गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

जमीन से जुड़े जीजाजी

चित्र साभारः गूगल 
हालांकि रिश्ते में वो मेरे जीजाजी नहीं हैं पर मैं उन्हें अपने जीजाजी की निगाह से ही देखता हूं। उत्ता ही मान-सम्मान भी देता हूं। जरूरी नहीं, हर समय नाते-रिश्तेदारों को अपना सगा-संबंधी कहा जाए, कभी-कभार बाहर वालों को भी यह इज्जत देनी चाहिए। मेरा मानना है, अपनी भलाई की खातिर रिश्ते किसी से भी बनाए जा सकते हैं। जमाना बिगाड़कर नहीं, बनाकर चलने का है। कब, कौन, कहां काम आ जाए, कुछ नहीं कह सकते।
हां, यह बात सही है कि मेरा जीजाजी से आज तक न आमना-सामना हुआ है, न ही वो मुझे जानते हैं। पर इससे क्या होता है? जरूरी नहीं कि किसी को अपना मानने या बनाने के लिए उसे जाना या उससे मिला ही जाए। हम अहसास के तौर पर भी उसे अपना मान सकते हैं। प्यार (लव) में तो अक्सर ऐसे किस्से होते-बनते रहते हैं। इसे आप मेरा जीजाजी के प्रति प्यार (सम्मान) ही समझिए।

मेरे दिल में उन लोगों के प्रति खास जगह है, जो जमीन से जुड़े होते हैं। जमीन के लिए ही जीते हैं। जमीन से ही संघर्ष करते हैं। जमीन के नाम पर ही लाख से करोड़ बना लेते हैं। किसान के लिए भले ही जमीन सोना न उगल पाए पर उनके लिए तो उगलती ही है। और क्या खूब उगलती है। जीजाजी की गिनती ऐसे ही जमीन से जुड़े इंसानों में होती है।

जीजाजी के जमीनी-संघर्ष को देखकर मेरा सीना गर्व से फूल जाता है। जमीन ने जीजाजी को वो सब दिया, जिसकी कल्पना मेरे जैसा बे-जमीनी लेखक सपने में भी नहीं कर सकता। बताइए, मात्र पांच साल में मात्र एक लाख रुपए से जीजाजी ने तीन सौ पच्चीस करोड़ पैदा कर डाले। न न इसके आप कोरी किस्मत का चमकना न मानिए, यह जीजाजी के जमीनी-संघर्ष का प्रतिफल है। इस कमाई में एक तरफ जीजाजी का संघर्ष रहा तो दूसरी तरफ हाथ का साथ। जिस बंदे को हाथ के साथ का सहयोग निरंतर मिलता रहा हो, वो भला कैसे नहीं लाख के करोड़ कर सकता है? हमारे जीजाजी ने यह चमत्कार करके दिखाया।

फिर भी कुछ जलनखोर टाइप के लोग हैं, जो जीजाजी के जमीनी-संघर्ष और कमाई से जलते हैं। आए दिन उन्हें कोसते रहते हैं। सरकार से जांच करवाने की गुहार लगाते हैं। सरेआम जमीनी-दलाल कहकर बदनाम करते हैं। और तो और एक विदेशी अखबार ने भी हमारे जीजाजी के खिलाफ जाने क्या-क्या बकबास छापी है। जीजाजी की कमाई पर सवाल उठाए हैं।

अरे आरोप लगाने वालों का क्या है, कुछ भी कहते फिरते हैं। यहां कोई भी यह नहीं देख रहा कि जीजाजी ने कित्ती मेहनत के साथ, कित्ते कम समय में, कित्ती जोड़-जुगाड़ करके खुद को पैरों पर खड़ा किया है। सब उनकी कमाई का रोना-धोना लेकर बैठ गए हैं। जीजाजी ने अगर कमाई की है, तो केवल अपने बूते पर। कोई इत्ता जमीनी-संघर्ष करके तो दिखाए। दो दिन में न टांके ढिले हो जाएं, तो मेरा नाम बदल देना।

किसी और को क्या कहूं, जब अपने आप को देखता हूं, तो मुझे खुद पर शर्म आती है। मेरी पत्नी मुझे नकारा लेखक कहकर तंज कसती है। कहती है- दस साल हो गए तुम्हें यहां-वहां कलम रगड़ते हुए, क्या कमाया? जेब में दस रुपए तक तो मिलते नहीं। एक जीजाजी हैं, जिन्होंने मात्र पांच साल में कायाकल्प कर डाला। लेखन से न जुड़कर अगर तुम जमीन से जुड़े होते, तो आज जाने कहां से कहां होते। लेखन को छोड़कर जीजाजी जैसा बनने की कोशिश करो। समझे।

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