शनिवार, 15 मार्च 2014

पूनम पांडे संग खेलूं होली

प्यारे, चाहे जो कहो पर सुश्री पूनम पांडे में गजब की मस्ती है। या कहूं मस्ती की पूरी खान उनमें समाहित है। उनकी यह मस्ती मुझको बेहद जंचती है। जंचे भी क्यों न, आखिर जो बात उनमें है, वो औरों में कहां? इस मस्ती की खातिर मेरे दिल में मस्त-सी इच्छा जागी है कि इस दफे होली मैं पूनम पांडे के साथ ही खेलूं। बरेली में नहीं सीधा मुंबई जाकर खेलूं। दूर से नहीं बेहद करीब जाकर खेलूं। सुखे गुलाल से नहीं हर्बल कलर के साथ खेलूं। लहंगा-चोली में नहीं बिकनी में खेलें। ज्ञानी कहते हैं, बिकनी में रंगीन होली खेलने का असर देर तक रहता है। पूनम पांडे के बदन पर चढ़ी बिकनी होली की रंगीनीयत में खुमार भर देने को काफी है। होली में तन-मन को रंगीन बनाने के लिए ऐसे खुमारों की खास आवश्यकता रहती है।

असल में, होली की रंगीनीयत को मैं कुछ अलग ढंग से निभाने का आदी हूं। होली पर दिल में उमंग और बातों में मस्ती का नशा न हो तो गाड़े से गाड़ा रंग भी फीका जान पड़ता है। पूर्णता टल्ली होकर, दुनिया-जहान की हर फिकर को नाली में बहाकर, गोरे-चिट्टे-चिकने चेहरों पर लाल-नीला-पीला रंग पोतकर, खुद पुतकर, मौका पाते ही कुछ की चुनरियां, तो कुछ की अंगियों को भिगोकर जब तलक मस्ती का मूड न बन जाए, मुझ पर होली का सुरूर चढ़ता ही नहीं। इस किस्म का उन्मुक्त सुरूर तो मुझे केवल पूनम पांडे के साथ होली खेलकर ही प्राप्त हो सकता है। मजा उस आग में है, जो दोनों तरफ बराबर लगी हो। पूनम पांडे में यह आग पर्याप्त मात्रा में मौजूद है।
देखो प्यारे, मेरे होली खेलने का पहला ऊसूल लाच-शर्म का त्याग है। शर्म के कंबल को ओढक़र जो लोग होली खेलते हैं, मेरी निगाह में वो होली की मस्ती के सबसे बड़े दुश्मन होते हैं। ऐसे लोगों के संग-साथ मुझे होली खेलना कतई पसंद नहीं। मगर पूनम पांडे के भीतर हर वो गुण मौजूद है, जो उन्हें होली का मस्त आइकन बनाने के लिए काफी है।

मौका होली का हो या ऐंवई कुछ और शर्म से पूनम पांडे का दूर-दूर तलक कोई लेना-देना नहीं है। शर्म क्या होती है, कैसी होती है, उन्हें नहीं मालूम! बेचारी शर्म खुद पूनम पांडे के पास जाने से घबराती है। आखिर कोई तो ऐसा होना ही चाहिए, जो शर्म पर शर्म न करे। कम से कम मेरे यहां-वहां रंग लगाने पर वे शर्माएंगी तो नहीं। आराम से बिना किसी रोक-टोक के हर कहीं रंग लग भी देंगी और लगावा भी लेंगी। मुझे उनसे यही सुख तो चाहिए। ताकि रंग को भी लगे, मेरा इस्तेमाल बिल्कुल ठीक बदन पर हुआ है।

ऐसा सुना है, पूनम पांडे को पिचकारी से नहीं केवल हाथों की उनमुक्ताओं के साथ रंग खेलना ज्यादा पसंद है। उनका कहना है- पिचारी के साथ रंग खेलने में तरह-तरह की नैतिकता-शालीनता का झाड़ होता हैं। किंतु हाथ के सहारे रंग खेलने में ऐसा कुछ नहीं। हाथ बंधनमुक्त होते हैं। शरीर के किसी भी, कैसी भी कोने में जाकर रंग लगाने-लगावाने की उत्तेजना को बरकरार रखते हैं। ज्ञानी भी कहते हैं, हाथ के द्वारा खेली होली ही सबसे कामयाब और मस्त होली कहलाती है। अब अगर ऐसी होली पूनम पांडे के साथ खेली जाए, तो फिर उस होली का मजा ही कुछ और होता है। बेतकल्लुफी से वे रंग लगवाती जाएं और मैं उनके यहां-वहां रंग लगाता जाऊं।

होली की मस्ती के बहाने लगे हाथ मैं एक होली कलैंडर भी उनके साथ तैयार करवा लूंगा। ताकि सनद रहे। यह होली कलैंडर उन तमाम कलैंडरों से कहीं अधिक उत्तेजक होगा, जिसे अब तक विजय माल्या साहब बनवाते चले आए हैं। यों भी, पूनम पांडे को इस कलैंडर के ताईं अलग से किसी मादक मुद्रा पर मेहनत भी नहीं करनी पड़ेगी। क्योंकि होली की मादकता का खुमार ही काफी होगा। अपने पिछले कलैंडर की तस्वीरों से कहीं ज्यादा झक्कास वे इसमें दिखाई देंगी। बैठे-ठाले उनके साथ इस रोमांच में मेरा भी नाम हो जाएगा।

कुछ मत पूछिए मैं पूनम पांडे के साथ होली खेलने के प्रति किस कदर उत्तेजित हूं। इत्ता उत्तेजित तो मैं चिकनी चमेली की कमर को देखकर भी न हुआ था। हां, यह और बात है कि पूनम पांडे के साथ उत्तेजना के भाव कुछ दूजे किस्म के रहेंगे। ऐसी जोर की उत्तेजना किस्मतवालों को ही नसीब होती है। मैं चाहता भी हूं कि यह उत्तेजना ताउम्र बरकरार रहे।

खैर, काफी उत्तेजना को मैं यहां बयां कर चुका हूं। बाकी का 'उत्तेजनात्मक विश्लेषण' अपन पूनम पांडे संग होली खेलकर बयां करूंगा। तब तलक अपने-अपने धैर्य को होल्ड पर रखिए।

आप सब को होली की मस्त-मस्त शुभकामनाएं।

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