित्ता लगता है। तो बुरे समय का एक ऐसा झौंका आया, जिसमें वो सबको एक साथ बहा ले गया। बेचारे सेंसेक्स पर कई साल बुरे गुजरे। इस बीच सेंसेक्स सेहत के साथ-साथ आत्मविश्वास में भी अच्छा खासा कमजोर हुआ।

फिलहाल, अभी सीन काफी बदला हुआ है। हमारा प्यारा सेंसेक्स फुलटू खिलखिला और 24000 हजार के शिखर पर पहुंचकर मस्ता रहा है। सही मायने में स्थिर सरकार की संभावना का स्वागत सबसे पहले सेंसेक्स ने ही किया। अब इसे सेंसेक्स की जिंदादिली या सकारात्मकता न कहा जाए तो फिर क्या कहा जाए!

नकारात्मक किस्म के लोगों-बुद्धिजीवियों-प्रगतिशीलों को सेंसेक्स की सकरात्मक ऊर्जा से प्रेरणा लेनी चाहिए।

बनाने वालों का मुंह फिर भी बना हुआ है। उन्हें यह बात भीतर ही भीतर 'कचोट' रही है कि हाय! सेंसेक्स इत्ता बढ़ क्यों रहा है। दरअसल, जल वे इसीलिए रहे हैं क्योंकि जलना ही उनका काम है। कृपया, उन्हें यों ही जलने-भुनने दें।

हर फिक्र से बेपरवाह हमारा प्यारा सेंसेक्स इठला रहा है। सेंसेक्स की यह इठलाहट कायम रहे। लहर बनी रहे। और यों ही 'नए शिखर' को छूता रहे।

3 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन यक लोकतंत्र है, वोट हमारा मंत्र है... मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

आशा जोगळेकर ने कहा…

सेन्सेक्स की तरह ही देश भी छुए प्रगती के नये आयाम।

Prasanna Badan Chaturvedi ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
नयी पोस्ट@आप की जब थी जरुरत आपने धोखा दिया (नई ऑडियो रिकार्डिंग)