गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

कपड़े उतारू विरोध

चित्र साभारः गूगल
टेक इट ईजी प्यारे। टेक इट ईजी। इसमें शर्म-वर्म जैसी कोई बात नहीं। राजनीति में तो ऐसा चलता है। बिना ऐसा चले राजनीति नहीं चल सकती। समय के साथ-साथ राजनीति के रंग-ढंग काफी बदल गए हैं। जब राजनीति के रंग-ढंग बदले हैं, तो क्या नेताओं के न बदलेंगे!

इन दिनों संसद के भीतर या बाहर नेताओं-सांसदों-विधायकों का जो अजीबो-गरीब विरोध-प्रदर्शन नजर आ रहा है न, यह सब बदली हुई राजनीति का परिणाम है। नेताओं ने अब अपने विरोध करने के तरीके जरा बदल दिए हैं। पहले वे विरोध या क्रोध बोलकर ही व्यक्त कर दिया करते थे, अब बकायदा मिर्ची छिडक़कर, धक्का-मुक्की करके, थप्पड़ जडक़र या कपड़े उतारकर जतलाते हैं। इससे पता चलता है कि हमारे देश की राजनीति के नेता एवं सांसद लोग बोल्ड-दर-बोल्ड होते जा रहे हैं। अब आसानी से कोई उन्हें आड़े हाथों नहीं ले सकता। अब वे हाथ तक तोडऩे की ताकत रखते हैं। कतई फिल्मी स्टाइल में।

अमां, जब सदन के भीतर जूतम-जुताई हो सकती है, तो क्या कपड़े नहीं उतारे जा सकते? बिल्कु ल उतारे जा सकते हैं। बल्कि कपड़े उतारकर विरोध और क्रोध की तीव्रता का पता अधिक खुलकर चलता है। और फिर विधायकों ने कपड़े कोई खुद के तईं थोड़े उतारे, जन-हित वास्ते उतारे थे। चाहे कह कोई कु छ भी ले लेकिन हमारे देश के नेता जनता के हितों के प्रति हर वक्त तत्पर रहते हैं।

अभी तेलंगाना पर जो रार मची, वो नेताओं के निजी हितों के लिए नहीं, जनता के वास्ते थी। चाहे बंद दरवज्जों में ही सही पर तेलंगाना बिल पास करवाकर ही दम लिया। सही हुआ जो बिल पास हो गया, नहीं तो फिर कोई बखेड़ा खड़ा हो जाता। और बेचारे सांसद लोग मुफ्त में बदनाम हो जाते। मीडिया तो उन्हें बदनाम करने को हर पल तैयार बैठा रहता है।

सदन के भीतर कपड़े उतारने की घटना बेशक नई हो पर कदम बेहद साहसी कहा-माना जाएगा। अभी तलक हीरो फिल्मों में ही कपड़े उतारा करता था लेकिन अब यह काम ससद में भी होने लगा है। बस गनीमत इत्ती रही कि विधायक महोदय ने सिर्फ  कु र्ता ही उतारा, पायजामा नहीं। नहीं तो रायता और ज्यादा फैलता। हालांकि यूपी के एक ऊं चे मंत्रीजी ने विधायकों को पायजामा उतारने की सलाह दी थी। लेकिन..., शायद थोड़ी शर्म आ गई हो।

यों भी, बात-बात पर कपड़े उतारना अब चलन में है। चूंकि जमाना बदल रहा है, इस कारण लोगों ने अपने देखने के नजरिए में परिवर्तन कर लिया है। जो जित्ता ज्यादा कपड़े उतार ले, वो उत्ता बड़ा तीसमारखां। तीसमारखाई की यह हिरस धीरे-धीरे कर देश के नेताओं के बीच भी पनप रही है। अच्छा है, बहुत अच्छा है।

और हां, यह बात दिमाग से कतई बाहर निकाल दीजिए कि इन हरकतों से देश या लोकतंत्र शर्मसार हुआ है। न न कोई शर्मसार नहीं हुआ है। शर्मसार तो दरअसल वो हुए होंगे जिन्होंने इत्ते बलिदानों के बाद देश को गुलामी से मुक्त कराया था। मगर उनके शर्मसार होने की फिक्र यहां करता ही कौन है? क्या राजनीति, क्या नेता, क्या व्यवस्था सब मनोरंजन की सामान बन चुकी है। नेता राजनीति में अब नीतियों के लिए नहीं मात्र मनोरंजन के लिए आते हैं।

खैर, कोई नहीं। टेक इट ईजी प्यारे। अभी आगे और न जाने क्या-क्या देखने-सुनने को मिले, राजनीति और नेताओं के बीच। हैव पैशेंस।

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