सोमवार, 31 मार्च 2014

मैं और मेरी मूर्खता

चित्र साभारः गूगल
मुझे गंभीरता से चिढ़, मूर्खता से प्यार है। अनुमानतः जब सृष्टि की रचना की गई होगी, तब मूर्खें में मेरा नाम अव्वल नंबर पर रहा होगा! गंभीरता का पुर्ज मेरे मस्तिष्क में शायद इसलिए नहीं डाला गया होगा- कहीं यह बंदा धरती पर पहुंचकर माहौल मातमी न कर दे। इसीलिए मुझे हर वो आदत बख्शी गई, जिसमें मूर्खता का पुट ही ज्यादा हो। मूर्ख होने के नाते मैं खुद को बुद्धिजीवियों-ज्ञानियों-पढ़े-लिखों से कुछ अलग-सा महसूस करता हूं।

मूर्ख होना मेरे लिए अपमान का नहीं, बेहद सम्मान का विषय है। मेरा मानना है- खुद को या दुनिया को मूर्ख बनकर या बनाकर ही समझा जा सकता है। हालांकि दुनिया में एक से बढ़कर एक मूर्ख भरा पड़ा है लेकिन वो मूर्ख इत्ता सियाना है कि खुद को मूर्ख मानता ही नहीं। अगर उन्हें कोई मूर्ख कह भी दे, तो इत्ता बुरा मानते हैं, मानो उनकी बुद्धि पर डाका डाल दिया हो। जबकि बुद्धि का मूर्ख या मूर्खता से भला क्या मतलब? बुद्धि तो मूर्ख के लिए दिमाग का मैल है।

फिलहाल, मैं बुद्धि के मैल को दिमाग से बाहर ही रखता हूं। दिमाग के भीतर रहकर बुद्धि तरह-तरह से आतंक मचाती है। किसी भी बात या मुद्दे पर बंदे को इत्ता अधिक सोचने पर मजबूर कर देती है कि पगला जाए। जबकि ज्यादा सोचना एक प्रकार बीमारी है। मैंने कई ऐसे बंदे देखे-सुने हैं, जो बेचारे सोचते-सोचते ही दुनिया से विदा हो लिए। मेडिकल सांइस बताती है कि सोचने में बुद्धि का सबसे अधिक सत्यानाश होता है। सोचना बुद्धि को इस कदर कुंद बना देता है, फिर बंदा न खुद का रह पाता है न समाज का। सोचने वालों की दुनिया बेहद काली होती है। काल-कोठरी समान। बुद्धि का दबाव उन्हें कहीं का नहीं छोड़ता।

परंतु मूर्खता ऐसा कुछ भी करने से हमेशा रोकती है। मूर्ख बंदे कने इत्ता टाइम ही नहीं होता कि वो अपनी मूर्खता के अतिरिक्त किसी और बात या मुद्दे पर ध्यान दे सके। वो तो हर वक्त अपनी मूर्खता में ही व्यस्त रहता है। जैसाकि मैं।

यकीन मानिए, मूर्खें की दुनिया समझदारों से कहीं बेहतर और दिलचस्प होती है। सबसे खास बात, मूर्ख बेफालतू की टेंशन नहीं लेता। न किसी के बारे में गलत सोचता है, न किसी को गलत बताता। मूर्ख की स्थिति एकदम गधे जैसे होती है। अपनी ढेंचू-नुमा दुनिया में ही मस्त-व्यस्त।

आप शायद यकीन नहीं करेंगे गधा मेरी मूर्खता की प्रेरणा है। अपने जीवन व लेखन में मैंने गधे से बहुत कुछ सीखा व जाना है। दुनिया मेरे बारे जो चाहे राय रखे, मुझे इससे ज्यादा मतलब नहीं रहता। मेरे सरोकार मूर्खें और गधों से अधिक जुड़े हैं। मैं हर उस बात को करता-मानता हूं, जहां बौद्धिता का नहीं मूर्खता का वर्चस्व ज्यादा रहता है। मूर्खता के धरातल पर खड़े होकर चीजें मुझे अधिक पारदर्शी दिखाई पड़ती हैं। यही हमारे वक्त का तकाजा भी है।

दरअसल, लेखन में मैंने व्यंग्य को इसलिए चुना ताकि अपनी मूर्खतापूर्ण सोच एवं विचारधारा का उत्पादन अधिक खुलकर कर सकूं। मेरा विश्वास चिंतन या मनन करने से अधिक मूर्ख-नुमा व्यवहार में है। चिंतन वो करते हैं, जिनके कने अतिरिक्त दिमाग होता है। चूंकि मेरे कने नहीं है, इसलिए मैं बचकर रहता हूं।

हम मूर्खें का कोई एक दिन नहीं होता। हर दिन, हर पल हमारा होता है। मूर्ख-दिवस चाहे एक अप्रैल को हो या न हो, हमें अपनी मूर्खता से मतलब। जिंदगी को मस्त होकर जीने का सबसे उम्दा जरिया है, खुद मूर्ख बने रहकर दूसरे की मूर्खता को जानना-समझना।

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