शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

'ईमानदारों के मसीहा' का इस्तीफा

चित्र साभारः गूगल
बीती रात से ही मेरे मोहल्ले के घोषित ईमानदार बेहद मायूस हैं। सबके चेहरे उतरे हुए हैं। कोई किसी से किसी तरह की बात या चर्चा नहीं कर रहा। नुक्कड़ पर बसी चाय की दुकान पर एक भी ईमानदार नजर नहीं आ रहा। वरना तो वहां ईमानदारों का हुजूम लगा रहता था। हर वक्त ईमानदार और ईमानदारी पर ही बातचीत व बहसें होती रहती थीं। लेकिन अब सब खामोश हैं।

मोहल्ले के घोषित ईमानदारों की खामोश को मैं समझ सकता हूं। इस वक्त उनके कने खामोश रहने के कोई और चारा भी तो नहीं! किसी सवाल का जवाब दें भी तो क्या? दरअसल, सवालों के जवाब तो ईमानदारों के मसीहा अरविंद केजरीवाल के पास भी नहीं होंगे। बेशक, उन्होंने दिल्ली की गद्दी त्याग दी लेकिन प्यारे सवाल तो बने ही हुए हैं। और, अब ताउम्र बने रहेंगे।

राजनीति के दंगल में केजरीवाल ने कदम तो इत्ती धमक के साथ रखा था कि अब वे एक-एक सूरमा को पटखनी देकर ही दम लेंगे। न खुद चैन से बैठेंगे न किसी नेता-मंत्री को चैन से बैठने देंगे। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इस-उस नेता को अंदर करवा देंगे। बस कुछ ही दिनों में न केवल दिल्ली बल्कि पूरे देश और व्यवस्था को भ्रष्टाचारमुक्त कर देंगे। कारपोरेट दलालों की जमकर क्लास लेंगे। पुलिस को अपने आधीन कर क्या से क्या बना देंगे। लेकिन हुआ क्या...? शेखचिल्लीनुमा लफ्फबाजियां नितांत लफ्फबाजी बनकर ही रह गईं। न भ्रष्टाचार का अंत हुआ। न कोई भ्रष्टाचारी अंदर हुआ। न कारपोरेट का बैंड बजा। हां, दिल्ली वालों के साथ-साथ अपना दिल बहलाने को थोड़ी-बहुत मेहरबानी बिजली-पानी पर कर दी। मगर उससे भी क्या...?

जनता तो बेचारी ठगी की ठगी ही रह गई न।

सुनिए केजरीवालजी, यह राजनीति है राजनीति। मंदिर का घंटा नहीं कि बजाया और भगवान प्रसन्न हो गए। यहां इस्तीफे की नौटंकी या ईमानदारी-सादगी की महानता से काम नहीं चलता। राजनीति में जब आए हैं, तो हर तरह की स्थिति-परिस्थिति से निपटना पड़ता है। यों, हार मानकर इस्तीफा देकर चलते बनना न सिर्फ दिल्ली की जनता के साथ धोखा है बल्कि लोकतंत्र का मजाक भी।

बुरा न मानना मियां, आप तो शुरू से ही खुद की प्रसिद्धि को भुनाने की राजनीति कर रहे हो। जनता की भावनाओं से खेलकर उनका केवल दिल जीतते रहे, बदले में उन्हें दिया कुछ नहीं। हर समय मीडिया में चेहरा चमकाते रहने या अपनी बेचारगी को प्रकट करते रहने से न देश का भला होने वाला है न जनता का। हां, आपको पब्लिसिटी जरूर मिल सकती है। और मिली भी है। उसकी का लाभ पाकर ही तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पाई थी। लेकिन अब जब खुद को साबित करने की बारी आई तो मियां यों गायब हो लिए जैसे गंजे के सिर से बाल। न न केजरीवालजी ऐसे न चलेगा। यों, हर वक्त की मजाक ठीक नहीं।

नहीं जानता कि इस्तीफा देने के बाद आप कित्ता मायूस महसूस कर होंगे किंतु मेरे मोहल्ले के घोषित ईमानदार बेहद मायूस हैं। अगर संभव हो तो एक दफा मेरे मोहल्ले के घोषित ईमानदारों के तईं 'हौसला रखिए' जैसा संदेश एसएमएस या ट्वीट अवश्य कर दीजिएगा। आप तो वैसे भी तकनीक-संपन्न राजनीति के ही पक्षधर हैं।

अंत में, बस इत्ता और बतला दीजिए कि इस्तीफे के बाबत क्या पहले आपने जनता की राय जानी थी?

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