बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

हंगामा और मनोरंजन

मैं मेरे देश के नेताओं का तहे-दिल से एहसानमंद हूं कि उन्होंने राजनीति को 'मनोरंजन' का साधन बनाया हुआ है। हर मुद्दे और हर बात पर किसी न किसी तरह का हंगामा खड़ा करके हमारा मनोरंजन करते-करवाते रहते हैं। राजनीति के प्रति गंभीर होना का हमें रत्तीभर मौका नहीं देते। उनका मनोरंजन कभी संसद के अंदर देखने को मिलता है, तो कभी बाहर। चुनावी सभाओं में तो मनोरंजन हदें तक पार कर जाता है। गजब यह है कि अक्सर बयानबाजी में भी वे 'शाब्दिक मनोरंजन' कर जाते हैं। हंगामें के बहाने हुए मनोरंजन के बीच-बीच में यह भी कहते रहते हैं कि वे यह सब जनता के लिए ही तो कर रहे हैं!

खैर, इसमें शक नहीं कि मेरे देश के नेता लोग जन-हित के प्रति वाकई बेहद संजीदा रहते हैं! अगर नेताओं को जन-हित का ख्याल न होता, तो वे न आपस में लड़ते, न हंगामा काटते। हंगामें के बीच अगर कुछ ऊंच-नीच हो भी जाती है, तो इसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। आखिर ये सब वे जनता के वास्ते ही तो कर रहे हैं!

अभी चंद रोज पहले संसद के भीतर जो हुआ, बस हो ही गया। कोई नेताओं का मन थोड़े ही था, ये सब करने का! वो तो यहां-वहां से थोड़ा-बहुत दबाब पड़ा, कुछ गुस्सा आया, तो चक्कू और मिर्ची स्प्रे का बहाना बन गया। वरना, मेरे देश के नेता लोग बेहद शांत रहते हैं! राजनीति में शांति को बनाए रखना उनका परम-धर्म है! क्या नहीं प्यारे...?

हंगामा वगैहरा अपनी जगह है, लेकिन नेता लोग जन-हित के प्रति हमेशा प्रतिबद्ध हैं! यह नेताओं की जन-हित के प्रति प्रतिबद्धता ही थी कि तेलंगाना बिल बंद किवाड़ों के बीच पास हो गया। क्या करते, बंद किवाड़ों के बीच पास करना ही पड़ा, नहीं तो फिर से हो-हंगामा होता। दो-चार के बीच में सिर-मुचैटा होता। और खामखां नेता लोग बदनाम हो जाते। बदनामी से बचने के लिए ही तो यह सब ड्रामा करना पड़ा। ड्रामे के बहाने हमारा मनोरंजन भी हो गया और बिल भी पास हो गया। हैं न मेरे देश के नेता जन-हित के प्रति कित्ते समर्पित!

देखो प्यारे, हंगामें के बहाने मनोरंजन करने-करवाने में जित्ता प्रमुख दल चर्चा में रहते हैं, अब उत्ता ही आप वाले भी रहने लगे हैं। बेचारों को जब कुछ समझ नहीं आता तो धरना-आंदोलन करने बैठ जाते हैं। टोपी, ईमानदारी, सादगी, शुचिता की दुहाई देकर जनता पर डोरे डालते हैं। जब जनता उनकी डोर थाम लेती है और कहती है कि अब उड़ाओ पतंग तो कुछ देर उड़ाकर हांफकर यह कहते हुए भाग जाते हैं कि हम न उड़ा पाएंगे। क्योंकि पेंच लड़ाना तो हमें आता ही नहीं। अब इसे क्या समझा जाए?

चलो कोई नहीं इस बहाने अच्छा खासा मनोरंजन तो हो ही जाता है। और चाहिए भी क्या हमें।

चिंता-गंभीरता का त्याग कर हमें नेताओं के इस 'राजनीतिक मनोरंजन' का पूरा आनंद लेना चाहिए। प्रत्येक हो-हंगामें तो यह कहते हुए भूला देना चाहिए कि यह तो अक्सर होता ही रहता है। इसमें नया कुछ नहीं। चूंकि चुनाव सिर पर हैं, इसलिए, नेताओं का जोर भी अजब-गजब तरीके के मनोरंजन करके देश की जनता को लुभाना है। गंभीरता-नैतिकता की परवाह यहां करता ही कौन है?

फिलहाल, इंतजार कीजिए आगे अभी और भी तरीके के 'राजनीतिक मनोरंजन' देखने-सुनने को मिलेंगे।

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