रविवार, 16 मार्च 2014

पगालखाने में होली

चित्र साभारः गूगल
मुझे पागलपंती का बेहद शौक है। दिन के चौबीस में से साढ़े तेईस घंटे मैं पागलपंती करते हुए ही बिताता हूं। पागलपंती में मुझे आनंद आता है। आनंद आए भी क्यों न क्योंकि मैं उस शहर से हूं जहां एक 'पागलखाना' भी है। इस नाते मैं अपने शहर की शान पर किसी प्रकार धब्बा नहीं लगने देना चाहता। घर से ज्यादा मजा मुझे पागलखाने में आता है। पागलों के बीच मैं खुद को बेहद सुरक्षित व उन्मुक्त महसूस करता हूं।

यही वजह कि हर बार की तरह इस बार भी मैंने होली पागलखाने में पागलों के बीच पागलपंती के साथ मनाने का निर्णय लिया है। हालांकि पत्नी मेरे निर्णय से काफी खफा है, पिछले एक हफ्ते से न मुझे खाना दिया है न सोने को चारपाई। बातचीत भी लगभग बंद है। लेकिन मैंने भी ठान ली है कि होली समझदारों के बीच न मनाकर पागलों के बीच ही मनाऊंगा। यू नो, मुझे पागलों के बीच रहना ज्यादा भला लगता है।

पता नहीं आपने कभी पागलों के साथ होली खेली है कि नहीं लेकिन मैंने तो बहुतेरी दफा खेली है। पागलों के साथ होली खेलने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप हटो-बचो या यहां मत लगाओ, वहां मत लगाओ के झंझटों से कतई मुक्त होते हैं। पगाल वहीं रंग लगाता है, जहां उसका दिल करता है। सब जानते हैं कि पागल दिल के राजा होते हैं। जो दिल कहता है, करते वही हैं। दिल के कारण ही तो खिलौना में संजीव कुमार पागलपंती का बेहतरीन रोल को निभा पाए।

समझदारों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि वे बेहद सॉफिस्टिकेडिट होली खेलना चाहते हैं। जरा सा रंग अगर इधर-उधर या दाएं-बाएं लग गया तो तुरंत बुरा मान जाते हैं। रंगों से परहेज इत्ता करते हैं जैसे पंडितजी नॉन-वेज से। होली पर न उन्हें झूमने में मजा आता है न पीने में। बस एक जगह कायदे से बैठकर होली देखते रहते हैं। मानो होली कोई फिलम हो।

इत्ती नियम-कायदेयुक्त होली से मुझे एलर्जी है। अरे, ऐसी भी क्या होली जिसमें न ठिठोली हो, न चोली। होली पर जब तलक चोली-दामन भिगेंगे नहीं, तो धोबनिया क्या खाक धोएगी।

होली में तो पागलपंती सौ परसेंट बनती है प्यारे। इसीलिए होली खेलने का जो लुत्फ पागलों के साथ है, कायदेदारों के साथ नहीं। पागलों के साथ पागलखाने में होली खेलकर कम से कम लगता तो है कि हां होली खेली। रंगे-पुते चेहरे ही होली पर आनंद देते हैं। बिन पुते चेहरे बोगस लगते हैं मुझे।

अगर आपको भी मेरे साथ पागलों के बीच पागलपंती के साथ होली खेलने का शौक है, तो मेरे शहर आ जाइए। कसम से जिंदगी का असली वाला मजा पा लेंगे। गारंटी मेरी है।

खैर, मैं तो चला पागलखाने पागलों के साथ पागलपंतीयुक्त होली खेलने।

आप सबको होली की पागलपंतीयुक्त शुभकामनाएं।

1 टिप्पणी:

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत खूब ! होली की रिपोर्ट भी तो पेश की जाए.