मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

नेता की जुबान

चित्र साभारः गूगल
प्यारे, राजनीति में जुबान की शालीनता का क्या काम? जुबान की शालीनता साहित्य-वाहित्य में ही ठीक लगती है। नेता अगर जुबान की शालीनता के चक्कर में पड़ेगा, तो सही से न राजनीति कर पाएगा, न सामने वाले को हड़का पाएगा। राजनीति में जुबान का सख्त इस्तेमाल बेहद जरूरी है।

देख नहीं रहे- किस कदर राजनीति में कॉम्पीटिशन बढ़ता चला जा रहा है। जित्ती तेजी से तरह-तरह के राजनीतिक दल उग रहे हैं, उत्ती तेजी से नेता लोग भी पनप रहे हैं। शहर की छोड़िए, गली-मोहल्ले तक में चार-पांच राजनीतिक दल बिन खोजे ही मिल जाएंगे। हर दल के पास अपना एक से बढ़कर एक तुर्रेमखां नेता है। तुर्रेमखां नेताओं की जुबान कैसी होती है, यह आप जानते ही हो। उनका बस न जुबान पर रहता है, न हाथ पर। वे इस बात पर ही गली-मोहल्ले में चौड़े हुए घुमते हैं कि वे नेता हैं।
 
यू नो, चुनाव के वक्त नेता के जुबान की भूमिका वैसे भी बदल जाती है। जुबान खुद-ब-खुद शालीनता की हदें लांघ देती है। बेचारा नेता कहना कुछ चाह रहा होता है, मुई जुबान कहलवा कुछ और देती है। गलती जुबान की, फंस बेचारा नेता जाता है। जुबान के फिसलने का नेता से क्या मतलब! मुकदमा अगर दर्ज करवाना है तो जुबान पर करवाइए नाकि बेचारे नेता पर।

मैंने अक्सर देखा है, नेता की जुबान पर सबसे ज्यादा आपत्ति बुद्धिजीवि वर्ग को ही होती है। जहां किसी नेता की जुबान फिसली नहीं, बुद्धिजीवि लोग बेचारे पर ऐसे चढ़ बैठते हैं, जैसे खाली सीट देखकर सवारी। ठीक है, कभी-कभार जोश-जाश में नेता लोग कुछ अगलंम-बगलंम बोल जाते हैं पर इसका यह मतलब नहीं कि आप उनके चरित्र पर ही सवाल खड़े कर दें। जुबानी या मैनऊअल गलतियां यहां कौन नहीं करता। गलती माफ कर देने में ही भलाई और बढ़ाई है।

नेता दिल से कभी नहीं चाहता कि उसकी जुबान बहके या फिसले। वो तो पार्टी या भीड़ का प्रैशर आ जाता है, तो शब्द गड़बड़ा जाते हैं। वरना, जुबान और भाषा की सहजता एवं शालीनता के मामले में हमारे मुल्क के नेताओं का जवाब नहीं। अब आप चाहे यकीन करें न करें पर मेरा मानना तो यही है।

अभी हाल एक नेताजी ने दूसरे नेताजी की बोटी-बाटी का प्रसंग क्या छेड़ दिया, बेचारों को जेल जाना पड़ा और मीडिया के बीच फजीहत हुई सो अलग। जबकि दोष उनका नहीं, उनकी काली जुबान का था। चुनावी साभाओं में ऐसे दिलचस्प किस्से प्रायः घट जाते हैं। इत्ती संजीदगी से उन्हें नहीं लेना चाहिए।

दरअसल, जुबान भाषा का मैल है। कुछ नेता लोग अगर इस मैल को जुबान के रास्ते बाहर निकालने में लगे हैं, तो निकाल लेने दीजिए न, क्यों रोकते-टोकते या बुरा मानते हैं। आखिर वे भी इस लोकतंत्र के बंदे हैं। जुबानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार उन्हें भी है। है कि नहीं।

कृपया, नेता की जुबान पर न जाएं। जुबान पर काबू जब ईमानदार लोग नहीं रख पाए, वे तो फिर भी नेता हैं।

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