शनिवार, 22 मार्च 2014

टिकट कटने का दर्द

टिकट कटने का दर्द मैं समझ सकता हूं। टिकट कटने में उत्ता ही दर्द होता है, जित्ता दिल टूटने में। फिर टिकट कटे और दिल टूटे बंदे के पास एक ही रास्ता बचता है- दिल और दल बदलने का। जोकि जरूरी भी है। भला कौन कब तलक एक ही गम को सीने से लगाए रख सकता है! गम तो यों भी जिंदगी का सत्यानाश ही करता है।

अपनी पत्नी को छोड़कर (हालांकि यह संभव नहीं) कभी भी एक ही बात या चीज से चिपके नहीं रहना चाहिए। नहीं तो विविधता में भिन्नता का पता नहीं चलता। आज जो नेता लोग, टिकट कटने या उपेक्षित किए जाने पर, अपने दल को छोड़कर अन्य दलों में जा रहे हैं, मेरे विचार में, बिल्कुछ ठीक कर रहे हैं। उन्हें यही करना भी चाहिए।

देखिए मियां, राजनीति में बिना महत्त्वाकांक्षी हुए सफलता नहीं मिल सकती। चुनाव के वक्त, टिकट कटने या मिलने के मामले में नेता को अपनी महत्त्वाकांक्षा को चरम पर ही रखना चाहिए। पार्टी अगर मन-पसंद जगह से टिकट देती है, तो ठीक, नहीं तो प्यारे हम चले। तुरंत दूसरे दल में शामिल होकर पार्टी को बता देना चाहिए कि सिक्का अपना अभी खोटा नहीं हुआ है।

इधर, जिस तरह से लगातार देखने-सुनने में आ रहा है- फलां नेताजी ये दल छोड़कर वो दल में गए या टिकट न मिलने पर नाराज होकर निर्दलीय ही खड़े हो गए- अच्छा है, कम से कम इस बहाने दल-बदल का चलन प्रचलन में तो बना हुआ है।

मेरे विचार में तो हर नेता को दल बदलने की विशेष छूट दी जानी चाहिए। इस पर कानून बनाने से कुछ न होगा। खामखां, नेता लोगों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को झटका ही लगेगा।

यह कोई उचित थोड़े है कि पार्टी के लिए इत्ता कुछ किया और जब चुनाव का समय आया तो झट से टिकट काट दिया। सोचिए जरा, टिकट कटने पर बेचारे नेता के दिल पर क्या गुजरती होगी। उसकी तो दिन-रात की मेहनत पर जरा देर में पानी फिर जाता होगा।

नेता राजनीति में आता किसलिए है- चुनाव लड़कर ठीक-ठाक पद पाने के लिए ही न। अरे, जन-सेवा या जन-हित तो बाद की बात है। (हालांकि वोट जन-हित पर ही मांगे जाते हैं) लेकिन नेता का अपना हित भी तो मायने रखता है कि नहीं। बेचारा इत्ता संघर्ष करने के बाद राजनीति में आए, पद पाए और तुरंत ही जन-सेवा में लग जाए। यह भी तो तर्क-संगत नहीं है न। कुछ दिन नेता को भी अपने पद और राजनीति का मजा ले लेने दीजिए।

हां, कुछ वफादार किस्म के नेता होते हैं, जो टिकट कटने या मन-पसंद क्षेत्र न मिलने के बाद भी पार्टी में बने रहते हैं। बात-बात पर नाराज होते रहते हैं मगर ऊपर से आदेश आने के बाद क्षणभर में सीधे हो जाते हैं। पता नहीं कैसे इत्ता कुछ सह लेते हैं? अगर मैं होता तो तुरंत पार्टी छोड़कर दूसरी में शामिल हो जाता है। आखिर सेल्फ-रिसपेक्ड भी कोई चीज होती है कि नहीं।

मेरी मानो, टिकट कटने का दर्द तेज होने से पहले ही दल बदल लो, इसी में भलाई है। बाकी मर्जी पर निर्भर।

3 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ल ने कहा…

चकाचक है.

अजय कुमार झा ने कहा…

कित्तों का क्या क्या न कट जाएगा इस बार

Digamber Naswa ने कहा…

जब तक आखरी सांस है उम्मीद (कुर्सी) का दमन क्यों छोड़ें ...