गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

माफी और टॉफी का सियासी मनोरंजन

चित्र साभारः गूगल
प्यारे, माफी और टॉफी पर सियासत गर्म है। गर्म सियासत के बहाने एक-दूसरे को 'पटकनी' देने के रास्ते तलाशे जा रहे हैं। माफी वाले इस जिद पर अड़े हैं कि एक ही बात के लिए बार-बार माफी मांगने से क्या फायदा और टॉफी वाले यह यकीन करवाने में लगे हैं कि उनके कने सिर्फ 'टॉफी मॉडल' है। लुत्फ यह है कि जनता को न मतलब उनकी माफी से है न इनकी टॉफी से। उसे जिस बात से मतलब है, वो बात न उनके कने है न इनके। फिर भी दोनों का दावा यही है कि जनता की फिकर सबसे पहले उन्हें है, इन्हें है।

हालांकि माफी मांग लेने से कोई छोटा या मोटा नहीं हो जाता मगर क्या कीजिएगा जब उनकी डिक्शनरी में माफी शब्द है ही नहीं। ऐसा लगता है, माफी शब्द से उन्हें उत्ती ही ऐलर्जी है, जित्ती मुझे गंभीर लेखन से। वो दरअसल ऐसा सोचते हैं कि लंबी-लंबी फेंक लेने से ही माफी की पूर्ति हो जाएगी। और जनता बरगलाई में आकर उन्हें माफ भी कर देगी। लेकिन जनता के मूड का कोई भरोसा नहीं प्यारे, कब किसको कहां धोबी-पछाड़ दे मारे।

लोकतंत्र में तो जनता की ही चलती है, चाहे कोई माने या न माने। तब ही तो नेता लोग हाथ-पैर जोड़े-जाड़े जनता के सामने 'बेचारे' बने खड़े रहते हैं।

दूसरी तरफ, उनकी हालत कुछ यों है कि वे कभी टॉफी और मम्मी की सीमाओं से बाहर निकलकर देख ही नहीं पाते। उन्हें विकास से लेकर व्यवस्था तक में टॉफी के ही दर्शन होते हैं। या फिर जब कभी जोश में ज्यादा बोल-बाल लेते हैं, तो बाद में मम्मी की डांट का बहाना बनाकर 'इमोशनल' हो जाते हैं। हमारे बेचारे प्रधानमंत्रीजी उनके जोशनुमा गुस्से का खामियाजा अपने विधेयक को टुकड़ा-टुकड़ा होते देख भुगत ही चुके हैं। इसीलिए वे तो कुछ बोलते ही नहीं। हमेशा चुप्पी साधे रहते हैं। बोले तो वे तब न, जब उनकी चले!

खैर सियासत चाहे जैसी हो रही हो परंतु इत्ता समझ लीजिए न उनकी माफी, न इनकी टॉफी से चुनाव या वोट का रंग-ढंग नहीं बदलने वाला। माफी और टॉफी पर गुथ्म-गुथ्था तो इसलिए हो रही है ताकि हमारा-आपका 'मनोरंजन' होता रहे। ऐसे सूखे-रूखे चुनाव से भी क्या फायदा जिसमें जरा-बहुत मनोरंजन या हास्य न हो। कम से कम हमारे देश में तो ऐसे बोरिंग चुनाव नहीं ही लड़े जाते।

माफी और टॉफी की बहस के बीच एक नया जुमला उल्लू बनने-बनाने का भी फिट कर दिया गया है। जोकि आजकल बेहद हिट हो रहा है। हमें हमारे देश के नेताओं का 'एहसानमंद' होना चाहिए कि उन्होंने चुनावी-राजनीति को गंभीरता के झाड़ से मुक्त कर मनोरंजनयुक्त बना दिया है। आजकल हर नेता लगा हुआ है अपने-अपने तरीके से जनता का मनोरंजन करने और व्यंग्यकारों को लिखने का 'मसाला' देने में। जय हो।

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