बुधवार, 16 अप्रैल 2014

प्रधानमंत्रीजी की चुप्पी

चित्र साभारः गूगल
चुप्पी हो तो प्रधानमंत्रीजी जैसी वरना न हो। किताब पर इत्ता हंगामा मचने के बाद भी हमारे प्रधानमंत्रीजी चुप है। और ऐसे चुप हैं मानो उनके सिर पर जूं रेंगी तक न हो। यह चुप्पी हमारे प्रधानमंत्रीजी की 'स्मार्टनेस' को दर्शाती है। बेवजह हंगामे के बीच जो इंसान चुप रह लेता है, उससे बड़ा सियाना कोई नहीं। बिना सियाना बने राजनीति की भी नहीं जा सकती।

यों भी, प्रधानमंत्रीजी किताब पर क्या बोलें और क्यों बोलें? किताब में प्रधानमंत्रीजी के नेचर के बाबत कुछ नया दर्ज हुआ हो तो वे बोलें भी! किताब में सबकुछ तो पुराना-धुराना है। ऐसा समझ लीजिए, प्रधानमंत्रीजी पर लिखी किताब नई बोतल में पुरानी शराब जैसी है। पुरानी शराब की तासीर और प्रधानमंत्रीजी की चुप्पी के अपने-अपने मायने हैं। इन मायनों को अब समझना बेकार है।

चुप रहना प्रधानमंत्रीजी का जुबानी अधिकार है। हमें यह हक नहीं बनता कि हम उनके अधिकार का अधिग्रहण करें। वे अक्सर उत्ता ही बोलते हैं, जित्ता जरूरत हो। बे-जरूरत बोलना प्रधानमंत्रीजी की जुबान के खिलाफ है। अच्छा ही है न, ज्यादा बोलकर खामखां शब्द या जुबान को क्या कष्ट देना। ज्यादा लंबी जुबान प्रायः परेशानियां ही खड़ी करती है।

देखिए न, जाने कित्ते नेता लोग इन चुनावों में अपनी बे-जुबानी की कीमत अलग-अलग तरीकों से चुका रहे हैं। चुनावी सभा में बोलते वक्त उन्हें ध्यान ही नहीं रहता कि जुबान मुंह में या हाथ में। बस बोलने से मतलब। मगर इस मामले में हमारे प्रधानमंत्रीजी बेहद संयत हैं। बेहद कायदे से जुबान खोलते हैं। काम होने के बाद फिर से उसे मौन-बक्से में बंद कर देते हैं। जुबान को ज्यादा तकलीफ देना ठीक नहीं। कहीं फिसल गई तो लेने के देने।

किताब पर छिड़ी हल्ले-नुमा सियासत पर प्रधानमंत्रीजी चुप साधकर, मेरे विचार में, ठीक ही कर रहे हैं। वे जानते हैं, बोलकर भी नतीजा कोई निकलना-निकलाना है नहीं। इससे बढ़िया चुप ही रहो। एक चुप सौ की बोलतियां बंद कर देता है। किताब पर थोड़े-बहुत दिन बबाल कटेगा। चुनाव निपटते ही फिर न किसी को किताब में दर्ज बातें याद रहेंगी न लेखक का नाम। सब जानते हैं, ऐसी विवादित किताबें मौका देखकर ही लिखीं व पब्लिक की जाती हैं।

लेखक को प्रधानमंत्रीजी की चुप्पी का एहसानमंद होना चाहिए, इत्ती भयंकर पब्लिसिटी के लिए। घर बैठे ही किताब ने इत्ते नोट और वोट बटोर लिए। सुना है, ऑनलाइन स्टोर पर किताब आउट पर स्टॉक बता रहा है। इससे अधिक एक लेखक को और चाहिए भी क्या? किताब जित्ती ज्यादा विवादस्पद होगी, कमाई भी उत्ती ही मस्त होगी। यह बाजार का फंडा है प्यारे।

फिर भी किताब के बहाने जिन्हें प्रधानमंत्रीजी की चुप्पी पर सवाल खड़े करने हैं, शौक से करें। इससे प्रधानमंत्रीजी की सेहत पर कोई असर होने-हवाने वाला नहीं। वे जानते हैं कि उन्हें मौन रहना है और वे मौन ही रहेंगे। इत्ते विवादों और आरापों के बाद भी अगर कोई व्यक्ति मौन साधे रहता है, तो यह वाकई बहुत बड़ी बात है। वरना आजकल के जमाने में सहनशीलता बची कित्तों के भीतर है।

भले ही कोई माने या न माने लेकिन मौन या चुप्पी को मैं प्रधानमंत्रीजी की दस सालों की 'विशेष उपलब्धि' मानता हूं। ज्यादा जुबान चलाने वालों को प्रधानमंत्रीजी से कुछ सीखना चाहिए। जुबान पर इत्ता धैर्य हर किसी के बस की बात नहीं।

सच कहूं, मेरे लिए तो किताब से कहीं अधिक प्रधानमंत्रीजी की चुप्पी 'अनमोल' है। खुदा उनकी इस चुप्पी को सलामत रखे।

3 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन मुस्कुराते रहिए... फ़टफ़टिया बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

parmeshwari choudhary ने कहा…

अच्छा ब्यूरोक्रेट चुप रहना सीख ही जाता है। फिर नौकरी भी रानी की ठहरी। बढ़िया लिखा है। :)

रश्मि शर्मा ने कहा…

वाकई....बडे धैर्य की बात है यु चुप्‍पी भी