सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

पप्पू की आत्मकथा के बहाने

श्रीमान पप्पू यादव की आत्मकथा आ जाने के बाद से मेरा दिल भी मचलने लगा है। बरसों से ली गई कसम कि 'कभी किताब नहीं छपवानी है' को अब तोड़ने का मन करता है। प्रकाशक, समीक्षक व आलोचक के खिलाफ भी अब मेरे स्वर एवं विचार बदलने लगे हैं। साफ महसूस होने लगा है कि बिना बदले साहित्य एवं लेखन की दुनिया में अब मेरा गुजारा संभव नहीं। बदलने के साथ-साथ मुझे कुछ राजनीतिक प्रभाव भी अवश्य बनाना पड़ेगा। यह आज के वक्त की मांग है।

मैं यह देखकर गदगद हूं कि श्रीमान पप्पू यादव की किताब का विमोचन कित्ते ठाठ और ठसक के साथ हुआ। एक किताब से उन्होंने दो-दो निशाने साध लिए। राजनेताओं के साथ-साथ एक अति-वरिष्ठ साहित्यकार-कम-आलोचक को वे मंच पर ले आए। सबने साथ मिलकर उनकी किताब का विमोचन किया। उनके राजनीतिक एवं साहित्यिक योगदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की। तथा, साहित्य जगत का एक संभावित महान विचारक घोषित किया। साथ ही साथ, जीवन में अब तक की गईं उनकी क्रांतियों को बेहद सम्मानित लहजे में याद किया। श्रीमान पप्पू को इत्ता सम्मान मिलना न केवल राजनीति बल्कि साहित्य जगत के लिए भी बड़ी बात है।

इस वास्ते श्रीमान पप्पू यादव को बधाई एवं शुभकामनाएं तो बनती हैं।

ऐसा ऐतिहासिक सम्मान देखकर भला किसका मन न ललचाएगा पाने को। मेरा तो बार-बार ललचा रहा है। अगर श्रीमान पप्पू यादव साहित्य में नए प्रतिमान बनकर उभर सकते हैं, तो फिर मैं क्यों नहीं? जबकि मेरी उपस्थिति तो यहां बरसों से है। बस गलती मुझसे जरा-सी यह हो गई कि मैंने अपने लेखन व हैसियत को कभी भुनाने की कोशिश नहीं की। हमेशा इस ऐंठ में रहा कि इससे क्या फर्क पड़ता है। लेकिन प्यारे फर्क पड़ता है। और ऐसा-वैसा नहीं बहुत ज्यादा फर्क पड़ता है। न राजनीति न साहित्य में आप बिना जोड़-जुगाड़ के टिक ही नहीं सकते। अगर यहां टिकना है तो पप्पू यादव बनना ही होगा।

मुझे पछतावा हो रहा है अपने आदर्शवाद पर। खामाखां ही मैंने इसे ओढ़ा। आदर्शवाद ओढ़ने की नहीं बल्कि त्यागने की चीज है। जित्ता आदर्शवादी होगे, उत्ता ही रसातल में सरकते जाओगे। आज के जमाने में आदर्शवाद कोढ़ समान है। यहां किसे फुर्सत है आपके आदर्शवाद को देखने-समझने की। सबकी गाड़ी किस्म-किस्म के समझौतों पर टिकी हुई है। समझौते करते रहिए, आदर्शवाद को खुद से परे रखिए; फिर देखिए आप कहां से कहां पहुंचते हैं। जिसकी जित्ती लंबी पहुंच, उसका उत्ता लंबा कद। क्या समझे...।

मेरा मन कर रहा है कि मैं श्रीमान पप्पू यादव को ही अपना साहित्यिक गुरु बनाऊं। आत्मकथा लेखन के तमाम टिप्स उनसे लूं। उनके जीवन-संघर्ष को अपनी प्रेरणा बनाऊं। राजनीति और साहित्य में संबंधों का दबदबा कैसे बनाया जाता है, यह उनसे जानूं-समझूं। एक वे ही हैं, जो मुझे यह सब बतला सकते हैं। वरना तो हमारे हिंदी साहित्य की दुनिया इत्ती दोगली है कि यहां कब कौन कहां कैसे किसकी बजा दे, पता ही नहीं चलता। यहां अब केवल भगवानों को ही पूजा जाता है।

अब तलक तमाम तरह की आत्मकथाओं को पढ़कर मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि आत्मकथा लेखन अधिक मेहनत का काम नहीं। आत्मकथा कोई भी लिख सकता है। आत्मकथा लिखने के लिए साहित्यिक व्यक्तित्व या परिवेश का होना जरूरी नहीं। डॉन बबलू श्रीवास्तव तक की तो आत्मकथा है। और क्या रोमांचक आत्मकथा है। सुना है, फूलन देवी की भी है। लेकिन मैंने पढ़ी नहीं।

फिर मैं भी क्यों न सीधे आत्मकथा ही लिखूं। आत्मकथा बाजार में आएगी तो प्रभाव कुछ और ही होगा। श्रीमान पप्पू यादव के नक्शे-कदम पर चलने में कोई हर्ज थोड़ है। भई, मेरे तईं तो श्रीमान पप्पू यादव ही महान-विभूति हैं।

एक दफा मेरी आत्मकथा आ जाने दीजिए फिर मैं भी साहित्य और राजनीति जगत की महान-विभूति कहलाऊंगा। यह मेरा वायदा है आप से।

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