सोमवार, 7 अप्रैल 2014

दल बदलने में हर्ज क्या है?

चित्र साभारः गूगल
प्यारे, जब गिरगिट रंग बदल सकता है, तेंदुआ शहर में घुस सकता है, दूध में पानी मिल सकता है, तो नेता दल क्यों नहीं बदल सकता? आखिर नेता के दल बदलने में दिक्कत क्या है? नेता के दल बदलने पर इत्ती हाय-तौबा क्यों मचाई जाती है? यह लोकतंत्र है। और लोकतंत्र में हर किसी को अधिकार है, कहीं भी आने-जाने, खाने-पीने, बोलने-लिखने का। तो फिर दल बदलना 'लोकतांत्रिक प्रक्रिया' के तहत क्यों नहीं आता?

अरे भई, नेता का दिल अपने दल में नहीं लगा। उसे छोड़कर वो दूसरे दल में शामिल हो गया। दूसरे दल में भी दिल नहीं लगा, तीसरे दल में शामिल हो गया। ऐसे ही तीसरे, चौथे, पांचवे...हजारों प्रकार के दल हैं यहां, किसी में भी शामिल हो सकता है। क्या बड़ी-बड़ी कंपनियों में बंदे ऐसा नहीं करते? एक कंपनी को छोड़कर दूसरी कंपनी, दूसरी को छोड़कर तीसरी...।

सोचने वाली बात है, नेता दल या बंदा कंपनी को अगर नहीं छोड़ेगा-पकड़ेगा तो अन्य दलों या कंपनियों का क्या होगा? नेताओं की दलों के भीतर-बाहर आवाजाही बेहद जरूरी है। एक तो अन्य दलों के नेता संपर्क में रहते हैं और आड़े वक्त में काम भी आते हैं। फिर नेता अगर दल नहीं बदलेगा, तो चुनावों में मनोरंजन कैसे होगा? यह भी तो जरूर है न।

देखिए, राजनीति में सबकुछ चलता है। अगर सबकुछ न चले न, तो बेचारे नेताओं को कोई पूछेगा भी नहीं। भई, मैं तो इस बात के पक्ष में हूं कि जहां दाना-पानी ठीक-ठाक मिले, बंदे या नेता को अपना दिल वहीं लगाना चाहिए। ये अतिबद्धता-प्रतिबद्धता के दिन अब लद चुके हैं प्यारे। प्रतिबद्धता का मतलब यह थोड़े है कि अपने पेट पर लात मार लो। आजकल जब पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति प्रतिबद्धता नहीं हो-रह पाते फिर यह तो राजनीति है। राजनीति संभावनाओं और महत्त्वाकांक्षाओं का क्षेत्र है, यहां जिसके कने पावर, वही राजा।

कोई अनोखा नहीं हो रहा इन चुनावों में, कि अलां नेता फलां पार्टी में चले गए, कि इस दल ने उस दल के नेता को तोड़ लिया। हमारे यहां ज्यादातर चुनाव लड़े ही दल बदलूओं के आधार पर जाते हैं। अपनी पार्टी से टिकट नहीं मिला, तो दूसरी पार्टी से ले लिया। मतलब तो प्यारे टिकट मिलने से है। चाहे ये दे या वो दे। अपना काम बनता, भाड़ में जाए प्रतिबद्धता। अब सब सुविधा की राजनीति में जीते हैं। कल का क्या भरोसा रहे न रहे। सत्ता में एक दफा अगर कुर्सी नीचे से खिसक गई, तो फिर इत्ती आसानी से हाथ भी नहीं आती। क्या समझे...।

आदमी की जब निजी या सामाजिक जीवन में नैतिक गड़बड़ा जाती है, फिर यह तो राजनीति है। नैतिकता या ईमानदारी से यहां जिसने भी राजनीति की तुरंत ही हाशिए पर धकेल दिया गया। बहुत कहते थे आप वाले कि हम सौ फीसद शुद्ध व ईमानदारी की राजनीति करेंगे। खुद ही देख लो, कित्ती ईमानदारीपूर्ण राजनीति कर रहे हैं। ईमानदारों के बीच भी टिकट को लेकर जूतम-पैजार मची हुई है। ईमानदारी की माला जप-जप के उन्होंने बेचारे आम आदमी का ही बैंड बजा दिया।

जब तक दो-चार इधर या उधर न आएं-जाएं मजा नहीं आता राजनीति में। आया राम-गया राम के माध्यम से ही तो पता चलता है कि फलां दल में फलां पद खाली है। अगर सब एक ही जगह रहेंगे तो क्या खाक मजा आएगा राजनीति में!

हमें दल बदलू नेताओं के प्रति हीनता का नहीं, सम्मान का भाव रखना चाहिए। बेचारों की अपने दल में कोई न कोई मजबूरी ही रही होगी, जो उन्हें दूसरे दल का रूख करना पड़ा। दल-बदल तो एक स्वभाविक प्रक्रिया है राजनीति की। राजनीति में रहकर जो जित्ते दल बदल लेगा, वही अच्छे से सरवाइव कर पाएगा। नहीं तो खुदा ही मालिक।

दल बदलूओं से परेशान न हों उनका तहे-दिल से स्वागत करें। दल बदलू नेता भारतीय राजनीति एवं लोकतंत्र के महत्त्वपूर्ण स्तंभ हैं।

1 टिप्पणी:

कविता रावत ने कहा…

दल नहीं दलदल कहिये ..... फिर क्या फर्क पड़ता है कहीं भी लुढक जाय कोई.
बहुत बढ़िया प्रस्तुति। .