सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

शुक्र है, भैंसें मिल गईं

चित्र साभार- गूगल
अखबार के पहले पन्ने पर छपी खबर देखकर पता चला कि मंत्रीजी की लापता भैंसों का पता चल गया है। भैंसें सा-सुरक्षित मिल गई हैं। बधाई। मंत्रीजी के साथ-साथ तबेले की अन्य भैंसों ने भी राहत की सांस ली। मंत्रीजी ने राहत की सांस इसलिए ली कि भैंसे 'आप' में शामिल होने से बच गईं। और तबेले की अन्य भैंसों ने इसलिए कि उनके बिछड़े साथी घर लौट आए।

सुना है, भैंसें मिलने की खुशी में मंत्रीजी के घर लड्डू बांटे-बंटवाए गए और तबेले को झालरों से सजाया-संवारा गया। कुछ-कुछ नाच-गाना होने की खबरें भी आई हैं, ताकि भैंसों को संगीतमय दिमागी सुकून मिल सके। अच्छा है। भैंसे जित्ता खुश रहेंगी, उत्ता ही दूध देंगी।

चूंकि भैंसें समाजवादी थीं इसलिए पुलिस-प्रशासन का चिंतित होना लाजिमी था। और, उन्हें किसी भी कीमत पर खोजकर लाना बेहद जरूरी। इत्ते पर भी बेचारे तीन पुलिसवालों को लाइन हाजिर होना पड़ा। पर कोई नहीं। इससे पता चलता है कि भैंस के लापता होने में हुई लापरवाई की सजा ऐसे ही मिलती है।

अरे भई, एक रसूखदार मंत्रीजी की भैंसों का लापता होना कोई मामूली बात थोड़े थी! और वो भी इत्ते गुस्सैल मंत्रीजी की। जिनके गुस्से से न केवल सरकारी महकमा बल्कि तबेले की भैंसे तक थर-थर कांपती हैं। गुस्से में भरकर मंत्रीजी एक दफा आंख दिखा दें, तो पतलून गिली हो जाए। मैंने तो यह तक सुना है कि भैंसे मंत्रीजी के गुस्से के खौफ पर ही, बिना टांग मारे या उचकाए, आराम से दूध दे देती हैं।

एक मेरी बकरी है, जो बिना नाक रगड़वाए, बिना व्यंग्य सुने, दूध तो क्या मेरे कने नहीं आती। ज्यादा कुछ कह दूं तो तुरंत 'आप' में शामिल होने की धमकी देती है। क्या करूं, मेरी मजबूरी है कि मैं न बीवी से ऊंचा बोल सकता हूं न बकरी से। आजकल दोनों का ही मन केजरीवालजी के मफलर और सादगी में बसता है।

खैर, अच्छा हुआ जो भैंसें मिल गईं। नहीं तो समाजवाद कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रह जाता। सारे वादों में ले देके एक समाजवाद ही है, जिसमें समाज का प्रत्येक वर्ग सुरक्षित (!) महसूस करता है। समाजवाद न केवल जनता बल्कि भैंसों को भी समाज का एक अहम हिस्सा मानता है। अगर न मानता तो इत्ती जल्दी भैंसों का क्या पता चलता?

देखिए न, सारा का सारा पुलिसिया महकमा लग लगया भैंसों की खोजा-खाजी में। और समय रहते मिल भी गईं। खुदा-न-खास्ता, कहीं 'आप' वाले बहका कर ले जाते तो? ससुरी ईमानदार होने के साथ-साथ ऐंठवान और हो जातीं। 'आप' में क्या कम ऐंठूंओं की कमी है!

चलिए, लापता चीज का मिल जाना किसी नेमत से कम नहीं होता। सोच रहा हूं, बरसों पहले मेरे शहर के बाजार में जो झुमका गिरा था, उसको ढूंढवाने की बात मंत्रीजी के समक्ष रखूं, शायद कुछ बात बन जाए। क्या नहीं...?

2 टिप्‍पणियां:

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

वाह:-)
मस्त है।

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

बकरी व्‍यंग्‍य सुनाय :-)