बुधवार, 30 अप्रैल 2014

दामादश्री की 'जमीनी ईमानदारी'

चित्र साभारः गूगल
ऐसा आपको 'भ्रमवश' लग रहा है कि दामादश्री ने (घपला टाइप) कुछ किया है। जबकि दामादश्री ने कुछ नहीं किया है। दामादश्री कुछ कर ही नहीं सकते। दामादश्री को मैं अच्छे से जानता हूं। दामादश्री बेहद सहज व नेक दिल के इंसान हैं। ईमानदारी के जित्ते किस्म के गुण उनके भीतर हैं, इत्ते मेरे भीतर भी नहीं। बल्कि हकीकत यह है- जमीनी ईमानदारी पर दूर-दूर से लोग दामादश्री से सलाह लेने आते हैं। जमीनी ईमानदारी पर उनके स्कूल-कॉलेजों-यूनिवर्सिटियों में लेक्चर होते हैं।

दामादश्री को न केवल जमीन बल्कि जमीनी पेचीदगियों का अच्छा-खासा ज्ञान है। उनकी सुबह भी जमीन के लिए होती है और रात भी। जमीनी संघर्ष में वे इत्ते व्यस्त रहते हैं कि कब लाख के करोड़ बन जाते हैं, उन्हें खुद पता नहीं चलता। जमीनें जब से दामादश्री के संपर्क में आई हैं, काफी 'खुश' रहने लगी हैं। एक हजार रुपए गज की जमीन को दस हजार रुपए गज कर देना, दामादश्री के बाएं हाथ का गेम है।

जमीन पर रहकर जमीनी हितों के बारे में सोचना व करना बहुत बड़ी बात होती है। इत्ता समर्पित तो मैं अपने लेखन के प्रति नहीं रह पाता।

दामादश्री पर ऐंवई 'टोंड' कसने के बजाए हमें उन पर गर्व होना चाहिए। बहस या बुराई इस पर नहीं होनी चाहिए कि इत्ते कम समय में दामादश्री ने लाख से करोड़ कैसे और क्यों बना लिए बल्कि बात इस पर होनी चाहिए कि वे हाथ का साथ पाकर इत्ती दूर निकल आए। हाथ से हाथ मिलकर जो जमीनी संघर्ष दामादश्री ने किया, हर कोई नहीं कर सकता। ऊंचे संबंधों का लाभ उठाने की तकनीक हमें दामादश्री से समझनी चाहिए।

मुझे लगता है दामादश्री की जमीनी ईमानदारी से प्रभावित होकर ही शायद विपक्ष ने उन पर लघु-फिल्म बनाई होगी। फिल्म में भी दामादश्री को जमीन से जुड़ा बंदा ही बताया गया है। उनकी जमीनी मेहनत पर पूरा फोकस रखा गया है। साथ ही, काफी कुछ दामादश्री पर प्रकाशित पुस्तक में भी दर्ज है। इत्ते कम समय में इत्ता मान-सम्मान मिलना, वाक‌ई अद्भूत है। मैं दिल से प्रभावित हूं दामादश्री से।
 
दामादश्री का जमीनी संघर्ष व ईमानदारी बताती है कि हमें कभी भी जमीन के प्रति अपना मोह नहीं त्यागना चाहिए। नजरों को हर वक्त कमाऊ जमीन पर टिकाकर रखना चाहिए। जहां-जिस जमीन से लगे कि लाभ मिलने की संभावनाएं हैं, तुरंत उसका सौदा कर उसको इज्जत बख्शनी चाहिए। जमीन पर रहकर जमीन के लिए काम करने वाले लोगों की समाज को आज बहुत जरूरत है। यह प्रसन्नता की बात है कि दामादश्री जैसे 'नेक शख्स' हमारे बीच मौजूद हैं।

दरअसल, खिल्ली दामादश्री की वही लोग उड़ा रहे हैं, जिन्होंने जमीन के लिए कभी कुछ नहीं किया। केवल अपने लिए ही जिए, केवल अपने लिए ही सोचा। लेकिन दामादश्री ने हर वक्त हर कहीं जमीन की चिंता की और उसके लिए लड़े भी।

किसी को न हो किंतु मुझे दामादश्री की जमीनी ईमानदारी पर बेहद गर्व है।

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

उल्लू बनने का सुख

चित्र साभारः गूगल
ऐसा ध्यान नहीं पड़ता कि मैंने कभी किसी को उल्लू बनाया हो या बनाने की कोशिश भी की हो पर हां खुद उल्लू बना जरूर हूं, अनके बार। खुद उल्लू बनने की कभी शिकायत नहीं की किसी से। क्योंकि खुद को उल्लू बनते देखने में जो सुख है, वो बनाने में नहीं। एक मैं ही नहीं, दुनिया में ऐसा कौन-सा बंदा होगा, जो अपने जीवन में एकाध दफा 'उल्लू' न बना हो। लेकिन उसने अपने उल्लू बनने का जिक्र कभी किसी से किया नहीं होगा मगर मुझे यह स्वीकार करने में जरा-भी शर्म नहीं। आखिर शर्म किस बात की? लोग इंजीनियर बनते हैं, डॉक्टर बनते हैं, राइटर बनते हैं, साइंटिस्ट बनते हैं, डाइरेक्टर बनते हैं, हीरो बनते हैं मैं अगर उल्लू बन गया तो इसमें कैसी शर्म? उल्लू ही तो बना चोर-लुटेरा थोड़े ही।

उल्लू को देखकर अक्सर मैं यही सोचा करता था कि मैं खुद इसके जैसा कब बन पाऊंगा? उल्लू के प्रति मेरे दिल में खास जगह है। उल्लू न केवल दिखने में आकर्षक होता है बल्कि शारीरिक बनावट में भी। उल्लू में सबसे आकर्षक उसकी आंखें होती हैं। जब भी मैं खुद को आईने में निहारता हूं, मुझे अपने चेहरे में उल्लू की सी छाप फील होती है। खासकर मेरी आंखें और उल्लू की आंखों में काफी सामान्ताएं हैं। जित्ती चपलता उसकी आंखें में है, मेरी भी। जित्ती दूर या गहराई तक उल्लू देख सकता है, मैं भी।

ऐसा लोगों का भ्रम है कि उल्लू में 'दिमाग' नहीं होता। जबकि उल्लू में सामान्य प्राणी के मुकाबले अधिक दिमाग होता है। हां, यह बात अलग है कि उल्लू अपने दिमाग की करास्तानी को कभी जतलाता नहीं। और उल्लू बने रहने में ही संतुष्ट रहता है। ठीक मेरी तरह।

वाकई मुझे बहुत अच्छा लगता है अगर कोई मुझे उल्लू कहकर पुकारता है। अगर उल्लू बना दे तो फिर कहना ही क्या।

किंतु लोग हैं कि उल्लू शब्द से ही 'चिढ़ते' हैं। किसी को आप उल्लू कहकर या बनाकर तो देखिए तुरंत बुरा मान जाएगा। अपने उल्लू न होने को सरेआम जस्टिफाई करेगा। अभी एक नेता ने दूसरे नेता पर उल्लू बनाने का आरोप क्या लगा दिया, नेताजी सीधा दिल पर ले गए। वे उल्लू नहीं बना रहे हैं, भरी सभा में स्पष्टीकरण भी दे डाला। नेताओं के बीच उल्लू शब्द पर जुबानी-जंग इत्ती तेज हो गई कि शिकायत चुनाव आयोग तक पहुंच गई। चुनाव आयोग भी क्या करता नोटिस थमा दिया।

उल्लू होना या बनना 'बेवकूफी' का नहीं बल्कि 'बुद्धिमानी' का प्रतीक है। गधा होना चलो एक दफा बुरा लग सकता है पर उल्लू होना 'सम्मान' की बात है। मैं तो सोचा रहा हूं कि अपने नाम के अंत में उल्लू शब्द शामिल कर लूं। समाज-साहित्य-परिवार-नाते-रिश्तेदारों में अच्छा प्रभाव पड़ेगा।

उल्लू के प्रति हमें अपनी धारण व सोच को बदलना होगा। नो उल्लू बनाइंग की जगह, खूब उल्लू बनाइंगा का नारा बुलंद करना होगा। क्या समझे?

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

जमीन से जुड़े जीजाजी

चित्र साभारः गूगल 
हालांकि रिश्ते में वो मेरे जीजाजी नहीं हैं पर मैं उन्हें अपने जीजाजी की निगाह से ही देखता हूं। उत्ता ही मान-सम्मान भी देता हूं। जरूरी नहीं, हर समय नाते-रिश्तेदारों को अपना सगा-संबंधी कहा जाए, कभी-कभार बाहर वालों को भी यह इज्जत देनी चाहिए। मेरा मानना है, अपनी भलाई की खातिर रिश्ते किसी से भी बनाए जा सकते हैं। जमाना बिगाड़कर नहीं, बनाकर चलने का है। कब, कौन, कहां काम आ जाए, कुछ नहीं कह सकते।
हां, यह बात सही है कि मेरा जीजाजी से आज तक न आमना-सामना हुआ है, न ही वो मुझे जानते हैं। पर इससे क्या होता है? जरूरी नहीं कि किसी को अपना मानने या बनाने के लिए उसे जाना या उससे मिला ही जाए। हम अहसास के तौर पर भी उसे अपना मान सकते हैं। प्यार (लव) में तो अक्सर ऐसे किस्से होते-बनते रहते हैं। इसे आप मेरा जीजाजी के प्रति प्यार (सम्मान) ही समझिए।

मेरे दिल में उन लोगों के प्रति खास जगह है, जो जमीन से जुड़े होते हैं। जमीन के लिए ही जीते हैं। जमीन से ही संघर्ष करते हैं। जमीन के नाम पर ही लाख से करोड़ बना लेते हैं। किसान के लिए भले ही जमीन सोना न उगल पाए पर उनके लिए तो उगलती ही है। और क्या खूब उगलती है। जीजाजी की गिनती ऐसे ही जमीन से जुड़े इंसानों में होती है।

जीजाजी के जमीनी-संघर्ष को देखकर मेरा सीना गर्व से फूल जाता है। जमीन ने जीजाजी को वो सब दिया, जिसकी कल्पना मेरे जैसा बे-जमीनी लेखक सपने में भी नहीं कर सकता। बताइए, मात्र पांच साल में मात्र एक लाख रुपए से जीजाजी ने तीन सौ पच्चीस करोड़ पैदा कर डाले। न न इसके आप कोरी किस्मत का चमकना न मानिए, यह जीजाजी के जमीनी-संघर्ष का प्रतिफल है। इस कमाई में एक तरफ जीजाजी का संघर्ष रहा तो दूसरी तरफ हाथ का साथ। जिस बंदे को हाथ के साथ का सहयोग निरंतर मिलता रहा हो, वो भला कैसे नहीं लाख के करोड़ कर सकता है? हमारे जीजाजी ने यह चमत्कार करके दिखाया।

फिर भी कुछ जलनखोर टाइप के लोग हैं, जो जीजाजी के जमीनी-संघर्ष और कमाई से जलते हैं। आए दिन उन्हें कोसते रहते हैं। सरकार से जांच करवाने की गुहार लगाते हैं। सरेआम जमीनी-दलाल कहकर बदनाम करते हैं। और तो और एक विदेशी अखबार ने भी हमारे जीजाजी के खिलाफ जाने क्या-क्या बकबास छापी है। जीजाजी की कमाई पर सवाल उठाए हैं।

अरे आरोप लगाने वालों का क्या है, कुछ भी कहते फिरते हैं। यहां कोई भी यह नहीं देख रहा कि जीजाजी ने कित्ती मेहनत के साथ, कित्ते कम समय में, कित्ती जोड़-जुगाड़ करके खुद को पैरों पर खड़ा किया है। सब उनकी कमाई का रोना-धोना लेकर बैठ गए हैं। जीजाजी ने अगर कमाई की है, तो केवल अपने बूते पर। कोई इत्ता जमीनी-संघर्ष करके तो दिखाए। दो दिन में न टांके ढिले हो जाएं, तो मेरा नाम बदल देना।

किसी और को क्या कहूं, जब अपने आप को देखता हूं, तो मुझे खुद पर शर्म आती है। मेरी पत्नी मुझे नकारा लेखक कहकर तंज कसती है। कहती है- दस साल हो गए तुम्हें यहां-वहां कलम रगड़ते हुए, क्या कमाया? जेब में दस रुपए तक तो मिलते नहीं। एक जीजाजी हैं, जिन्होंने मात्र पांच साल में कायाकल्प कर डाला। लेखन से न जुड़कर अगर तुम जमीन से जुड़े होते, तो आज जाने कहां से कहां होते। लेखन को छोड़कर जीजाजी जैसा बनने की कोशिश करो। समझे।

माफी और टॉफी का सियासी मनोरंजन

चित्र साभारः गूगल
प्यारे, माफी और टॉफी पर सियासत गर्म है। गर्म सियासत के बहाने एक-दूसरे को 'पटकनी' देने के रास्ते तलाशे जा रहे हैं। माफी वाले इस जिद पर अड़े हैं कि एक ही बात के लिए बार-बार माफी मांगने से क्या फायदा और टॉफी वाले यह यकीन करवाने में लगे हैं कि उनके कने सिर्फ 'टॉफी मॉडल' है। लुत्फ यह है कि जनता को न मतलब उनकी माफी से है न इनकी टॉफी से। उसे जिस बात से मतलब है, वो बात न उनके कने है न इनके। फिर भी दोनों का दावा यही है कि जनता की फिकर सबसे पहले उन्हें है, इन्हें है।

हालांकि माफी मांग लेने से कोई छोटा या मोटा नहीं हो जाता मगर क्या कीजिएगा जब उनकी डिक्शनरी में माफी शब्द है ही नहीं। ऐसा लगता है, माफी शब्द से उन्हें उत्ती ही ऐलर्जी है, जित्ती मुझे गंभीर लेखन से। वो दरअसल ऐसा सोचते हैं कि लंबी-लंबी फेंक लेने से ही माफी की पूर्ति हो जाएगी। और जनता बरगलाई में आकर उन्हें माफ भी कर देगी। लेकिन जनता के मूड का कोई भरोसा नहीं प्यारे, कब किसको कहां धोबी-पछाड़ दे मारे।

लोकतंत्र में तो जनता की ही चलती है, चाहे कोई माने या न माने। तब ही तो नेता लोग हाथ-पैर जोड़े-जाड़े जनता के सामने 'बेचारे' बने खड़े रहते हैं।

दूसरी तरफ, उनकी हालत कुछ यों है कि वे कभी टॉफी और मम्मी की सीमाओं से बाहर निकलकर देख ही नहीं पाते। उन्हें विकास से लेकर व्यवस्था तक में टॉफी के ही दर्शन होते हैं। या फिर जब कभी जोश में ज्यादा बोल-बाल लेते हैं, तो बाद में मम्मी की डांट का बहाना बनाकर 'इमोशनल' हो जाते हैं। हमारे बेचारे प्रधानमंत्रीजी उनके जोशनुमा गुस्से का खामियाजा अपने विधेयक को टुकड़ा-टुकड़ा होते देख भुगत ही चुके हैं। इसीलिए वे तो कुछ बोलते ही नहीं। हमेशा चुप्पी साधे रहते हैं। बोले तो वे तब न, जब उनकी चले!

खैर सियासत चाहे जैसी हो रही हो परंतु इत्ता समझ लीजिए न उनकी माफी, न इनकी टॉफी से चुनाव या वोट का रंग-ढंग नहीं बदलने वाला। माफी और टॉफी पर गुथ्म-गुथ्था तो इसलिए हो रही है ताकि हमारा-आपका 'मनोरंजन' होता रहे। ऐसे सूखे-रूखे चुनाव से भी क्या फायदा जिसमें जरा-बहुत मनोरंजन या हास्य न हो। कम से कम हमारे देश में तो ऐसे बोरिंग चुनाव नहीं ही लड़े जाते।

माफी और टॉफी की बहस के बीच एक नया जुमला उल्लू बनने-बनाने का भी फिट कर दिया गया है। जोकि आजकल बेहद हिट हो रहा है। हमें हमारे देश के नेताओं का 'एहसानमंद' होना चाहिए कि उन्होंने चुनावी-राजनीति को गंभीरता के झाड़ से मुक्त कर मनोरंजनयुक्त बना दिया है। आजकल हर नेता लगा हुआ है अपने-अपने तरीके से जनता का मनोरंजन करने और व्यंग्यकारों को लिखने का 'मसाला' देने में। जय हो।

मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

नेता की जुबान

चित्र साभारः गूगल
प्यारे, राजनीति में जुबान की शालीनता का क्या काम? जुबान की शालीनता साहित्य-वाहित्य में ही ठीक लगती है। नेता अगर जुबान की शालीनता के चक्कर में पड़ेगा, तो सही से न राजनीति कर पाएगा, न सामने वाले को हड़का पाएगा। राजनीति में जुबान का सख्त इस्तेमाल बेहद जरूरी है।

देख नहीं रहे- किस कदर राजनीति में कॉम्पीटिशन बढ़ता चला जा रहा है। जित्ती तेजी से तरह-तरह के राजनीतिक दल उग रहे हैं, उत्ती तेजी से नेता लोग भी पनप रहे हैं। शहर की छोड़िए, गली-मोहल्ले तक में चार-पांच राजनीतिक दल बिन खोजे ही मिल जाएंगे। हर दल के पास अपना एक से बढ़कर एक तुर्रेमखां नेता है। तुर्रेमखां नेताओं की जुबान कैसी होती है, यह आप जानते ही हो। उनका बस न जुबान पर रहता है, न हाथ पर। वे इस बात पर ही गली-मोहल्ले में चौड़े हुए घुमते हैं कि वे नेता हैं।
 
यू नो, चुनाव के वक्त नेता के जुबान की भूमिका वैसे भी बदल जाती है। जुबान खुद-ब-खुद शालीनता की हदें लांघ देती है। बेचारा नेता कहना कुछ चाह रहा होता है, मुई जुबान कहलवा कुछ और देती है। गलती जुबान की, फंस बेचारा नेता जाता है। जुबान के फिसलने का नेता से क्या मतलब! मुकदमा अगर दर्ज करवाना है तो जुबान पर करवाइए नाकि बेचारे नेता पर।

मैंने अक्सर देखा है, नेता की जुबान पर सबसे ज्यादा आपत्ति बुद्धिजीवि वर्ग को ही होती है। जहां किसी नेता की जुबान फिसली नहीं, बुद्धिजीवि लोग बेचारे पर ऐसे चढ़ बैठते हैं, जैसे खाली सीट देखकर सवारी। ठीक है, कभी-कभार जोश-जाश में नेता लोग कुछ अगलंम-बगलंम बोल जाते हैं पर इसका यह मतलब नहीं कि आप उनके चरित्र पर ही सवाल खड़े कर दें। जुबानी या मैनऊअल गलतियां यहां कौन नहीं करता। गलती माफ कर देने में ही भलाई और बढ़ाई है।

नेता दिल से कभी नहीं चाहता कि उसकी जुबान बहके या फिसले। वो तो पार्टी या भीड़ का प्रैशर आ जाता है, तो शब्द गड़बड़ा जाते हैं। वरना, जुबान और भाषा की सहजता एवं शालीनता के मामले में हमारे मुल्क के नेताओं का जवाब नहीं। अब आप चाहे यकीन करें न करें पर मेरा मानना तो यही है।

अभी हाल एक नेताजी ने दूसरे नेताजी की बोटी-बाटी का प्रसंग क्या छेड़ दिया, बेचारों को जेल जाना पड़ा और मीडिया के बीच फजीहत हुई सो अलग। जबकि दोष उनका नहीं, उनकी काली जुबान का था। चुनावी साभाओं में ऐसे दिलचस्प किस्से प्रायः घट जाते हैं। इत्ती संजीदगी से उन्हें नहीं लेना चाहिए।

दरअसल, जुबान भाषा का मैल है। कुछ नेता लोग अगर इस मैल को जुबान के रास्ते बाहर निकालने में लगे हैं, तो निकाल लेने दीजिए न, क्यों रोकते-टोकते या बुरा मानते हैं। आखिर वे भी इस लोकतंत्र के बंदे हैं। जुबानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार उन्हें भी है। है कि नहीं।

कृपया, नेता की जुबान पर न जाएं। जुबान पर काबू जब ईमानदार लोग नहीं रख पाए, वे तो फिर भी नेता हैं।

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

प्रधानमंत्रीजी की चुप्पी

चित्र साभारः गूगल
चुप्पी हो तो प्रधानमंत्रीजी जैसी वरना न हो। किताब पर इत्ता हंगामा मचने के बाद भी हमारे प्रधानमंत्रीजी चुप है। और ऐसे चुप हैं मानो उनके सिर पर जूं रेंगी तक न हो। यह चुप्पी हमारे प्रधानमंत्रीजी की 'स्मार्टनेस' को दर्शाती है। बेवजह हंगामे के बीच जो इंसान चुप रह लेता है, उससे बड़ा सियाना कोई नहीं। बिना सियाना बने राजनीति की भी नहीं जा सकती।

यों भी, प्रधानमंत्रीजी किताब पर क्या बोलें और क्यों बोलें? किताब में प्रधानमंत्रीजी के नेचर के बाबत कुछ नया दर्ज हुआ हो तो वे बोलें भी! किताब में सबकुछ तो पुराना-धुराना है। ऐसा समझ लीजिए, प्रधानमंत्रीजी पर लिखी किताब नई बोतल में पुरानी शराब जैसी है। पुरानी शराब की तासीर और प्रधानमंत्रीजी की चुप्पी के अपने-अपने मायने हैं। इन मायनों को अब समझना बेकार है।

चुप रहना प्रधानमंत्रीजी का जुबानी अधिकार है। हमें यह हक नहीं बनता कि हम उनके अधिकार का अधिग्रहण करें। वे अक्सर उत्ता ही बोलते हैं, जित्ता जरूरत हो। बे-जरूरत बोलना प्रधानमंत्रीजी की जुबान के खिलाफ है। अच्छा ही है न, ज्यादा बोलकर खामखां शब्द या जुबान को क्या कष्ट देना। ज्यादा लंबी जुबान प्रायः परेशानियां ही खड़ी करती है।

देखिए न, जाने कित्ते नेता लोग इन चुनावों में अपनी बे-जुबानी की कीमत अलग-अलग तरीकों से चुका रहे हैं। चुनावी सभा में बोलते वक्त उन्हें ध्यान ही नहीं रहता कि जुबान मुंह में या हाथ में। बस बोलने से मतलब। मगर इस मामले में हमारे प्रधानमंत्रीजी बेहद संयत हैं। बेहद कायदे से जुबान खोलते हैं। काम होने के बाद फिर से उसे मौन-बक्से में बंद कर देते हैं। जुबान को ज्यादा तकलीफ देना ठीक नहीं। कहीं फिसल गई तो लेने के देने।

किताब पर छिड़ी हल्ले-नुमा सियासत पर प्रधानमंत्रीजी चुप साधकर, मेरे विचार में, ठीक ही कर रहे हैं। वे जानते हैं, बोलकर भी नतीजा कोई निकलना-निकलाना है नहीं। इससे बढ़िया चुप ही रहो। एक चुप सौ की बोलतियां बंद कर देता है। किताब पर थोड़े-बहुत दिन बबाल कटेगा। चुनाव निपटते ही फिर न किसी को किताब में दर्ज बातें याद रहेंगी न लेखक का नाम। सब जानते हैं, ऐसी विवादित किताबें मौका देखकर ही लिखीं व पब्लिक की जाती हैं।

लेखक को प्रधानमंत्रीजी की चुप्पी का एहसानमंद होना चाहिए, इत्ती भयंकर पब्लिसिटी के लिए। घर बैठे ही किताब ने इत्ते नोट और वोट बटोर लिए। सुना है, ऑनलाइन स्टोर पर किताब आउट पर स्टॉक बता रहा है। इससे अधिक एक लेखक को और चाहिए भी क्या? किताब जित्ती ज्यादा विवादस्पद होगी, कमाई भी उत्ती ही मस्त होगी। यह बाजार का फंडा है प्यारे।

फिर भी किताब के बहाने जिन्हें प्रधानमंत्रीजी की चुप्पी पर सवाल खड़े करने हैं, शौक से करें। इससे प्रधानमंत्रीजी की सेहत पर कोई असर होने-हवाने वाला नहीं। वे जानते हैं कि उन्हें मौन रहना है और वे मौन ही रहेंगे। इत्ते विवादों और आरापों के बाद भी अगर कोई व्यक्ति मौन साधे रहता है, तो यह वाकई बहुत बड़ी बात है। वरना आजकल के जमाने में सहनशीलता बची कित्तों के भीतर है।

भले ही कोई माने या न माने लेकिन मौन या चुप्पी को मैं प्रधानमंत्रीजी की दस सालों की 'विशेष उपलब्धि' मानता हूं। ज्यादा जुबान चलाने वालों को प्रधानमंत्रीजी से कुछ सीखना चाहिए। जुबान पर इत्ता धैर्य हर किसी के बस की बात नहीं।

सच कहूं, मेरे लिए तो किताब से कहीं अधिक प्रधानमंत्रीजी की चुप्पी 'अनमोल' है। खुदा उनकी इस चुप्पी को सलामत रखे।

रविवार, 13 अप्रैल 2014

मेरी पत्नी के आदर्श

चित्र साभारः गूगल
मेरी पत्नी के आदर्श बदलते रहते हैं। उसके आदर्शों में या तो नेता होते हैं, या फिर फिल्मी हीरो। यही वजह है कि मैं कभी मेरी पत्नी का आदर्श नहीं रहा! वो तो खुल्ला कहती है, शादी मैंने गलत व्यक्ति से कर ली, जिसमें आदर्श नाम की कोई चीज ही नहीं। लेकिन मैं बुरा नहीं मानता। बुरा मानकर मुझे अपनी खटिया घर के बाहर थोड़े पड़वानी है।

खैर, जैसाकि मैंने ऊपर बतलाया कि पत्नी के आदर्श बदलते हैं। अब पत्नी के आदर्श अरविंद केजरीवाल नहीं, मेरे ही मोहल्ले के एक बड़े नेताजी हैं। आजकल पत्नी उन्हीं को आदर्श मानकर उनके गुणगान में लगी रहती है। कल तलक जिस दीवार पर श्रीमान अरविंद केजरीवाल की तस्वीर (बतौर आदर्श वयक्तित्व) टंगी रहती थी, उस जगह पर अब नेताजी की तस्वीर है। पत्नी ने मंगलसूत्र में नेताजी का फोटू जड़वाया है। कहती है- इससे नेताजी के विचार एवं व्यवहार दिल के करीब रहते हैं। फिलहाल, इन दिनों वो नेताजी के साथ चुनाव प्रचार में लगी है।

मुझे चूंकि न मेरे न किसी और के प्रचार-प्रसार में दिलचस्पी है इसलिए मैं घर पर ही रहता हूं। घर पर रहकर या तो कलम-घिसाई करता हूं या फिर खाना-बर्तन-झाड़ू इत्यादि। घर में बाई इसलिए नहीं लगाई है, क्योंकि पत्नी को मेरी निगाहों पर भरोसा नहीं। उसकी निगाह में मेरा स्टेटस शाइनी आहूजा जैसा है।

मेरी पत्नी उक्त नेताजी को अपना आदर्श क्यों मानती है, सुनिए- पत्नी का कहना है- नेताजी में वो सभी गुण हैं, जो एक आदर्श बंदे में होने चाहिए। नेताजी कने भरपूर पैसा है। नेताजी कने एक-एक लाख के पांच पैन और दो-दो लाख की आठ इंपोर्टेड घड़ियां हैं। नेताजी कने दस कारें और तीन ट्रेक्टर हैं। जमीन-जायदाद का तो पूछो ही नहीं कि कित्ती और कहां-कहां है। साथ-साथ, नेताजी का न सिर्फ मोहल्ले बल्कि शहर में भी अच्छा-खासा दबदबा है। बरेली से लेकर दिल्ली तक तगड़ी पहुंच है नेताजी की। इत्ता पैसा होने के बाद भी नेताजी रहते बिल्कुल सीधे-सादा हैं। अगर दो-चार दाग दामन पर हैं भी तो क्या! वो नेता ही क्या जिसके दामन पर दाग न हो! आजकल दाग वालों का ही जमाना है।

पत्नी को मैंने कई दफा समझाया कि अंटी में नोट या दामन पर दाग लगा लेने से कोई आदर्श नेता नहीं हो जाता। नेता होने के लिए ईमानदारी-सादगी-त्याग-सत्यता बहुत जरूरी है। शास्त्रीजी जैसे आदर्श नेता अब भला कित्ते हैं? लेकिन पत्नी को मेरा कहा-समझाया बहुत बुरा लगता है। वो कहती है- तुम्हारे भेजे में न आए हैं न आएंगे, नेता होने के फायदे। तुम अपना आदर्शवाद और ईमानदारी अपने कने रखो। तुम एक मामूली से लेखक भला क्या समझोगे नेताजी के राजनीतिक आदर्शवाद को? राजनीति में रहकर नेताजी ने जित्ता (नाम और दाम) कमा लिया, तुम पचास बरस कलम रगड़कर भी न कमा पाओगे। अब तक के लेखन में तुम्हें मिला ही क्या है? ले देके एक स्कूटर है, वो भी उधार का। तुम दस साल पहले भी पांच सौ पर अटके थे, अब भी वहीं अटके हो। नेताजी इत्ते सालों में जाने कहां से कहां पहुंच गए। तुम भी अगर राजनीति में होते, तो आज हमारे हालात क्या ऐसे होते? हर वक्त कभी इस नेता, कभी उस नेता की खींचाई-बुराई में लगे रहते हो। कभी अपनी शक्ल आइने में देखी है, छत्तीस की उम्र में छप्पन के लगते हो। एक मेरे आदर्श नेताजी हैं पचास में भी तीस के लगते हैं। पता है, पैसा ऐसी चीज है,जो बूढ़े को भी जवान बनाए रखता है ताउम्र।

इस बाबत पत्नी से ज्यादा बहस करना बेमानी था। क्योंकि बहस-बहस में झाड़ू या चिमटा उठाते उसे जरा भी देर नहीं लगती। इसलिए अपनी इज्जत बचाते हुए मैं खुद ही कट लेता हूं। मेरी बात जब मेरी कलम नहीं समझती तो पत्नी क्या खाक समझेगी? पत्नी की देखा-दाखी मेरी कलम भी अक्सर मुझे खारिज कर देती है। सच बोलूं, मैं अपने खारिज होने का भी बुरा नहीं मानता।

सोचता हूं तो अक्सर लगता है कि जमाना वाकई बहुत बदल गया। उसी हिसाब से बदल गए हैं लोगों के आदर्श। अब जो राजनीति-साहित्य-समाज-व्यवस्था में शुचिता की बात करता है, वो बेवकूफ है शायद मेरी तरह।

सोमवार, 7 अप्रैल 2014

दल बदलने में हर्ज क्या है?

चित्र साभारः गूगल
प्यारे, जब गिरगिट रंग बदल सकता है, तेंदुआ शहर में घुस सकता है, दूध में पानी मिल सकता है, तो नेता दल क्यों नहीं बदल सकता? आखिर नेता के दल बदलने में दिक्कत क्या है? नेता के दल बदलने पर इत्ती हाय-तौबा क्यों मचाई जाती है? यह लोकतंत्र है। और लोकतंत्र में हर किसी को अधिकार है, कहीं भी आने-जाने, खाने-पीने, बोलने-लिखने का। तो फिर दल बदलना 'लोकतांत्रिक प्रक्रिया' के तहत क्यों नहीं आता?

अरे भई, नेता का दिल अपने दल में नहीं लगा। उसे छोड़कर वो दूसरे दल में शामिल हो गया। दूसरे दल में भी दिल नहीं लगा, तीसरे दल में शामिल हो गया। ऐसे ही तीसरे, चौथे, पांचवे...हजारों प्रकार के दल हैं यहां, किसी में भी शामिल हो सकता है। क्या बड़ी-बड़ी कंपनियों में बंदे ऐसा नहीं करते? एक कंपनी को छोड़कर दूसरी कंपनी, दूसरी को छोड़कर तीसरी...।

सोचने वाली बात है, नेता दल या बंदा कंपनी को अगर नहीं छोड़ेगा-पकड़ेगा तो अन्य दलों या कंपनियों का क्या होगा? नेताओं की दलों के भीतर-बाहर आवाजाही बेहद जरूरी है। एक तो अन्य दलों के नेता संपर्क में रहते हैं और आड़े वक्त में काम भी आते हैं। फिर नेता अगर दल नहीं बदलेगा, तो चुनावों में मनोरंजन कैसे होगा? यह भी तो जरूर है न।

देखिए, राजनीति में सबकुछ चलता है। अगर सबकुछ न चले न, तो बेचारे नेताओं को कोई पूछेगा भी नहीं। भई, मैं तो इस बात के पक्ष में हूं कि जहां दाना-पानी ठीक-ठाक मिले, बंदे या नेता को अपना दिल वहीं लगाना चाहिए। ये अतिबद्धता-प्रतिबद्धता के दिन अब लद चुके हैं प्यारे। प्रतिबद्धता का मतलब यह थोड़े है कि अपने पेट पर लात मार लो। आजकल जब पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति प्रतिबद्धता नहीं हो-रह पाते फिर यह तो राजनीति है। राजनीति संभावनाओं और महत्त्वाकांक्षाओं का क्षेत्र है, यहां जिसके कने पावर, वही राजा।

कोई अनोखा नहीं हो रहा इन चुनावों में, कि अलां नेता फलां पार्टी में चले गए, कि इस दल ने उस दल के नेता को तोड़ लिया। हमारे यहां ज्यादातर चुनाव लड़े ही दल बदलूओं के आधार पर जाते हैं। अपनी पार्टी से टिकट नहीं मिला, तो दूसरी पार्टी से ले लिया। मतलब तो प्यारे टिकट मिलने से है। चाहे ये दे या वो दे। अपना काम बनता, भाड़ में जाए प्रतिबद्धता। अब सब सुविधा की राजनीति में जीते हैं। कल का क्या भरोसा रहे न रहे। सत्ता में एक दफा अगर कुर्सी नीचे से खिसक गई, तो फिर इत्ती आसानी से हाथ भी नहीं आती। क्या समझे...।

आदमी की जब निजी या सामाजिक जीवन में नैतिक गड़बड़ा जाती है, फिर यह तो राजनीति है। नैतिकता या ईमानदारी से यहां जिसने भी राजनीति की तुरंत ही हाशिए पर धकेल दिया गया। बहुत कहते थे आप वाले कि हम सौ फीसद शुद्ध व ईमानदारी की राजनीति करेंगे। खुद ही देख लो, कित्ती ईमानदारीपूर्ण राजनीति कर रहे हैं। ईमानदारों के बीच भी टिकट को लेकर जूतम-पैजार मची हुई है। ईमानदारी की माला जप-जप के उन्होंने बेचारे आम आदमी का ही बैंड बजा दिया।

जब तक दो-चार इधर या उधर न आएं-जाएं मजा नहीं आता राजनीति में। आया राम-गया राम के माध्यम से ही तो पता चलता है कि फलां दल में फलां पद खाली है। अगर सब एक ही जगह रहेंगे तो क्या खाक मजा आएगा राजनीति में!

हमें दल बदलू नेताओं के प्रति हीनता का नहीं, सम्मान का भाव रखना चाहिए। बेचारों की अपने दल में कोई न कोई मजबूरी ही रही होगी, जो उन्हें दूसरे दल का रूख करना पड़ा। दल-बदल तो एक स्वभाविक प्रक्रिया है राजनीति की। राजनीति में रहकर जो जित्ते दल बदल लेगा, वही अच्छे से सरवाइव कर पाएगा। नहीं तो खुदा ही मालिक।

दल बदलूओं से परेशान न हों उनका तहे-दिल से स्वागत करें। दल बदलू नेता भारतीय राजनीति एवं लोकतंत्र के महत्त्वपूर्ण स्तंभ हैं।

रविवार, 6 अप्रैल 2014

मैं और छिपकली

यह तो मुझे नहीं मालूम कि छिपकली मुझसे डरती है या नहीं पर मैं छिपकली से बहुत डरता हूं। छिपकली का डर मेरे दिलो-दिमाग में अंदर तक बस गया है। जहां-जिस कमरे या जगह में छिपकली होती है, वहां मैं नहीं होता। छिपकली को दूर से देखकर ही मेरी पतलून पानी-पानी हो जाती है। हालांकि कोशिश कई दफा की कि छिपकली से न डरूं, उसके करीब जाकर उसके हाल-चाल लूं, लेकिन डर के आगे जीत कभी नहीं मिल पाई।

वैसे छिपकली से एक मैं ही नहीं, मुझे लगता है, बहुत से लोग डरते हैं। इन बहुत से लोगों में महिलाओं की संख्या ज्यादा है। उन्हें तो कॉकरोच तक से डर लगता है। जबकि मैं कॉकरोच से नहीं डरता! कॉकरोच के साथ मेरा तालमेल अच्छा है। अपने कमरे में मैंने कॉकरोचों को भरपूर जगह दी हुई है- रहने-खाने-पीने-सोने की। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि कॉकरोच मेरे ऊपर ही सो गए हैं। कॉकरोच नुकसान कतई नहीं पहुंचाते। बेहद शांत भाव से, अपनी लंबी-लंबी मूंछों को यहां-वहां फैलाते-उठाते-गिराते रहते हैं।

हालांकि शांत स्वभाव की छिपकली भी होती है। पर पता नहीं क्यों, उसकी शांति में एक अजीब तरह का डर छिपा होता है। छिपकली को देखते ही मुझे ऐसा लगने लगता है कि अब ये सिर्फ मुझ पर ही आकर गिरेगी। चाहे वो मुझसे पांच-दस गज की दूरी पर ही क्यों न हो। लेकिन उसका होना ही खौफ के होने जैसा होता है मेरे लिए।

छिपकली से सबसे ज्यादा परेशानी मुझे नहाने और पाखाने जाने में होती है। नाहते समय अगर छिपकली दिख जाए या पाखाने में दर्शन हो जाएं फिर तो आप कल्पना ही कर सकते हैं- मेरे भय के टेंपरेचर की। उस वक्त डर के मारे न मुझे पसीना आता है, न चीखता-चिल्लाता हूं। सांसें जहां जैसी होती हैं, बस वहीं थम जाती हैं। एकाध बार ऐसा हुआ भी है। वो तो गनीमत रही- छिपकली ने मुझसे कुछ कहा नहीं।

कहा यही जाता है कि छिपकली सामान्यता डरपोक होती है। इंसान को देख खुद ही इधर-उधर हो जाती है। बिना छेड़ा-छाड़ी काटती भी नहीं। अपने प्रिय कीड़ों को बस निगल लेती है। मगर फिर भी उसकी छवि किसी आतंक से कम नहीं होती। तुर्रेमखां भी छिपकली के आगे पनाह मांगते हैं। यों, छिपकली ज्यादा डरावनी (यहां मैं अफ्रीका आदि देशों में पाई जाने वाली छिपकलियों की बात नहीं कर रहा) नहीं होती मगर डरने के लिए उसका 'नाम' ही काफी होता है।

पत्नी मजाक बनाती है कि मैं लेखक होकर छिपकली से डरता हूं। जबकि लेखक को तो हर स्थिति में बहादुर होना चाहिए। कहीं या किसी और मामले में शायद बहादुर होऊं किंतु छिपकली में मामले में कभी नहीं हो सकता। एक बार पत्नी के गुस्से के आगे डटकर खड़ा रह सकता हूं, पर छिपकली के आगे कभी नहीं। छिपकली मेरे डर का मुख्य कारण है।

मेरे मोहल्ले में भी सबको मालूम है कि मैं छिपकली से बहुत डरता हूं इसलिए उन्होंने मेरा नाम ही 'छिपकली-लेखक' रख दिया है। मेरे मुंह पर तो नहीं कहते मगर मुझे पता है। मैं बुरा नहीं मानता। बुरा मानने का कोई फायदा भी तो नहीं क्योंकि जो है सो है ही। यों भी, दुनिया मैं ऐसा कोई बंदा नहीं जो किसी न किसी से डरता न हो। डरते सब हैं पर कह नहीं पाते। लेकिन मैं कह देता हूं। हां, मुझे छिपकली से बेहद डर लगता है।

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

एक बेईमान बंदे की बतकही

मैं मेरे परिवार का सबसे बेईमान बंदा हूं! जबकि मेरे परिवार में एक से बढ़कर एक ईमानदार मौजूद हैं। लेकिन मेरी पटरी परिवार के ईमानदारों से कभी नहीं बैठ पाई। एकाध दफा कोशिश की भी पटरी बैठाने की पर किसी न किसी बात पर अखड़ ही गई। पटरी न बैठ पाने के कारण परिवार वाले मुझसे उत्ती ही दूरी बनाकर रहते हैं, जित्ती आजकल भाजपा वाले राम-मंदिर के मुद्दे पर बनाए हुए हैं।

मैंने खुद के बेईमान होने पर कभी अफसोस जाहिर नहीं किया। मुझे बेईमान बनकर रहने में ही मजा आता है। इस बहाने कम से कम बेमतलब की हवाई लफ्फबाजियों से तो दूर रहता हूं। वरना परिवार में तो सारे ईमानदार हर समय लंबी-लंबी ही छोड़ते रहते हैं। कभी-कभी उनके छोड़ने की लंबाई इत्ती लंबी हो जाती है कि वे खुद नहीं संभला पाते।

मेरे परिवार के ईमानदार आजकल मोहल्ले की एक ईमानदार पार्टी को चुनाव लड़वाने में जुटे हुए हैं। ईमानदार पार्टी का ईमानदार नेता मेरे परिवार वालों का खास आदमी है। हर काम मेरे परिवार वालों से ही पूछकर किया करता है। एक-दो बार उसने मुझे भी अपनी ईमानदार पार्टी में शामिल करने की कोशिश की मगर मैंने यह कहते हुए मना कर दिया- भाई, मैं कतई ईमानदार नहीं हूं। मुझे ईमानदार और ईमानदारों से चिढ़ है। बस तब ही से मैं उस ईमानदार आदमी और अपने परिवार वालों के लिए बेईमान हो गया हूं।

बेवजह ईमानदारी का कंबल अपने ऊपर डाले रहना मुझे पसंद नहीं। मैं ईमानदार नहीं हूं, इसे छिपाना क्यों? और फिर जो घोषित ईमानदार हैं भी, क्या वाकई वे ईमानदार हैं?

देख रहा हूं आजकल ईमानदार लोगों की बाढ़-सी आई हुई है हर तरफ। न केवल मेरे मोहल्ले बल्कि पूरे देश में से ऐसे-ऐसे ईमानदार बाहर निकलकर आ रहे हैं, मानो हमारा देश 'ईमानदारों का हब' बनने से बस जरा-सा दूर है। फिर तो दूसरे देशों के लोग हमारे देश आया करेंगे 'ईमानदार कैसे बनें' की ट्रेनिंग लेने। क्या नहीं...।

लेकिन प्यारे ज्यादा मीठा खाना अक्सर डाइबिटिज को ही जन्म देता है। कहीं ऐसा न हो सब अति-ईमानदार होने के चक्कर में, ईमानदारी का रोग लगा बैठें।

पर मुझे क्या, जिन्हें बनना हो ईमानदार वे बनें, मैं बेईमान बने रहकर ही प्रसन्न हूं। वैसे जित्ता सुकून बेईमान बने रहने में है, ईमानदारी में नहीं। ईमानदार बनकर रहने में फॉरमेंलटिएं बहुत निभानी पड़ती हैं। ये करो, वो मत करो। इससे मत मिलो, सिर्फ उससे ही मिलो। आदि-आदि।

अब परिवार-समाज-देश के बीच ऐसे बंदे भी तो होने चाहिए, जो ईमानदारी के बैलेंस को बेईमान बनकर मेनटेन कर सकें। मतलब, रेशो बराबर का रहना चाहिए। इसीलिए मैं अपने परिवार वालों के ऊपर नहीं गया। छंटा हुआ बेईमान बना। और मुझे अपनी बेईमानी पर नाज है।

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

श्रीनि से खास बातचीत

चित्र साभारः गूगल
आज हमसे खास बातचीत के लिए मौजूद हैं पूर्व बीसीसीआइ अध्यक्ष श्री श्रीनि। आइए, उन्हीं से जानते-समझते हैं, स्पाट फिक्सिंग का पूरा मसला है क्या?

एंकरः- सर, स्वागत है टाइम बम चैनल पर।
श्रीनिः- थैंक्स।

एंकरः- अंदर-बाहर बहुत हल्ला मचा है, आपने क्रिकेट में स्पाट फिक्सिंग को जगह देकर खेल को नुकसान पहुंचाया है।
श्रनिः- सब बकवास है। सब झूठे आरोप लगा रहे हैं मुझ पर। भला मैं क्यों क्रिकेट को नुकसान पहुंचाऊंगा? क्रिकेट मेरी आत्मा में बसता है। मैं क्रिकेट की पूजा और भलाई के लिए बना हूं। फिर भी, अगर स्पाट फिक्सिंग हुई है, तो इसमें इत्ता हंगामा खड़ा करने की क्या जरूरत है? आजकल जमाना ही फिक्सिंग का है।

एंकरः- लेकिन सुनने में यही आ रहा है कि फिक्सिंग के तार आपसे जुड़े हैं। साथ-साथ आपके दमाद मयप्पन ने भी खूब नोट पिटे हैं।
श्रीनिः- अजी, लोगों का क्या है। लोगों का तो काम है कहना। दरअसल, ये लोग मेरी निष्ठा-प्रतिष्ठा से जलते हैं। मेरी क्रिकेट (खेल) के प्रति ईमानदारी से चिढ़ते हैं। इत्ते कम टाइम में मैंने आइपीएल को जानते हैं, कहां से कहां पहुंचा दिया! आइपीएल में ग्लैमर और मनी का प्रचार एवं संचार मेरी ही देन है। अब इसका क्रेडिट चाहे जो ले ले। रही बात मेरी दमाद की। उन बेचारो को क्रिकेट और आइपीएल का एबीसीडी तक नहीं मालूम। ऐंवई यहां आकर फंस गए। जबकि मैंने बहुतेरा समझाया था उन्हें।

एंकरः- सुप्रिम कोर्ट की हड़काई के बाद आपको गद्दी छोड़नी ही पड़ी। कुछ पूर्व क्रिकेटर भी ऐसा ही चाहते थे।
श्रीनिः- देखिए, मैं माननीय सुप्रिम कोर्ट के फैसले का सम्मान करता हूं। न ही मैंने कभी ऐसी जिद की कि मैं गद्दी नहीं छोड़ूंगा। अरे, गद्दी तो पिछवाड़े का मैल है। आज मेरे नीचे हैं, कल किसी और के होगी। पर, मेरा कहना अब भी यही है, मैं निर्दोष हूं। रही बात पूर्व क्रिकेटरों की तो मुझे सब मालूम है, कौन कित्ता पानी में है और कित्ता ईमानदार।

एंकरः- अच्छा सर, यह तो आप मानेंगे न कि स्पाट फिक्सिंग में आपका हाथ रहा है। आपको सारी जानकारी होने के बावजूद आपने न किसी खिलाड़ी को डांटा न टोका- बेटा ऐसा न करो, यह अच्छी चीज नहीं।
श्रनिः- व्हाट स्पाट फिक्सिंग? क्या आप मुझे फिक्सर मानते हैं? यार, मुझे क्या मालूम आइपीएल में कौन खिलाड़ी किस जुगाड़ में लगा है। कौन किस के साथ मिलकर कहां सेटिंग कर रहा है। मेरी कने वैसे ही इत्ते काम रहते थे, अब इत्ती छोटी-छोटी बातों के लिए भी मैं टाइम देने लगूं, तो हो गया। और फिर वे दूध पीते बच्चे तो हैं नहीं। उन्हें नहीं मालूम फिक्सिंग बुरी चीज है, इससे दूर रहना चाहिए। फिक्सिंग में शामिल वे रहे और कीचड़ मेरे पाक-दामन पर उछाली जा रही है। यह ठीक नहीं।

एंकरः- सर, अंतिम सवाल। पद छोड़ने के बाद अब आप क्या करेंगे; भजन करेंगे या फिक्सिंग मामले में चली जांच में सहयोग देंगे।
श्रीनिः- अब भजन करने के अतिरिक्त मेरे कने बचा क्या है? अच्छा-खासा काम-धंधा चल रहा था, कमाई हो रही थी, पर क्या करें? किस्मत से ज्यादा कभी किसी को कुछ मिला है यहां? मैं हर तरह की जांच के लिए तैयार हूं। लेकिन मेरी जांच करवाने से पहले ललित मोदी की भी तो जांच करवाइए। फिक्सिंग का सारा खेल तो उन्हीं का रचा है। मैं फिर कह रहा हूं, मुझे फंसाया गया है। मैं बस क्रिकेट को जानता हूं, फिक्सिंग या फिक्सर को नहीं।

एंकरः- हमसे बातचीत करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया आपका।

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

पादने के बहाने

चित्र साभारः गूगल
हालांकि मैं पाद-विशेषज्ञ तो नहीं फिर भी अपने अनुभव के हिसाब से कह सकता हूं, दुनिया में पादने से बेहतर दूसरा कोई सुख नहीं। पादकर संपूर्ण तृप्ति का एहसास मिलता है। महसूस होता है, पेट के डिब्बे में जो गैस कई मिनट या घंटों से परेशान कर रही थी- उसे मात्र एक पाद ने ध्वस्त कर दिया। तीव्र वेग से आया पाद पेट के साथ-साथ दिमाग को भी काफी हद तक सुकून देता है।

मुझे नहीं मालूम मेडिकल साइंस में पाद या पादने पर कभी कोई रिसर्च हुई है कि नहीं। पर हां इत्ता दावे के साथ कह सकता हूं कि यह विषय है बेहद शोध-युक्त। ज्यादा कुछ नहीं तो कम से कम इस बात पर तो रिसर्च होनी ही चाहिए कि इंसान दिन भर में कित्ता और कित्ते किलो पाद लेता है। (यहां पाद को- बतौर किलो- इसलिए लिखा क्योंकि पाद एक तरह से गैस ही होती है)। या फिर किन-किन स्थितियों-परिस्थितियों में पाद सबसे अधिक आते हैं। खुशी के पाद कैसे होतें, गम के पाद कैसे होते हैं, असंतोष के पाद कैसे होते हैं, अराजकता के पाद कैसे होते हैं, आंदोलन के पाद कैसे होते हैं, विमर्श या लेखन के पाद कैसे होते हैं, उत्तेजना के पाद कैसे होते हैं। आखिर मालूम तो चले कि पादने का मनुष्य के जीवन में कित्ता और कैसा महत्त्व है।

औरों के बारे में तो नहीं किंतु अपने बारे में कह सकता हूं कि मैं दिनभर में पांच-सात बार आराम से पाद लेता हूं। मुझको सबसे अधिक पाद व्यंग्य लिखते हुए आते हैं। व्यंग्य लिखते वक्त आ रहे पादों को मैं रोकता नहीं बल्कि खुलकर आने देता हूं। उस दौरान पाद जित्ता लंबा और तगड़ा आता है, व्यंग्य उत्ता ही उम्दा बनता है। इसे मैंने अब अपना टोटका-सा बना लिया है। जब भी व्यंग्य लिखने बैठता हूं- पादता अवश्य हूं। पाद के रास्ते मेरे पेट का सारा कचरा बाहर निकल जाता है। फिर मैं कहीं अच्छा लिख पाता हूं।

मुझे तेज-तर्रार पादने वाले अधिक पसंद हैं। उनके पादे की आवाज में एक अजीब तरह की गूंज होती है। गूंज की महक फिजा में कुछ देर तलक यों बनी रहती है- मानो किसी ने मदमस्त गंध वाला डियो छिड़का हो। धीमा पादने वाले अपने जीवन में भी बेहद धीमे होते हैं। पता नहीं तेज पादने में उन्हें क्या तकलीफ होती है। कई-कई तो इत्ते सियाने होते हैं कि अपने पाद को बीच में ही रोक लेते हैं। बेचारा पाद मन मसोस कर रह जाता है पेट के भीतर। गाली देता होगा कि साला कित्ता कंजूस है- मुझे बाहर भी नहीं निकलने देता। धीमा पाद सुस्त व्यक्तित्व की निशानी है।

पाद एक ऐसी चीज है- जिसे पास करने में न पैसे लगते हैं न अतिरिक्त भार सहना पड़ता है। बस जरा-सा अपने पिछवाड़े को कष्ट देना होता है। लेकिन इंसान इसमें भी सियानापन दिखला जाता है। यों, जीवन में तमाम तरह के कष्ट-तकलीफें झेल लेगा लेकिन पादने की बारी जब आएगी तो पिछवाड़े उठाके ही नहीं देगा। कैसे-कैसे लोग होते हैं दुनिया में। मतलब, फ्री का सुकून लेने में भी उनकी नानी मरती है।

मुझे याद है, एक दफा खुशवंत सिंह ने पाद पर बड़ा ही रोचक प्रसंग लिखा था अपने स्तंभ में। मित्र के साथ एक रात अपने कमरे में बीताने पर उन्हें पाद का जो अनुभव हासिल हुआ था- वही दर्ज था। साथ ही, यह भी लिखा था- दुनिया में सबसे खराब अमेरिकनस ही पादते हैं। उनके पाद बेहद बदबूदार और नापाक होते हैं। पाद ऐसा होना चाहिए जिसमें आवाज के साथ-साथ कुछ महक भी हो।

खैर, मैं इस बात का खास ध्यान रखता हूं कि चाहे अपने बिस्तर पर किसी भी तरह का पाद लूं मगर पब्लिस प्लेस में हमेशा महकदार ही पादूं। अधिक जोर से नहीं शालीनता के साथ पादूं। अमूमन, धड़ाम-बड़ाम वाले पादों से बचता हूं। मगर हां जब घर में या फिर व्यंग्य लिख रहा होता हूं, तो खूब मस्त और तरह-तरह की आवाजों के साथ पादता हूं। मेरा कमरा मेरे पादों की महक से महका रहता है हमेशा।

हालांकि मेरी पत्नी को मेरा यों पादते रहना पसंद नहीं। पाद पर ही कई दफा बात तलाक तक पहुंच चुकी है। पर क्या करूं, ससुरी आदत ऐसी पड़ गई है कि छुटने का नाम ही नहीं लेती। वैसे मैंने पत्नी को बोल रखा है- जब मैं पादा करूं अपनी नाक में रूमाल ठूंस लिया करो। मगर स्थितियां तब भी काबू में नहीं रह पातीं। फिर भी किसी तरह मना ही लेता हूं।

अब पत्नी क्या जाने पादने का सुख। मुझे पादने से इत्ता प्यार है कि दुनिया का हर सुख इसके आगे बौना लगता है। दावा कर सकता हूं, अगर पाद-प्रतियोगिता में भाग लेना पड़ा तो जीतूंगा मैं ही।

बहरहाल, पेट, दिमाग और विचार को अगर दुरुस्त रखना है तो प्यारे जमकर पादो। क्योंकि जीवन का असली सुख पादने में ही है।

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

सनी लियोन ने नाम पत्र

चित्र साभारः गूगल
प्यारी सनी लियोन,

तुम्हें यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता होगी कि मैंने रगिनी एमएमएस-2 दो दफा देखी है। दोनों ही दफा मुझे बैटर फील हुआ। अमूमन हॉरर फिल्म देखकर हॉरर ज्यादा फील होता है, लेकिन मुझे बैटर फील हुआ। जाहिर-सी बात है, जिस फिल्म में तुम जैसी उन्मुक्त अदाकारा हो, उसे देखकर भला किस मूरख को बैटर फील न होगा!

सच्ची बताऊं, मुझे फिल्म जरा-सी भी भूतिया नहीं लगी। हालांकि मेरी अगल-बगल में बैठे लोग भूतनी को देखकर या भूतिया किस्म की आवाजों को सुनकर डर जाते थे, एकाध तो डर के मारे बीच में चले भी गए, लेकिन मैं नहीं डरा। अंत तक हॉल में डटा रहा। मैंने तुम्हारे और तुम्हारी मिनी ड्रेस के बहाने अपने डर को फुल-टू एंजॉय किया। कसम से, इत्ती सेक्सी और हॉट भूतनी हिंदी हॉरर फिल्म में मैंने पहली बार ही देखी है। अंग्रेजी हॉरर फिल्म में तो कमाल की भूतनियां होती हैं। तुम्हें मालूम ही होगा।

तुम हिंदी मस्त बोल लेती हो। हालांकि थोड़ा अटकी-भटती जरूर हो पर इत्ता तो चलता है। कैटरीना से तो बेहतर ही है। फिल्म में क्या मस्त डयलॉग बोले हैं तुमने। उन्हें यहां खुलकर लिख भी नहीं सकता। मगर प्रभावित हूं- दिल से।

यू नो, जब तुम्हारा बेबी डॉल... वाला गाना बजा, कसम से हॉल में इत्ती सीटियां बजीं, इत्ती सीटियां बजीं कि गाना कम सीटियां ज्यादा सुनाई दे रही थीं। हर कोई लगा था बस तुम्हारी देह, तुम्हारी कमर और तुम्हारे उन्मुक्त डांस को देखने। गाने में तुम्हारा ड्रेसिंग सेंस कमाल का था। मैं तो कहता हूं, हर हीरोइन को तुम्हारे ड्रेसिंग सेंस से प्रेरणा लेनी चाहिए। जिस ड्रेस को पहनने से यहां की हीरोइनें अक्सर बचती हैं, उसे तुमने खुलकर पहना और प्रदर्शित भी किया। दिल खुश हुआ देखकर।

कोई माने या न माने मगर मैं मानता हूं, तुम्हारे भीतर एक्टिंग की अपार संभावनाएं हैं। जो तुम कर सकती हो, आम हीरोइन करने की सोच भी नहीं सकती। क्या करें, यहां परंपरा-संस्कृति का बड़ा लोचा है। फिर भी कुछ हीरोइनें वर्जित को भी सार्वजनिक कर रही हैं, उम्दा प्रयास है। बेवकुफियां में सोनम कपूर ने बिकनी पहनकर धमाल ही कर दिया और विद्या बालन के तो कहने ही क्या।

तुम चिंता न किया करो यहां तुम्हारे चाहने वाले बहुत हैं। मैं तो खैर हूं ही। अब तलक शायद ही तुम्हारी कोई फिल्म या क्लिप होगी, जो मैंने देखे बगैर छोड़ी हो। तुम्हें देखने में परम-सुख मिलता है।

उम्मीद है, रागिनी एमएमएस-2 के बाद ऐसी ही कोई अति-उन्मुक्त फिल्म में तुम दोबारा जरूर नजर आओगी। पर अबकी से इत्ती हॉट भूतनी बनकर मत आना नहीं तो रीयल भूतनियां बुरा मान जाएंगी।

मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

लहर की चपेट में

प्यारे, आजकल मैंने घर से निकलना बंद कर रखा है। दफ्तर से छुट्टी ले ली है। भाजी-तरकारी लेने के लिए भी पत्नी को ही भेजता हूं। कमरे की खिड़की-किवाड़े भी ज्यादातर बंद ही रहती हैं। न बाहर झांकता हूं न किसी को अंदर तांकने देता हूं। पत्नी बता रही थी- दो-चार पड़ोसियों ने पूछा भी है कि आजकल मैं कहां हूं। दिखाई नहीं पड़ता। मैंने पत्नी को बोल दिया है, अगर कोई ऐसा कुछ पूछा करे तो कह देना- गंभीर लेखन में व्यस्त हैं।

अरे, न न लेखन-वेखन की व्यस्ता कुछ नहीं, मसला जरा दूसरा है।

दरअसल, है क्या, इन दिनों हर तरफ बड़ी भयंकर एक लहर चल रही है। लहर के बारे में प्रचारित किया जा रहा है कि देश की नैया अब इसी लहर के सहारे पार लगेगी। लहर में इत्ती ताकत है कि आस-पास की लहरें तक पनाह मांग जाएंगी। लहर को चलाने वाले बड़ी तत्परता से लहर की मार्केटिंग में डटे हुए हैं। जहां भी संभव हो पा रहा है, वहां लहर को चलाया-चलवाया जा रहा है।

अभी तलक यह लहर राजनीति और सत्ता के गलियारों में ही चल रही थी, अब साहित्य के बीच भी चलने लगी है। एकाध साहित्यकार भी लहर की चपेट में आ गए हैं। बेचारे एक मशहूर कहानीकार तो लहर का नाम लेने भर पर ऐसे फंस गए हैं कि प्रगतिशीलों ने उनकी नाक में दम किया हुआ है। आजकल फेसबुक पर यह बड़ी बहस का मुद्दा बना हुआ है।

वो तो गनीमत रही कि असांज लहर की चपेट में न आया। खामखां, उसे भी लहर में लपेटे ले रहे थे।

इसीलिए, कहीं यह लहर मुझे भी अपनी चपेट में न ले ले, मैंने खुद को कुछ दिनों के लिए घर में बंद कर लिया है।

देखिए, लहर यह नहीं जानती कि मैं कौन हूं, क्या हूं। लहर जब आती है, तो बिन पूछे-गछे अपने साथ बहा ले जाती है। लहर में न बहें इसका ख्याल तो आपको आप ही रखना पड़ता है। जरा ढीले पड़े नहीं कि लहर क्षणभर में काम तमाम कर डालती है। चूंकि वर्तमान में जो लहर चल रही है, बहुत भयंकर किस्म की है, इसलिए ऐतिहात ज्यादा बरतना पड़ रहा है। यों भी, मेरे लिए पिछली दो-तीन लहरों में बहने का अनुभव खास अच्छा नहीं रहा है।
 
यह तो व्यक्ति विशेष की राजनीतिक लहर है, मैं तो मेरी पत्नी की लहर तक से बचकर रहता हूं। बताने में कैसी शर्म, मेरे घर में मेरी कोई लहर नहीं है। मेरी सारी लहर पत्नी ने निकाल रखी है। साथ-साथ, वर्निंग भी दे दी है कि मैं किसी भी लहर में न बहूं। इसलिए ध्यान ज्यादा रखता हूं। ऐंवई कहीं बह-बाह गया तो घर में घुसने तक के लाले पड़ जाएंगे।

लहर का कहां कित्ता जोर है, मैं अधिक नहीं जानता। न जानने की तमन्ना रखता हूं। लहर का असली असर तो जनता ही बताएगी। तब तलक इंतजार करें।