सोमवार, 31 मार्च 2014

मैं और मेरी मूर्खता

चित्र साभारः गूगल
मुझे गंभीरता से चिढ़, मूर्खता से प्यार है। अनुमानतः जब सृष्टि की रचना की गई होगी, तब मूर्खें में मेरा नाम अव्वल नंबर पर रहा होगा! गंभीरता का पुर्ज मेरे मस्तिष्क में शायद इसलिए नहीं डाला गया होगा- कहीं यह बंदा धरती पर पहुंचकर माहौल मातमी न कर दे। इसीलिए मुझे हर वो आदत बख्शी गई, जिसमें मूर्खता का पुट ही ज्यादा हो। मूर्ख होने के नाते मैं खुद को बुद्धिजीवियों-ज्ञानियों-पढ़े-लिखों से कुछ अलग-सा महसूस करता हूं।

मूर्ख होना मेरे लिए अपमान का नहीं, बेहद सम्मान का विषय है। मेरा मानना है- खुद को या दुनिया को मूर्ख बनकर या बनाकर ही समझा जा सकता है। हालांकि दुनिया में एक से बढ़कर एक मूर्ख भरा पड़ा है लेकिन वो मूर्ख इत्ता सियाना है कि खुद को मूर्ख मानता ही नहीं। अगर उन्हें कोई मूर्ख कह भी दे, तो इत्ता बुरा मानते हैं, मानो उनकी बुद्धि पर डाका डाल दिया हो। जबकि बुद्धि का मूर्ख या मूर्खता से भला क्या मतलब? बुद्धि तो मूर्ख के लिए दिमाग का मैल है।

फिलहाल, मैं बुद्धि के मैल को दिमाग से बाहर ही रखता हूं। दिमाग के भीतर रहकर बुद्धि तरह-तरह से आतंक मचाती है। किसी भी बात या मुद्दे पर बंदे को इत्ता अधिक सोचने पर मजबूर कर देती है कि पगला जाए। जबकि ज्यादा सोचना एक प्रकार बीमारी है। मैंने कई ऐसे बंदे देखे-सुने हैं, जो बेचारे सोचते-सोचते ही दुनिया से विदा हो लिए। मेडिकल सांइस बताती है कि सोचने में बुद्धि का सबसे अधिक सत्यानाश होता है। सोचना बुद्धि को इस कदर कुंद बना देता है, फिर बंदा न खुद का रह पाता है न समाज का। सोचने वालों की दुनिया बेहद काली होती है। काल-कोठरी समान। बुद्धि का दबाव उन्हें कहीं का नहीं छोड़ता।

परंतु मूर्खता ऐसा कुछ भी करने से हमेशा रोकती है। मूर्ख बंदे कने इत्ता टाइम ही नहीं होता कि वो अपनी मूर्खता के अतिरिक्त किसी और बात या मुद्दे पर ध्यान दे सके। वो तो हर वक्त अपनी मूर्खता में ही व्यस्त रहता है। जैसाकि मैं।

यकीन मानिए, मूर्खें की दुनिया समझदारों से कहीं बेहतर और दिलचस्प होती है। सबसे खास बात, मूर्ख बेफालतू की टेंशन नहीं लेता। न किसी के बारे में गलत सोचता है, न किसी को गलत बताता। मूर्ख की स्थिति एकदम गधे जैसे होती है। अपनी ढेंचू-नुमा दुनिया में ही मस्त-व्यस्त।

आप शायद यकीन नहीं करेंगे गधा मेरी मूर्खता की प्रेरणा है। अपने जीवन व लेखन में मैंने गधे से बहुत कुछ सीखा व जाना है। दुनिया मेरे बारे जो चाहे राय रखे, मुझे इससे ज्यादा मतलब नहीं रहता। मेरे सरोकार मूर्खें और गधों से अधिक जुड़े हैं। मैं हर उस बात को करता-मानता हूं, जहां बौद्धिता का नहीं मूर्खता का वर्चस्व ज्यादा रहता है। मूर्खता के धरातल पर खड़े होकर चीजें मुझे अधिक पारदर्शी दिखाई पड़ती हैं। यही हमारे वक्त का तकाजा भी है।

दरअसल, लेखन में मैंने व्यंग्य को इसलिए चुना ताकि अपनी मूर्खतापूर्ण सोच एवं विचारधारा का उत्पादन अधिक खुलकर कर सकूं। मेरा विश्वास चिंतन या मनन करने से अधिक मूर्ख-नुमा व्यवहार में है। चिंतन वो करते हैं, जिनके कने अतिरिक्त दिमाग होता है। चूंकि मेरे कने नहीं है, इसलिए मैं बचकर रहता हूं।

हम मूर्खें का कोई एक दिन नहीं होता। हर दिन, हर पल हमारा होता है। मूर्ख-दिवस चाहे एक अप्रैल को हो या न हो, हमें अपनी मूर्खता से मतलब। जिंदगी को मस्त होकर जीने का सबसे उम्दा जरिया है, खुद मूर्ख बने रहकर दूसरे की मूर्खता को जानना-समझना।

शनिवार, 22 मार्च 2014

टिकट कटने का दर्द

टिकट कटने का दर्द मैं समझ सकता हूं। टिकट कटने में उत्ता ही दर्द होता है, जित्ता दिल टूटने में। फिर टिकट कटे और दिल टूटे बंदे के पास एक ही रास्ता बचता है- दिल और दल बदलने का। जोकि जरूरी भी है। भला कौन कब तलक एक ही गम को सीने से लगाए रख सकता है! गम तो यों भी जिंदगी का सत्यानाश ही करता है।

अपनी पत्नी को छोड़कर (हालांकि यह संभव नहीं) कभी भी एक ही बात या चीज से चिपके नहीं रहना चाहिए। नहीं तो विविधता में भिन्नता का पता नहीं चलता। आज जो नेता लोग, टिकट कटने या उपेक्षित किए जाने पर, अपने दल को छोड़कर अन्य दलों में जा रहे हैं, मेरे विचार में, बिल्कुछ ठीक कर रहे हैं। उन्हें यही करना भी चाहिए।

देखिए मियां, राजनीति में बिना महत्त्वाकांक्षी हुए सफलता नहीं मिल सकती। चुनाव के वक्त, टिकट कटने या मिलने के मामले में नेता को अपनी महत्त्वाकांक्षा को चरम पर ही रखना चाहिए। पार्टी अगर मन-पसंद जगह से टिकट देती है, तो ठीक, नहीं तो प्यारे हम चले। तुरंत दूसरे दल में शामिल होकर पार्टी को बता देना चाहिए कि सिक्का अपना अभी खोटा नहीं हुआ है।

इधर, जिस तरह से लगातार देखने-सुनने में आ रहा है- फलां नेताजी ये दल छोड़कर वो दल में गए या टिकट न मिलने पर नाराज होकर निर्दलीय ही खड़े हो गए- अच्छा है, कम से कम इस बहाने दल-बदल का चलन प्रचलन में तो बना हुआ है।

मेरे विचार में तो हर नेता को दल बदलने की विशेष छूट दी जानी चाहिए। इस पर कानून बनाने से कुछ न होगा। खामखां, नेता लोगों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को झटका ही लगेगा।

यह कोई उचित थोड़े है कि पार्टी के लिए इत्ता कुछ किया और जब चुनाव का समय आया तो झट से टिकट काट दिया। सोचिए जरा, टिकट कटने पर बेचारे नेता के दिल पर क्या गुजरती होगी। उसकी तो दिन-रात की मेहनत पर जरा देर में पानी फिर जाता होगा।

नेता राजनीति में आता किसलिए है- चुनाव लड़कर ठीक-ठाक पद पाने के लिए ही न। अरे, जन-सेवा या जन-हित तो बाद की बात है। (हालांकि वोट जन-हित पर ही मांगे जाते हैं) लेकिन नेता का अपना हित भी तो मायने रखता है कि नहीं। बेचारा इत्ता संघर्ष करने के बाद राजनीति में आए, पद पाए और तुरंत ही जन-सेवा में लग जाए। यह भी तो तर्क-संगत नहीं है न। कुछ दिन नेता को भी अपने पद और राजनीति का मजा ले लेने दीजिए।

हां, कुछ वफादार किस्म के नेता होते हैं, जो टिकट कटने या मन-पसंद क्षेत्र न मिलने के बाद भी पार्टी में बने रहते हैं। बात-बात पर नाराज होते रहते हैं मगर ऊपर से आदेश आने के बाद क्षणभर में सीधे हो जाते हैं। पता नहीं कैसे इत्ता कुछ सह लेते हैं? अगर मैं होता तो तुरंत पार्टी छोड़कर दूसरी में शामिल हो जाता है। आखिर सेल्फ-रिसपेक्ड भी कोई चीज होती है कि नहीं।

मेरी मानो, टिकट कटने का दर्द तेज होने से पहले ही दल बदल लो, इसी में भलाई है। बाकी मर्जी पर निर्भर।

रविवार, 16 मार्च 2014

पगालखाने में होली

चित्र साभारः गूगल
मुझे पागलपंती का बेहद शौक है। दिन के चौबीस में से साढ़े तेईस घंटे मैं पागलपंती करते हुए ही बिताता हूं। पागलपंती में मुझे आनंद आता है। आनंद आए भी क्यों न क्योंकि मैं उस शहर से हूं जहां एक 'पागलखाना' भी है। इस नाते मैं अपने शहर की शान पर किसी प्रकार धब्बा नहीं लगने देना चाहता। घर से ज्यादा मजा मुझे पागलखाने में आता है। पागलों के बीच मैं खुद को बेहद सुरक्षित व उन्मुक्त महसूस करता हूं।

यही वजह कि हर बार की तरह इस बार भी मैंने होली पागलखाने में पागलों के बीच पागलपंती के साथ मनाने का निर्णय लिया है। हालांकि पत्नी मेरे निर्णय से काफी खफा है, पिछले एक हफ्ते से न मुझे खाना दिया है न सोने को चारपाई। बातचीत भी लगभग बंद है। लेकिन मैंने भी ठान ली है कि होली समझदारों के बीच न मनाकर पागलों के बीच ही मनाऊंगा। यू नो, मुझे पागलों के बीच रहना ज्यादा भला लगता है।

पता नहीं आपने कभी पागलों के साथ होली खेली है कि नहीं लेकिन मैंने तो बहुतेरी दफा खेली है। पागलों के साथ होली खेलने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप हटो-बचो या यहां मत लगाओ, वहां मत लगाओ के झंझटों से कतई मुक्त होते हैं। पगाल वहीं रंग लगाता है, जहां उसका दिल करता है। सब जानते हैं कि पागल दिल के राजा होते हैं। जो दिल कहता है, करते वही हैं। दिल के कारण ही तो खिलौना में संजीव कुमार पागलपंती का बेहतरीन रोल को निभा पाए।

समझदारों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि वे बेहद सॉफिस्टिकेडिट होली खेलना चाहते हैं। जरा सा रंग अगर इधर-उधर या दाएं-बाएं लग गया तो तुरंत बुरा मान जाते हैं। रंगों से परहेज इत्ता करते हैं जैसे पंडितजी नॉन-वेज से। होली पर न उन्हें झूमने में मजा आता है न पीने में। बस एक जगह कायदे से बैठकर होली देखते रहते हैं। मानो होली कोई फिलम हो।

इत्ती नियम-कायदेयुक्त होली से मुझे एलर्जी है। अरे, ऐसी भी क्या होली जिसमें न ठिठोली हो, न चोली। होली पर जब तलक चोली-दामन भिगेंगे नहीं, तो धोबनिया क्या खाक धोएगी।

होली में तो पागलपंती सौ परसेंट बनती है प्यारे। इसीलिए होली खेलने का जो लुत्फ पागलों के साथ है, कायदेदारों के साथ नहीं। पागलों के साथ पागलखाने में होली खेलकर कम से कम लगता तो है कि हां होली खेली। रंगे-पुते चेहरे ही होली पर आनंद देते हैं। बिन पुते चेहरे बोगस लगते हैं मुझे।

अगर आपको भी मेरे साथ पागलों के बीच पागलपंती के साथ होली खेलने का शौक है, तो मेरे शहर आ जाइए। कसम से जिंदगी का असली वाला मजा पा लेंगे। गारंटी मेरी है।

खैर, मैं तो चला पागलखाने पागलों के साथ पागलपंतीयुक्त होली खेलने।

आप सबको होली की पागलपंतीयुक्त शुभकामनाएं।

शनिवार, 15 मार्च 2014

पूनम पांडे संग खेलूं होली

प्यारे, चाहे जो कहो पर सुश्री पूनम पांडे में गजब की मस्ती है। या कहूं मस्ती की पूरी खान उनमें समाहित है। उनकी यह मस्ती मुझको बेहद जंचती है। जंचे भी क्यों न, आखिर जो बात उनमें है, वो औरों में कहां? इस मस्ती की खातिर मेरे दिल में मस्त-सी इच्छा जागी है कि इस दफे होली मैं पूनम पांडे के साथ ही खेलूं। बरेली में नहीं सीधा मुंबई जाकर खेलूं। दूर से नहीं बेहद करीब जाकर खेलूं। सुखे गुलाल से नहीं हर्बल कलर के साथ खेलूं। लहंगा-चोली में नहीं बिकनी में खेलें। ज्ञानी कहते हैं, बिकनी में रंगीन होली खेलने का असर देर तक रहता है। पूनम पांडे के बदन पर चढ़ी बिकनी होली की रंगीनीयत में खुमार भर देने को काफी है। होली में तन-मन को रंगीन बनाने के लिए ऐसे खुमारों की खास आवश्यकता रहती है।

असल में, होली की रंगीनीयत को मैं कुछ अलग ढंग से निभाने का आदी हूं। होली पर दिल में उमंग और बातों में मस्ती का नशा न हो तो गाड़े से गाड़ा रंग भी फीका जान पड़ता है। पूर्णता टल्ली होकर, दुनिया-जहान की हर फिकर को नाली में बहाकर, गोरे-चिट्टे-चिकने चेहरों पर लाल-नीला-पीला रंग पोतकर, खुद पुतकर, मौका पाते ही कुछ की चुनरियां, तो कुछ की अंगियों को भिगोकर जब तलक मस्ती का मूड न बन जाए, मुझ पर होली का सुरूर चढ़ता ही नहीं। इस किस्म का उन्मुक्त सुरूर तो मुझे केवल पूनम पांडे के साथ होली खेलकर ही प्राप्त हो सकता है। मजा उस आग में है, जो दोनों तरफ बराबर लगी हो। पूनम पांडे में यह आग पर्याप्त मात्रा में मौजूद है।
देखो प्यारे, मेरे होली खेलने का पहला ऊसूल लाच-शर्म का त्याग है। शर्म के कंबल को ओढक़र जो लोग होली खेलते हैं, मेरी निगाह में वो होली की मस्ती के सबसे बड़े दुश्मन होते हैं। ऐसे लोगों के संग-साथ मुझे होली खेलना कतई पसंद नहीं। मगर पूनम पांडे के भीतर हर वो गुण मौजूद है, जो उन्हें होली का मस्त आइकन बनाने के लिए काफी है।

मौका होली का हो या ऐंवई कुछ और शर्म से पूनम पांडे का दूर-दूर तलक कोई लेना-देना नहीं है। शर्म क्या होती है, कैसी होती है, उन्हें नहीं मालूम! बेचारी शर्म खुद पूनम पांडे के पास जाने से घबराती है। आखिर कोई तो ऐसा होना ही चाहिए, जो शर्म पर शर्म न करे। कम से कम मेरे यहां-वहां रंग लगाने पर वे शर्माएंगी तो नहीं। आराम से बिना किसी रोक-टोक के हर कहीं रंग लग भी देंगी और लगावा भी लेंगी। मुझे उनसे यही सुख तो चाहिए। ताकि रंग को भी लगे, मेरा इस्तेमाल बिल्कुल ठीक बदन पर हुआ है।

ऐसा सुना है, पूनम पांडे को पिचकारी से नहीं केवल हाथों की उनमुक्ताओं के साथ रंग खेलना ज्यादा पसंद है। उनका कहना है- पिचारी के साथ रंग खेलने में तरह-तरह की नैतिकता-शालीनता का झाड़ होता हैं। किंतु हाथ के सहारे रंग खेलने में ऐसा कुछ नहीं। हाथ बंधनमुक्त होते हैं। शरीर के किसी भी, कैसी भी कोने में जाकर रंग लगाने-लगावाने की उत्तेजना को बरकरार रखते हैं। ज्ञानी भी कहते हैं, हाथ के द्वारा खेली होली ही सबसे कामयाब और मस्त होली कहलाती है। अब अगर ऐसी होली पूनम पांडे के साथ खेली जाए, तो फिर उस होली का मजा ही कुछ और होता है। बेतकल्लुफी से वे रंग लगवाती जाएं और मैं उनके यहां-वहां रंग लगाता जाऊं।

होली की मस्ती के बहाने लगे हाथ मैं एक होली कलैंडर भी उनके साथ तैयार करवा लूंगा। ताकि सनद रहे। यह होली कलैंडर उन तमाम कलैंडरों से कहीं अधिक उत्तेजक होगा, जिसे अब तक विजय माल्या साहब बनवाते चले आए हैं। यों भी, पूनम पांडे को इस कलैंडर के ताईं अलग से किसी मादक मुद्रा पर मेहनत भी नहीं करनी पड़ेगी। क्योंकि होली की मादकता का खुमार ही काफी होगा। अपने पिछले कलैंडर की तस्वीरों से कहीं ज्यादा झक्कास वे इसमें दिखाई देंगी। बैठे-ठाले उनके साथ इस रोमांच में मेरा भी नाम हो जाएगा।

कुछ मत पूछिए मैं पूनम पांडे के साथ होली खेलने के प्रति किस कदर उत्तेजित हूं। इत्ता उत्तेजित तो मैं चिकनी चमेली की कमर को देखकर भी न हुआ था। हां, यह और बात है कि पूनम पांडे के साथ उत्तेजना के भाव कुछ दूजे किस्म के रहेंगे। ऐसी जोर की उत्तेजना किस्मतवालों को ही नसीब होती है। मैं चाहता भी हूं कि यह उत्तेजना ताउम्र बरकरार रहे।

खैर, काफी उत्तेजना को मैं यहां बयां कर चुका हूं। बाकी का 'उत्तेजनात्मक विश्लेषण' अपन पूनम पांडे संग होली खेलकर बयां करूंगा। तब तलक अपने-अपने धैर्य को होल्ड पर रखिए।

आप सब को होली की मस्त-मस्त शुभकामनाएं।

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

होली पर चकल्लस

चित्र साभारः गूगल
काफी सोचने-विचारने के बाद मैंने तय किया है कि मैं होली पर सिर्फ नेता से चकल्लस करूंगा, साहित्यकार से नहीं। साहित्यकार से चकल्लस करने का कोई फायदा नहीं। साहित्यकार बड़े मूडी किस्म के लोग होते हैं। न उनके भाव का पता रहता है न स्वभाव का। कब, कहां, किस बात का बुरा मान जाएं, कोई नहीं जानता। ज्यादातर साहित्यकार तो ऐसे हैं कि हर वक्त मुंह पर गंभीरता ताने रहते हैं। चकल्लस तो छोड़िए उनसे बात करने में भी डर लगता है। क्या पता कल को गुस्से में आकर कहीं मुझ पर ही कविता-कहानी-उपन्यास जड़ दें। इसलिए होली पर साहित्यकारों से चकल्लस का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।

हां, लेकिन, नेताओं के साथ ऐसा कुछ नहीं है। नेता लोगों के साथ आप चाहे होली या बे-होली कैसे भी, कहीं भी चकल्लस कर सकते हैं। वे, ज्यादातर, बुरा नहीं मानते। जो मानते हैं, वे फिर न राजनीति न सत्ता न समाज में कहीं टिक नहीं पाते। बिन बताए ही उन्हें हाशिए पर धकेल दिया जाता है।

चूंकि मौसम चुनावी है और ऊपर से होली का भी जोर है, इस नाते आप अपने शहर या केंद्र के किसी भी ऊंचे या नीचे नेता से खुलकर चकल्लस कर सकते हैं। इस समय तो वे चाहकर भी बुरा नहीं मानेंगे। बुरा मानकर उन्हें अपने पैरों पर कुल्हाड़ी थोड़े मरवानी है। जब नेता लोग जनता से पांच तक चकल्लस कर सकते हैं, तो क्या मैं होली पर चकल्लस नहीं कर सकता। नेता लोगों से चकल्लस करना मेरा विधिवत अधिकार है।

चुनावी मौसम में नेता लोग जनता से चकल्लस ही तो कर रहे होते हैं, अलां-फलां वायदे कर-करके। जनता भी खूब जानती है कि चुनावी मौसम में किए गए वायदे पूरे कभी नहीं होने हैं, पर मजे लेने में क्या जाता है? नेताओं ने अपने देश की राजनीति को बना भी मनोरंजन जैसा ही दिया है। हर पार्टी का हर नेता अपने तरीके से जनता का मनोरंजन कर रहा है। कोई दल बदलकर कर रहा है, तो कोई लोकल ट्रेन में बैठकर। तो कोई मनचाही जगह से टिकट न मिलने पर टि्वट कर।

राजनीतिक-कम-चुनावी रस्साकशियां इसलिए भी अधिक बढ़ गई हैं ताकि एक-दूसरे की होली के बहाने ही उतारी-संवारी जा सके। ऐसे मनोरंजनात्मक सीन में चकल्लस तो बनती है प्यारे। होली पर या चुनावी मौसम में जिनने चकल्लस न की, समझो, उसने कुछ न किया। नेता लोगों से जित्ती चकल्लस करोगे, उत्ता दिल को तसल्ली मिलेगी।

हालांकि अपने यहां एक बढ़कर एक चकल्लसी नेता हैं मगर लालूजी का जवाब नहीं। होली पर लालूजी जब तलक चकल्लस न करें, रंग ही नहीं चढ़ता। लेकिन इस दफा मुझे थोड़ा संशय है कि लालूजी होली पर चकल्लस करेंगे कि नहीं। क्योंकि उनके एक पुराने साथी ऐन चुनाव पर उनसे चकल्लस कर दूसरी पार्टी में शामिल हो गए हैं। पिछले दिनों कुछ विधायकों ने भी उनसे पार्टी छोड़ने जैसी चकल्लस की थी, वो तो समय रहते लालूजी ने उन्हें मना लिया। क्या कीजिएगा लालूजी, यह राजनीति है ही इत्ती मजेदार चीज कि किसी का भी मन बिन ललचाए मानता ही नहीं।

एक लालूजी की ही पार्टी में नहीं इस वक्त हर पार्टी में कोई न कोई चकल्लस किसी न किसी नेता के द्वारा हो ही रही है। चकल्लसों की गिरफ्त में आप वाले भी हैं और कमल वाले भी। सभी पाप-पुण्य का लाभ-हानि देख रहे हैं। भई, मैं तो ईमानदार लोगों को गंभीर समझता था मगर ये तो परम-चकल्लसी निकले। खैर, इनका भी वर्तमान-भविष्य जनता ही लिखेगी।

मुझको तो फिलहाल नेता लोगों से चकल्लस करने से मतलब। वो करूंगा ही करूंगा। मौसम चुनावी है और समां होलीमय। ऐसे चकल्लसी मौके बार-बार नहीं आते प्यारे।

सोमवार, 10 मार्च 2014

नैतिकता बनाम अवसरवादिता

देखो प्यारे, राजनीति में नैतिकता ही सबकुछ नहीं होती, अवसरवादिता भी अपनी जगह रखती है। नेता अगर नैतिकता के दम पर राजनीति करेगा, तो हमेशा ठगा जाएगा। क्योंकि नैतिकता मन को तसल्ली तो अवश्य दे सकती है, किंतु अवसर नहीं दिलवा सकती। राजनीति में अगर अवसर पाने हैं, तो प्यारे अवसरवादी बनो! यहां जो जित्ता बड़ा अवसरवादी बनकर दिखला देगा, वो उत्ता ही बड़ा पद पा जाएगा।

नैतिकता और शुचिता के जमाने राजनीति में से अब हवा हुए। सादगी और ईमानदारी तो जाने कब की ठिकाने लग चुकी है।

अवसरों को भुनाने का चुनाव से बेहतर विकल्प दूसरा नहीं हो सकता। आजकल तो हर दल में होड़-सी लगी हैं, कभी इस नेता के आने और उस नेता के जाने की। कोई नेता किसी दल में मजबूरी में आ रहा, तो कोई मुफलिसी में। लेकिन लक्ष्य दोनों के 'अवसरवादी' ही हैं। पर उन्हें अपनी अवसरवादिता पर 'लाज' नहीं, 'नाज' है। नाज हो भी क्यों न, क्योंकि अवसरवादी राजनीति के वे पुराने खिलाड़ी जो ठहरे।

आपको चाहे न हो लेकिन मुझे अवसरवादी नेताओं पर हमेशा गर्व रहा है। दरअसल, अवसरवादी नेता राजनीति के कुशल सेल्समैन की तरह होते हैं। उन्हें मालूम होता है कि चुनाव के आसपास किस दल या नेता की हवा जोर की बहने वाली है, बस वे भी उसी में अपने अवसर का रिज्यूमे फिट कर देते हैं। और कमाल देखिए, तुरंत ही रिज्यूमे स्वीकृत भी हो जाता है। स्वीकृत हो भी क्यों न, क्योंकि दलों को भी तलाश रहती है, ऐसे अवसरवादियों की जो अपने साथ नैतिकता भले ही न लाएं किंतु वोट बैंक अच्छा-खासा लाएं। ताकि चुनावों में नैया ठिकाने पर जाकर लग सके।

चूंकि चुनाव नजदीक हैं, इस कारण अवसरवादियों के पौ बारहा हैं।

बदलते वक्त के साथ राजनीति के मायने, रंग-रूप, चाल-ढाल सब बदल गए हैं। बदलना चाहिए भी। नहीं बदलेंगे तो हाशिए पर पड़े रहेंगे। और हां, ईमानदारी के साथ राजनीति न तब हुई थी, न अब होने वाली है। फिर भी जो सियाने ईमानदारी से राजनीति करने का दम भरते हैं, वे दरअसल जनता को 'उल्लू' बनाते हैं। प्यारे, आज के जमाने में ईमानदार है कौन? पहले जरा ये ही बतला दो। हर कोई, हर कहीं तलाश में बैठा है, मौका देखकर चौका जमाने की। अगर अवसरवादी नेता राजनीति या दलों के मध्य अपने असवर या भविष्य को तलाश रहे हैं, तो क्या गलत कर रहे हैं? नौकरियों में अवसर पाने के लिए हम जोड़-जुगाड़ नहीं करते क्या?

अलां-फलां दल के भीतर-बाहर इस-उस नेता के आने-जाने को गंभीरता से न लें, यह कोई नई बात नहीं। जहां अवसर मिले, वहां हाथ तुरंत मार लेना चाहिए। कल का क्या भरोसा प्यारे।
तो मेरे प्यारे असवरवादी नेताओं-मंत्रियों अपने-अपने अवसरों के साथ ऐसे ही लगे रहो, क्या पता कब 'चांदी' हो जाए।

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

सेंसेक्स, तुम बढ़े चलो

प्यारे सेंसेक्स, अच्छा लगता है, जब तुम बढ़ते हो। अच्छा लगता है, जब शिखर पर पहुंचकर तुम मुस्कुराते हो। अच्छा लगता है, जब दलाल पथ पर चहलकदमी बढ़ जाती है। अच्छा लगता है, जब अर्थव्यवस्था तुम्हारे दम पर छलांगे मारती है। अच्छा लगता है, जब निवेशकों की जेबें भरने लगती हैं। अच्छा लगता है, जब बुरे दिन गुरजरने लगते हैं। अच्छा लगता है, जब तुम मंदडि़यों को टंगड़ी मारते हो।

आज तुम्हें बाइस हजार की ऊंचाई पर देखना बेहद सुखद अनुभव है मेरे लिए। इस सुखद अनुभव का लुत्फ एक मैं ही नहीं, हम सब ले रहे हैं। एक लंबे दौर के बाद आज तुम यहां पहुंचे हो। बीच में जाने कैसे-कैसे तूफानों का तुमने सामना किया। जाने कैसे-कैसे दर्द झेले। जाने कित्तों की कित्ती-कित्ती बातें सुनीं। कभी सरकार ने तुम्हारा साथ नहीं दिया, तो कभी बुरी खबरें तुम्हें सताती रहीं। लेकिन फिर भी तुम डरे नहीं डटे रहे। विपरित परिस्थितियों में भी हौसला नहीं छोड़ा। हालांकि तुम्हारी बेरूखी का काफी नुकसान लोगों को उठाना पड़ा मगर इसमें तुम्हारी गलती भी क्या थी प्यारे।

हवा का रूख ही कुछ ऐसा था कि सबकुछ उड़ा चला जा रहा था। न सरकार संभाल पा रही थी, न तुम संभल पा रहे थे। हां, बीच-बीच में कभी-कभार रिलिफ रैली आ जाया करती थी, तो थोड़ा-बहुत हम-तुम मुस्कुरा लिया करते थे। पर कित्ते दिन...। 2008 के बाद से तो ऐसा ग्रहण लगा कि हटने का नाम ही नहीं लिया। जाने कित्ते निपट लिए और कित्ते बरबाद हो गए। पर तुम भी क्या करते। जो होना है, सो होना है।

लेकिन अब बाइस हजार के शिखर पर पहुंचकर तुमने काफी राहत दी है हम सब को। उम्मीद की किरणें फिर से नजर आने लगी हैं। अब जो होगा अच्छा ही होगा पर विश्वास मजबूत होने लगा है। इस मजबूती को और सहारा तब मिलेगा जब देश में एक मजबूत सरकार आएगी। यों भी, तुम्हारी मजबूती भी सरकार के कंधों पर ही तो टिकी है, है न प्यारे।

अब जब जैसे-तैसे तुम्हारे कदम नई ऊंचाई की तरफ बढ़े हैं, तो कुछ खुजलीखोरों को खुजली हो रही है कि तुम एकतरफा बढ़ क्यों रहे हो? तुम्हारी बढ़त पर उन्हें संशय है। तुम्हारा बाइस हजारी होना उन्हें पच नहीं रहा। कह रहे हैं, यह बस कुछ दिनों की तेजी है। फिर से तुम फर्श पर नजर आओगे। जाने कैसे-कैसे जलन और खुजलीखोर है, हमारे समाज में, जिन्हें न दूसरे की कामयाबी अच्छी लगती है, न पीना। हां, दूसरी की बीवी उन्हें अपनी बीवी से बेहतर जरूर नजर आती है।

शायद इसीलिए खुजलीखोर मैलुए कहलाते हैं।

प्यारे सेंसेक्स, जिन्हें जो कहना है, कहने दो। जलने वालों को जलने और खुजली वालों को खुजलाने दो। पर तुम वीर की तरह ऊंचाई के पथ पर बस बढ़े चलो, बढ़े चलो। तुम्हारे बढ़े चलने में ही हम सब की बढ़ाई निहित है। तुम टॉप पर बने रहोगे तो देश की अर्थव्यवस्था भी शाइनिंग करती रहेगी।

फिलहाल, तुम्हें बाइस हजारी होने की शुभकामनाएं।

सोमवार, 3 मार्च 2014

पिता-पुत्र का मिलन

चित्र साभारः गूगल
पिताजी ने पुत्र को गले लगाया। सबके सामने लगाया। मीडिया भी मौजूद था। पिताजी के चेहरे पर लालिमा थी। पुत्र का माथा चिंतारहित। पिता-पुत्र के मिलन पर खुश मैं भी था। खुश क्यों न होऊंगा, आखिर पिताजी ने अपने पितत्त्व की लाज रख ही ली। वैसे, मुझे पूरा यकीन था कि पिताजी एक दिन मान ही जाएंगे। पुत्र को लिपटकर गले से लगा लेंगे। और दुनिया को बतला देंगे कि मैं 'आवारा पिता' नहीं। मेरे सीने में भी पिता का प्यार बसता है। हां, यह बात सही है कि पिताजी पर कुछ राजनीतिक दबाव थे लेकिन पुत्र के स्नेह से बढ़कर भला क्या दबाव हो सकता है।

साथ-साथ, मुझे इस बात की भी प्रसन्नता है कि पुत्र ने पिताजी की पतलून दुनिया-समाज की निगाह चंद बिलांग भी छोटी नहीं होने दी। पुत्र ने पिताजी की पतलून की इज्जत को बचाए-बनाए रखा। आज के लंपट समय में भला कौन पुत्र अपने पिता के तईं इत्ता करता है, जित्ता इस पुत्र ने किया।

चलो यह अच्छा है कि अब से कोई भी पिताजी के चरित्र पर तरह-तरह के सवाल नहीं उठाएगा। अब से कोई पिताजी का मजाक नहीं उड़ाएगा। अब हर कोई, हर कहीं पिताजी का सम्मान करेगा। झुककर पिताजी का आर्शीर्वाद लेगा। इस उम्र में पिताजी को यह सम्मान मिलना किसी वरदान से कम न है प्यारे।

यों, पिताजी को दोष देना ठीक नहीं। होती हैं, होती हैं, सबसे गलतियां होती हैं। क्या कीजिएगा, यह उम्र ही ऐसी होती है कि गलतियां न चाहकर भी हो ही जाती हैं। हो सकता है, तब पिताजी से अनजाने में कोई गलती हो गई हो पर इस पर इत्ता बखेड़ा खड़ा करने से क्या हासिल। उम्र के उस पड़ाव पर जाने कित्तो ने कित्ती-कित्ती गलतियां की हैं। पिताजी से हो गई तो क्या हुआ?

पर यह अच्छा है कि अब जाकर पिताजी ने अपनी गलती को दुरुस्त करते हुए पुत्र को सम्मान के साथ गले लगाया। और क्या चाहिए भला। पिताजी की करनी पर खाक डालिए, बस कथनी को देखिए।

अखबारों में छपे फोटू को देखकर लग भी रहा है कि पिताजी एवं पुत्र के साथ-साथ माताजी भी प्रसन्न हैं। माताजी ने भी पिताजी की स्वीकारोक्ती को सहर्ष स्वीकार कर लिया। अब मन में न इनके कोई मैल है, न उनके। चलो अच्छा है, होली के नजदीक सारे मैल मनों से दूर हुए। मन में मैल बने रहने से शक का कीड़ा बहुत परेशान करता है।

पिताजी भारतीय राजनीति के आधार-स्तंभ हैं। ऐसे स्तंभों का बना रहना जित्ता जरूरी राजनीति में है, उत्ता ही पारिवारिक जीवन में भी। हमें तो पिताजी पर गर्व होना चाहिए। क्या नहीं...?

फिर भी, जिनके दिल पिता-पुत्र के गले-मिलन पर जल रहे हैं, वे अपनी जलन अपने कने रखें। दूसरों की खुशियों पर जलने वालों की यहां कमी नहीं।

जलन को त्याग पिता-पुत्र के गले-मिलन का स्वागत करें।

शनिवार, 1 मार्च 2014

बहकने के बहाने

चित्र साभारः गूगल
प्यारे, बहकने की कोई उम्र नहीं होती। उम्र के किसी भी पड़ाव या मोड़ पर बहका जा सकता है। बहकने के लिए सेलिब्रिटी होना अवश्यक नहीं है। हां, बहक कर आप सेलिब्रिटी की श्रेणी में जरूर आ सकते हैं। बहका हुआ बंदा जब सेलिब्रिटी की श्रेणी में आता है तो वो मशहूर नहीं बल्कि महान हो जाता है। उसकी महानता के चर्चे जगह-जगह होते हैं। मीडिया से लेकर मार्केट तक में उसको हीरो बनाकर पेश किया जाता है। वो कैसे, क्यों और किस कारण बहका इस पर बहस होती है। इस बहस में सबसे अधिक प्रतिशत घोषित नैतिकतावादियों और शुचितावादियों का ही रहता है। रही-सही कसर संस्कृति-रक्षक पूरी कर देते हैं।

बहकना किसी एक निश्चित वस्तु, चीज या पदार्थ पर निर्भर नहीं करता। किसी भी क्षेत्र या चीज में बहकने की स्वतंत्रता आपके कने होती है। जैसे-जैसे समय बदलता है, बहकने के अंदाज भी बदलते रहते हैं। बदलना चाहिए भी। नहीं हो तो एक जैसा बहकना यथास्थितिवादी का प्रयाय बन जाएगा। ज्यादातर किस्से सुनाई व पढ़ाई में पीकर बहकने के ही सामने आते हैं। लेकिन ऊंचे या बुद्धिजीवि टाइप के लोग पीकर जब बहकते हैं, तो उसका रंग-ढंग ही कुछ और होता है। न न वे पीकर किसी नाली या नाले में नहीं लुढ़कते बल्कि 'दिललगी' का शिकार हो जाते हैं। यकायक जवानी उन्हें दीवाना बना देती है। जवानी पर बहकते वक्त वे उम्र का नहीं केवल खुमारी का ख्याल रखते हैं। खुमारी में की गईं हरकतें उन्हें जिंदगी का खूबसूरत एहसास-सा लगती हैं। लेकिन जब खुमारी के तेवर ढीले पड़ते हैं, तो मियां कोर्ट-कचहरी में उलझे नजर आते हैं।

मानना पड़ेगा कि बुढ़ापा बुरी चीज होती है। किसी को भी नहीं आना चाहिए। जिंदगी की रंगीनियत एवं रोमानियत बुढ़ापे के बीच कसमसा कर रह जाती हैं। मगर फिर भी बुढ़ापे में बंदा दांव खेलने से नहीं चूकता। अब तो मेडिकल सांइस ने इत्ती तरक्की कर ली है कि बुढ़ापे में भी बूढ़ेपन का एहसास नहीं होता। शरीर और सेहत हर वक्त उत्साहित व उत्तेजित ही रहते व दिखते हैं।

देखिए न, एक बाबा जी ने तो बुढ़ापे की काट के लिए तमाम प्रकार की पौरूष-बर्द्धक औषद्यियों का प्रयोग खुद पर ही किया। और भरे-पूरे बुढ़ापे में जो कमाल किए, हम सब के सामने हैं। हालांकि किए प्रयोगों की कीमत उन्हें जेल के भीतर रहकर चुकानी जरूर पड़ रही है लेकिन बुढ़ापे को धोखा तो दे ही दिया न। इस खेल में जित्ते बड़े खिलाड़ी बाप रहे, उत्ता ही उनका बेटा भी। फिलहाल, दोनों जेल के भीतर हैं।

न जाने ऐसा क्या हो गया है कि पचास साल पार लोग खूब बहक रहे हैं। न सिर्फ बहक रहे हैं बल्कि अपने बहकने को 'जस्टिफाई' भी कर रहे हैं। बाबा तो चलो भगवानत्त्व में बहके लेकिन संपादक महोदय और जज साहेब का क्या? आखिर ये दोनों तो बुद्धिजीवि वर्ग में आते हैं न! बताइए, जब बुद्धिजीवि ही ऐसे बहकेगा तो फिर साधारण वर्ग का क्या होगा प्यारे।
संपादक महोदय तो अब भी कह रहे हैं कि यह बहका-बहकी दोनों की सहमति से हुई। उन्हें राजनीति के तहत फंसाया गया है। खैर, जो हो। फिलहाल मियां बहकने की कीमत चुका रहे हैं।

कहिए कुछ भी पर बहकने के लाभ ही लाभ हैं। बहकना अब बदनामी की श्रेणी में नहीं आता। बदनाम होकर मिलने वाले नाम का मजा ही कुछ और होता है। बुढ़ापे में हासिल हुईं ये 'फौरी बदनामियां' हैं, पर इनका लाभ लंबा है। जो इन बदनामियों को झेल गया, समझो तर गया।

अंदर की बात बताऊं, कभी-कभी मेरा दिल भी करता है बहकने का, पर डरता हूं, कहीं इज्जत का फलूदा न बन जाए। बाबा और संपादक महोदय तो झेल गए मगर मैं कैसे झेल पाऊंगा। बहकने और बदनामी का स्वाद चखने के लिए कलेजा चाहिए होता है परंतु मैं तो छिपकली के नाम मात्र से ही डर जाता हूं। बहक कैसे सकूंगा। लेकिन फिर भी कोशिश करूंगा कि बहक जाऊं बाकी बाद में जो होगा देखा जाएगा प्यारे।