शुक्रवार, 14 मार्च 2014

होली पर चकल्लस

चित्र साभारः गूगल
काफी सोचने-विचारने के बाद मैंने तय किया है कि मैं होली पर सिर्फ नेता से चकल्लस करूंगा, साहित्यकार से नहीं। साहित्यकार से चकल्लस करने का कोई फायदा नहीं। साहित्यकार बड़े मूडी किस्म के लोग होते हैं। न उनके भाव का पता रहता है न स्वभाव का। कब, कहां, किस बात का बुरा मान जाएं, कोई नहीं जानता। ज्यादातर साहित्यकार तो ऐसे हैं कि हर वक्त मुंह पर गंभीरता ताने रहते हैं। चकल्लस तो छोड़िए उनसे बात करने में भी डर लगता है। क्या पता कल को गुस्से में आकर कहीं मुझ पर ही कविता-कहानी-उपन्यास जड़ दें। इसलिए होली पर साहित्यकारों से चकल्लस का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।

हां, लेकिन, नेताओं के साथ ऐसा कुछ नहीं है। नेता लोगों के साथ आप चाहे होली या बे-होली कैसे भी, कहीं भी चकल्लस कर सकते हैं। वे, ज्यादातर, बुरा नहीं मानते। जो मानते हैं, वे फिर न राजनीति न सत्ता न समाज में कहीं टिक नहीं पाते। बिन बताए ही उन्हें हाशिए पर धकेल दिया जाता है।

चूंकि मौसम चुनावी है और ऊपर से होली का भी जोर है, इस नाते आप अपने शहर या केंद्र के किसी भी ऊंचे या नीचे नेता से खुलकर चकल्लस कर सकते हैं। इस समय तो वे चाहकर भी बुरा नहीं मानेंगे। बुरा मानकर उन्हें अपने पैरों पर कुल्हाड़ी थोड़े मरवानी है। जब नेता लोग जनता से पांच तक चकल्लस कर सकते हैं, तो क्या मैं होली पर चकल्लस नहीं कर सकता। नेता लोगों से चकल्लस करना मेरा विधिवत अधिकार है।

चुनावी मौसम में नेता लोग जनता से चकल्लस ही तो कर रहे होते हैं, अलां-फलां वायदे कर-करके। जनता भी खूब जानती है कि चुनावी मौसम में किए गए वायदे पूरे कभी नहीं होने हैं, पर मजे लेने में क्या जाता है? नेताओं ने अपने देश की राजनीति को बना भी मनोरंजन जैसा ही दिया है। हर पार्टी का हर नेता अपने तरीके से जनता का मनोरंजन कर रहा है। कोई दल बदलकर कर रहा है, तो कोई लोकल ट्रेन में बैठकर। तो कोई मनचाही जगह से टिकट न मिलने पर टि्वट कर।

राजनीतिक-कम-चुनावी रस्साकशियां इसलिए भी अधिक बढ़ गई हैं ताकि एक-दूसरे की होली के बहाने ही उतारी-संवारी जा सके। ऐसे मनोरंजनात्मक सीन में चकल्लस तो बनती है प्यारे। होली पर या चुनावी मौसम में जिनने चकल्लस न की, समझो, उसने कुछ न किया। नेता लोगों से जित्ती चकल्लस करोगे, उत्ता दिल को तसल्ली मिलेगी।

हालांकि अपने यहां एक बढ़कर एक चकल्लसी नेता हैं मगर लालूजी का जवाब नहीं। होली पर लालूजी जब तलक चकल्लस न करें, रंग ही नहीं चढ़ता। लेकिन इस दफा मुझे थोड़ा संशय है कि लालूजी होली पर चकल्लस करेंगे कि नहीं। क्योंकि उनके एक पुराने साथी ऐन चुनाव पर उनसे चकल्लस कर दूसरी पार्टी में शामिल हो गए हैं। पिछले दिनों कुछ विधायकों ने भी उनसे पार्टी छोड़ने जैसी चकल्लस की थी, वो तो समय रहते लालूजी ने उन्हें मना लिया। क्या कीजिएगा लालूजी, यह राजनीति है ही इत्ती मजेदार चीज कि किसी का भी मन बिन ललचाए मानता ही नहीं।

एक लालूजी की ही पार्टी में नहीं इस वक्त हर पार्टी में कोई न कोई चकल्लस किसी न किसी नेता के द्वारा हो ही रही है। चकल्लसों की गिरफ्त में आप वाले भी हैं और कमल वाले भी। सभी पाप-पुण्य का लाभ-हानि देख रहे हैं। भई, मैं तो ईमानदार लोगों को गंभीर समझता था मगर ये तो परम-चकल्लसी निकले। खैर, इनका भी वर्तमान-भविष्य जनता ही लिखेगी।

मुझको तो फिलहाल नेता लोगों से चकल्लस करने से मतलब। वो करूंगा ही करूंगा। मौसम चुनावी है और समां होलीमय। ऐसे चकल्लसी मौके बार-बार नहीं आते प्यारे।

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