सोमवार, 28 अप्रैल 2014

उल्लू बनने का सुख

चित्र साभारः गूगल
ऐसा ध्यान नहीं पड़ता कि मैंने कभी किसी को उल्लू बनाया हो या बनाने की कोशिश भी की हो पर हां खुद उल्लू बना जरूर हूं, अनके बार। खुद उल्लू बनने की कभी शिकायत नहीं की किसी से। क्योंकि खुद को उल्लू बनते देखने में जो सुख है, वो बनाने में नहीं। एक मैं ही नहीं, दुनिया में ऐसा कौन-सा बंदा होगा, जो अपने जीवन में एकाध दफा 'उल्लू' न बना हो। लेकिन उसने अपने उल्लू बनने का जिक्र कभी किसी से किया नहीं होगा मगर मुझे यह स्वीकार करने में जरा-भी शर्म नहीं। आखिर शर्म किस बात की? लोग इंजीनियर बनते हैं, डॉक्टर बनते हैं, राइटर बनते हैं, साइंटिस्ट बनते हैं, डाइरेक्टर बनते हैं, हीरो बनते हैं मैं अगर उल्लू बन गया तो इसमें कैसी शर्म? उल्लू ही तो बना चोर-लुटेरा थोड़े ही।

उल्लू को देखकर अक्सर मैं यही सोचा करता था कि मैं खुद इसके जैसा कब बन पाऊंगा? उल्लू के प्रति मेरे दिल में खास जगह है। उल्लू न केवल दिखने में आकर्षक होता है बल्कि शारीरिक बनावट में भी। उल्लू में सबसे आकर्षक उसकी आंखें होती हैं। जब भी मैं खुद को आईने में निहारता हूं, मुझे अपने चेहरे में उल्लू की सी छाप फील होती है। खासकर मेरी आंखें और उल्लू की आंखों में काफी सामान्ताएं हैं। जित्ती चपलता उसकी आंखें में है, मेरी भी। जित्ती दूर या गहराई तक उल्लू देख सकता है, मैं भी।

ऐसा लोगों का भ्रम है कि उल्लू में 'दिमाग' नहीं होता। जबकि उल्लू में सामान्य प्राणी के मुकाबले अधिक दिमाग होता है। हां, यह बात अलग है कि उल्लू अपने दिमाग की करास्तानी को कभी जतलाता नहीं। और उल्लू बने रहने में ही संतुष्ट रहता है। ठीक मेरी तरह।

वाकई मुझे बहुत अच्छा लगता है अगर कोई मुझे उल्लू कहकर पुकारता है। अगर उल्लू बना दे तो फिर कहना ही क्या।

किंतु लोग हैं कि उल्लू शब्द से ही 'चिढ़ते' हैं। किसी को आप उल्लू कहकर या बनाकर तो देखिए तुरंत बुरा मान जाएगा। अपने उल्लू न होने को सरेआम जस्टिफाई करेगा। अभी एक नेता ने दूसरे नेता पर उल्लू बनाने का आरोप क्या लगा दिया, नेताजी सीधा दिल पर ले गए। वे उल्लू नहीं बना रहे हैं, भरी सभा में स्पष्टीकरण भी दे डाला। नेताओं के बीच उल्लू शब्द पर जुबानी-जंग इत्ती तेज हो गई कि शिकायत चुनाव आयोग तक पहुंच गई। चुनाव आयोग भी क्या करता नोटिस थमा दिया।

उल्लू होना या बनना 'बेवकूफी' का नहीं बल्कि 'बुद्धिमानी' का प्रतीक है। गधा होना चलो एक दफा बुरा लग सकता है पर उल्लू होना 'सम्मान' की बात है। मैं तो सोचा रहा हूं कि अपने नाम के अंत में उल्लू शब्द शामिल कर लूं। समाज-साहित्य-परिवार-नाते-रिश्तेदारों में अच्छा प्रभाव पड़ेगा।

उल्लू के प्रति हमें अपनी धारण व सोच को बदलना होगा। नो उल्लू बनाइंग की जगह, खूब उल्लू बनाइंगा का नारा बुलंद करना होगा। क्या समझे?

1 टिप्पणी:

कविता रावत ने कहा…

किसी को उल्लू बनने तो किसी को उल्लू बनाने में ही मजा आता है ..
बहुत खूब!