सोमवार, 10 मार्च 2014

नैतिकता बनाम अवसरवादिता

देखो प्यारे, राजनीति में नैतिकता ही सबकुछ नहीं होती, अवसरवादिता भी अपनी जगह रखती है। नेता अगर नैतिकता के दम पर राजनीति करेगा, तो हमेशा ठगा जाएगा। क्योंकि नैतिकता मन को तसल्ली तो अवश्य दे सकती है, किंतु अवसर नहीं दिलवा सकती। राजनीति में अगर अवसर पाने हैं, तो प्यारे अवसरवादी बनो! यहां जो जित्ता बड़ा अवसरवादी बनकर दिखला देगा, वो उत्ता ही बड़ा पद पा जाएगा।

नैतिकता और शुचिता के जमाने राजनीति में से अब हवा हुए। सादगी और ईमानदारी तो जाने कब की ठिकाने लग चुकी है।

अवसरों को भुनाने का चुनाव से बेहतर विकल्प दूसरा नहीं हो सकता। आजकल तो हर दल में होड़-सी लगी हैं, कभी इस नेता के आने और उस नेता के जाने की। कोई नेता किसी दल में मजबूरी में आ रहा, तो कोई मुफलिसी में। लेकिन लक्ष्य दोनों के 'अवसरवादी' ही हैं। पर उन्हें अपनी अवसरवादिता पर 'लाज' नहीं, 'नाज' है। नाज हो भी क्यों न, क्योंकि अवसरवादी राजनीति के वे पुराने खिलाड़ी जो ठहरे।

आपको चाहे न हो लेकिन मुझे अवसरवादी नेताओं पर हमेशा गर्व रहा है। दरअसल, अवसरवादी नेता राजनीति के कुशल सेल्समैन की तरह होते हैं। उन्हें मालूम होता है कि चुनाव के आसपास किस दल या नेता की हवा जोर की बहने वाली है, बस वे भी उसी में अपने अवसर का रिज्यूमे फिट कर देते हैं। और कमाल देखिए, तुरंत ही रिज्यूमे स्वीकृत भी हो जाता है। स्वीकृत हो भी क्यों न, क्योंकि दलों को भी तलाश रहती है, ऐसे अवसरवादियों की जो अपने साथ नैतिकता भले ही न लाएं किंतु वोट बैंक अच्छा-खासा लाएं। ताकि चुनावों में नैया ठिकाने पर जाकर लग सके।

चूंकि चुनाव नजदीक हैं, इस कारण अवसरवादियों के पौ बारहा हैं।

बदलते वक्त के साथ राजनीति के मायने, रंग-रूप, चाल-ढाल सब बदल गए हैं। बदलना चाहिए भी। नहीं बदलेंगे तो हाशिए पर पड़े रहेंगे। और हां, ईमानदारी के साथ राजनीति न तब हुई थी, न अब होने वाली है। फिर भी जो सियाने ईमानदारी से राजनीति करने का दम भरते हैं, वे दरअसल जनता को 'उल्लू' बनाते हैं। प्यारे, आज के जमाने में ईमानदार है कौन? पहले जरा ये ही बतला दो। हर कोई, हर कहीं तलाश में बैठा है, मौका देखकर चौका जमाने की। अगर अवसरवादी नेता राजनीति या दलों के मध्य अपने असवर या भविष्य को तलाश रहे हैं, तो क्या गलत कर रहे हैं? नौकरियों में अवसर पाने के लिए हम जोड़-जुगाड़ नहीं करते क्या?

अलां-फलां दल के भीतर-बाहर इस-उस नेता के आने-जाने को गंभीरता से न लें, यह कोई नई बात नहीं। जहां अवसर मिले, वहां हाथ तुरंत मार लेना चाहिए। कल का क्या भरोसा प्यारे।
तो मेरे प्यारे असवरवादी नेताओं-मंत्रियों अपने-अपने अवसरों के साथ ऐसे ही लगे रहो, क्या पता कब 'चांदी' हो जाए।

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