शनिवार, 5 अप्रैल 2014

एक बेईमान बंदे की बतकही

मैं मेरे परिवार का सबसे बेईमान बंदा हूं! जबकि मेरे परिवार में एक से बढ़कर एक ईमानदार मौजूद हैं। लेकिन मेरी पटरी परिवार के ईमानदारों से कभी नहीं बैठ पाई। एकाध दफा कोशिश की भी पटरी बैठाने की पर किसी न किसी बात पर अखड़ ही गई। पटरी न बैठ पाने के कारण परिवार वाले मुझसे उत्ती ही दूरी बनाकर रहते हैं, जित्ती आजकल भाजपा वाले राम-मंदिर के मुद्दे पर बनाए हुए हैं।

मैंने खुद के बेईमान होने पर कभी अफसोस जाहिर नहीं किया। मुझे बेईमान बनकर रहने में ही मजा आता है। इस बहाने कम से कम बेमतलब की हवाई लफ्फबाजियों से तो दूर रहता हूं। वरना परिवार में तो सारे ईमानदार हर समय लंबी-लंबी ही छोड़ते रहते हैं। कभी-कभी उनके छोड़ने की लंबाई इत्ती लंबी हो जाती है कि वे खुद नहीं संभला पाते।

मेरे परिवार के ईमानदार आजकल मोहल्ले की एक ईमानदार पार्टी को चुनाव लड़वाने में जुटे हुए हैं। ईमानदार पार्टी का ईमानदार नेता मेरे परिवार वालों का खास आदमी है। हर काम मेरे परिवार वालों से ही पूछकर किया करता है। एक-दो बार उसने मुझे भी अपनी ईमानदार पार्टी में शामिल करने की कोशिश की मगर मैंने यह कहते हुए मना कर दिया- भाई, मैं कतई ईमानदार नहीं हूं। मुझे ईमानदार और ईमानदारों से चिढ़ है। बस तब ही से मैं उस ईमानदार आदमी और अपने परिवार वालों के लिए बेईमान हो गया हूं।

बेवजह ईमानदारी का कंबल अपने ऊपर डाले रहना मुझे पसंद नहीं। मैं ईमानदार नहीं हूं, इसे छिपाना क्यों? और फिर जो घोषित ईमानदार हैं भी, क्या वाकई वे ईमानदार हैं?

देख रहा हूं आजकल ईमानदार लोगों की बाढ़-सी आई हुई है हर तरफ। न केवल मेरे मोहल्ले बल्कि पूरे देश में से ऐसे-ऐसे ईमानदार बाहर निकलकर आ रहे हैं, मानो हमारा देश 'ईमानदारों का हब' बनने से बस जरा-सा दूर है। फिर तो दूसरे देशों के लोग हमारे देश आया करेंगे 'ईमानदार कैसे बनें' की ट्रेनिंग लेने। क्या नहीं...।

लेकिन प्यारे ज्यादा मीठा खाना अक्सर डाइबिटिज को ही जन्म देता है। कहीं ऐसा न हो सब अति-ईमानदार होने के चक्कर में, ईमानदारी का रोग लगा बैठें।

पर मुझे क्या, जिन्हें बनना हो ईमानदार वे बनें, मैं बेईमान बने रहकर ही प्रसन्न हूं। वैसे जित्ता सुकून बेईमान बने रहने में है, ईमानदारी में नहीं। ईमानदार बनकर रहने में फॉरमेंलटिएं बहुत निभानी पड़ती हैं। ये करो, वो मत करो। इससे मत मिलो, सिर्फ उससे ही मिलो। आदि-आदि।

अब परिवार-समाज-देश के बीच ऐसे बंदे भी तो होने चाहिए, जो ईमानदारी के बैलेंस को बेईमान बनकर मेनटेन कर सकें। मतलब, रेशो बराबर का रहना चाहिए। इसीलिए मैं अपने परिवार वालों के ऊपर नहीं गया। छंटा हुआ बेईमान बना। और मुझे अपनी बेईमानी पर नाज है।

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