रविवार, 13 अप्रैल 2014

मेरी पत्नी के आदर्श

चित्र साभारः गूगल
मेरी पत्नी के आदर्श बदलते रहते हैं। उसके आदर्शों में या तो नेता होते हैं, या फिर फिल्मी हीरो। यही वजह है कि मैं कभी मेरी पत्नी का आदर्श नहीं रहा! वो तो खुल्ला कहती है, शादी मैंने गलत व्यक्ति से कर ली, जिसमें आदर्श नाम की कोई चीज ही नहीं। लेकिन मैं बुरा नहीं मानता। बुरा मानकर मुझे अपनी खटिया घर के बाहर थोड़े पड़वानी है।

खैर, जैसाकि मैंने ऊपर बतलाया कि पत्नी के आदर्श बदलते हैं। अब पत्नी के आदर्श अरविंद केजरीवाल नहीं, मेरे ही मोहल्ले के एक बड़े नेताजी हैं। आजकल पत्नी उन्हीं को आदर्श मानकर उनके गुणगान में लगी रहती है। कल तलक जिस दीवार पर श्रीमान अरविंद केजरीवाल की तस्वीर (बतौर आदर्श वयक्तित्व) टंगी रहती थी, उस जगह पर अब नेताजी की तस्वीर है। पत्नी ने मंगलसूत्र में नेताजी का फोटू जड़वाया है। कहती है- इससे नेताजी के विचार एवं व्यवहार दिल के करीब रहते हैं। फिलहाल, इन दिनों वो नेताजी के साथ चुनाव प्रचार में लगी है।

मुझे चूंकि न मेरे न किसी और के प्रचार-प्रसार में दिलचस्पी है इसलिए मैं घर पर ही रहता हूं। घर पर रहकर या तो कलम-घिसाई करता हूं या फिर खाना-बर्तन-झाड़ू इत्यादि। घर में बाई इसलिए नहीं लगाई है, क्योंकि पत्नी को मेरी निगाहों पर भरोसा नहीं। उसकी निगाह में मेरा स्टेटस शाइनी आहूजा जैसा है।

मेरी पत्नी उक्त नेताजी को अपना आदर्श क्यों मानती है, सुनिए- पत्नी का कहना है- नेताजी में वो सभी गुण हैं, जो एक आदर्श बंदे में होने चाहिए। नेताजी कने भरपूर पैसा है। नेताजी कने एक-एक लाख के पांच पैन और दो-दो लाख की आठ इंपोर्टेड घड़ियां हैं। नेताजी कने दस कारें और तीन ट्रेक्टर हैं। जमीन-जायदाद का तो पूछो ही नहीं कि कित्ती और कहां-कहां है। साथ-साथ, नेताजी का न सिर्फ मोहल्ले बल्कि शहर में भी अच्छा-खासा दबदबा है। बरेली से लेकर दिल्ली तक तगड़ी पहुंच है नेताजी की। इत्ता पैसा होने के बाद भी नेताजी रहते बिल्कुल सीधे-सादा हैं। अगर दो-चार दाग दामन पर हैं भी तो क्या! वो नेता ही क्या जिसके दामन पर दाग न हो! आजकल दाग वालों का ही जमाना है।

पत्नी को मैंने कई दफा समझाया कि अंटी में नोट या दामन पर दाग लगा लेने से कोई आदर्श नेता नहीं हो जाता। नेता होने के लिए ईमानदारी-सादगी-त्याग-सत्यता बहुत जरूरी है। शास्त्रीजी जैसे आदर्श नेता अब भला कित्ते हैं? लेकिन पत्नी को मेरा कहा-समझाया बहुत बुरा लगता है। वो कहती है- तुम्हारे भेजे में न आए हैं न आएंगे, नेता होने के फायदे। तुम अपना आदर्शवाद और ईमानदारी अपने कने रखो। तुम एक मामूली से लेखक भला क्या समझोगे नेताजी के राजनीतिक आदर्शवाद को? राजनीति में रहकर नेताजी ने जित्ता (नाम और दाम) कमा लिया, तुम पचास बरस कलम रगड़कर भी न कमा पाओगे। अब तक के लेखन में तुम्हें मिला ही क्या है? ले देके एक स्कूटर है, वो भी उधार का। तुम दस साल पहले भी पांच सौ पर अटके थे, अब भी वहीं अटके हो। नेताजी इत्ते सालों में जाने कहां से कहां पहुंच गए। तुम भी अगर राजनीति में होते, तो आज हमारे हालात क्या ऐसे होते? हर वक्त कभी इस नेता, कभी उस नेता की खींचाई-बुराई में लगे रहते हो। कभी अपनी शक्ल आइने में देखी है, छत्तीस की उम्र में छप्पन के लगते हो। एक मेरे आदर्श नेताजी हैं पचास में भी तीस के लगते हैं। पता है, पैसा ऐसी चीज है,जो बूढ़े को भी जवान बनाए रखता है ताउम्र।

इस बाबत पत्नी से ज्यादा बहस करना बेमानी था। क्योंकि बहस-बहस में झाड़ू या चिमटा उठाते उसे जरा भी देर नहीं लगती। इसलिए अपनी इज्जत बचाते हुए मैं खुद ही कट लेता हूं। मेरी बात जब मेरी कलम नहीं समझती तो पत्नी क्या खाक समझेगी? पत्नी की देखा-दाखी मेरी कलम भी अक्सर मुझे खारिज कर देती है। सच बोलूं, मैं अपने खारिज होने का भी बुरा नहीं मानता।

सोचता हूं तो अक्सर लगता है कि जमाना वाकई बहुत बदल गया। उसी हिसाब से बदल गए हैं लोगों के आदर्श। अब जो राजनीति-साहित्य-समाज-व्यवस्था में शुचिता की बात करता है, वो बेवकूफ है शायद मेरी तरह।

1 टिप्पणी:

वाणी गीत ने कहा…

दरअसल व्यवस्था से इतने उकताए हुए हैं लोग कि जो भी ताजा हवा का झोंका नजर आता है , उससे उम्मीद लगा बैठते हैं। ईमानदारी की छवि से मात खाए लोग बेईमानों पर भी यकीन करने लग जाते हैं !