रविवार, 16 फ़रवरी 2014

मैं एक 'बौड़म लेखक' हूं

चित्र साभारः गूगल
पत्नी को मुझसे हजारों शिकायतें हैं। यह कोई नहीं बात नहीं। हर पत्नी की हर पति से कोई न कोई शिकायत जरूर होती है। पति से शिकायत रखना पत्नी का मूलभूत हक है। इस हक को हम पति उनसे चाहकर भी नहीं छीन सकते।

बहरहाल, हजारों शिकायतों में पत्नी की एक शिकायत मेरे लेखन को लेकर भी है। पत्नी कहती है, 'मुझे लिखना नहीं आता। मैं हमेशा ऊल-जलूल लेखन किया करता हूं। न मेरे लेखन में गभीरता है, न संवेदना। इस नाते मैं एक 'बौड़म लेखक' हूं।'

चूंकि वो पत्नी है, इस नाते पत्नी की शिकायत सिर-आंखों पर। मैं चाहकर भी पत्नी की शिकायत का 'प्रतिवाद' नहीं कर सकता। 'प्रतिवाद' करके मुझे घर में अपना दाना-पानी थोड़े बंद करवाना है।

हर लेखक-पति अपने लेखन या कथन में कित्ता ही क्रांतिकारी क्यों न हो मगर पत्नी के आगे उसकी सारी क्रांतिकारिता धरी की धरी रह जाती है। जैसा कि मेरे साथ है।

पत्नी की यह शिकायत कुछ हद तक सही है कि मेरे लेखन में गंभीरता का भाव न के बराबर होता है। हालांकि कोशिश तो मैं कई दफा कर चुका हूं अपने लेखन को गंभीरनुमा बनाने की, लेकिन बात बन ही नहीं पाती। अच्छे खासे लेख का अंततः व्यंग्य ही बन जाता है। दूसरा, गंभीरता से मैं इसलिए भी बचकर रहता हूं कि कहीं यह मेरे लेखन के साथ-साथ मेरे दिमाग पर बोझ न बन जाए। खुदा-न-खास्ता गंभीरता की गिरफ्त में अगर मैं आ गया तो मेरा बहुत नुकसान होगा। लेकिन मैं अपना नुकसान करने नहीं देना चाहता।

गंभीर लेखन करने के लिए यहां इत्ते बड़े-बड़े सूरमा हैं। तमाम बुद्धिजीव हैं, प्रगतिशील हैं, चिंतक हैं। लेकिन मैं तो इनमें से कुछ भी नहीं हूं। न ही मैं उन जैसा होने की चाहत रखता हूं। खामखां, गंभीर चिंतन का बोझ अपने सिर पर लेकर दिमाग की बत्ती बंद नहीं करवाना चाहता।

गंभीरता भी एक तरह की बीमारी है प्यारे। मैंने कई-कई गंभीर किस्म के लोगों-लेखकों को देखा है। हर वक्त वे या तो माथे पर बल डाले रहते हैं या फिर कभी इसका, कभी उसका विरोध करते दिखते हैं। उन्हें किसी चीज में आनंद ही नजर नहीं आता।

न प्यारे न मैं ऐसा लेखक बनकर न रह सकता हूं न जी ही सकता। हंसना और मस्त रहना मेरी आदत में शुमार है। मैं चीजों और मुद्दों को व्यंग्य की निगाह से देखता हूं, गंभीरता की नहीं। हां, जहां गंभीर होना चाहिए वहां हो भी जाता हूं। परंतु अति-गंभीरता से मुझे जबरदस्त परहेज है प्यारे।

फिर भी अगर पत्नी को मैं 'बौड़म लेखक' नजर आता हूं, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं। गंभीर होने से बौड़म होना ज्यादा श्रेयस्कर है मेरे तईं। बौड़म होने में कम से कम बेमतलब का बौद्धिक या वैचारिक बोझ तो नहीं रहता दिमाग पर। बौड़म रहकर मैं चीजों को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ-जान लेता हूं।

यों भी, पति-पत्नी में एक को 'गंभीर' और एक को 'बौड़म' ही होना चाहिए। तो ऐसा समझ लीजिए कि मेरी पत्नी गंभीर है और मैं बौड़म। ठीक है न।

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