गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

क्योंकि गुंडे सर्वश्रेष्ठ हैं

चित्र साभारः गूगल
मेरी बचपन से तमन्ना थी कि मैं बड़ा होकर गुंडा बनूं! गुंडों जैसा जीवन जियूं! गुंडई के कार्यकलापों में व्यस्त रहूं! गुंडई के दम पर न केवल समाज बल्कि राजनीति और साहित्य के बीच भी अहम जगह बनाए रखूं। न कोई नेता मुझसे ऊंचे आवाज में बात करने की हिम्मत कर पाए। और न ही कोई संपादक मेरे लेख को न छापने का साहस दिखा पाए। गुंडई करूं तो ऐसी कि दुनिया देखे। और मेरे नाम के सोते-जागते, खाते-पीते, टलते-घुमते चर्चे करे।

न जाने क्यों गुंडे और गुंडई शब्द से मुझे शुरू से प्यार रहा है। गुंडे शब्द में वो ताकत है, जो दबंग में नहीं। दबंग दबंगई तो दिखा सकता है लेकिन गुंडई के मानकों पर खरा नहीं उतर सकता। गुंडई में एक अलग तरह की वीरता झलकती है। जिस अंदाज में गुंडा किसी को हड़का सकता है, दबंग नहीं। मार-कुटाई में दबंग से ज्यादा तेज गुंडा होता है। गुंडा सुपारी की कीमत जान पर खेलकर चुकाना जानता है, जबकि दबंग सिर्फ सुपारी को खाना।

मेरा स्पष्ट मानना है कि समाज-राजनीति-व्यवस्था को सुधारने के लिए गुंडे से बेहतर कोई दूसरा विकल्प हो ही नहीं सकता। ईमानदार तो कतई नहीं। ईमानदार राजनीति के बीच अपनी गोटी तो फिट करना जानता है, लेकिन चलाना नहीं। ईमानदार बेहद शातिर होता है। जनता के बीच लल्लू बने रहकर केवल अपना उल्लू सीधा करता रहता है। जबकि गुंडे के साथ ऐसा नहीं है। गुंडे से क्या ईमानदार, क्या दबंग, क्या नैतिकतावादी हर कोई डरता है।

लेकिन ईमानदारों की तरह गुंडा तानाशाह कतई नहीं होता। गुंडा अपने हक के लिए नहीं, जनता के हक के लिए लड़ता है। गुंडा ईमानदारों की तरह सिर्फ गुर्रा कर नहीं रह जाता, काम पैतीस करके ही दम लेता है।

दिल से कह रहा हूं, मैं तो फिल्म गुंडे देखकर अत्यंत प्रभावित हूं। गुंडे के आगे तो दबंग भी पीछे छूटती दिखती है मुझे। हीरो ही जब गुंडे के किरदार को निभाने लगे, तो फिर कहना ही क्या प्यारे। मतलब, अब बेहद कठिन है हीरो और गुंडे के बीच फर्क महसूस करना। फिल्म का हीरो अगर चरित्र से गुंडा है तो सर्वश्रेष्ठ है। न केवल फिल्म बल्कि बदलते समाज और परिवेश की जान है। देखिए न, गुंडा कित्ता खुलकर फिल्म की सेक्सी हीरोइन के साथ नाच भी सकता है और रोमांस भी कर सकता है। पर्दे पर गुंडे का हीरोइन के साथ रोमांस अब नैतिकता के दायरों में आता है। पुराने जमाने के फिल्मों की तरह नहीं, जिसमें गुंडे को हक ही नहीं था, हीरोइन के पास फटकने का भी। बेचारा शुरू से लेकर आखिर तक हीरो से पिटता ही रहता था। लेकिन अब हीरो ही गुंडा है। और उसकी लड़ाई अपने किरदार से खुद की है।

यही वजह है कि हमारे मध्य दबंग और गुंडे जैसी फिल्में हिट हो रही हैं। हिट हो भी क्यों न, क्योंकि जमाना बदल रहा है डूड। बदलते जमाने के बीच गुंडे और दबंग जैसे करेक्टर ही स्वीकृत और सर्वश्रेष्ठ हैं।

गुंडे में गुंडई को देखने के बाद मुझे खुद पर बेहद गुस्सा रहा है कि हाय! मैं क्यों नहीं गुंडा हुआ? गुंडा हो जाता तो कम से कम समाज और दुनिया के बीच ऊंचा नाम तो पा जाता है। आजकल तो बस नाम की धूम है। नाम कैसे और कहां से हो रहा है, इस पर अब कोई दिमाग खोटी करना नहीं चाहता।

हालांकि देर तो काफी हो चुकी है फिर भी कोशिश में हूं कि बहुत बड़ा तो नहीं कम से कम अपने मोहल्ले का ही गुंडा बनकर नाम पैदा कर सकूं। लेखक बनकर तो देख लिया।

1 टिप्पणी:

Rakesh Lakhani ने कहा…

बेहतरिन लेख । शुभकामनाऐ