मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

तेंदुए पर वीर रस प्रधान कविता

मेरे प्यारे तेंदुए,

मैं दाउद इब्राहिम पर व्यंग्य लिख सकता हूं, मल्लिका शेरावत को कपड़े पहनने की सलाह दे सकता हूं मगर तुम पर न व्यंग्य लिख सकता हूं, न तुम्हें कोई सलाह दे सकता हूं। तुम पर व्यंग्य लिखकर या तुम्हें सलाह देकर मुझे मरना थोड़े ही है! हां, तुम पर वीर रस प्रधान कविता अवश्य लिख सकता हूं। हालांकि मैंने वीर रस तो क्या जीवन में कभी कविता ही नहीं लिखी मगर तुम पर लिख सकता हूं। चाहे किसी वीर रस के कवि की कविता को चुराना ही क्यों न पड़े। तुम्हारे सम्मान की खातिर मैं यह रिक्स भी लेने को तैयार हूं।

तुम व्यंग्य या सलाह के लिए बने भी नहीं हो। तुम तो सिर्फ  और सिर्फ  वीर-रस प्रधान कविता के लिए बने हो। मैं तुम्हें संसार का सबसे ज्यादा ताकतवर और वीर जानवर मानता हूं। तुम्हारी बहादुरी के समक्ष हर वक्त नतमस्तक रहता हूं। जो बात तुम्हारी वीरता या दहाड़ में है, वो बबर शेर में भी नहीं। (यह बात बबर शेर से कह मत देना, खामखां महाराज कहीं मेरा काम तमाम कर दें...)

तुम मात्र तेंदुए नहीं हो। तुम दहशत के साए हो। तुम्हारी दहशत के आगे अच्छे-अच्छे तोपचंद पानी भरते हैं। जो व्यंग्यकार खुद को बहुत ऊंचे किस्म का व्यंग्यकार मानते-मनवाते, समझते-समझाते हैं, वे भी तुम पर व्यंग्य लिखने में कतराते हैं। अभी हाल मैंने एक ऊं चे किस्म के व्यंग्यकार को तुम पर व्यंग्य लिखने के लिए कहा तो मियां कन्नी काट गए। तुम पर व्यंग्य लिखना तो दूर की बात रही, बात करने में ही हकलाने लगे। क्या करें, तुम्हारा खौफ है ही इत्ता भयानक कि कौन मूरख चाहेगा ऐंवई अपनी कब्र खुद खोदना।

तुम पर वीर-रस प्रधान कविता लिखने के लिए ज्यादा मेहनत की दरकार नहीं। कलम और शब्द खुद-ब-खुद तुम्हारी वीरता के आगे वीर हो जाते हैं। मजाल है जो शब्दों के बीच कहीं हास्य-व्यंग्य का पुट भी आ जाए। अमां, शब्द तक तुमसे खौफ खाते हैं।

इसीलिए तो मैंने तुम पर व्यंग्य न लिखकर वीर-रस प्रधान कविता लिखने का तय किया। ताकि जब तुम पढ़ो तो मुझे शबाशी दो। मेरी कलम, मेरे हाथ, मेरा माथा स्नेह के साथ चूमो।

प्यारे तेंदुए, शायद तुम नहीं जानते कि मैं तुमसे कित्ता प्यार करता हूं। न न मेरे प्यारे को हवाबाजी मत समझना। यह बात मैं अपने दिल की गहराईयों के बीच से कह रहा हूं। तुमसे प्यार करने का कारण है। पिछली दफा जब तुम बरेली आए थे, तो तुमने एक मुझे छोडक़र कईयों का काम तमाम किया था। कई दिनों तलक लोगों के दिलों में तुम्हारे नाम और दहाड़ की धमक बसी रही थी। वो तो तुम्हारी मेहरबानी रही कि उस दिन बीच राह में आमना-सामना होने के बाद भी तुमने मुझे बिन खाए जाने दिया। शायद तुमने यह सोचा हो कि एक लेखक को खाकर मैं क्या करूं गा? लेखक के अंदर मांस तो मिलने से रहा, मिलेंगे या तो शब्द या फिर विचार। शब्द और विचार तुम्हारे किस काम के। उस दिन के बाद से कई दिनों तलक मेरे दिल-दिमाग में तुम्हारा खौफ कायम रहा। लेकिन फिर धीरे-धीरे उतर भी गया।

बस उसी दिन से मैंने तय कर लिया कि मुझे तुम पर वीर रस प्रधान कविता लिखनी ही लिखनी है। और तुम्हें जरूर सुनानी है। बर्शेते सुनकर तुम मुझे पर दहाड़ो नहीं।

सुना है, अभी तुम मेरठ में हो। जब मेरठ से चलने को हो, मुझे बता देना, मैं खुद तुम्हारे पास आ जाऊं गा। मैं नहीं चाहता कि अपनी कविता सुनाने के लिए मैं तुम्हें दोबारा बरेली बुलाऊं । तुम बरेली वालों से दूर रहो तो ही अच्छा।

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