मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

लहर की चपेट में

प्यारे, आजकल मैंने घर से निकलना बंद कर रखा है। दफ्तर से छुट्टी ले ली है। भाजी-तरकारी लेने के लिए भी पत्नी को ही भेजता हूं। कमरे की खिड़की-किवाड़े भी ज्यादातर बंद ही रहती हैं। न बाहर झांकता हूं न किसी को अंदर तांकने देता हूं। पत्नी बता रही थी- दो-चार पड़ोसियों ने पूछा भी है कि आजकल मैं कहां हूं। दिखाई नहीं पड़ता। मैंने पत्नी को बोल दिया है, अगर कोई ऐसा कुछ पूछा करे तो कह देना- गंभीर लेखन में व्यस्त हैं।

अरे, न न लेखन-वेखन की व्यस्ता कुछ नहीं, मसला जरा दूसरा है।

दरअसल, है क्या, इन दिनों हर तरफ बड़ी भयंकर एक लहर चल रही है। लहर के बारे में प्रचारित किया जा रहा है कि देश की नैया अब इसी लहर के सहारे पार लगेगी। लहर में इत्ती ताकत है कि आस-पास की लहरें तक पनाह मांग जाएंगी। लहर को चलाने वाले बड़ी तत्परता से लहर की मार्केटिंग में डटे हुए हैं। जहां भी संभव हो पा रहा है, वहां लहर को चलाया-चलवाया जा रहा है।

अभी तलक यह लहर राजनीति और सत्ता के गलियारों में ही चल रही थी, अब साहित्य के बीच भी चलने लगी है। एकाध साहित्यकार भी लहर की चपेट में आ गए हैं। बेचारे एक मशहूर कहानीकार तो लहर का नाम लेने भर पर ऐसे फंस गए हैं कि प्रगतिशीलों ने उनकी नाक में दम किया हुआ है। आजकल फेसबुक पर यह बड़ी बहस का मुद्दा बना हुआ है।

वो तो गनीमत रही कि असांज लहर की चपेट में न आया। खामखां, उसे भी लहर में लपेटे ले रहे थे।

इसीलिए, कहीं यह लहर मुझे भी अपनी चपेट में न ले ले, मैंने खुद को कुछ दिनों के लिए घर में बंद कर लिया है।

देखिए, लहर यह नहीं जानती कि मैं कौन हूं, क्या हूं। लहर जब आती है, तो बिन पूछे-गछे अपने साथ बहा ले जाती है। लहर में न बहें इसका ख्याल तो आपको आप ही रखना पड़ता है। जरा ढीले पड़े नहीं कि लहर क्षणभर में काम तमाम कर डालती है। चूंकि वर्तमान में जो लहर चल रही है, बहुत भयंकर किस्म की है, इसलिए ऐतिहात ज्यादा बरतना पड़ रहा है। यों भी, मेरे लिए पिछली दो-तीन लहरों में बहने का अनुभव खास अच्छा नहीं रहा है।
 
यह तो व्यक्ति विशेष की राजनीतिक लहर है, मैं तो मेरी पत्नी की लहर तक से बचकर रहता हूं। बताने में कैसी शर्म, मेरे घर में मेरी कोई लहर नहीं है। मेरी सारी लहर पत्नी ने निकाल रखी है। साथ-साथ, वर्निंग भी दे दी है कि मैं किसी भी लहर में न बहूं। इसलिए ध्यान ज्यादा रखता हूं। ऐंवई कहीं बह-बाह गया तो घर में घुसने तक के लाले पड़ जाएंगे।

लहर का कहां कित्ता जोर है, मैं अधिक नहीं जानता। न जानने की तमन्ना रखता हूं। लहर का असली असर तो जनता ही बताएगी। तब तलक इंतजार करें।

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