सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

तमंचे पे डिस्को

चित्र साभारः गूगल
हालांकि कभी किया नहीं लेकिन करने की तमन्ना रखता हूं। जी हां, मैं तमंचे पे डिस्को करना चाहता हूं! तमंचे पे डिस्को की थिरकन को अंदर तलक फील करना चाहता हूं। बतौर लेखक तमंचे पे डिस्को करके लेखकिए बिरादरी का मान बढ़ाना चाहता हूं। अपने यथास्थितिवाद से बाहर निकल, रंगीनियत में बहक जाना चाहता हूं। लेकिन इत्ता भी नहीं, जित्ता एक संपादक महोदय बहक गए। लुत्फ देखिए, बहके संपादक महोदय परंतु डिस्को मीडिया और सियाने कर रहे हैं।

वैसे तमंचे पे डिस्को करने में कोई हर्ज नहीं। यहां हर कोई, हर तरह से किसी न किसी के तमंचे पे डिस्को कर ही रहा है। कोई ज्यादा कर रहा है, कोई कम। लेकिन कर अवश्य रहा है। दरअसल, वक्त ही कुछ ऐसा आ गया है कि बिना तमंचे पे डिस्को करे या कथित ईमानदारी का चोला ओढ़े, काम चल ही नहीं सकता। या तो तमंचे पे डिस्को कीजिए या फिर किसी को करवाइए, तब ही सामाजिक-राजनीतिक-साहित्यिक गाड़ी चल सकती है। वरना तो इधर अंधेरा और उधर खाई है प्यारे।

वक्त के साथ ढलने या समझौता करने में मैं माहिर हूं। जिस तरह की हवा चलती है, मैं उसी के संग-साथ बह लेता हूं। आजकल हवा तमंचे पे डिस्को, गंदी बात, शुद्धि देसी रोमांस, साड़ी के फॉल, रज्जो, रामलीला की बह रही है, तो मैं भी इन्हीं में बह रहा हूं। हवा के विपरित बहकर मुझे हाशिए पर थोड़े लुढ़ना है। दुनिया को अगर तमंचे पे डिस्को करने में आनंद आ रहा है, तो मुझे भी आ रहा है। जीवन में आनंद का बना रहना जरूर है, चाहे जैसे।

एक शोले की बसंती थी, जो मजबूरी में तमंचे की नोक पर नाची थी। एक नवाब साहब हैं, जो शौक से तमंचे पे डिस्को कर रहे हैं। आखिर बुलेट राजा का कुछ तो जमा-हासिल नवाब साहब को मिलना चाहिए कि नहीं। फिर चाहे तमंचा ही क्यों न हो।

अब देखिए न, 'आप' वाले झाड़ू की सींक पे दिल्ली को हिलाने-नचाने की बात कर रहे हैं। बिजली से लेकर मेट्रो तक को सस्ता करने का दावा ठोंक रहे हैं। ईमानदारी की टोपी पहन खुल्ला नेताओं को गरिया रहे हैं। स्टिंग पर आग-बबूला होकर आप ही अपनों को क्लीनचिट दे रहे हैं। ऊपर से, बात इत्ती ऐंठ में रहकर करते हैं कि जाने कहां के तोपची हों। ऐसे तोपचियों को नचाना जनता को खूब आता है प्यारे।

इसीलिए तो मैं बिना तोपची हुए केवल तमंचे पे डिस्को करना चाहता हूं। क्या पता 'अब' तमंचे पे किया डिस्को, 'कब' काम आ जाए। दुनिया जुगाड़ पर चल रही है, तो फिर मैं क्यों न तमंचे पे नाचूं। सुना है, तमंचे पे नाचने वाले को किसी से डर नहीं लगता। डर के आगे जीत है।

मेरा प्रयास रहेगा कि मैं साहित्यिक तमंचे पे नहीं राजनीतिक तमंचे पे डिस्को करूं। राजनीतिक तमंचे पे डिस्को करने का अपना ही सुख है। एक दफा नेता या मंत्री बन लिए, तो बारे-नियारे। न क‌रियर का झंझट न पैसे की चिंता। पांच साल में केवल एक दफा जनता के बीच जाना होगा, बाकी के दिन मौजां ही मौजां। जो लेखन में नहीं धरा, वो सब राजनीति में धरा है। तब ही तो आजकल के नेता लोग अपने-अपने राजनीतिक सुख का लुत्फ बिंदास उठा रहे हैं। हालांकि घोटालों के बीच उनकी गर्दन फंसी जरूर है, तो क्या, राजनीति में तो बने ही हुए हैं न। काफी है।

बहरहाल, तमंचे ने गाने में जगह पाकर मुझे नई तरह की ऊर्जा दी है। जब भी मेरे कानों में तमंचे पे डिस्को के स्वर पड़ते हैं, मैं स्वतः ही थिरकने लगता हूं। थिरकने में मुझे मजा आता है। दिमाग की सारी बत्तियां खुली हुई-सी जान पड़ती हैं। आपको विश्वास दिलाता हूं कि ये बत्तियां यों ही खुली रहेंगी और मैं यों ही तमंचे पे डिस्को करता रहूंगा।

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