मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

टोपियों के बहाने

हम कहीं टोपियों के 'सत-युग' में तो नहीं आ गए हैं? जहां देखो वहां टोपियां ही टोपियां नजर आ रही हैं। हर कोई टोपी पहनकर क्रांति करने, ईमानदार बनने, चरित्रवान होने को उतावला बैठा है। हालांकि टोपियों में रंगों की विविधता है, किंतु उद्देश्य सभी का एक ही है, आम आदमी की फिकर! मात्र टोपी पहनकर आम आदमी की फिकर करने वाले राजनीतिक दलों की दरियादिली देखकर असली वाला आम आदमी परेशान है। वो बेचारा समझ ही नहीं पा रहा कि यह हो क्या रहा है?

देखा-देखी मेरे प्यारे को भी टोपी पहनने का चस्का लगा है। एक बेहद ईमानदार एनजीओ-टाइप राजनीतिक दल की टोपी को उसने भी सिर पर चढ़ा लिया है। जिस दिन से टोपी प्यारे के सिर चढ़ी है, प्यारे शत-प्रतिशत चरित्रवान व ईमानदार हो गया है। अब मैं तो क्या साक्षात भगवान भी उसकी ईमानदारी पर रत्तीभर शक नहीं कर सकते!

मेरा प्यारे अब ईमानदारों का राजा है।

प्यारे कोशिश में लगा हुआ है कि जिस ईमानदार दल की टोपी उसने पहनी है, मैं भी पहन लूं। इस वास्ते वो कई दफा मुझे ईमानदारी और शुचिता का वास्ता भी दे चुका हूं। लेकिन हर दफा मैंने उसको यही समझाया कि 'मैं चाहकर भी ईमानदार या चरित्रवान नहीं हो सकता। क्योंकि न ईमानदार होना, न चरित्रवान दिखना मेरी राशि में ही नहीं है। मेरी राशि में केवल अ-ईमानदार लेखक बने रहना ही लिखा है। जिसे मैं पूरी तसल्ली के साथ निभा रहा हूं।'

मेरे टोपी न पहनने से प्यारे मुझसे नाराज है। कहता है, 'तुम मूरख हो। मौका देखकर चौका मारने का चांस खो रहे हो। ईमानदार बनने का ऐसा 'गोल्डन चांस' दोबारा नहीं मिलेगा। ईमानदार बनने के लिए तुम्हें ज्यादा कुछ नहीं करना सिर्फ टोपी पहननी है। एक दफा अलां-फलां दल की टोपी तुम्हारे सिर पर चढ़ गई बस समझ लो जनता की नजर में तुम ईमानदार हो गए। यों भी, आजकल जनता टोपी वाले ईमानदारों को अधिक पसंद कर रही है। दिल खोलकर उनको अपना समर्थन दे रही है। चांस है, हाथ धो लो।'

जो भी हो लेकिन प्यारे मैं टोपी नहीं पहन सकता। मैं बिन-टोपी ही सही हूं। कम से कम टोपी न पहनने से मेरे सिर पर जनता की जिम्मेवारी जैसा कोई बोझ तो नहीं है। न मुझे जनता के वास्ते पानी मुफ्त करना है, न बत्ती के दाम आधे करने हैं। न अपनी ऊंची रखने के लिए जनता दरबार लगाना है। ऐसे जनता दरबार से भी क्या हासिल कि मुझे अपनी ही जान छत पर चढ़कर बचानी पड़े। और न ही मुझे टोपी पहनकर जनता के अंडे खाने हैं। तुम्हारी ईमानदारी तुम्हें ही मुबारक। मैंने प्यारे को समझाया।

प्यारे समझा तो नहीं पर इत्ता जरूर कह गया कि टोपी वाले ईमानदार एक दिन तुम भी देख लेंगे।

मैं तो जाने कब से देखने-दिखाने को तैयार बैठा हूं। कोई आए तो सही।

और फिर, जब इस कदर थोक के भाव में हर गली-मोहल्ले, शहर-गांव में ईमानदार बढ़ रहे हैं, तो एक अकेले मेरे ईमानदार न हो होने से कौन-सा ईमानदारी को बट्टा लग जाएगा। कौन-सी टोपियां बे-रंग हो जाएंगी।

यह वक्त तो ईमानदारों की टोपियों पर व्यंग्य लिखने का है। सो प्यारे खुलकर लिख रहा हूं।

कोई टिप्पणी नहीं: