शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

मेरे देश के सांसद

चित्र साभारः गूगल
आपको न हो मगर मुझे है। जी हां, मुझे मेरे देश के सांसदों पर बहुत गर्व है! गर्व के मारे मेरा सीना हर वक्त छप्पन इंची से भी ज्यादा चौड़ा रहता है। किसी देश का कोई सांसद मेरे देश के सांसदों के चाल-चलन और उन्मुक्त व्यवहार का मुकाबला सपने में भी नहीं कर सकता। मेरे देश के सांसदों में अंदर-बाहर वो-वो अद्भूत खूबियां हैं, जिनका साधारण मनुष्य में मिलना असंभव है। जित्ती बहादुरी के साथ सड़क से लेकर संसद तक की राजनीति मेरे देश के सांसद कर सकते हैं, कोई दूसरा नहीं कर सकता। मेरा दावा है।

कौन सिरफिरा कहता है कि मेरे देश के सांसद संसद के भीतर बोलते या बहस नहीं करते। अमां, आपस में इत्ती विकट बहस करते हैं कि सामने वाला डर के मारे पतलून गिली कर जाए। बहस करते-करते कभी-कभार लात-घूंसे तक चला लेते हैं। तोड़ा-फोड़ी भी मचा देते हैं। एक दफा तो संसद के बाहर रखे गमले तक जमीन पर दे मारे थे। क्या करें उनके भीतर गुस्सा इत्ता भरा रहता है कि कंट्रोल ही नहीं होता। और फिर बिना गुस्से, बिना लात-जूते आज के टाइम में राजनीति संभव है क्या भला? हर समय तो कोई न कोई नेता-सांसद एक-दूसरे की काट में लगा रहता है। खिंचाई करता रहता है। ऐसे में तुम ही बताओ प्यारे कि गुस्सा आएगा कि नहीं।

और हां बतला दूं, ये सब ऊंट-पटांग हरकतें वे अपने लिए नहीं, जनता के हित और मुद्दों के वास्ते किया करते हैं। देश की जनता से मेरे देश के नेताओं-मंत्रियों-संत्रियों-सांसदों-विधायकों-सभासदों को बेइंतहा प्यारे है। प्रमाण देने की जरूरत नहीं।

अभी हाल जो ड्रामा संसद के भीतर हुआ, वो कोई नया थोड़े है। संसद में सांसदों के ऐसे करतब प्रायः होते रहते हैं। क्या हुआ जो एक सांसद महोदय ने मिर्ची का छिड़काव कर दिया और दूसरे ने चक्कू निकाल लिया। अगला जब गुस्सा दिलाएगा तो क्या सामने वाला चुप्पी लगाए बैठा रहेगा? लगें हैं, राजनीति के पंडित और बुद्धिजीवि बेचारे सांसदों को गलियाने में। टीवी चैनलों पर आ-आकर बहस कर रहे हैं। आदर्शवाद के उदाहरण पर उदाहरण दिए चले जा रहे हैं।

ठीक है, चलो माना, कि बेचारे सांसदों से गलती हो गई अब इस पर इत्ता हंगामा किसलिए प्यारे। यहां मिर्ची छिड़कने पर इत्ता बवाल और खाने में हर वक्त मिर्ची का ख्याल। यहां चक्कू के निकालने पर हंगामा हो गया और फिल्मों में खुलेआम तमंचे पर डिस्को हो रहा है। यह तो सरासर दोगलापन है प्यारे।

मानाकि संसद की गरिमा को 'गहरी क्षति' पहुंची है, किंतु क्या करें, इत्ता समझाने पर भी सांसदों को अक्ल नहीं आती। वैसे संसद ने तो जाने कब का सांसदों पर माफ भी कर दिया होगा। वो भी कब तलक मुंह फुलाए बैठी रह सकती है। उसे भी मालूम है कि मेरी संसद के सांसद न कभी सुधरे हैं न कभी सुधरेंगे। तो फिर खामखां दिमाग पर शर्मसारी का बोझ डाले रहना। जो हो गया, उसे भूल जाने में ही भलाई है। क्या नहीं...?

साथ-साथ, मेरी अपील देश के समस्त बुद्धिजीवियों एवं वरिष्ठ नेता लोगों से भी है कि उक्त सांसदों को माफ किया जाए। गुस्से-गुस्से के खेल में मिर्ची-चक्कू निकल आए, कोई बात नहीं। आगे से नहीं निकलेंगे फिलहाल इसकी गारंटी मैं तो नहीं ले सकता। यों भी, लोकतंत्र में गारंटी की क्या हैसियत! गारंटी तो आप वालों ने भी दी थी इस-उस को अंदर करने की लेकिन अभी तलक तो सब के सब बाहर ही हैं।

अच्छा...अच्छा... इत्ता माने लेते हैं कि यह दिन देश के संसदीय इतिहास का सबसे काला दिन था। अब तो खुश न!

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