रविवार, 11 मई 2014

मोदीमय सेंसेक्स

चित्र साभारः गूगल
सेंसेक्स को 'खिलखिलाने' के मौके बहुत कम मिला करते हैं। लेकिन जब भी मिलते हैं पूरे जोर और जोश के साथ खिलखिलाता है। गत शुक्रवार को भी कुछ ऐसा ही हुआ। मोदी के आने भर की आहट पाते ही सेंसेक्स खिलखिलाकर 600 अंक दौड़ गया। एक दफा जो दौड़ा फिर न हाथ आया न वापस लौटा। चंद घंटों में ही सेंसेक्स ने खुद को 'मोदीमय' कर लिया। भले ही कुछ देर के लिए सही पर हमारा सेंसेक्स मुस्कुराया तो। मुस्कुराहट बहुत जरूर है, चाहे कुछ मिनट की हो या सेकेंड की।

मुस्कुराने-खिलखिलाने से, कहते हैं, खून बढ़ता है। मोदीमय होकर ही अगर सेंसेक्स का ग्राफ ऊपर चला गया, तो बुरा क्या है?

सेंसेक्स को यों भी दरकार रहती है अच्छे दिनों की। अच्छे दिनों में सेंसेक्स वो करिश्मे दिखला देता है, जिसकी कल्पना करने से हम थोड़ा घबराते हैं। घबराहट लाजमी है क्योंकि सेंसेक्स के मूड का कोई भरोसा नहीं- कब में शोला, कब में माशा। पर, इत्ता जरूर है कि हर सकारात्मक खबर पर सेंसेक्स उछलता खूब है। उछलना सेंसेक्स का 'विशेष गुण' है।

अंदर की खबरें यही बताती हैं कि दलाल पथ पर अब रौनक भरे दिन लौटने को हैं। सेंसेक्स के लेकर अर्थव्यवस्था तक मोदीमय होने को है। मगर फिर भी कयासों का बाजार गर्म है प्यारे। कोई नहीं जानता कि 16 मई को किसका ऊंट किस करवट बैठेगा। कौन कहां से बाजी जीतेगा और कौन हारेगा? अच्छे दिन आएंगे भी या नहीं या फिर सब हवा-हवाई बनकर ही रह जाएगा? लेकिन कयासों-संशयों के बीच अगर कुछ सकारात्मक खुशी मिल रही है, फिर क्यों न उसको जी भरकर जी लिया जाए। क्या कहते हो प्यारे?

सुना कि सेंसेक्स का मोदीमय होना कुछ लोगों को 'अखरा' भी। कहा- सेंसेक्स का मोदीकरण जानकर किया गया। केवल एक दिन की तेजी को सेंसेक्स का अच्छे दिनों में लौटना न समझा जाए। तो क्या...। लोग हैं, बातें हैं। बनेंगी ही। लोगों की बातों पर खाक डालकर क्यों न सकारात्मकता में ही जिया जाए। जीके देखो प्यारे- बहुत सुकून मिलेगा।

भले अफवाह के सहारे ही सही सेंसेक्स अगर मोदीमय हुआ भी तो हमारा कौन-सा कुछ ले गया। हां, देकर जरूर गया। मैंने तो एक दिन की तेजी में ही अपना उल्लू सीधा कर लिया। क्या पता, अगली दफा सच्ची-मुच्ची का उल्लू ही न बनना पड़े!

भई, अपनी खुशी तो सेंसेक्स की खिलखिलाहट में ही निहित है। सेंसेक्स चाहे मोदीमय होकर खिलखिलाय या राहुलमय होकर, अपने को मतलब मुस्कुराने से है।

दुआ करता हूं, सेंसेक्स की यह खिलखिलाहट बरकरार रहे आगे भी- चाहे सरकार कोई भी आए। क्योंकि, सेंसेक्स की खिलखिलाहट में ही अर्थव्यवस्था की गुलाबियत बसी है।

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