मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

56 इंच का सीना

चित्र साभारः गूगल
मेरे मोहल्ले में केवल 56 इंच का सीना रखने वालों का ही दबदबा है! 56 इंच से कम सीने वालों को कोई पूछता तक नहीं। राजनीति से लेकर साहित्य तक में 56 इंच के सीने वाले ही हैं। चूंकि मेरा सीना 56 तो छोड़िए 36 का भी नहीं है, इसलिए मैं हमेशा हाशिए पर रहता हूं। 56 इंच के सीने वाले मेरे आगे से छाती चौड़ी करके ऐसे निकल जाते हैं, जैसे गधे के आगे से हाथी। जी हां, मोहल्ले में मेरी गिनती चुने हुए गधों में होती है। मैं मेरे गधा होने का बुरा नहीं मानता लेकिन इस उम्मीद पर जरूर जीता हूं कि एक दिन गधे के दिन भी फिरेंगे।

56 इंच का सीना रखने वालों की एक खासियत होती है कि वे फेंकते बहुत ऊंची-ऊंची हैं। कभी-कभी तो इत्ती ऊंची फेंक देते हैं कि इतिहास-भूगोल तक शर्मा जाते हैं। फेंकने के चक्कर में वे यह तक भूल जाते हैं कि पटना कहां है और तक्ष्शीला कहां? हर बात में 'मैं ही मैं' का जिक्र करते-करते अक्सर उनका अहम चेहरे पर आ जाता है।

अब चूंकि वे 56 इंच का सीना रखते हैं इसलिए उन्हें रोका-टोका भी नहीं जा सकता। आराम से कानों में तेल डालकर बस सुना जा सकता है। यही मैं करता हूं। मैं मेरे मोहल्ले के 56 इंच का सीना-प्रधान वीरों को बस सुनता हूं; न उनसे बहस करता हूं, न उन्हें टोकता। खामखां, कहीं बुरा मान गए तो मुझे तो 'मसल' ही डालेंगे। हल्का-सा ढेंचू करके चुप हो जाता हूं।

कहा यही जाता है कि जिनका सीना 56 इंच का होता है, विकास की बात वही कर सकता है। लेकिन मेरे मोहल्ले का हिसाब-किताब कुछ अलहदा है। बेशक मोहल्ले में अधिकतर लोगों का सीना 56 इंच का है। पर विकास के नाम पर सीना हमेशा सिकुड़ा-सिकुड़ा सा रहता है। दरअसल, वे अपने घर की साफ-सफाई व विकास को ही 56 इंच के सीने की संज्ञा देते हैं। उनके घर-आंगन का विकास हो गया, समझो पूरे मोहल्ले का विकास हो गया। अक्सर यही पता नहीं चल पाता कि मोहल्ले की सड़क नालियों के भीतर हैं या नालियां सड़क के भीतर। गड्डो की तो पूछिए ही मत। कई बार तो मैं ही उनमें गिर चुका हूं।

मैं चाहे नाली में गिरूं या गड्डों में, गधा होने के नाते, मुझ पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। लेकिन फर्क उन्हें भी कहां पड़ता है, तो जगह-जगह 56 इंच का सीना लिए फिरते हैं। केवल अपने ही घर के विकास का महिमामंडन पूरे देश में जा-जाकर करना कौन-सी '56 इंची' है प्यारे! मुझे ही देख लो न, मैं अपने गधेपन का रोना कहीं जाकर रोता हूं? गधा हूं, तो हूं। गधे का काम ही ढेंचू-ढेंचू करना है। यह मैं ऐसे ही करता रहूंगा।

बहरहाल, देख रहा हूं, राजनीति में 56 इंच के सीने वालों की डिमांड निरंतर बढ़ती जा रही है। कल तलक जीना सीना 30 से कम हुआ करता था, वे भी अपना सीना चौड़ा करके चलने लगे हैं। धरना-प्रदर्शन कर सीने की चौड़ाई को बढ़ाने में लगे हैं। समझौते किए चले जा रहे हैं फिर भी दावा यही कर रहे हैं कि ईमानदार केवल हम ही हैं बाकी सब...।

लेकिन मुझे क्या, मैं तो गधा बनकर हर तमाशे को चुपचाप देख-सुन रहा हूं। ढेंचू

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

बहुत खूब लिखा है...गधे की आत्मकथा कहें या व्यथा !! दोनों ही सही हैं ।

बेनामी ने कहा…

बहुत खूब लिखा है...गधे की आत्मकथा कहें या व्यथा !! दोनों ही सही हैं ।