रविवार, 6 अप्रैल 2014

मैं और छिपकली

यह तो मुझे नहीं मालूम कि छिपकली मुझसे डरती है या नहीं पर मैं छिपकली से बहुत डरता हूं। छिपकली का डर मेरे दिलो-दिमाग में अंदर तक बस गया है। जहां-जिस कमरे या जगह में छिपकली होती है, वहां मैं नहीं होता। छिपकली को दूर से देखकर ही मेरी पतलून पानी-पानी हो जाती है। हालांकि कोशिश कई दफा की कि छिपकली से न डरूं, उसके करीब जाकर उसके हाल-चाल लूं, लेकिन डर के आगे जीत कभी नहीं मिल पाई।

वैसे छिपकली से एक मैं ही नहीं, मुझे लगता है, बहुत से लोग डरते हैं। इन बहुत से लोगों में महिलाओं की संख्या ज्यादा है। उन्हें तो कॉकरोच तक से डर लगता है। जबकि मैं कॉकरोच से नहीं डरता! कॉकरोच के साथ मेरा तालमेल अच्छा है। अपने कमरे में मैंने कॉकरोचों को भरपूर जगह दी हुई है- रहने-खाने-पीने-सोने की। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि कॉकरोच मेरे ऊपर ही सो गए हैं। कॉकरोच नुकसान कतई नहीं पहुंचाते। बेहद शांत भाव से, अपनी लंबी-लंबी मूंछों को यहां-वहां फैलाते-उठाते-गिराते रहते हैं।

हालांकि शांत स्वभाव की छिपकली भी होती है। पर पता नहीं क्यों, उसकी शांति में एक अजीब तरह का डर छिपा होता है। छिपकली को देखते ही मुझे ऐसा लगने लगता है कि अब ये सिर्फ मुझ पर ही आकर गिरेगी। चाहे वो मुझसे पांच-दस गज की दूरी पर ही क्यों न हो। लेकिन उसका होना ही खौफ के होने जैसा होता है मेरे लिए।

छिपकली से सबसे ज्यादा परेशानी मुझे नहाने और पाखाने जाने में होती है। नाहते समय अगर छिपकली दिख जाए या पाखाने में दर्शन हो जाएं फिर तो आप कल्पना ही कर सकते हैं- मेरे भय के टेंपरेचर की। उस वक्त डर के मारे न मुझे पसीना आता है, न चीखता-चिल्लाता हूं। सांसें जहां जैसी होती हैं, बस वहीं थम जाती हैं। एकाध बार ऐसा हुआ भी है। वो तो गनीमत रही- छिपकली ने मुझसे कुछ कहा नहीं।

कहा यही जाता है कि छिपकली सामान्यता डरपोक होती है। इंसान को देख खुद ही इधर-उधर हो जाती है। बिना छेड़ा-छाड़ी काटती भी नहीं। अपने प्रिय कीड़ों को बस निगल लेती है। मगर फिर भी उसकी छवि किसी आतंक से कम नहीं होती। तुर्रेमखां भी छिपकली के आगे पनाह मांगते हैं। यों, छिपकली ज्यादा डरावनी (यहां मैं अफ्रीका आदि देशों में पाई जाने वाली छिपकलियों की बात नहीं कर रहा) नहीं होती मगर डरने के लिए उसका 'नाम' ही काफी होता है।

पत्नी मजाक बनाती है कि मैं लेखक होकर छिपकली से डरता हूं। जबकि लेखक को तो हर स्थिति में बहादुर होना चाहिए। कहीं या किसी और मामले में शायद बहादुर होऊं किंतु छिपकली में मामले में कभी नहीं हो सकता। एक बार पत्नी के गुस्से के आगे डटकर खड़ा रह सकता हूं, पर छिपकली के आगे कभी नहीं। छिपकली मेरे डर का मुख्य कारण है।

मेरे मोहल्ले में भी सबको मालूम है कि मैं छिपकली से बहुत डरता हूं इसलिए उन्होंने मेरा नाम ही 'छिपकली-लेखक' रख दिया है। मेरे मुंह पर तो नहीं कहते मगर मुझे पता है। मैं बुरा नहीं मानता। बुरा मानने का कोई फायदा भी तो नहीं क्योंकि जो है सो है ही। यों भी, दुनिया मैं ऐसा कोई बंदा नहीं जो किसी न किसी से डरता न हो। डरते सब हैं पर कह नहीं पाते। लेकिन मैं कह देता हूं। हां, मुझे छिपकली से बेहद डर लगता है।