सोमवार, 3 मार्च 2014

पिता-पुत्र का मिलन

चित्र साभारः गूगल
पिताजी ने पुत्र को गले लगाया। सबके सामने लगाया। मीडिया भी मौजूद था। पिताजी के चेहरे पर लालिमा थी। पुत्र का माथा चिंतारहित। पिता-पुत्र के मिलन पर खुश मैं भी था। खुश क्यों न होऊंगा, आखिर पिताजी ने अपने पितत्त्व की लाज रख ही ली। वैसे, मुझे पूरा यकीन था कि पिताजी एक दिन मान ही जाएंगे। पुत्र को लिपटकर गले से लगा लेंगे। और दुनिया को बतला देंगे कि मैं 'आवारा पिता' नहीं। मेरे सीने में भी पिता का प्यार बसता है। हां, यह बात सही है कि पिताजी पर कुछ राजनीतिक दबाव थे लेकिन पुत्र के स्नेह से बढ़कर भला क्या दबाव हो सकता है।

साथ-साथ, मुझे इस बात की भी प्रसन्नता है कि पुत्र ने पिताजी की पतलून दुनिया-समाज की निगाह चंद बिलांग भी छोटी नहीं होने दी। पुत्र ने पिताजी की पतलून की इज्जत को बचाए-बनाए रखा। आज के लंपट समय में भला कौन पुत्र अपने पिता के तईं इत्ता करता है, जित्ता इस पुत्र ने किया।

चलो यह अच्छा है कि अब से कोई भी पिताजी के चरित्र पर तरह-तरह के सवाल नहीं उठाएगा। अब से कोई पिताजी का मजाक नहीं उड़ाएगा। अब हर कोई, हर कहीं पिताजी का सम्मान करेगा। झुककर पिताजी का आर्शीर्वाद लेगा। इस उम्र में पिताजी को यह सम्मान मिलना किसी वरदान से कम न है प्यारे।

यों, पिताजी को दोष देना ठीक नहीं। होती हैं, होती हैं, सबसे गलतियां होती हैं। क्या कीजिएगा, यह उम्र ही ऐसी होती है कि गलतियां न चाहकर भी हो ही जाती हैं। हो सकता है, तब पिताजी से अनजाने में कोई गलती हो गई हो पर इस पर इत्ता बखेड़ा खड़ा करने से क्या हासिल। उम्र के उस पड़ाव पर जाने कित्तो ने कित्ती-कित्ती गलतियां की हैं। पिताजी से हो गई तो क्या हुआ?

पर यह अच्छा है कि अब जाकर पिताजी ने अपनी गलती को दुरुस्त करते हुए पुत्र को सम्मान के साथ गले लगाया। और क्या चाहिए भला। पिताजी की करनी पर खाक डालिए, बस कथनी को देखिए।

अखबारों में छपे फोटू को देखकर लग भी रहा है कि पिताजी एवं पुत्र के साथ-साथ माताजी भी प्रसन्न हैं। माताजी ने भी पिताजी की स्वीकारोक्ती को सहर्ष स्वीकार कर लिया। अब मन में न इनके कोई मैल है, न उनके। चलो अच्छा है, होली के नजदीक सारे मैल मनों से दूर हुए। मन में मैल बने रहने से शक का कीड़ा बहुत परेशान करता है।

पिताजी भारतीय राजनीति के आधार-स्तंभ हैं। ऐसे स्तंभों का बना रहना जित्ता जरूरी राजनीति में है, उत्ता ही पारिवारिक जीवन में भी। हमें तो पिताजी पर गर्व होना चाहिए। क्या नहीं...?

फिर भी, जिनके दिल पिता-पुत्र के गले-मिलन पर जल रहे हैं, वे अपनी जलन अपने कने रखें। दूसरों की खुशियों पर जलने वालों की यहां कमी नहीं।

जलन को त्याग पिता-पुत्र के गले-मिलन का स्वागत करें।

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