रविवार, 23 फ़रवरी 2014

मफलर और ईमानदारी

चित्र साभारः गूगल
सुनो प्यारे, मैं एक मफलर खरीदकर लाया हूं। अब से हर जगह इसे ही पहना करूंगा। यह मुझे ठंड से भी बचाएगा और फैशन का हिस्सा भी बना रहने देगा। पर बताने वाले बताते हैं कि यह कोई मामूली मफलर नहीं है। आजकल यह मफलर हर कहीं, हर किसी पर छाया हुआ है। इस मफलर को पहनने से ईमानदारी, सादगी व कर्तव्यनिष्ठा अपने आप आ जाते हैं। इस मफलर में इत्ती ताकत है कि बेईमान और भ्रष्टाचारी इसकी परछाई तक से डरते हैं! सिर्फ डरते हैं, ईमानदार बनने की कोशिश नहीं करते। कहते हैं, 'ईमानदार बन गए तो आजू-बाजू की कमाई का क्या होगा? सूखी तनखाह में गुजारा किसका चलता है यहां?'

देखा-देखी मफलर को पहनना शुरू मैंने भी कर दिया है, पर उम्मीद कम ही लगती है कि मैं ईमानदार, सादगीपसंद या कर्तव्यनिष्ठ हो-बन पाऊं। मैं मफलर को बतौर 'फैशन' पहन रहा हूं, बतौर 'नेक-नीयत' नहीं। मैंने तो टोपी भी फैशन समझकर ही पहनी थी। लेकिन टोपी से अब 'मोहभंग' हो चुका है मेरा।

यकीन तो मुझे भी नहीं होता कि मात्र मफलर पहन लेने भर से ईमानदारी या सादगी आ जाएगी। फिर भी, लोग हिरस में पहन रहे हैं। गांधी टोपी पहन लेने भर से जब आज तलक रामराज्य नहीं आ पाया, तो मफलर पहन लेने से ईमानदारी आ जाएगी? क्या बात करते हो प्यारे।

राजनीति में रहकर कुछ नेताओं को शौक होता है 'प्रतीकात्मक' चीजों को ओढ़े रहने का। कोई टोपी रिवाज में रखता है। कोई मफलर तो कोई शॉल। लेकिन प्रतीकात्मक चीजों से न राजनीति चलती है न देश। न जनता के जन-सरोकारों के साथ न्याय हो पाता है।

बेशक सादगी नेता के जीवन का हिस्सा हो सकती है किंतु राजनीति या देश की नैया पार लगाने को यही काफी नहीं प्यारे। दिल्ली में सादगी और ईमानदारी का जिस तरह से ढोल बजाया गया, धीरे-धीरे कर सारी पोलें अब खुलने लगी हैं। आम आदमी को टोपी पहनाकर, खुद मफलर पहन लिया है सीएम साहब ने। फिर भी दावा यह कि हमसे बड़ा ईमानदार ढूंढकर तो बता दें। ईमानदारी पर अभिमान। बात जांची न प्यारे।

मफलर-टोपी के साथ राजनीतिक नूरा-कुश्ती ही चल रही है। जनता अब भी वहीं है, जहां कल थी। कल तलक जनता ने भ्रष्ट-तंत्र की तानाशाही को झेला, अब ईमानदारों की तानाशाही को झेल रही है। फिर इनमें या उनमें फर्क ही कहां रह गया?

चिंता न करें, मैं मफलर और टोपी की इस ईमानदार ( ! ) राजनीति से बचकर ही रहूंगा। यह मेरे किसी काम की नहीं। मेरा शौक तो इस-उस की राजनीति को देखने का है, खुद नेता या राजनीति में जाने का नहीं। जो राजनीति का हिस्सा बने हैं, बने रहें। मेरी बला से। मेरे गुजारा तो व्यंग्य लिखकर चल ही रहा है। व्यंग्य ही लिखते रहने का विचार है। किसी अन्य विचार के साथ जाने की तमन्ना नहीं।

मफलर पहना जरूर है पर ठंड से बचने और फैशन का हिस्सा बनने के लिए। उस लिए नहीं जिसके बारे में तुम सोच रहे हो प्यारे।

1 टिप्पणी:

Abhilekh Dwivedi ने कहा…

Hahahaha!! Bhai bahut sahi kataksh hai! Bahut badhia likhte hain aap! Kabhi ek nazar mere blog pr bhi zarur dijiyeg..Abhaari rahunga!
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