शनिवार, 1 मार्च 2014

बहकने के बहाने

चित्र साभारः गूगल
प्यारे, बहकने की कोई उम्र नहीं होती। उम्र के किसी भी पड़ाव या मोड़ पर बहका जा सकता है। बहकने के लिए सेलिब्रिटी होना अवश्यक नहीं है। हां, बहक कर आप सेलिब्रिटी की श्रेणी में जरूर आ सकते हैं। बहका हुआ बंदा जब सेलिब्रिटी की श्रेणी में आता है तो वो मशहूर नहीं बल्कि महान हो जाता है। उसकी महानता के चर्चे जगह-जगह होते हैं। मीडिया से लेकर मार्केट तक में उसको हीरो बनाकर पेश किया जाता है। वो कैसे, क्यों और किस कारण बहका इस पर बहस होती है। इस बहस में सबसे अधिक प्रतिशत घोषित नैतिकतावादियों और शुचितावादियों का ही रहता है। रही-सही कसर संस्कृति-रक्षक पूरी कर देते हैं।

बहकना किसी एक निश्चित वस्तु, चीज या पदार्थ पर निर्भर नहीं करता। किसी भी क्षेत्र या चीज में बहकने की स्वतंत्रता आपके कने होती है। जैसे-जैसे समय बदलता है, बहकने के अंदाज भी बदलते रहते हैं। बदलना चाहिए भी। नहीं हो तो एक जैसा बहकना यथास्थितिवादी का प्रयाय बन जाएगा। ज्यादातर किस्से सुनाई व पढ़ाई में पीकर बहकने के ही सामने आते हैं। लेकिन ऊंचे या बुद्धिजीवि टाइप के लोग पीकर जब बहकते हैं, तो उसका रंग-ढंग ही कुछ और होता है। न न वे पीकर किसी नाली या नाले में नहीं लुढ़कते बल्कि 'दिललगी' का शिकार हो जाते हैं। यकायक जवानी उन्हें दीवाना बना देती है। जवानी पर बहकते वक्त वे उम्र का नहीं केवल खुमारी का ख्याल रखते हैं। खुमारी में की गईं हरकतें उन्हें जिंदगी का खूबसूरत एहसास-सा लगती हैं। लेकिन जब खुमारी के तेवर ढीले पड़ते हैं, तो मियां कोर्ट-कचहरी में उलझे नजर आते हैं।

मानना पड़ेगा कि बुढ़ापा बुरी चीज होती है। किसी को भी नहीं आना चाहिए। जिंदगी की रंगीनियत एवं रोमानियत बुढ़ापे के बीच कसमसा कर रह जाती हैं। मगर फिर भी बुढ़ापे में बंदा दांव खेलने से नहीं चूकता। अब तो मेडिकल सांइस ने इत्ती तरक्की कर ली है कि बुढ़ापे में भी बूढ़ेपन का एहसास नहीं होता। शरीर और सेहत हर वक्त उत्साहित व उत्तेजित ही रहते व दिखते हैं।

देखिए न, एक बाबा जी ने तो बुढ़ापे की काट के लिए तमाम प्रकार की पौरूष-बर्द्धक औषद्यियों का प्रयोग खुद पर ही किया। और भरे-पूरे बुढ़ापे में जो कमाल किए, हम सब के सामने हैं। हालांकि किए प्रयोगों की कीमत उन्हें जेल के भीतर रहकर चुकानी जरूर पड़ रही है लेकिन बुढ़ापे को धोखा तो दे ही दिया न। इस खेल में जित्ते बड़े खिलाड़ी बाप रहे, उत्ता ही उनका बेटा भी। फिलहाल, दोनों जेल के भीतर हैं।

न जाने ऐसा क्या हो गया है कि पचास साल पार लोग खूब बहक रहे हैं। न सिर्फ बहक रहे हैं बल्कि अपने बहकने को 'जस्टिफाई' भी कर रहे हैं। बाबा तो चलो भगवानत्त्व में बहके लेकिन संपादक महोदय और जज साहेब का क्या? आखिर ये दोनों तो बुद्धिजीवि वर्ग में आते हैं न! बताइए, जब बुद्धिजीवि ही ऐसे बहकेगा तो फिर साधारण वर्ग का क्या होगा प्यारे।
संपादक महोदय तो अब भी कह रहे हैं कि यह बहका-बहकी दोनों की सहमति से हुई। उन्हें राजनीति के तहत फंसाया गया है। खैर, जो हो। फिलहाल मियां बहकने की कीमत चुका रहे हैं।

कहिए कुछ भी पर बहकने के लाभ ही लाभ हैं। बहकना अब बदनामी की श्रेणी में नहीं आता। बदनाम होकर मिलने वाले नाम का मजा ही कुछ और होता है। बुढ़ापे में हासिल हुईं ये 'फौरी बदनामियां' हैं, पर इनका लाभ लंबा है। जो इन बदनामियों को झेल गया, समझो तर गया।

अंदर की बात बताऊं, कभी-कभी मेरा दिल भी करता है बहकने का, पर डरता हूं, कहीं इज्जत का फलूदा न बन जाए। बाबा और संपादक महोदय तो झेल गए मगर मैं कैसे झेल पाऊंगा। बहकने और बदनामी का स्वाद चखने के लिए कलेजा चाहिए होता है परंतु मैं तो छिपकली के नाम मात्र से ही डर जाता हूं। बहक कैसे सकूंगा। लेकिन फिर भी कोशिश करूंगा कि बहक जाऊं बाकी बाद में जो होगा देखा जाएगा प्यारे।

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