बुधवार, 28 मई 2014

शपथ-ग्रहण के बाद

चित्र साभारः गूगल
चलिए, शपथ-ग्रहण भी हो गया। नरेंद्र मोदी विधिवत प्रधानमंत्री भी बन गए। जिन्हें जो पद दिए जाने थे, वो भी लगभग दे ही दिए गए। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ-साथ सार्क देशों के नेताओं से भी मेल-मुलाकात हो गई। जित्ती भव्यता की उम्मीद की जा रही थी, उससे कहीं ज्यादा ही हो ली। अव्वल तो थी नहीं किंतु जिनकी जरा-बहुत भी नाराजगियां थीं, उनको भी सुलटा लिया गया। साथ-साथ, वरिष्ठों को कायदे से किनारे कर केवल मार्ग-दर्शक ही बने रहने को कहा गया। मीडिया ने भी भरपूर कवरेज देते हुए, शपथ-ग्रहण को 'बेशकीमती समारोह' बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चाहने वालो और समर्थकों ने भी जमकर दीवाली मनाई। मिठाइयां बांटी-बंटवाईं। नाच-गाने भी खूब हुए।

भव्य-जश्न के बाद अब बारी अच्छे दिनों को अच्छे से लाने की है। जित्ती मात्रा में वायदे किए गए थे, उन्हें अब निभाने की है। छप्पन इंच के सीने को अब दिखाने की है। साठ साल बनाम साठ महीने के फासले को सफलता में तब्दील करने की है। पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते मजबूत और व्यवहारिक बनाने की है। किसानों-गरीबों को समर्पित सरकार के वास्तव में वैसा ही लगने-दिखने की है।

हालांकि किए गए वायदे न एक दिन में पूरे हो जाएंगे न ही एक रात में मगर फिर भी जनता को ऐसा महसूस तो होना चाहिए कि हां प्रधानमंत्रीजी उन्हीं रास्तों पर चल रहे हैं। वरना अब तलक तो जित्ते भी नेता-मंत्री जिन-जिन रास्तों पर चले हैं- सब ने अपना ही अपना भला किया है। सत्ता के सहारे मिली कुर्सी की मलाई केवल खुद ही छक कर खाई है और जनता को बाबाजी का ठुल्लू दिया है। किसी मंत्री ने कोयले की दलाली में अपना चेहरा काला किया तो कोई टूजी-थ्रीजी से अपनी झोली भरता रहा। चलो मलाई खुद ही खाता तो ठीक था- पर साथ-साथ अपने दामादों-संबंधियों को भी खूब खिलाई। और महज तीन साल में ही करोड़ों कमाकर डकार भी न ली प्यारे ने।

बाकी की कसर एक तरफा महंगाई ने पूरी कर दी। मंत्रीजी के मुंह से निकलने की देरी थी और महंगाई सरपट-सरपट दौड़ लेती। फिर भी तमाम मंत्रियों-नेताओं का दावा था कि जनता महज पांच रुपए या पच्चीस रुपए में भरपूर पेट भर सकती है और गुजारा भी कर सकती है। बावजूद इसके जनता ने इन्हें भी झेला और जब झेलते-झेलते थक गई तो अपने मत से तगड़ा फैसला भी सुना दिया।

खैर, अब देश और जनता की बागडोर नई सरकार के हाथ है। नई सरकार क्या नया और क्रांतिकारी काम करती है, समय बताएगा। पर ज्यादा समय तक 'आत्ममुग्धता' में जीना भी ठीक नहीं। विराट जनादेश के बदले में जनता को कुछ विकास-प्रधान मिले तो है बात प्यारे। यह न हो कि बातें-वायदे केवल खाली-मूली में ही हवा बनकर रह जाएं। लंबी-लंबी तो 'आप' ने भी बहुत छोड़ी थी लेकिन मियां महज 49 दिनों में ही मैदान छोड़कर भाग लिए। बस ऐसा मजाक जनता के साथ न हो। जो शपथ ली है, नई सरकार का जोर उसे पूरा करने में हो नाकि भूल जाने में।

थोड़ी लगाम अगर चेलों-चपाटों पर भी कस ली जाए फिर तो सारे काम आसान ही आसान। क्योंकि सरकार, देश और जनता की ऐसी-तैसी करने में चेले-चपाटे ज्यादा सक्रिय रहते हैं। पिछली सरकार के अनुभव नई सरकार के लिए काफी हैं, ज्यादा बतलाने की जरूरत नहीं।

सरकार का अच्छे दिन लाने का समय शुरू हो चुका है अब।

रविवार, 25 मई 2014

'मेरी जिद' बनाम 'केजरीवाल जिद'

चित्र साभारः गूगल
यों तो जिद्दी मैं भी कुछ कम नहीं लेकिन केजरीवाल की जिद के आगे मेरा जिद्दीपन पानी मांगता है! मेरी जिद 'क्षणिक' होती है लेकिन केजरीवाल की जिद 'अनिश्चित'। मैं जिद मांग और माहौल को देखकर करता हूं लेकिन केजरीवाल समय-असमय कैसी भी जिद करने का दम रखते हैं। एक दफा केजरीवाल अपनी जिद पर जम जाएं तो मजाल है किसी माईकलाल की कि उन्हें डरा पाए। सच्ची, मैं केजरीवाल की जिद के आगे बेहद बौना हूं। पत्नी भी ताना मारते हुए कहती है- भई, जिद हो तो केजरीवाल जैसी वरना न हो। जो बंदा अपनी जिद की खातिर कोर्ट से भिड़ जाए, उसे वीरता-चक्र मिलना सौ फीसद बनता है।

हर कोई जिद करने में फरफैक्ट नहीं होता। मैंने अपने आस-पास न जाने कित्ते ही जिद्दीयों को देखा है, परंतु प्रभाव कोई भी नहीं छोड़ पाया। कुछ तो जिद इसीलिए करते हैं क्योंकि उनके कने करने को कुछ नहीं होता। और जिद्दें भी ऐसी-ऐसी की भेजा पगला जाए। मेरे मौहल्ले में ही एक जिद्दी पहलवान हैं। उनका नाम जिद्दी पहलवान इसीलिए पड़ा क्योंकि वे सचमुच के पहलवान न बन सके। एक और जिद्दी महाशय हैं। उन्हें इस बात का मलाल है कि वे जिद-जिद में यह ही तय नहीं कर पाते कि जिद किस बात पर करनी है, किस पर नहीं। एक तो मेरे पड़ोसी ही हैं, वे कभी-कभी इत्ती जिद कर लेते हैं कि पागलखाने तक ले जाने की नौबत आ जाती है।

मैंने बोला न कि जिद करना हर किसी के बस की बात नहीं। वो तो केजरीवाल का जिगर इत्ता मजबूत है, जो प्रत्येक किस्म की जिद को बर्दाशत कर लेता है। भला कोर्ट-कचहरी-पुलिस से भिड़ना सामान्य आदमी के बस का कहां। चूंकि केजरीवाल सौ फीसद आम आदमी हैं इसीलिए जिद के पक्के और धरना एक्सपर्ट हैं।

हां, यह सही है कि चुनाव में केजरीवाल और उनकी पार्टी बुरी तरह हारे मगर फिर भी उन्होंने रस्सी के बल बने रहना ही मंजूर किया। जमानत जब्त गई तो क्या, जनता ने खारिज कर दिया तो क्या, पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ा तो क्या मगर केजरीवाल अपनी जिद, अपने हट पर अड़े रहे। इसको कहते हैं, बड़ा क्रांतिकारी, बहुत ही बड़ा क्रांतिकारी। जिद के साथ-साथ क्रांतिकारिता (!) का जज्बा (!) केजरीवाल में गजब का है। बधाई उन्हें।

जिस तरह से केजरीवाल टोपी या मफलर की ब्रांडिग हुई, उसी तरह से केजरीवाल-जिद की भी ब्रांडिग होनी चाहिए। बाजार में टिके रहने के तईं बहुत जरूरी है। केजरीवाल ने हमें सीख दी है कि राजनीति या सामान्य जीवन में भी कोई काम 'शांति' से मत करो, जब करो 'हल्ला' मचाकर करो। इससे चेहरा और वैल्यू दोनों बढ़ते हैं।

प्रयासरत हूं कि मैं भी अपनी जिद में 'केजरीवाल-जिद' जैसा इफेक्ट ला सकूं ।

शनिवार, 24 मई 2014

अच्छे दिन और सेंसेक्स

चित्र साभारः गूगल
अच्छे दिन शुरू होने का स्वागत सबसे पहले प्यारे सेंसेक्स ने किया। छप्पन इंची का सीना फुलाकर सेंसेक्स ने अर्थव्यवस्था के गालों पर गुलाबी चुंबन धर दिया। दलाल पथ गुलजार हुआ। सालों से मुरझाए चेहरों पर मुस्कुराहट की चमक साफ दिखी। मैंने भी चैन की लंबी सांस ली कि अब हमारा सेंसेक्स जन-हित के वास्ते बहुत कुछ करेगा।

सेंसेक्स को अच्छे दिनों की तलाश हर समय रहती है। अच्छे दिनों में रहकर सेंसेक्स कहीं अधिक बेहतर कर पाता है। सरकार से कहीं अधिक फिक्र सेंसेक्स को निवेशकों की रहती है। उसकी कोशिश यही होती है कि उसके दर पर आया प्रत्येक निवेशक कुछ न कुछ 'लेकर' ही जाए, 'खो' कर नहीं। क्योंकि खोना सेंसेक्स को पसंद नहीं। खोई चीज या इज्जत का दोबारा मिल पाना बेहद मुश्किल होता है। सेंसेक्स ने तो इस 'अपमान' को जाने कित्ती ही दफा खुद पर झेला है। इत्ते-इत्ते बुरे दिन देखे कि कोई दुश्मन भी न देखे।

बावजूद इत्ती कठिनाईयों के सेंसेक्स अपनी जमीन पर सिर्फ इस उम्मीद पर बना रहा कि एक न एक दिन 'अच्छे दिन' जरूर आएंगे। और देखिए अच्छे दिन आ भी गए। इसे कहते हैं- सकारात्मकता में जीने का फल।

वरना, हम तो जरा से दुख में ही इत्ते नकारात्मक और बेचैन से हो जाते हैं कि आते हुए अच्छे दिन भी हमारे पास आने में कतराते हैं। कुछ लोग तो नकारात्मकता को ही अपने जीने और जीवन का उद्देश्य बनाकर हर समय 'रोते' रहते हैं।

किंतु प्यारे सेंसेक्स के साथ ऐसा नहीं है। सेंसेक्स नकारात्मकता से ज्यादा सकारात्मकता में यकीन रखता है। तब ही तो एक दिन में हजार अंक बढ़कर और पच्चीस हजारी होकर मंदड़ियों को मुंह चिढ़ा गया। बेचारे मंदड़िए परेशान हैं सेंसेक्स की तेज रफ्तार को देखकर।

सेंसेक्स के उत्साहित मूड को देखकर लगता तो यही है कि यह रफ्तार अब नहीं थमेगी। थमनी चाहिए भी नहीं। क्योंकि 'बुरी नजर' वालों को सबक सिखाना भी तो जरूरी है प्यारे। देखा नहीं, पिछली सरकार में बेचारे सेंसेक्स की क्या हालत हो गई थी। पटकनी दे-देकर उसका वो हाल कर दिया था कि बेचारा न चेहरा दिखाने लायक रहा था न छिपाने। दुनिया भर के बाजारों में सेंसेक्स के साथ-साथ अर्थव्यवस्था की जग-हंसाई हुई सो अलग।

वो कहते हैं न कि सब दिन एक समान नहीं होते। अच्छे दिनों के आगाज के बाद शायद अब ऐसा ही कुछ होने वाला। जिस हल्ले के साथ अच्छे दिन आने वाले हैं को विज्ञापित किया गया- अब यही समय उन्हें लाने का भी है।

खैर, सेंसेक्स के रास्ते अच्छे दिनों की अच्छी शुरूआत हुई तो है। अब यह देखना आगे है कि ये अच्छे दिन सेंसेक्स के साथ-साथ जनता के मिजाज को कब तक प्रसन्न रख पाते हैं। उम्मीद पर दुनिया पहले टिकी होती थी अब तो प्यारे अच्छे दिनों पर ही टिकी है।

गुरुवार, 22 मई 2014

इत्ते ईमानदार, इत्ते क्रांतिकारी बस 'आप' हैं

चित्र साभारः गूगल
अब उनके बारे में क्या कहूं और कैसे कहूं! उनके बारे में कुछ भी कहना, सिर में से जूं निकालने समान है। साथ-साथ, वे इत्ते ईमानदार हैं, इत्ते ईमानदार हैं कि ईमानदारी भी उनके आगे घुटने टेकती है। और तो और विश्व के महान ईमानदारों के बीच वे एक अकेले ऐसे ईमानदार हैं, जो सुर्खियां बटोरने में सबसे आगे रहते हैं। बस उन्हें मौका मिलना चाहिए फिर वे खांसने से लेकर जेल जाने तक पर कमाल की सुर्खियां बटोर सकते हैं। मैं उनकी इस 'सुर्खियां-बटेरू' कला का कायल हूं।

भीषण ईमानदार होने के साथ-साथ वे भीषण किस्म के क्रांतिकारी भी हैं। लोग बताते हैं- भगत सिंह के बाद वे दूसरे ऐसे क्रांतिकारी हैं, जिनकी क्रांतिकारिता के चर्चे गली-मोहल्ले से ज्यादा बुद्धिजीवियों के बीच होते हैं। वे बुद्धिजीवियों के 'रोल-मॉडल' हैं। अक्सर बुद्धिजीवि लोग उनकी क्रांतिकारी छवि को इसीलिए महिमामंडित करते रहते हैं ताकि उनके क्रांतिकारी दल में उन्हें भी कोई कोना मिल सके। इसीलिए बुद्धिजीवियों की कोशिश रहती है, उनमें भगत सिंह से लेकर लाल बहादुर शास्त्री तक की छवि को गढ़ना। लेकिन प्यारे महज छवि गढ़ लेने से न कोई क्रांतिकारी हो जाता है न सादगी-पसंद।

नेता के तईं जेल जाना कोई नई बात नहीं होती है। अक्सर जन-हित में नेता लोग जेल की सैर कर आ चुके हैं। लेकिन ये मियां तो जेल सिर्फ इसीलिए गए हैं ताकि मीडिया और जनता के बीच अपने चेहरे को चमका सकें। धीरे-धीरे कर जो जन उन्हें भूलने लगे थे, उनके ध्यान में आ सकें। अब कोई अगर जेल जाने की जिद पर ही अड़ा जाए तो भला कोर्ट भी क्या कर सकता है! आखिर इच्छा तो पूरी करनी ही पड़ेगी। किंतु उनकी तो जिद ही अनूठी है, ठीक उनके व्यक्तित्व के जैसी।

अब सुर्खियों में बने रहने के लिए कुछ तो चाहिए चलो जेल ही सही। यों भी, उनका राजनीति आधार इन चुनावों में ही मिट्टी में मिल गया। जो बचा था, उसे जेल जाने के स्वांग ने कचरे में मिल दिया। बड़े क्रांतिकारी। बहुत ही बड़े क्रांतिकारी।

मुझे उनकी जगह राजनीति से कहीं ज्यादा नौटंकी में बेहतर लगती है। क्योंकि मियां नौटंकी गजब की कर लिया करते हैं। मुद्दा चाहे 49 दिन में पीठ दिखाकर मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़कर भागने का हो या बनारस से चुनाव लड़ने की जिद का, नौटंकी मियां ने हर जगह 'जबरदस्त' की है। चाहे गाल पर थप्पड़ खाए हों या स्याही पुतवाई हो, सबको मीडिया ने भी मस्त होकर भुनाया है। आंदोलन ऐसे किए हैं मानो अराजकता की स्क्रिप्ट लिख रहे हों। हर सरकारी सुविधा पाने के बाद भी यह कहना कि मेरा किसी भी सुविधा में विश्वास नहीं। वाकई बड़े क्रांतिकारी। बहुत ही बड़े क्रांतिकारी।

सच बोलता हूं, अगर ऐसे 'नौटंकीनुमा-क्रांतिकारी' हमारे यहां और हो जाएं फिर कहीं और नाटक देखने जाने की जरूरत ही नहीं। सारा का सारा मसाला अपने ही घर में मौजूद। मनोरंजन के लिए ऐसी नौटंकियां जरूरी हैं।

फिलहाल, (इन पंक्तियों के रचे जाने तक) मियां अभी जेल में ही हैं। कब तलक जेल के भीतर-बाहर नौटंकियां करते रहेंगे कहना मुश्किल है। पर मुझे क्या, मेरा मनोरंजन तो हो ही रहा है। मियां जब भी ऐसी कोई नौटंकी करते हैं, मैं भरपूर 'आनंद' लेता हूं। वो मेरे लिए, दरअसल, सिर्फ 'मनोरंजन की वस्तु' हैं। जय हो।

बुधवार, 21 मई 2014

सहानुभूति के बहाने

चित्र साभारः गूगल
सहानुभूति के मामले में मैं बेहद 'सजग' रहता हूं। कोशिश मेरी यही रहती है कि मैं हर उस व्यक्ति के प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट कर सकूं, जिसके साथ कुछ न कुछ 'अफसोसजनक' हुआ है। किसी के दुख को अपना समझ सहानुभूति व्यक्त करना भी एक ‘कला‘ है प्यारे। यों भी, आज के जमाने भला कौन किसके दुख में शरीक होता है, वो भी सहानुभूति के साथ!

चूंकि अभी-अभी चुनावी नतीजे आकर चुके हैं, इस नाते आजकल मैं अपनी सहानुभूतियों के साथ बहुत व्यस्त हूं। अब तलक न जाने कित्ते नेताओं (हारे एवं जमानत जब्त हुए) को अपनी सहानुभूतियां लिखित एवं शाब्दिक तौर पर दे चुका हूं। फिर भी, कुछ को दिया जाना अभी बाकी है। जिन तलक मैं स्वयं अपनी सहानुभूति प्रकट नहीं कर पाया, उनके तईं मैंने एक पीए रख रखा है। वो मेरे कहे और लिखे को उन तलक पहुंचा देता है। मेरा मानना है, दुखी बंदे तलक मेरी सहानुभूति कैसे या किसी भी रास्ते पहुंचनी चाहिए। यह मेरी 'ड्यूटी' भी है।

मुझसे सबसे ज्यादा सहानुभूति प्रकट करने में मजा उन नेताओं के प्रति आया है, जिनकी जमानतें जब्त हुई हैं। चुनाव में हार को तो चलो बंदा एक दफा पचा लेगा लेकिन हार के साथ-साथ जमानत जब्त होना, बेहद ‘लज्जामय‘ बात है। हारने वाला एक दफा अपनी शक्ल जनता को दिखला भी सकता है लेकिन... जमानत जब्त हुआ, बेचारा, शक्ल दिखलाने लायक भी नहीं रह पाता। हार के बावजूद जमानत का जब्त हो जाना मतलब धड़ का शरीर से अलग हो जाने जैसा है।

अब ऐसे दुखी बंदे के साथ भी अगर मैं अपनी सहानुभूति प्रकट नहीं कर पाता, तो मेरे मनुष्य जीवन पर ‘लानत‘ है प्यारे। सहानुभूति के दो मीठे शब्दों से अगले को कित्ता सुकून मिलता होगा, इस अहसास को केवल वही समझ सकता है।

इस दफा सहानुभूति प्रकट करने में मुझे थोड़ा कठिनाई का भी सामना करना पड़ा। जित्ती संख्या में नेताओं की जमानतें जब्त हुईं हैं, मेरे कने सहानुभूति के शब्द और भावनाएं तक कम पड़ गईं। वो तो जैसे-तैसे गूगल कर-करके खानापूर्ति की गई। कुछ पिछले चुनाव में व्यक्त की गईं सहानुभूतियों को उधार लेना पड़ा। सच बताऊं, इत्ता मैंने भी नहीं सोचा था कि नेता लोग 'ऐसे' हारेंगे। राजनीति का बड़े से बड़ा धुरंधर या तीसमारखां हार कर अपनी जमानत जब्त कराए बैठा है। जनता के बीच 'खिल्ली' उड़ रही है, सो अलग। अब करती रहे पार्टी आत्म-मंथन या चिंतन, हार गए तो हार ही गए। साथ-साथ, जमानत की तौहमत और चिपक गई।

हारे हुए से सहानुभूति रखो अच्छी बात है किंतु यों किसी की खिल्ली नहीं उड़ाई चाहिए। सुना है, 'पाप' लगता है।

इसीलिए मैं जीन-जान जुटा हूं, जहां तलक हो पा रहा है कर भी रहा हूं अपनी सहानुभूतियों को बांटने-बांटवाने में।

यों, मेरे भीतर और तो कोई 'अच्छा गुण' नहीं- ले दे के सहानुभूति ही है, जिसे मैं हर दुखी, हर पीडि़त पर व्यक्त कर दिया करता हूं। क्या करूं, बचपन से आदत ऐसी पड़ी है कि छूटने का नाम ही नहीं लेती है। सहानुभूति के मामले में न मेरे परिवार और न मेरे मोहल्ले में मेरे जैसा दू-दूर तलक कोई नहीं है। लोग बताते हैं, मेरी सहानुभूति में उत्ती ही ‘शक्ति‘ होती है, जित्ती निर्मल बाबा की 'किरपा' में।

खैर, बहुतों तक अपनी 'सहानुभूतियां' प्रकट कर चुका हूं, फिर भी, जिन्हें नहीं मिल पाई हैं, इस लेख के माध्यम से ले लें। यकीन रखें, सहानुभूति का असर 'सेम-टू-सेम' ही रहेगा।

सोमवार, 19 मई 2014

टि्वटर पर रजनीकांत

चित्र साभारः गूगल
मेरी बचपन से चाहत रजनीकांत जैसा बनने की थी! रजनीकांत की फिल्में देख-देखकर अक्सर उनके जैसा एक्शन या स्टंट किया करता था। मैंने सिगरेट पीना सिर्फ इसीलिए शुरू किया था ताकि रजनीकांत-स्टाइल में उसे सुलगा सकूं। रजनीकांत का चश्मा पहनने का स्टाइल मुझे अब तक आकर्षित करता है।

जब-जब रजनीकांत को देखता हूं शरीर में अजीब-सी उर्जा का संचार होता है। लगता है, मैं हर कठिन से कठिन काम को चुटकी बजाकर निपटा डालूंगा। यकीन मानिए, रजनीकांत स्टाइल में मैंने कित्ते ही काम चुटकी बजाकर निपटाए भी हैं। मसलन, जब बीवी बीमार हो तो घर में झाड़ू लगाना, खाना बनाना और बर्तन साफ करना। यों, घर के काम देखने में लगते बहुत आसान हैं पर जब करने बैठो तो नानी क्या परदादा तक याद आ जाते हैं। लेकिन मैं हर छोटे-बड़े काम को रजनीकांत स्टाइल में निपटाता हूं। फिलहाल, अभी तक मैंने किसी से पंगा लेकर उसे रजनीकांत स्टाइल में नहीं निपटाया है। दरअसल, थोड़ा डर-सा लगता है। वैसे कोई बात नहीं है।

इधर जब से सुना है- रजनीकांत अब टि्वटर पर आ गए हैं, मैंने भी टि्वटर पर रहना शुरू कर दिया है। फेसबुक से किनारा कर लिया है। भला यह कैसे संभव है कि रजनीकांत टि्वटर पर रहें और मैं फेसबुक पर। टि्वटर पर मैं आराम से उन्हें और वे मुझे पढ़ सकते हैं। साथ-साथ, मैंने उन्हें फॉलो भी करने लगा हूं।

न केवल बीवी बल्कि मोहल्ले के प्रत्येक मोहल्लेदार को पकड़-पकड़ कर मैंने बताया है कि मैं रजनीकांत के फॉलोअर्स में शामिल हो गया हूं। अपने मोबाइल पर भी मैंने फेसबुक को हटाकर टि्वटर को जमा लिया है। टि्वटर पर रहने का अंदाज ही कुछ और है। एक तो, चार लोगों के बीच में खुद को एक्ट्राऑडनरी-सा महसूस होता है। बड़ा गर्व-सा महसूस होता यह कहना कि अलां-फलां मुद्दे पर मैंने यह ट्वीट किया। टि्वटर पर रहना 'सामाजिक हैसियत' में भी बढ़ोत्तरी करता है।

चूंकि अब रजनीकांत टि्वटर पर हैं, इस नाते टि्वटर को भी अपने फीचर में कुछ एक्शननुमा बदलाव लाने चाहिए। रजनीकांत के स्टाइल और स्टंट की तर्ज पर इसे डिजाइन किया जाना चाहिए। आखिर लगे तो कि टि्वटर पर रजनीकांत के होने के क्या मायने हैं।

वैसे, रजनीकांत और अमिताभ बच्चन का टि्वटर पर होना टि्वटर के तईं सम्मान की बात है।

रजनीकांत के टि्वटर पर आने का असर यह हुआ है कि मेरे मोहल्ले के स्टंट-पसंद लोगों ने भी टि्वटर पर रहना शुरू कर दिया है। वे अब पड़ोसी मोहल्ले वालों को भी टि्वटर पर रहने को प्रेरित कर रहे हैं ताकि रजनीकांत के ट्वीट(स) का आनंद लिया जा सके। टि्वटर के रजनीकांतमय होने में हर्ज ही क्या है प्यारे।

बुधवार, 14 मई 2014

लहर पे सवार सेंसेक्स

चित्र साभारः गूगल
अभी तलक तो वे ही 'लहर' पे सवार थे, अब हमारा प्यारा सेंसेक्स भी 'लहर' पे सवार हो गया है। लहर का सहारा पाकर सरपट-सरपट दौड़े चला जा रहा है। आखिर क्यों न दौड़े... इत्ते लंबे टाइम बाद दौड़ने का मौका जो हाथ आया है। यों भी, दौड़ना स्वस्थ सेहत के लिए जरूरी भी है।

सेंसेक्स की यह 'संकेतिक लहर' बताती है कि अब अच्छे दिनों को आने से कोई नहीं रोक सकता। अच्छे दिन आने भी चाहिए। बहुत रह लिए बुरे दिनों के बीच। बेचारे सेंसेक्स ने तो इत्ते-इत्ते बुरे दिन देखें हैं- कभी किसी दुश्मन को भी न देखने पड़ें। बुरे दिनों में फंसकर दलाल पथ तो एकदम बेदम-सा हो गया था।

लेकिन वक्त कभी भी एक जैसा नहीं रहता प्यारे। कल तलक बुरे दिनों को झेला अब अच्छे दिनों का स्वागत है।

वैसे हमारा सेंसेक्स रहता बहुत 'सकारात्मक मूड' में है। कभी किसी का न बुरा सोचता है, न चाहता। पर क्या कीजिएगा, जब सामने वाले ने ही ठान रखी हो 'पटखनी' देने की। दबाव में फिर सेंसेक्स भी 'धराशाही' हो जाता है। गिरावट न होने के बावजूद गिर जाता है। दरअसल, सेंसेक्स अपनी संवेदनाओं पर कंट्रोल नहीं कर पाता। जहां किसी ने जरा छींक मारी नहीं कि सेंसेक्स धड़ाम। लेकिन जब उठता है तो फिर किसी के रोके बैठता नहीं।

मगर अब कुछ ऐसी सकारात्मक उम्मीदें बंधने लगी हैं कि सेंसेक्स आसानी से किसी की छींक का शिकार नहीं होगा। छींकने वाले को ही अपनी लहर में ऐसा लपेटेगा कि अगला चारों खाने चित्त नजर आएगा। यही होना भी चाहिए।

हमारा सेंसेक्स जनता से अलग थोड़े सोचता है। जैसे जनता को दरकार है एक स्थिर सरकार की, वैसे ही सेंसेक्स को भी। इसी आशा में ही तो सेंसेक्स अनुमानों के पार निकलकर खिलखिला रहा है। इस वक्त हमारे प्यारे सेंसेक्स की खिलखिलाहट देखते ही बनती है।

सेंसेक्स का जोर हमेशा देश की अर्थव्यवस्था को 'गुलाबी' बनाए रखने में रहा है। जब भी यह मौका उसके हाथ आया है, उसने कसर कोई नहीं रख छोड़ी है। जरा याद कीजिए सन् 2008 से पहले के समय को। सेंसेक्स अपनी पूरी 'जवानी' पर था। क्या सरकार, क्या दलाल पथ, क्या निवेशक सब एक सुर में बल्ले-बल्ले कर रहे थे। डॉलर दबा हुआ था, रुपया मजबूत था। लेकिन कहते हैं न, बुरा समय आते वक्त ही कित्ता लगता है। तो बुरे समय का एक ऐसा झौंका आया, जिसमें वो सबको एक साथ बहा ले गया। बेचारे सेंसेक्स पर कई साल बुरे गुजरे। इस बीच सेंसेक्स सेहत के साथ-साथ आत्मविश्वास में भी अच्छा खासा कमजोर हुआ।

फिलहाल, अभी सीन काफी बदला हुआ है। हमारा प्यारा सेंसेक्स फुलटू खिलखिला और 24000 हजार के शिखर पर पहुंचकर मस्ता रहा है। सही मायने में स्थिर सरकार की संभावना का स्वागत सबसे पहले सेंसेक्स ने ही किया। अब इसे सेंसेक्स की जिंदादिली या सकारात्मकता न कहा जाए तो फिर क्या कहा जाए!

नकारात्मक किस्म के लोगों-बुद्धिजीवियों-प्रगतिशीलों को सेंसेक्स की सकरात्मक ऊर्जा से प्रेरणा लेनी चाहिए।

बनाने वालों का मुंह फिर भी बना हुआ है। उन्हें यह बात भीतर ही भीतर 'कचोट' रही है कि हाय! सेंसेक्स इत्ता बढ़ क्यों रहा है। दरअसल, जल वे इसीलिए रहे हैं क्योंकि जलना ही उनका काम है। कृपया, उन्हें यों ही जलने-भुनने दें।

हर फिक्र से बेपरवाह हमारा प्यारा सेंसेक्स इठला रहा है। सेंसेक्स की यह इठलाहट कायम रहे। लहर बनी रहे। और यों ही 'नए शिखर' को छूता रहे।

रविवार, 11 मई 2014

मोदीमय सेंसेक्स

चित्र साभारः गूगल
सेंसेक्स को 'खिलखिलाने' के मौके बहुत कम मिला करते हैं। लेकिन जब भी मिलते हैं पूरे जोर और जोश के साथ खिलखिलाता है। गत शुक्रवार को भी कुछ ऐसा ही हुआ। मोदी के आने भर की आहट पाते ही सेंसेक्स खिलखिलाकर 600 अंक दौड़ गया। एक दफा जो दौड़ा फिर न हाथ आया न वापस लौटा। चंद घंटों में ही सेंसेक्स ने खुद को 'मोदीमय' कर लिया। भले ही कुछ देर के लिए सही पर हमारा सेंसेक्स मुस्कुराया तो। मुस्कुराहट बहुत जरूर है, चाहे कुछ मिनट की हो या सेकेंड की।

मुस्कुराने-खिलखिलाने से, कहते हैं, खून बढ़ता है। मोदीमय होकर ही अगर सेंसेक्स का ग्राफ ऊपर चला गया, तो बुरा क्या है?

सेंसेक्स को यों भी दरकार रहती है अच्छे दिनों की। अच्छे दिनों में सेंसेक्स वो करिश्मे दिखला देता है, जिसकी कल्पना करने से हम थोड़ा घबराते हैं। घबराहट लाजमी है क्योंकि सेंसेक्स के मूड का कोई भरोसा नहीं- कब में शोला, कब में माशा। पर, इत्ता जरूर है कि हर सकारात्मक खबर पर सेंसेक्स उछलता खूब है। उछलना सेंसेक्स का 'विशेष गुण' है।

अंदर की खबरें यही बताती हैं कि दलाल पथ पर अब रौनक भरे दिन लौटने को हैं। सेंसेक्स के लेकर अर्थव्यवस्था तक मोदीमय होने को है। मगर फिर भी कयासों का बाजार गर्म है प्यारे। कोई नहीं जानता कि 16 मई को किसका ऊंट किस करवट बैठेगा। कौन कहां से बाजी जीतेगा और कौन हारेगा? अच्छे दिन आएंगे भी या नहीं या फिर सब हवा-हवाई बनकर ही रह जाएगा? लेकिन कयासों-संशयों के बीच अगर कुछ सकारात्मक खुशी मिल रही है, फिर क्यों न उसको जी भरकर जी लिया जाए। क्या कहते हो प्यारे?

सुना कि सेंसेक्स का मोदीमय होना कुछ लोगों को 'अखरा' भी। कहा- सेंसेक्स का मोदीकरण जानकर किया गया। केवल एक दिन की तेजी को सेंसेक्स का अच्छे दिनों में लौटना न समझा जाए। तो क्या...। लोग हैं, बातें हैं। बनेंगी ही। लोगों की बातों पर खाक डालकर क्यों न सकारात्मकता में ही जिया जाए। जीके देखो प्यारे- बहुत सुकून मिलेगा।

भले अफवाह के सहारे ही सही सेंसेक्स अगर मोदीमय हुआ भी तो हमारा कौन-सा कुछ ले गया। हां, देकर जरूर गया। मैंने तो एक दिन की तेजी में ही अपना उल्लू सीधा कर लिया। क्या पता, अगली दफा सच्ची-मुच्ची का उल्लू ही न बनना पड़े!

भई, अपनी खुशी तो सेंसेक्स की खिलखिलाहट में ही निहित है। सेंसेक्स चाहे मोदीमय होकर खिलखिलाय या राहुलमय होकर, अपने को मतलब मुस्कुराने से है।

दुआ करता हूं, सेंसेक्स की यह खिलखिलाहट बरकरार रहे आगे भी- चाहे सरकार कोई भी आए। क्योंकि, सेंसेक्स की खिलखिलाहट में ही अर्थव्यवस्था की गुलाबियत बसी है।

गुरुवार, 8 मई 2014

मेरी जांच भी करवा लो

चित्र साभारः गूगल
मेरी मित्र-मंडली में शायद ही कोई ऐसा मित्र हो जिसकी किसी न किसी मामले में जांच न चल रही हो। मेरे मित्र नौकरियों से ज्यादा व्यस्त अपने खिलाफ चल रही जांचों में रहते हैं। बड़ी बात यह है कि कोई भी मित्र अपने खिलाफ जांचों को लेकर परेशान या बेचैन नहीं दिखता। आए दिन उनके घरों के आगे कभी इनकम टैक्स, कभी सीबीआइ, कभी एसआइटी के अफसरों की गाड़ियां खड़ी ही रहती हैं। अखबारों में आए दिन उनके खिलाफ चल रही जांचों की खबरें भी छपती हैं। अड़ोसी-पड़ोसी भले ही उन्हें अच्छा इंसान न मानतें हों पर इससे मित्रों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। वे गर्व के साथ अपने खिलाफ चली रही जांचों के बारे में मुझे बतलाते हैं।

अपने मित्रों के बीच मैं खुद को बेचारा-सा महसूस करता हूं। हर वक्त इसी गम में घुलता रहता हूं कि मेरे खिलाफ क्यों कोई जांच नहीं चलता? क्यों कोई मेरी भी शिकायत सरकार से नहीं करता? जबकि मेरी और मेरे मित्रों की कमाई के साधन लगभग एक जैसे ही हैं। जिन तरकीबों से वे नोट कमाते हैं, मैं भी। हर नामी-गिरामी उद्योगपति से जित्ते उनके करीबी संबंध हैं, मेरे भी। लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों किसी की भी निगाह मुझ पर टेढ़ी नहीं होती।

सच बताऊं, जाने कित्ती ही दफा मैं अपने फेसबुक-टि्वटर एकाउंट पर लिख चुका हूं कि हां, मेरे कने भी काला धन है। मैं भी अपना काला धन स्विस बैंक खाते में ही रखता हूं। आए दिन स्विट्जरलैंड के चक्कर भी लगाता हूं। देश के ऊंचे नेताओं-व्यापारियों के यहां मेरा लगभग रोज का आना-जाना भी है। फिर भी मेरे खिलाफ कोई क्यों नहीं जांच बैठाता? जबकि जांच बैठनी चाहिए। मुझसे भी लंबी-चौड़ी बातचीत होनी चाहिए। मीडिया में मेरा भी नाम खूब उछलना चाहिए। किसी विदेशी अखबार को मेरे खिलाफ तथ्य जुटाकर खबर प्रकाशित करनी चाहिए। जैसाकि दामादश्री के खिलाफ किया। मगर कोई पहल ही नहीं करता। क्या सब डरते हैं मुझसे?

एक लेखक कने काला धन होना बहुत बड़ी बात है। पर कोई मानने को तैयार ही नहीं। मेरे मित्र भी कहां मानते हैं। हजारों दफा उनको बोल चुका हूं कि यार, मेरे खिलाफ भी जांच बैठवा दो। मगर कोई सुनकर ही नहीं देता। हंसकर टाल जाते हैं। पता नहीं क्यों मुझे ईमानदार समझते हैं? जबकि मैं ईमानदार कतई नहीं हूं। अपने परिवार और मोहल्ले का छंटा हुआ बेईमान हूं मैं। बेईमानी ही मेरी पूंजी है। बेईमानी ही मेरी साधना है।

गजब देखिए, अभी हाल काला धन वालों की जो सूची जारी हुई उसमें भी तो मेरा नाम नहीं है। यह मेरे तईं बेहद शर्म की बात है।

खैर, मैं पुनः सरकार से गुजारिश करता हूं कि मेरी भी जांच करवा लो प्लीज।

बुधवार, 7 मई 2014

बे-कंट्रोल होती जुबान

चित्र साभारः गूगल
प्यारे, जब लड़कों से 'गलती' हो सकती है तो फिर नेताओं की जुबान क्यों नहीं 'बहक' सकती? बहक सकती है, बिल्कुल बहक सकती है। जुबान का काम ही बहकना है। राजनीति में रहकर नेता की जुबान न बहके, भला ऐसा कभी हुआ है। चुनावों के दौरान नेताओं की जुबान कुछ ज्यादा ही बहक जाती है। क्या करें, उन्हें अपनी जुबान पर 'कंट्रोल' ही नहीं होता। जोश-खरोश के चक्कर में सब गड़बड़ हो जाती है। गलती जुबान की होती है, नोटिस बेचारे नेताओं को थमा दिया जाता है।

केवल जुबान की खातिर नेताओं को नोटिस थमाना या उनसे जवाब-तलब करना मुझे समझ नहीं आता। बेचारे नेताओं को पांच साल में चुनाव के दौरान ही तो मौका मिलता है, जनता से रू-ब-रू होने का, अपनी कथित उपल्बधियों को गिनाने का, दूसरे दलों-नेताओं की टांग-खिंचाई करने का, ऐसे में अगर उनकी जुबान कहीं कुछ बहक भी जाती है, तो इसे हल्के में ही लेना चाहिए। जुबान के बहाने नेताओं पर ज्यादा 'आक्रमकता' ठीक नहीं। बदजुबानी नेताओं का शगल नहीं होती, वो तो बस जरा-सा जोश 'रायता' फैला देता है।
 
नेताओं की बहकी जुबान को सुनने का अलग ही 'आनंद' है। मगर गंभीर या बुद्धिजीवि किस्म के लोग इस आनंद को महसूस नहीं कर पाएंगे। अक्सर बहकी जुबान में वे इत्ता दिलचस्प और व्यंग्यात्मक कह-बोल जाते हैं, जिसे सुनकर अच्छा-खासा मनोरंजन हो जाता है। शब्दवाण चलाने में हमारे देश के नेताओं का जवाब नहीं। एक नेता दूसरे नेता को कुछ भी या कैसा भी बोल सकता है, इत्ती छूट वे ले ही लेते हैं। कभी शहजादा, कभी कुत्ते का पिल्ला, कभी बबर शेर, कभी सांड, कभी मौत का सौदागर, कभी मादारी, कभी ड्रामेबाज, कभी भगौड़ा आदि-आदि।

नेताओं की जुबान को सुनकर अक्सर यह महसूस होता है कि राजनीति में पढ़ा-लिखा होना कोई जरूर नहीं बस जुबान या दिमाग का तेज होना चाहिए। राजनीति खुद-ब-खुद सध जाएगी।

जुबान के मामले में कुछ नेता लोग तो ऐसे हैं, जिनकी जुबान को राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा जाना चाहिए। वे जब भी जुबान खोलते हैं (चाहे कम या ज्यादा), गारंटी है, बहकते जरूर हैं। ऊपर वाले ने उनकी जुबान में कुछ ऐसा 'यंत्र' लगा कर रखा है कि जुबान का बहकना तय ही है। उन नेताओं की हमें आदत भी कुछ ऐसी पड़ चुकी है कि उनकी 'बिन बहकी जुबान' अब अच्छी भी नहीं लगती। अपने राजनीतिक-विरोधियों को वे जिस जुबान में आड़े हाथों लेते हैं, उसका कहना ही क्या प्यारे।

देखिए, नेताओं कने एक जुबान ही है, जिसे हिलाकर वे विकास भी कर सकते हैं, जन-हित के समर्थन में खड़े भी हो सकते हैं, जनता से वोट भी मांग सकते हैं, जन समस्याओं का हल भी निकाल सकते हैं, विरोधियों को लताड़ भी सकते हैं। यानी, जुबान नेताओं का बायां हाथ है। केवल जुबान के सहारे ही इत्ते सारे कामों को कर पाना, यह हमारे देश के लोकतंत्र में ही संभव है। इस नाते हमें हमारे नेताओं की जुबान पर 'फक्र' होना चाहिए नाकि उन्हें 'गरियाना'।

दरअसल, नेताओं को गरियाकर हम अपनी ही जुबान खराब कर रहे होते हैं, उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

बेहतर यही है कि हम नेताओं की जुबान के प्रति अपनी सोच को खुला रखें। न खुद गंभीर हों, न बेवजह शिकायत करें। बेचारे नेताओं कने एक जुबान ही है, जो आड़े वक्त में उनके काम आती है। वरना तो सब राजनीति है प्यारे।

बस इत्ता ध्यान रखिए, राजनीति में नेताओं की जुबान 'बे-कंट्रोल' होती है। कंट्रोल हमें खुद पर ही करना होता है।

मंगलवार, 6 मई 2014

जीजाजी की जमीनी लहर

चित्र साभारः गूगल
सिवाय जीजाजी की जमीनी लहर के कोई दूसरी लहर मुझे न चलती हुई दिख रही है न बहती हुई। आज हर जगह, हर कहीं बस जीजाजी की जमीनी लहर के ही चर्चे हैं। चाहे टीवी पर बहस हो या सड़क-चौराहे पर बातचीत जीजाजी की जमीनी लहर ही प्राथमिकता में है। आखिर प्राथमिकता में हो भी क्यों न? जीजाजी ने महज पांच साल में जो चमत्कार करके दिखाया, वो हर किसी के बस की बात नहीं कर पाना। चमत्कार को नाम आप कुछ भी दे लीजिए लेकिन कर वाकई कमाल ही दिया।

मुझ जैसा दोयम दर्जे का लेखक ऐसे चमत्कार के बारे में सोचना तो बहुत दूर की बात है, कल्पना भी नहीं कर सकता। चलो कल्पना अगर कर भी ले तो साकार करने लायक सोर्स नहीं मिलेगा। लेकिन जीजाजी के साथ ऐसा कोई रगड़ा नहीं था। उन्हें कल्पना तो करनी ही नहीं थी। उनके सोर्स ही इत्ते तगड़े थे कि पांच साल में लाख से करोड़ बन गए।

खैर, सोर्स कित्ता भी रहा हो मगर मेहनत तो जीजाजी की ही थी। हवा में या लहर पर संघर्ष तो कोई भी कर सकता है किंतु सीधे जमीन पर संघर्ष करना, हर किसी के बूते की बात नहीं। इस जमीनी संघर्ष के वास्ते मैं जीजाजी की बेहद इज्जत करता हूं। लोगों को अक्सर उदाहरण दिया करता हूं- जमीनी संघर्ष को लहर में बदलने का दम सिर्फ और सिर्फ हमारे जीजाजी में ही है। सोच रहा हूं, जीजाजी पर एक किताब ही लिख डालूं। वैसे भी, महान व्यक्तित्व पर किताब लिखना सम्मान की बात है प्यारे।

यह देखकर मुझे अच्छा नहीं लगता कि कुछ लोग बेवजह ही जीजाजी की जमीनी लहर के विरोध में आकर खड़े हो जाते हैं। जमीनी संघर्ष का हिसाब मांगते हैं। लाख के करोड़ बनने पर बेतुकी बयानबाजी करते हैं। फिलहाल, भाभीजी ने उचित ही विरोधियों को हद में रहने की हिदायत दी है। ऐंवई किसी के जमीनी संघर्ष पर उंगली उठाना, ठीक नहीं।

आगे सरकार चाहे किसी भी आए पर जीजाजी का जमीनी संघर्षर ऐसे ही जारी रहना चाहिए। जीजाजी के जमीनी संघर्ष पर बनी लहर को देखकर मुझे बेहद आत्मबल मिलता है। दिल में बार-बार उमंग-सी जागती है कि मैं भी जीजाजी जैसी जमीनी लहर बना पाऊं। क्योंकि लेखन से तो लहर बनने से रही!

अभी चुनाव जरा निपट लेने दीजिए फिर जुगाड़ करता हूं जीजाजी के संपर्क में आकर जमीनी संघर्ष के गुण सिखने की। लाख से करोड़ बनाने के लिए जीजाजी से बेहतर मुझे कोई दूसरा बंदा नजर नहीं आता। नहीं भूलना चाहिए कि हमारे जीजाजी सीधे जमीन से जुड़े इंसान हैं।