गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

क्योंकि गुंडे सर्वश्रेष्ठ हैं

चित्र साभारः गूगल
मेरी बचपन से तमन्ना थी कि मैं बड़ा होकर गुंडा बनूं! गुंडों जैसा जीवन जियूं! गुंडई के कार्यकलापों में व्यस्त रहूं! गुंडई के दम पर न केवल समाज बल्कि राजनीति और साहित्य के बीच भी अहम जगह बनाए रखूं। न कोई नेता मुझसे ऊंचे आवाज में बात करने की हिम्मत कर पाए। और न ही कोई संपादक मेरे लेख को न छापने का साहस दिखा पाए। गुंडई करूं तो ऐसी कि दुनिया देखे। और मेरे नाम के सोते-जागते, खाते-पीते, टलते-घुमते चर्चे करे।

न जाने क्यों गुंडे और गुंडई शब्द से मुझे शुरू से प्यार रहा है। गुंडे शब्द में वो ताकत है, जो दबंग में नहीं। दबंग दबंगई तो दिखा सकता है लेकिन गुंडई के मानकों पर खरा नहीं उतर सकता। गुंडई में एक अलग तरह की वीरता झलकती है। जिस अंदाज में गुंडा किसी को हड़का सकता है, दबंग नहीं। मार-कुटाई में दबंग से ज्यादा तेज गुंडा होता है। गुंडा सुपारी की कीमत जान पर खेलकर चुकाना जानता है, जबकि दबंग सिर्फ सुपारी को खाना।

मेरा स्पष्ट मानना है कि समाज-राजनीति-व्यवस्था को सुधारने के लिए गुंडे से बेहतर कोई दूसरा विकल्प हो ही नहीं सकता। ईमानदार तो कतई नहीं। ईमानदार राजनीति के बीच अपनी गोटी तो फिट करना जानता है, लेकिन चलाना नहीं। ईमानदार बेहद शातिर होता है। जनता के बीच लल्लू बने रहकर केवल अपना उल्लू सीधा करता रहता है। जबकि गुंडे के साथ ऐसा नहीं है। गुंडे से क्या ईमानदार, क्या दबंग, क्या नैतिकतावादी हर कोई डरता है।

लेकिन ईमानदारों की तरह गुंडा तानाशाह कतई नहीं होता। गुंडा अपने हक के लिए नहीं, जनता के हक के लिए लड़ता है। गुंडा ईमानदारों की तरह सिर्फ गुर्रा कर नहीं रह जाता, काम पैतीस करके ही दम लेता है।

दिल से कह रहा हूं, मैं तो फिल्म गुंडे देखकर अत्यंत प्रभावित हूं। गुंडे के आगे तो दबंग भी पीछे छूटती दिखती है मुझे। हीरो ही जब गुंडे के किरदार को निभाने लगे, तो फिर कहना ही क्या प्यारे। मतलब, अब बेहद कठिन है हीरो और गुंडे के बीच फर्क महसूस करना। फिल्म का हीरो अगर चरित्र से गुंडा है तो सर्वश्रेष्ठ है। न केवल फिल्म बल्कि बदलते समाज और परिवेश की जान है। देखिए न, गुंडा कित्ता खुलकर फिल्म की सेक्सी हीरोइन के साथ नाच भी सकता है और रोमांस भी कर सकता है। पर्दे पर गुंडे का हीरोइन के साथ रोमांस अब नैतिकता के दायरों में आता है। पुराने जमाने के फिल्मों की तरह नहीं, जिसमें गुंडे को हक ही नहीं था, हीरोइन के पास फटकने का भी। बेचारा शुरू से लेकर आखिर तक हीरो से पिटता ही रहता था। लेकिन अब हीरो ही गुंडा है। और उसकी लड़ाई अपने किरदार से खुद की है।

यही वजह है कि हमारे मध्य दबंग और गुंडे जैसी फिल्में हिट हो रही हैं। हिट हो भी क्यों न, क्योंकि जमाना बदल रहा है डूड। बदलते जमाने के बीच गुंडे और दबंग जैसे करेक्टर ही स्वीकृत और सर्वश्रेष्ठ हैं।

गुंडे में गुंडई को देखने के बाद मुझे खुद पर बेहद गुस्सा रहा है कि हाय! मैं क्यों नहीं गुंडा हुआ? गुंडा हो जाता तो कम से कम समाज और दुनिया के बीच ऊंचा नाम तो पा जाता है। आजकल तो बस नाम की धूम है। नाम कैसे और कहां से हो रहा है, इस पर अब कोई दिमाग खोटी करना नहीं चाहता।

हालांकि देर तो काफी हो चुकी है फिर भी कोशिश में हूं कि बहुत बड़ा तो नहीं कम से कम अपने मोहल्ले का ही गुंडा बनकर नाम पैदा कर सकूं। लेखक बनकर तो देख लिया।

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

तेंदुए पर वीर रस प्रधान कविता

मेरे प्यारे तेंदुए,

मैं दाउद इब्राहिम पर व्यंग्य लिख सकता हूं, मल्लिका शेरावत को कपड़े पहनने की सलाह दे सकता हूं मगर तुम पर न व्यंग्य लिख सकता हूं, न तुम्हें कोई सलाह दे सकता हूं। तुम पर व्यंग्य लिखकर या तुम्हें सलाह देकर मुझे मरना थोड़े ही है! हां, तुम पर वीर रस प्रधान कविता अवश्य लिख सकता हूं। हालांकि मैंने वीर रस तो क्या जीवन में कभी कविता ही नहीं लिखी मगर तुम पर लिख सकता हूं। चाहे किसी वीर रस के कवि की कविता को चुराना ही क्यों न पड़े। तुम्हारे सम्मान की खातिर मैं यह रिक्स भी लेने को तैयार हूं।

तुम व्यंग्य या सलाह के लिए बने भी नहीं हो। तुम तो सिर्फ  और सिर्फ  वीर-रस प्रधान कविता के लिए बने हो। मैं तुम्हें संसार का सबसे ज्यादा ताकतवर और वीर जानवर मानता हूं। तुम्हारी बहादुरी के समक्ष हर वक्त नतमस्तक रहता हूं। जो बात तुम्हारी वीरता या दहाड़ में है, वो बबर शेर में भी नहीं। (यह बात बबर शेर से कह मत देना, खामखां महाराज कहीं मेरा काम तमाम कर दें...)

तुम मात्र तेंदुए नहीं हो। तुम दहशत के साए हो। तुम्हारी दहशत के आगे अच्छे-अच्छे तोपचंद पानी भरते हैं। जो व्यंग्यकार खुद को बहुत ऊंचे किस्म का व्यंग्यकार मानते-मनवाते, समझते-समझाते हैं, वे भी तुम पर व्यंग्य लिखने में कतराते हैं। अभी हाल मैंने एक ऊं चे किस्म के व्यंग्यकार को तुम पर व्यंग्य लिखने के लिए कहा तो मियां कन्नी काट गए। तुम पर व्यंग्य लिखना तो दूर की बात रही, बात करने में ही हकलाने लगे। क्या करें, तुम्हारा खौफ है ही इत्ता भयानक कि कौन मूरख चाहेगा ऐंवई अपनी कब्र खुद खोदना।

तुम पर वीर-रस प्रधान कविता लिखने के लिए ज्यादा मेहनत की दरकार नहीं। कलम और शब्द खुद-ब-खुद तुम्हारी वीरता के आगे वीर हो जाते हैं। मजाल है जो शब्दों के बीच कहीं हास्य-व्यंग्य का पुट भी आ जाए। अमां, शब्द तक तुमसे खौफ खाते हैं।

इसीलिए तो मैंने तुम पर व्यंग्य न लिखकर वीर-रस प्रधान कविता लिखने का तय किया। ताकि जब तुम पढ़ो तो मुझे शबाशी दो। मेरी कलम, मेरे हाथ, मेरा माथा स्नेह के साथ चूमो।

प्यारे तेंदुए, शायद तुम नहीं जानते कि मैं तुमसे कित्ता प्यार करता हूं। न न मेरे प्यारे को हवाबाजी मत समझना। यह बात मैं अपने दिल की गहराईयों के बीच से कह रहा हूं। तुमसे प्यार करने का कारण है। पिछली दफा जब तुम बरेली आए थे, तो तुमने एक मुझे छोडक़र कईयों का काम तमाम किया था। कई दिनों तलक लोगों के दिलों में तुम्हारे नाम और दहाड़ की धमक बसी रही थी। वो तो तुम्हारी मेहरबानी रही कि उस दिन बीच राह में आमना-सामना होने के बाद भी तुमने मुझे बिन खाए जाने दिया। शायद तुमने यह सोचा हो कि एक लेखक को खाकर मैं क्या करूं गा? लेखक के अंदर मांस तो मिलने से रहा, मिलेंगे या तो शब्द या फिर विचार। शब्द और विचार तुम्हारे किस काम के। उस दिन के बाद से कई दिनों तलक मेरे दिल-दिमाग में तुम्हारा खौफ कायम रहा। लेकिन फिर धीरे-धीरे उतर भी गया।

बस उसी दिन से मैंने तय कर लिया कि मुझे तुम पर वीर रस प्रधान कविता लिखनी ही लिखनी है। और तुम्हें जरूर सुनानी है। बर्शेते सुनकर तुम मुझे पर दहाड़ो नहीं।

सुना है, अभी तुम मेरठ में हो। जब मेरठ से चलने को हो, मुझे बता देना, मैं खुद तुम्हारे पास आ जाऊं गा। मैं नहीं चाहता कि अपनी कविता सुनाने के लिए मैं तुम्हें दोबारा बरेली बुलाऊं । तुम बरेली वालों से दूर रहो तो ही अच्छा।

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

तमंचे पे डिस्को

चित्र साभारः गूगल
हालांकि कभी किया नहीं लेकिन करने की तमन्ना रखता हूं। जी हां, मैं तमंचे पे डिस्को करना चाहता हूं! तमंचे पे डिस्को की थिरकन को अंदर तलक फील करना चाहता हूं। बतौर लेखक तमंचे पे डिस्को करके लेखकिए बिरादरी का मान बढ़ाना चाहता हूं। अपने यथास्थितिवाद से बाहर निकल, रंगीनियत में बहक जाना चाहता हूं। लेकिन इत्ता भी नहीं, जित्ता एक संपादक महोदय बहक गए। लुत्फ देखिए, बहके संपादक महोदय परंतु डिस्को मीडिया और सियाने कर रहे हैं।

वैसे तमंचे पे डिस्को करने में कोई हर्ज नहीं। यहां हर कोई, हर तरह से किसी न किसी के तमंचे पे डिस्को कर ही रहा है। कोई ज्यादा कर रहा है, कोई कम। लेकिन कर अवश्य रहा है। दरअसल, वक्त ही कुछ ऐसा आ गया है कि बिना तमंचे पे डिस्को करे या कथित ईमानदारी का चोला ओढ़े, काम चल ही नहीं सकता। या तो तमंचे पे डिस्को कीजिए या फिर किसी को करवाइए, तब ही सामाजिक-राजनीतिक-साहित्यिक गाड़ी चल सकती है। वरना तो इधर अंधेरा और उधर खाई है प्यारे।

वक्त के साथ ढलने या समझौता करने में मैं माहिर हूं। जिस तरह की हवा चलती है, मैं उसी के संग-साथ बह लेता हूं। आजकल हवा तमंचे पे डिस्को, गंदी बात, शुद्धि देसी रोमांस, साड़ी के फॉल, रज्जो, रामलीला की बह रही है, तो मैं भी इन्हीं में बह रहा हूं। हवा के विपरित बहकर मुझे हाशिए पर थोड़े लुढ़ना है। दुनिया को अगर तमंचे पे डिस्को करने में आनंद आ रहा है, तो मुझे भी आ रहा है। जीवन में आनंद का बना रहना जरूर है, चाहे जैसे।

एक शोले की बसंती थी, जो मजबूरी में तमंचे की नोक पर नाची थी। एक नवाब साहब हैं, जो शौक से तमंचे पे डिस्को कर रहे हैं। आखिर बुलेट राजा का कुछ तो जमा-हासिल नवाब साहब को मिलना चाहिए कि नहीं। फिर चाहे तमंचा ही क्यों न हो।

अब देखिए न, 'आप' वाले झाड़ू की सींक पे दिल्ली को हिलाने-नचाने की बात कर रहे हैं। बिजली से लेकर मेट्रो तक को सस्ता करने का दावा ठोंक रहे हैं। ईमानदारी की टोपी पहन खुल्ला नेताओं को गरिया रहे हैं। स्टिंग पर आग-बबूला होकर आप ही अपनों को क्लीनचिट दे रहे हैं। ऊपर से, बात इत्ती ऐंठ में रहकर करते हैं कि जाने कहां के तोपची हों। ऐसे तोपचियों को नचाना जनता को खूब आता है प्यारे।

इसीलिए तो मैं बिना तोपची हुए केवल तमंचे पे डिस्को करना चाहता हूं। क्या पता 'अब' तमंचे पे किया डिस्को, 'कब' काम आ जाए। दुनिया जुगाड़ पर चल रही है, तो फिर मैं क्यों न तमंचे पे नाचूं। सुना है, तमंचे पे नाचने वाले को किसी से डर नहीं लगता। डर के आगे जीत है।

मेरा प्रयास रहेगा कि मैं साहित्यिक तमंचे पे नहीं राजनीतिक तमंचे पे डिस्को करूं। राजनीतिक तमंचे पे डिस्को करने का अपना ही सुख है। एक दफा नेता या मंत्री बन लिए, तो बारे-नियारे। न क‌रियर का झंझट न पैसे की चिंता। पांच साल में केवल एक दफा जनता के बीच जाना होगा, बाकी के दिन मौजां ही मौजां। जो लेखन में नहीं धरा, वो सब राजनीति में धरा है। तब ही तो आजकल के नेता लोग अपने-अपने राजनीतिक सुख का लुत्फ बिंदास उठा रहे हैं। हालांकि घोटालों के बीच उनकी गर्दन फंसी जरूर है, तो क्या, राजनीति में तो बने ही हुए हैं न। काफी है।

बहरहाल, तमंचे ने गाने में जगह पाकर मुझे नई तरह की ऊर्जा दी है। जब भी मेरे कानों में तमंचे पे डिस्को के स्वर पड़ते हैं, मैं स्वतः ही थिरकने लगता हूं। थिरकने में मुझे मजा आता है। दिमाग की सारी बत्तियां खुली हुई-सी जान पड़ती हैं। आपको विश्वास दिलाता हूं कि ये बत्तियां यों ही खुली रहेंगी और मैं यों ही तमंचे पे डिस्को करता रहूंगा।

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

मफलर और ईमानदारी

चित्र साभारः गूगल
सुनो प्यारे, मैं एक मफलर खरीदकर लाया हूं। अब से हर जगह इसे ही पहना करूंगा। यह मुझे ठंड से भी बचाएगा और फैशन का हिस्सा भी बना रहने देगा। पर बताने वाले बताते हैं कि यह कोई मामूली मफलर नहीं है। आजकल यह मफलर हर कहीं, हर किसी पर छाया हुआ है। इस मफलर को पहनने से ईमानदारी, सादगी व कर्तव्यनिष्ठा अपने आप आ जाते हैं। इस मफलर में इत्ती ताकत है कि बेईमान और भ्रष्टाचारी इसकी परछाई तक से डरते हैं! सिर्फ डरते हैं, ईमानदार बनने की कोशिश नहीं करते। कहते हैं, 'ईमानदार बन गए तो आजू-बाजू की कमाई का क्या होगा? सूखी तनखाह में गुजारा किसका चलता है यहां?'

देखा-देखी मफलर को पहनना शुरू मैंने भी कर दिया है, पर उम्मीद कम ही लगती है कि मैं ईमानदार, सादगीपसंद या कर्तव्यनिष्ठ हो-बन पाऊं। मैं मफलर को बतौर 'फैशन' पहन रहा हूं, बतौर 'नेक-नीयत' नहीं। मैंने तो टोपी भी फैशन समझकर ही पहनी थी। लेकिन टोपी से अब 'मोहभंग' हो चुका है मेरा।

यकीन तो मुझे भी नहीं होता कि मात्र मफलर पहन लेने भर से ईमानदारी या सादगी आ जाएगी। फिर भी, लोग हिरस में पहन रहे हैं। गांधी टोपी पहन लेने भर से जब आज तलक रामराज्य नहीं आ पाया, तो मफलर पहन लेने से ईमानदारी आ जाएगी? क्या बात करते हो प्यारे।

राजनीति में रहकर कुछ नेताओं को शौक होता है 'प्रतीकात्मक' चीजों को ओढ़े रहने का। कोई टोपी रिवाज में रखता है। कोई मफलर तो कोई शॉल। लेकिन प्रतीकात्मक चीजों से न राजनीति चलती है न देश। न जनता के जन-सरोकारों के साथ न्याय हो पाता है।

बेशक सादगी नेता के जीवन का हिस्सा हो सकती है किंतु राजनीति या देश की नैया पार लगाने को यही काफी नहीं प्यारे। दिल्ली में सादगी और ईमानदारी का जिस तरह से ढोल बजाया गया, धीरे-धीरे कर सारी पोलें अब खुलने लगी हैं। आम आदमी को टोपी पहनाकर, खुद मफलर पहन लिया है सीएम साहब ने। फिर भी दावा यह कि हमसे बड़ा ईमानदार ढूंढकर तो बता दें। ईमानदारी पर अभिमान। बात जांची न प्यारे।

मफलर-टोपी के साथ राजनीतिक नूरा-कुश्ती ही चल रही है। जनता अब भी वहीं है, जहां कल थी। कल तलक जनता ने भ्रष्ट-तंत्र की तानाशाही को झेला, अब ईमानदारों की तानाशाही को झेल रही है। फिर इनमें या उनमें फर्क ही कहां रह गया?

चिंता न करें, मैं मफलर और टोपी की इस ईमानदार ( ! ) राजनीति से बचकर ही रहूंगा। यह मेरे किसी काम की नहीं। मेरा शौक तो इस-उस की राजनीति को देखने का है, खुद नेता या राजनीति में जाने का नहीं। जो राजनीति का हिस्सा बने हैं, बने रहें। मेरी बला से। मेरे गुजारा तो व्यंग्य लिखकर चल ही रहा है। व्यंग्य ही लिखते रहने का विचार है। किसी अन्य विचार के साथ जाने की तमन्ना नहीं।

मफलर पहना जरूर है पर ठंड से बचने और फैशन का हिस्सा बनने के लिए। उस लिए नहीं जिसके बारे में तुम सोच रहे हो प्यारे।

शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

मंत्रीजी के नाम खत

आदरणीय मंत्रीजी,

जिंदगी में अब तलक किसी नेता या मंत्री को मैंने कभी खत नहीं लिखा। लेकिन आपको लिख रहा हूं। एक आप ही हैं, जो मेरी पीड़ा, मेरी भावना को समझ सकते हैं।

पहले तो आपको बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं कि आपकी लापता भैंसें सुरक्षित वापस मिल गईं। वरना एक दफा चोरी हुआ जानवर मिलता कहां है। गए साल मेरी दो बकरियां चोरी हो गईं थी, आज तलक न मिल पाई हैं। पीएम से लेकर सीएम तक गुहार लगवा ली मगर हासिल कुछ न हुआ। मन मसोसकर रह गया।

चलिए खैर जो हुआ सो हुआ। होनी को भला कौन टाल सका है।

दरअसल, मंत्रीजी बात यह है कि दो रोज पहले मेरी इकलौती पतलून कहीं गुम हो गई। हर जगह, हर कोना, हर छत, हर गली, हर कूचा ढूंढवाकर देख लिया किंतु कुछ पता न चला। पतलून गुमशुदगी की रपट भी थाने में दर्ज करवा दी। मगर थानेदार महोदय कुछ खास ध्यान नहीं दे रहे। जब भी जाता हूं, तो टला देते हैं, यह कहते हुए कि पतलून ही तो गुम हुई है, बीवी थोड़े। अब उनको मैं यह कैसे समझाऊं कि यह मात्र पतलून नहीं, मेरी इज्जत है। शादी की प्रथम वर्षगांठ पर बीवी ने गिफ्ट की थी। और यह कहा था कि अब जब भी कहीं किसी समारोह या सम्मेलन में जाना इसे ही पहनकर जाना। उसे उसी तरह सहेज-संभालकर रखना जैसी अपनी इज्जत को रखते हो। खबरदार, कहीं गुम की तो...।

लेकिन मेरी पीड़ा को न थानेदार महोदय समझ रहे हैं न पड़ोसी। और बीवी ने तो साफ कह दिया है कि दो दिन में अगर पतलून खोजकर नहीं लाए तो तलाक दे दूंगी। अजीब-सी उलझन में हूं। क्या करूं, क्या न करूं, कुछ समझ नहीं आता। बिन पतलून मुझे मेरी जिंदगी अंधकार में नजर आती है। यों भी, इंसान की इज्जत केवल दो वजह से ही सुरक्षित रहती है; एक टोपी, दूसरी पतलून। अफसोस, मेरी कने अब दोनों में से कुछ नहीं है। टोपी भीड़ में कहीं खो गई और पतलून... न जाने कौन दबाए बैठा है। कहीं इसके पीछे विदेशी हाथ तो नहीं!

मंत्रीजी, अब मेरी इज्जत आपके हाथ है। आपसे विनम्र विनती है कि मेरी खोई पतलून को खोजवाने का आदेश पुलिस विभाग को दें। चाहें तो खुफिया या क्राइम विभाग को भी इस काम में लगा सकते हैं। मुझे पूरी उम्मीद है कि आप मेरी पीड़ा, मेरी भावना को अच्छे से समझ पाएंगे क्योंकि एक भुगतभोगी दूसरे भुगतभोगी को बेहतर समझ सकता है।

और हां पहचान के लिए बताए देता हूं कि मेरी पतलून लाल कलर (कृपया, लाल कलर से भ्रमित न होइएगा) की है। ज्यादा धुलने-सुखने के कारण लाला कलर फीका-सा पड़ने लगा है। पतलून में छह जेबें हैं; दो आगे, दो पीछे, दो घुटने से ऊपर। पतलून बे-क्रीज है। नीचे से उसको फोल्ड करके पहनता हूं। कुछ लंबी ज्यादा है।

मेरी पतलून को खोजवाना आपके तईं कोई बहुत बड़ा काम नहीं है। आप एक दफा आदेश दे दीजिए फिर देखिए पुलिसिया विभाग कित्ती मुस्तैदी से काम करता है। आपके गुस्से के आगे आज तलक भला कोई ठहरा है। मैं तो कहता हूं, यह भैंसों का सौभाग्य है कि वे आपकी सरपरस्ती में सुरक्षित व मौज से रह रही हैं।

मेरी दिली तमन्ना है कि एक दफा जाकर देख आऊं आपके तबले और भैंसों को। ज्ञानी बताते हैं कि मंत्रीजी की भैंसों को देखकर सबाब मिलता है। मैं यह सबाब लेना चाहता हूं मंत्रीजी।

लेकिन उससे पहले मेरी गुहार पर एक्शन लेकर मुझे मेरी इज्जत लौटवा दीजिए मंत्रीजी। घर-बाहर मेरी इज्जत बस इसी पर टिकी है।

आशा है कि आप निराश न करेंगे। निश्चिंत रहिए, पतलून खोजवाने में जो खरचा आएगा सब दे दूंगा। पर तलाक से पहले-पहले मुझको बचा लीजिए। कहीं ऐसा न हो पतलून भी जाए और बीवी भी।

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

फेसबुक की गोद में व्हाट्स एप

यार जुकरबर्ग, कभी-कभी तुम्हारे अद्भूत कारनामों को देख-सुनकर मेरे दिल के अंदर जलन-सी होती है। न न इस जलन को कुढ़ने-चिढ़ने वाली जलन मत समझना। यह जलन तो तुम्हारे बरक्स न आ पाने की खुद से है। यों, तुम्हारी मेरी उम्र में कोई खास अंतर नहीं लेकिन जो कामयाबियां तुमने हासिल की हैं, उन तलक पहुंचना वाकई हर किसी के बस की बात नहीं। हां हां सौ फीसद ठीक बोल रहा हूं प्यारे। विरले ही होते हैं, जो मार्क जुकरबर्ग या बिल गेट्स बन पाते हैं। सच्ची।

और एक मैं हूं, जिसे इत्ते साल हो गए कलम रगड़ाई करते-करते मगर हाथ पल्ले बड़ा तो क्या अभी तलक छोटा पुरस्कार भी नहीं आया है।

सलाह देने वाले तो कहते हैं कि जुगाड़ सेट कर लो फिर पुरस्कार तो क्या चयन-मंडली में ही तुम्हारा नाम शामिल कर लिया जाएगा। लेकिन यार मैं भी हूं बड़ा सियाना, चाहे पुरस्कार उम्र भर न मिले पर जोड़-जुगाड़ की गलियों में नहीं भटकूंगा। अमां, असली पुरस्कार तो वो है, जो स्वतः मिले। है कि नहीं?

लेकिन प्यारे जुकरबर्ग तुम्हें देखता हूं तो लगता है कि प्रसिद्धि ऐसी ही होनी चाहिए। कि, पुरस्कार-सम्मान हर वक्त कदमों में बिछे पड़े रहें। तुम जहां खड़े हो जाओ, दुनिया खुद-ब-खुद खींची चली आए।

फेसबुक के सहारे तुमने दुनिया को जो खींचा है, यार कमाल ही कर दिया है। कह सकता हूं कि दुनिया तुम्हारी बनाई सोशल नेटवर्किंग की हद दर्जे तक दीवानी-मस्तानी हो गई है। बंदा एक बार को 'लगाना' भूल सकता है किंतु फेसबुक पर 'टलना' नहीं। फेसबुक को तुमने 'आदत' बना दिया है मेरे दोस्त। इस आदत के शिकार जवान भी हैं, बूढ़े भी और बच्चे भी। यार, मैंने तो उन लोगों को फेसबुक पर चलह-कदमी करते देखा है, जिन्हें पता न फेसबुक के मालिक का है, न इस्पेलिंग का। मगर हैं दीवाने फेसबुक के। कमाल है प्यारे वाकई कमाल।

यार जुकरबर्ग, एक कमाल तुमने और कर दिया व्हाट्स एप को उन्नीस अरब डॉलर में खरीदकर। उन्नीस अरब डॉलर कित्ते होते होंगे यार? यहां तो कभी उन्नीस हजार साक्षात नहीं देख पाया हूं। पर्स की हैसियत कभी उन्नीस रुपए से आगे बढ़ ही नहीं पाई। बहरहाल...फेसबुक की गोद में व्हाट्स एप को बैठा देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। बधाई तुमको।

बतलाऊं तुम्हें, मेरे मोहल्ले के लगभग सभी लोग फेसबुक के साथ-साथ अब व्हाट्स एप पर भी हैं। जवान बंदे-बंदियां तो रात-दिन व्हाट्स एप, व्हाट्स एप ही खेलते रहते हैं। व्हाट्स एप की बढ़ती डिमांड ने बेचारे एसएमएस के बाजार को फीका कर दिया है। खबरें बताती हैं कि फेसबुक के बाद व्हाट्स एप दूसरी ऐसी एप्लिकेशन बन गई है, जिसने सोशल नेटवर्किंग में क्रांति-सी ला दी है।

देखो न, लव-शव, लड़ाई-झगड़ा, तलाक-प्रपोज, मिलना-बतियाना अब सब व्हाट्स एप पर है। गजब तो यह है कि अब एप बच्चा पालने के साथ-साथ हग करने का आइडिया भी देने लगी हैं। व्हाट्स एप से चीजें काफी नजदीक लगने लगी हैं। कुछ भी, कैसा भी चित्र या संदेश आराम से भेजो। न पैक का झंझट, न बेलैंस कटने का रगड़ा।

फेसबुक और व्हाट्स एप की जुगलबंदी, उम्मीद करता हूं, सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में काफी कुछ और नया रचेगी। लेकिन यार जुकरबर्ग मेरी तुमसे जलन की भावना कभी कम न होगी। तुम्हारे प्रति जलन रखकर मेरी दिल की अगन को शांति मिलती है। कसम से...।

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

कपड़े उतारू विरोध

चित्र साभारः गूगल
टेक इट ईजी प्यारे। टेक इट ईजी। इसमें शर्म-वर्म जैसी कोई बात नहीं। राजनीति में तो ऐसा चलता है। बिना ऐसा चले राजनीति नहीं चल सकती। समय के साथ-साथ राजनीति के रंग-ढंग काफी बदल गए हैं। जब राजनीति के रंग-ढंग बदले हैं, तो क्या नेताओं के न बदलेंगे!

इन दिनों संसद के भीतर या बाहर नेताओं-सांसदों-विधायकों का जो अजीबो-गरीब विरोध-प्रदर्शन नजर आ रहा है न, यह सब बदली हुई राजनीति का परिणाम है। नेताओं ने अब अपने विरोध करने के तरीके जरा बदल दिए हैं। पहले वे विरोध या क्रोध बोलकर ही व्यक्त कर दिया करते थे, अब बकायदा मिर्ची छिडक़कर, धक्का-मुक्की करके, थप्पड़ जडक़र या कपड़े उतारकर जतलाते हैं। इससे पता चलता है कि हमारे देश की राजनीति के नेता एवं सांसद लोग बोल्ड-दर-बोल्ड होते जा रहे हैं। अब आसानी से कोई उन्हें आड़े हाथों नहीं ले सकता। अब वे हाथ तक तोडऩे की ताकत रखते हैं। कतई फिल्मी स्टाइल में।

अमां, जब सदन के भीतर जूतम-जुताई हो सकती है, तो क्या कपड़े नहीं उतारे जा सकते? बिल्कु ल उतारे जा सकते हैं। बल्कि कपड़े उतारकर विरोध और क्रोध की तीव्रता का पता अधिक खुलकर चलता है। और फिर विधायकों ने कपड़े कोई खुद के तईं थोड़े उतारे, जन-हित वास्ते उतारे थे। चाहे कह कोई कु छ भी ले लेकिन हमारे देश के नेता जनता के हितों के प्रति हर वक्त तत्पर रहते हैं।

अभी तेलंगाना पर जो रार मची, वो नेताओं के निजी हितों के लिए नहीं, जनता के वास्ते थी। चाहे बंद दरवज्जों में ही सही पर तेलंगाना बिल पास करवाकर ही दम लिया। सही हुआ जो बिल पास हो गया, नहीं तो फिर कोई बखेड़ा खड़ा हो जाता। और बेचारे सांसद लोग मुफ्त में बदनाम हो जाते। मीडिया तो उन्हें बदनाम करने को हर पल तैयार बैठा रहता है।

सदन के भीतर कपड़े उतारने की घटना बेशक नई हो पर कदम बेहद साहसी कहा-माना जाएगा। अभी तलक हीरो फिल्मों में ही कपड़े उतारा करता था लेकिन अब यह काम ससद में भी होने लगा है। बस गनीमत इत्ती रही कि विधायक महोदय ने सिर्फ  कु र्ता ही उतारा, पायजामा नहीं। नहीं तो रायता और ज्यादा फैलता। हालांकि यूपी के एक ऊं चे मंत्रीजी ने विधायकों को पायजामा उतारने की सलाह दी थी। लेकिन..., शायद थोड़ी शर्म आ गई हो।

यों भी, बात-बात पर कपड़े उतारना अब चलन में है। चूंकि जमाना बदल रहा है, इस कारण लोगों ने अपने देखने के नजरिए में परिवर्तन कर लिया है। जो जित्ता ज्यादा कपड़े उतार ले, वो उत्ता बड़ा तीसमारखां। तीसमारखाई की यह हिरस धीरे-धीरे कर देश के नेताओं के बीच भी पनप रही है। अच्छा है, बहुत अच्छा है।

और हां, यह बात दिमाग से कतई बाहर निकाल दीजिए कि इन हरकतों से देश या लोकतंत्र शर्मसार हुआ है। न न कोई शर्मसार नहीं हुआ है। शर्मसार तो दरअसल वो हुए होंगे जिन्होंने इत्ते बलिदानों के बाद देश को गुलामी से मुक्त कराया था। मगर उनके शर्मसार होने की फिक्र यहां करता ही कौन है? क्या राजनीति, क्या नेता, क्या व्यवस्था सब मनोरंजन की सामान बन चुकी है। नेता राजनीति में अब नीतियों के लिए नहीं मात्र मनोरंजन के लिए आते हैं।

खैर, कोई नहीं। टेक इट ईजी प्यारे। अभी आगे और न जाने क्या-क्या देखने-सुनने को मिले, राजनीति और नेताओं के बीच। हैव पैशेंस।

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

हंगामा और मनोरंजन

मैं मेरे देश के नेताओं का तहे-दिल से एहसानमंद हूं कि उन्होंने राजनीति को 'मनोरंजन' का साधन बनाया हुआ है। हर मुद्दे और हर बात पर किसी न किसी तरह का हंगामा खड़ा करके हमारा मनोरंजन करते-करवाते रहते हैं। राजनीति के प्रति गंभीर होना का हमें रत्तीभर मौका नहीं देते। उनका मनोरंजन कभी संसद के अंदर देखने को मिलता है, तो कभी बाहर। चुनावी सभाओं में तो मनोरंजन हदें तक पार कर जाता है। गजब यह है कि अक्सर बयानबाजी में भी वे 'शाब्दिक मनोरंजन' कर जाते हैं। हंगामें के बहाने हुए मनोरंजन के बीच-बीच में यह भी कहते रहते हैं कि वे यह सब जनता के लिए ही तो कर रहे हैं!

खैर, इसमें शक नहीं कि मेरे देश के नेता लोग जन-हित के प्रति वाकई बेहद संजीदा रहते हैं! अगर नेताओं को जन-हित का ख्याल न होता, तो वे न आपस में लड़ते, न हंगामा काटते। हंगामें के बीच अगर कुछ ऊंच-नीच हो भी जाती है, तो इसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। आखिर ये सब वे जनता के वास्ते ही तो कर रहे हैं!

अभी चंद रोज पहले संसद के भीतर जो हुआ, बस हो ही गया। कोई नेताओं का मन थोड़े ही था, ये सब करने का! वो तो यहां-वहां से थोड़ा-बहुत दबाब पड़ा, कुछ गुस्सा आया, तो चक्कू और मिर्ची स्प्रे का बहाना बन गया। वरना, मेरे देश के नेता लोग बेहद शांत रहते हैं! राजनीति में शांति को बनाए रखना उनका परम-धर्म है! क्या नहीं प्यारे...?

हंगामा वगैहरा अपनी जगह है, लेकिन नेता लोग जन-हित के प्रति हमेशा प्रतिबद्ध हैं! यह नेताओं की जन-हित के प्रति प्रतिबद्धता ही थी कि तेलंगाना बिल बंद किवाड़ों के बीच पास हो गया। क्या करते, बंद किवाड़ों के बीच पास करना ही पड़ा, नहीं तो फिर से हो-हंगामा होता। दो-चार के बीच में सिर-मुचैटा होता। और खामखां नेता लोग बदनाम हो जाते। बदनामी से बचने के लिए ही तो यह सब ड्रामा करना पड़ा। ड्रामे के बहाने हमारा मनोरंजन भी हो गया और बिल भी पास हो गया। हैं न मेरे देश के नेता जन-हित के प्रति कित्ते समर्पित!

देखो प्यारे, हंगामें के बहाने मनोरंजन करने-करवाने में जित्ता प्रमुख दल चर्चा में रहते हैं, अब उत्ता ही आप वाले भी रहने लगे हैं। बेचारों को जब कुछ समझ नहीं आता तो धरना-आंदोलन करने बैठ जाते हैं। टोपी, ईमानदारी, सादगी, शुचिता की दुहाई देकर जनता पर डोरे डालते हैं। जब जनता उनकी डोर थाम लेती है और कहती है कि अब उड़ाओ पतंग तो कुछ देर उड़ाकर हांफकर यह कहते हुए भाग जाते हैं कि हम न उड़ा पाएंगे। क्योंकि पेंच लड़ाना तो हमें आता ही नहीं। अब इसे क्या समझा जाए?

चलो कोई नहीं इस बहाने अच्छा खासा मनोरंजन तो हो ही जाता है। और चाहिए भी क्या हमें।

चिंता-गंभीरता का त्याग कर हमें नेताओं के इस 'राजनीतिक मनोरंजन' का पूरा आनंद लेना चाहिए। प्रत्येक हो-हंगामें तो यह कहते हुए भूला देना चाहिए कि यह तो अक्सर होता ही रहता है। इसमें नया कुछ नहीं। चूंकि चुनाव सिर पर हैं, इसलिए, नेताओं का जोर भी अजब-गजब तरीके के मनोरंजन करके देश की जनता को लुभाना है। गंभीरता-नैतिकता की परवाह यहां करता ही कौन है?

फिलहाल, इंतजार कीजिए आगे अभी और भी तरीके के 'राजनीतिक मनोरंजन' देखने-सुनने को मिलेंगे।

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

टोपियों के बहाने

हम कहीं टोपियों के 'सत-युग' में तो नहीं आ गए हैं? जहां देखो वहां टोपियां ही टोपियां नजर आ रही हैं। हर कोई टोपी पहनकर क्रांति करने, ईमानदार बनने, चरित्रवान होने को उतावला बैठा है। हालांकि टोपियों में रंगों की विविधता है, किंतु उद्देश्य सभी का एक ही है, आम आदमी की फिकर! मात्र टोपी पहनकर आम आदमी की फिकर करने वाले राजनीतिक दलों की दरियादिली देखकर असली वाला आम आदमी परेशान है। वो बेचारा समझ ही नहीं पा रहा कि यह हो क्या रहा है?

देखा-देखी मेरे प्यारे को भी टोपी पहनने का चस्का लगा है। एक बेहद ईमानदार एनजीओ-टाइप राजनीतिक दल की टोपी को उसने भी सिर पर चढ़ा लिया है। जिस दिन से टोपी प्यारे के सिर चढ़ी है, प्यारे शत-प्रतिशत चरित्रवान व ईमानदार हो गया है। अब मैं तो क्या साक्षात भगवान भी उसकी ईमानदारी पर रत्तीभर शक नहीं कर सकते!

मेरा प्यारे अब ईमानदारों का राजा है।

प्यारे कोशिश में लगा हुआ है कि जिस ईमानदार दल की टोपी उसने पहनी है, मैं भी पहन लूं। इस वास्ते वो कई दफा मुझे ईमानदारी और शुचिता का वास्ता भी दे चुका हूं। लेकिन हर दफा मैंने उसको यही समझाया कि 'मैं चाहकर भी ईमानदार या चरित्रवान नहीं हो सकता। क्योंकि न ईमानदार होना, न चरित्रवान दिखना मेरी राशि में ही नहीं है। मेरी राशि में केवल अ-ईमानदार लेखक बने रहना ही लिखा है। जिसे मैं पूरी तसल्ली के साथ निभा रहा हूं।'

मेरे टोपी न पहनने से प्यारे मुझसे नाराज है। कहता है, 'तुम मूरख हो। मौका देखकर चौका मारने का चांस खो रहे हो। ईमानदार बनने का ऐसा 'गोल्डन चांस' दोबारा नहीं मिलेगा। ईमानदार बनने के लिए तुम्हें ज्यादा कुछ नहीं करना सिर्फ टोपी पहननी है। एक दफा अलां-फलां दल की टोपी तुम्हारे सिर पर चढ़ गई बस समझ लो जनता की नजर में तुम ईमानदार हो गए। यों भी, आजकल जनता टोपी वाले ईमानदारों को अधिक पसंद कर रही है। दिल खोलकर उनको अपना समर्थन दे रही है। चांस है, हाथ धो लो।'

जो भी हो लेकिन प्यारे मैं टोपी नहीं पहन सकता। मैं बिन-टोपी ही सही हूं। कम से कम टोपी न पहनने से मेरे सिर पर जनता की जिम्मेवारी जैसा कोई बोझ तो नहीं है। न मुझे जनता के वास्ते पानी मुफ्त करना है, न बत्ती के दाम आधे करने हैं। न अपनी ऊंची रखने के लिए जनता दरबार लगाना है। ऐसे जनता दरबार से भी क्या हासिल कि मुझे अपनी ही जान छत पर चढ़कर बचानी पड़े। और न ही मुझे टोपी पहनकर जनता के अंडे खाने हैं। तुम्हारी ईमानदारी तुम्हें ही मुबारक। मैंने प्यारे को समझाया।

प्यारे समझा तो नहीं पर इत्ता जरूर कह गया कि टोपी वाले ईमानदार एक दिन तुम भी देख लेंगे।

मैं तो जाने कब से देखने-दिखाने को तैयार बैठा हूं। कोई आए तो सही।

और फिर, जब इस कदर थोक के भाव में हर गली-मोहल्ले, शहर-गांव में ईमानदार बढ़ रहे हैं, तो एक अकेले मेरे ईमानदार न हो होने से कौन-सा ईमानदारी को बट्टा लग जाएगा। कौन-सी टोपियां बे-रंग हो जाएंगी।

यह वक्त तो ईमानदारों की टोपियों पर व्यंग्य लिखने का है। सो प्यारे खुलकर लिख रहा हूं।

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

पप्पू की आत्मकथा के बहाने

श्रीमान पप्पू यादव की आत्मकथा आ जाने के बाद से मेरा दिल भी मचलने लगा है। बरसों से ली गई कसम कि 'कभी किताब नहीं छपवानी है' को अब तोड़ने का मन करता है। प्रकाशक, समीक्षक व आलोचक के खिलाफ भी अब मेरे स्वर एवं विचार बदलने लगे हैं। साफ महसूस होने लगा है कि बिना बदले साहित्य एवं लेखन की दुनिया में अब मेरा गुजारा संभव नहीं। बदलने के साथ-साथ मुझे कुछ राजनीतिक प्रभाव भी अवश्य बनाना पड़ेगा। यह आज के वक्त की मांग है।

मैं यह देखकर गदगद हूं कि श्रीमान पप्पू यादव की किताब का विमोचन कित्ते ठाठ और ठसक के साथ हुआ। एक किताब से उन्होंने दो-दो निशाने साध लिए। राजनेताओं के साथ-साथ एक अति-वरिष्ठ साहित्यकार-कम-आलोचक को वे मंच पर ले आए। सबने साथ मिलकर उनकी किताब का विमोचन किया। उनके राजनीतिक एवं साहित्यिक योगदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की। तथा, साहित्य जगत का एक संभावित महान विचारक घोषित किया। साथ ही साथ, जीवन में अब तक की गईं उनकी क्रांतियों को बेहद सम्मानित लहजे में याद किया। श्रीमान पप्पू को इत्ता सम्मान मिलना न केवल राजनीति बल्कि साहित्य जगत के लिए भी बड़ी बात है।

इस वास्ते श्रीमान पप्पू यादव को बधाई एवं शुभकामनाएं तो बनती हैं।

ऐसा ऐतिहासिक सम्मान देखकर भला किसका मन न ललचाएगा पाने को। मेरा तो बार-बार ललचा रहा है। अगर श्रीमान पप्पू यादव साहित्य में नए प्रतिमान बनकर उभर सकते हैं, तो फिर मैं क्यों नहीं? जबकि मेरी उपस्थिति तो यहां बरसों से है। बस गलती मुझसे जरा-सी यह हो गई कि मैंने अपने लेखन व हैसियत को कभी भुनाने की कोशिश नहीं की। हमेशा इस ऐंठ में रहा कि इससे क्या फर्क पड़ता है। लेकिन प्यारे फर्क पड़ता है। और ऐसा-वैसा नहीं बहुत ज्यादा फर्क पड़ता है। न राजनीति न साहित्य में आप बिना जोड़-जुगाड़ के टिक ही नहीं सकते। अगर यहां टिकना है तो पप्पू यादव बनना ही होगा।

मुझे पछतावा हो रहा है अपने आदर्शवाद पर। खामाखां ही मैंने इसे ओढ़ा। आदर्शवाद ओढ़ने की नहीं बल्कि त्यागने की चीज है। जित्ता आदर्शवादी होगे, उत्ता ही रसातल में सरकते जाओगे। आज के जमाने में आदर्शवाद कोढ़ समान है। यहां किसे फुर्सत है आपके आदर्शवाद को देखने-समझने की। सबकी गाड़ी किस्म-किस्म के समझौतों पर टिकी हुई है। समझौते करते रहिए, आदर्शवाद को खुद से परे रखिए; फिर देखिए आप कहां से कहां पहुंचते हैं। जिसकी जित्ती लंबी पहुंच, उसका उत्ता लंबा कद। क्या समझे...।

मेरा मन कर रहा है कि मैं श्रीमान पप्पू यादव को ही अपना साहित्यिक गुरु बनाऊं। आत्मकथा लेखन के तमाम टिप्स उनसे लूं। उनके जीवन-संघर्ष को अपनी प्रेरणा बनाऊं। राजनीति और साहित्य में संबंधों का दबदबा कैसे बनाया जाता है, यह उनसे जानूं-समझूं। एक वे ही हैं, जो मुझे यह सब बतला सकते हैं। वरना तो हमारे हिंदी साहित्य की दुनिया इत्ती दोगली है कि यहां कब कौन कहां कैसे किसकी बजा दे, पता ही नहीं चलता। यहां अब केवल भगवानों को ही पूजा जाता है।

अब तलक तमाम तरह की आत्मकथाओं को पढ़कर मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि आत्मकथा लेखन अधिक मेहनत का काम नहीं। आत्मकथा कोई भी लिख सकता है। आत्मकथा लिखने के लिए साहित्यिक व्यक्तित्व या परिवेश का होना जरूरी नहीं। डॉन बबलू श्रीवास्तव तक की तो आत्मकथा है। और क्या रोमांचक आत्मकथा है। सुना है, फूलन देवी की भी है। लेकिन मैंने पढ़ी नहीं।

फिर मैं भी क्यों न सीधे आत्मकथा ही लिखूं। आत्मकथा बाजार में आएगी तो प्रभाव कुछ और ही होगा। श्रीमान पप्पू यादव के नक्शे-कदम पर चलने में कोई हर्ज थोड़ है। भई, मेरे तईं तो श्रीमान पप्पू यादव ही महान-विभूति हैं।

एक दफा मेरी आत्मकथा आ जाने दीजिए फिर मैं भी साहित्य और राजनीति जगत की महान-विभूति कहलाऊंगा। यह मेरा वायदा है आप से।

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

मैं एक 'बौड़म लेखक' हूं

चित्र साभारः गूगल
पत्नी को मुझसे हजारों शिकायतें हैं। यह कोई नहीं बात नहीं। हर पत्नी की हर पति से कोई न कोई शिकायत जरूर होती है। पति से शिकायत रखना पत्नी का मूलभूत हक है। इस हक को हम पति उनसे चाहकर भी नहीं छीन सकते।

बहरहाल, हजारों शिकायतों में पत्नी की एक शिकायत मेरे लेखन को लेकर भी है। पत्नी कहती है, 'मुझे लिखना नहीं आता। मैं हमेशा ऊल-जलूल लेखन किया करता हूं। न मेरे लेखन में गभीरता है, न संवेदना। इस नाते मैं एक 'बौड़म लेखक' हूं।'

चूंकि वो पत्नी है, इस नाते पत्नी की शिकायत सिर-आंखों पर। मैं चाहकर भी पत्नी की शिकायत का 'प्रतिवाद' नहीं कर सकता। 'प्रतिवाद' करके मुझे घर में अपना दाना-पानी थोड़े बंद करवाना है।

हर लेखक-पति अपने लेखन या कथन में कित्ता ही क्रांतिकारी क्यों न हो मगर पत्नी के आगे उसकी सारी क्रांतिकारिता धरी की धरी रह जाती है। जैसा कि मेरे साथ है।

पत्नी की यह शिकायत कुछ हद तक सही है कि मेरे लेखन में गंभीरता का भाव न के बराबर होता है। हालांकि कोशिश तो मैं कई दफा कर चुका हूं अपने लेखन को गंभीरनुमा बनाने की, लेकिन बात बन ही नहीं पाती। अच्छे खासे लेख का अंततः व्यंग्य ही बन जाता है। दूसरा, गंभीरता से मैं इसलिए भी बचकर रहता हूं कि कहीं यह मेरे लेखन के साथ-साथ मेरे दिमाग पर बोझ न बन जाए। खुदा-न-खास्ता गंभीरता की गिरफ्त में अगर मैं आ गया तो मेरा बहुत नुकसान होगा। लेकिन मैं अपना नुकसान करने नहीं देना चाहता।

गंभीर लेखन करने के लिए यहां इत्ते बड़े-बड़े सूरमा हैं। तमाम बुद्धिजीव हैं, प्रगतिशील हैं, चिंतक हैं। लेकिन मैं तो इनमें से कुछ भी नहीं हूं। न ही मैं उन जैसा होने की चाहत रखता हूं। खामखां, गंभीर चिंतन का बोझ अपने सिर पर लेकर दिमाग की बत्ती बंद नहीं करवाना चाहता।

गंभीरता भी एक तरह की बीमारी है प्यारे। मैंने कई-कई गंभीर किस्म के लोगों-लेखकों को देखा है। हर वक्त वे या तो माथे पर बल डाले रहते हैं या फिर कभी इसका, कभी उसका विरोध करते दिखते हैं। उन्हें किसी चीज में आनंद ही नजर नहीं आता।

न प्यारे न मैं ऐसा लेखक बनकर न रह सकता हूं न जी ही सकता। हंसना और मस्त रहना मेरी आदत में शुमार है। मैं चीजों और मुद्दों को व्यंग्य की निगाह से देखता हूं, गंभीरता की नहीं। हां, जहां गंभीर होना चाहिए वहां हो भी जाता हूं। परंतु अति-गंभीरता से मुझे जबरदस्त परहेज है प्यारे।

फिर भी अगर पत्नी को मैं 'बौड़म लेखक' नजर आता हूं, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं। गंभीर होने से बौड़म होना ज्यादा श्रेयस्कर है मेरे तईं। बौड़म होने में कम से कम बेमतलब का बौद्धिक या वैचारिक बोझ तो नहीं रहता दिमाग पर। बौड़म रहकर मैं चीजों को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ-जान लेता हूं।

यों भी, पति-पत्नी में एक को 'गंभीर' और एक को 'बौड़म' ही होना चाहिए। तो ऐसा समझ लीजिए कि मेरी पत्नी गंभीर है और मैं बौड़म। ठीक है न।

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

'ईमानदारों के मसीहा' का इस्तीफा

चित्र साभारः गूगल
बीती रात से ही मेरे मोहल्ले के घोषित ईमानदार बेहद मायूस हैं। सबके चेहरे उतरे हुए हैं। कोई किसी से किसी तरह की बात या चर्चा नहीं कर रहा। नुक्कड़ पर बसी चाय की दुकान पर एक भी ईमानदार नजर नहीं आ रहा। वरना तो वहां ईमानदारों का हुजूम लगा रहता था। हर वक्त ईमानदार और ईमानदारी पर ही बातचीत व बहसें होती रहती थीं। लेकिन अब सब खामोश हैं।

मोहल्ले के घोषित ईमानदारों की खामोश को मैं समझ सकता हूं। इस वक्त उनके कने खामोश रहने के कोई और चारा भी तो नहीं! किसी सवाल का जवाब दें भी तो क्या? दरअसल, सवालों के जवाब तो ईमानदारों के मसीहा अरविंद केजरीवाल के पास भी नहीं होंगे। बेशक, उन्होंने दिल्ली की गद्दी त्याग दी लेकिन प्यारे सवाल तो बने ही हुए हैं। और, अब ताउम्र बने रहेंगे।

राजनीति के दंगल में केजरीवाल ने कदम तो इत्ती धमक के साथ रखा था कि अब वे एक-एक सूरमा को पटखनी देकर ही दम लेंगे। न खुद चैन से बैठेंगे न किसी नेता-मंत्री को चैन से बैठने देंगे। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इस-उस नेता को अंदर करवा देंगे। बस कुछ ही दिनों में न केवल दिल्ली बल्कि पूरे देश और व्यवस्था को भ्रष्टाचारमुक्त कर देंगे। कारपोरेट दलालों की जमकर क्लास लेंगे। पुलिस को अपने आधीन कर क्या से क्या बना देंगे। लेकिन हुआ क्या...? शेखचिल्लीनुमा लफ्फबाजियां नितांत लफ्फबाजी बनकर ही रह गईं। न भ्रष्टाचार का अंत हुआ। न कोई भ्रष्टाचारी अंदर हुआ। न कारपोरेट का बैंड बजा। हां, दिल्ली वालों के साथ-साथ अपना दिल बहलाने को थोड़ी-बहुत मेहरबानी बिजली-पानी पर कर दी। मगर उससे भी क्या...?

जनता तो बेचारी ठगी की ठगी ही रह गई न।

सुनिए केजरीवालजी, यह राजनीति है राजनीति। मंदिर का घंटा नहीं कि बजाया और भगवान प्रसन्न हो गए। यहां इस्तीफे की नौटंकी या ईमानदारी-सादगी की महानता से काम नहीं चलता। राजनीति में जब आए हैं, तो हर तरह की स्थिति-परिस्थिति से निपटना पड़ता है। यों, हार मानकर इस्तीफा देकर चलते बनना न सिर्फ दिल्ली की जनता के साथ धोखा है बल्कि लोकतंत्र का मजाक भी।

बुरा न मानना मियां, आप तो शुरू से ही खुद की प्रसिद्धि को भुनाने की राजनीति कर रहे हो। जनता की भावनाओं से खेलकर उनका केवल दिल जीतते रहे, बदले में उन्हें दिया कुछ नहीं। हर समय मीडिया में चेहरा चमकाते रहने या अपनी बेचारगी को प्रकट करते रहने से न देश का भला होने वाला है न जनता का। हां, आपको पब्लिसिटी जरूर मिल सकती है। और मिली भी है। उसकी का लाभ पाकर ही तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पाई थी। लेकिन अब जब खुद को साबित करने की बारी आई तो मियां यों गायब हो लिए जैसे गंजे के सिर से बाल। न न केजरीवालजी ऐसे न चलेगा। यों, हर वक्त की मजाक ठीक नहीं।

नहीं जानता कि इस्तीफा देने के बाद आप कित्ता मायूस महसूस कर होंगे किंतु मेरे मोहल्ले के घोषित ईमानदार बेहद मायूस हैं। अगर संभव हो तो एक दफा मेरे मोहल्ले के घोषित ईमानदारों के तईं 'हौसला रखिए' जैसा संदेश एसएमएस या ट्वीट अवश्य कर दीजिएगा। आप तो वैसे भी तकनीक-संपन्न राजनीति के ही पक्षधर हैं।

अंत में, बस इत्ता और बतला दीजिए कि इस्तीफे के बाबत क्या पहले आपने जनता की राय जानी थी?

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

मेरे देश के सांसद

चित्र साभारः गूगल
आपको न हो मगर मुझे है। जी हां, मुझे मेरे देश के सांसदों पर बहुत गर्व है! गर्व के मारे मेरा सीना हर वक्त छप्पन इंची से भी ज्यादा चौड़ा रहता है। किसी देश का कोई सांसद मेरे देश के सांसदों के चाल-चलन और उन्मुक्त व्यवहार का मुकाबला सपने में भी नहीं कर सकता। मेरे देश के सांसदों में अंदर-बाहर वो-वो अद्भूत खूबियां हैं, जिनका साधारण मनुष्य में मिलना असंभव है। जित्ती बहादुरी के साथ सड़क से लेकर संसद तक की राजनीति मेरे देश के सांसद कर सकते हैं, कोई दूसरा नहीं कर सकता। मेरा दावा है।

कौन सिरफिरा कहता है कि मेरे देश के सांसद संसद के भीतर बोलते या बहस नहीं करते। अमां, आपस में इत्ती विकट बहस करते हैं कि सामने वाला डर के मारे पतलून गिली कर जाए। बहस करते-करते कभी-कभार लात-घूंसे तक चला लेते हैं। तोड़ा-फोड़ी भी मचा देते हैं। एक दफा तो संसद के बाहर रखे गमले तक जमीन पर दे मारे थे। क्या करें उनके भीतर गुस्सा इत्ता भरा रहता है कि कंट्रोल ही नहीं होता। और फिर बिना गुस्से, बिना लात-जूते आज के टाइम में राजनीति संभव है क्या भला? हर समय तो कोई न कोई नेता-सांसद एक-दूसरे की काट में लगा रहता है। खिंचाई करता रहता है। ऐसे में तुम ही बताओ प्यारे कि गुस्सा आएगा कि नहीं।

और हां बतला दूं, ये सब ऊंट-पटांग हरकतें वे अपने लिए नहीं, जनता के हित और मुद्दों के वास्ते किया करते हैं। देश की जनता से मेरे देश के नेताओं-मंत्रियों-संत्रियों-सांसदों-विधायकों-सभासदों को बेइंतहा प्यारे है। प्रमाण देने की जरूरत नहीं।

अभी हाल जो ड्रामा संसद के भीतर हुआ, वो कोई नया थोड़े है। संसद में सांसदों के ऐसे करतब प्रायः होते रहते हैं। क्या हुआ जो एक सांसद महोदय ने मिर्ची का छिड़काव कर दिया और दूसरे ने चक्कू निकाल लिया। अगला जब गुस्सा दिलाएगा तो क्या सामने वाला चुप्पी लगाए बैठा रहेगा? लगें हैं, राजनीति के पंडित और बुद्धिजीवि बेचारे सांसदों को गलियाने में। टीवी चैनलों पर आ-आकर बहस कर रहे हैं। आदर्शवाद के उदाहरण पर उदाहरण दिए चले जा रहे हैं।

ठीक है, चलो माना, कि बेचारे सांसदों से गलती हो गई अब इस पर इत्ता हंगामा किसलिए प्यारे। यहां मिर्ची छिड़कने पर इत्ता बवाल और खाने में हर वक्त मिर्ची का ख्याल। यहां चक्कू के निकालने पर हंगामा हो गया और फिल्मों में खुलेआम तमंचे पर डिस्को हो रहा है। यह तो सरासर दोगलापन है प्यारे।

मानाकि संसद की गरिमा को 'गहरी क्षति' पहुंची है, किंतु क्या करें, इत्ता समझाने पर भी सांसदों को अक्ल नहीं आती। वैसे संसद ने तो जाने कब का सांसदों पर माफ भी कर दिया होगा। वो भी कब तलक मुंह फुलाए बैठी रह सकती है। उसे भी मालूम है कि मेरी संसद के सांसद न कभी सुधरे हैं न कभी सुधरेंगे। तो फिर खामखां दिमाग पर शर्मसारी का बोझ डाले रहना। जो हो गया, उसे भूल जाने में ही भलाई है। क्या नहीं...?

साथ-साथ, मेरी अपील देश के समस्त बुद्धिजीवियों एवं वरिष्ठ नेता लोगों से भी है कि उक्त सांसदों को माफ किया जाए। गुस्से-गुस्से के खेल में मिर्ची-चक्कू निकल आए, कोई बात नहीं। आगे से नहीं निकलेंगे फिलहाल इसकी गारंटी मैं तो नहीं ले सकता। यों भी, लोकतंत्र में गारंटी की क्या हैसियत! गारंटी तो आप वालों ने भी दी थी इस-उस को अंदर करने की लेकिन अभी तलक तो सब के सब बाहर ही हैं।

अच्छा...अच्छा... इत्ता माने लेते हैं कि यह दिन देश के संसदीय इतिहास का सबसे काला दिन था। अब तो खुश न!

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

वेलैंटाइन डे का जीवन में महत्त्व

चित्र साभारः गूगल
प्रस्तुत निबंध दर्जा सात के छात्र की कापी में से कॉपी किया गया है। निबंध का शीर्षक है- 'वेलैंटाइन डे का जीवन में महत्त्व'।

वेलैंटाइन डे पर्व का हमारे जीवन में उत्ता ही महत्त्व है, जित्ता रजाई का जाड़ों में। यह पर्व हर साल 14 फरवरी को संत वेलैंटाइन के नाम पर मनाया जाता है। जनश्रुति के अनुसार, संत वेलैंटाइन बहुत ऊंचे दर्जे के प्रेमी थे। प्रेम को जीवन में बहुत महत्त्व दिया करते थे। दिल के साथ-साथ व्यवहार में भी प्रेम रखा करते थे। हमेशा कहा करते थे कि हर किसी को दबाकर प्रेम करना चाहिए। इसीलिए वेलैंटाइन डे को हम प्रेम दिवस के रूप में मनाते हैं। और कामना करते हैं कि इस दिन सब एक-दूसरे से प्रेम करें।

बताता दें, वेलैंटाइन डे पर्व न केवल भारत बल्कि अन्य देशों में भी एक साथ मनाया जाता है। इस पर्व पर उपहारस्वरूप दिल देने-लेने की परंपरा है। एक मान्यता के अनुसार, इसी दिन आई लव यू सबसे अधिक बोला जाता है। जो लोग आई लव यू सीधा बोलने में डरते हैं, वे अपनी बात एसएमएस या वॉट्सएप्प के जरिए रखते हैं। कुछ तो अपने आई लव यू का वीडियो बनाकर ही भेज देते हैं।

इस पर्व हर कोई व्यस्त रहता है। शहर के पार्क एवं रेस्त्रां लड़का-लड़की के मेल-मिलापों से भरे रहते हैं। सभी एक-दूसरे के हाथों में हाथ डालकर अपने-अपने प्रेम का इजहार करते हैं। जिसके इजहार को 'स्वीकृति' मिल जाती है, वो खुश हो जाता है। और जिसके इजहार पर 'न' हो जाती है, वो देवदास बन जाता है। देवदास बनकर या तो केएल सहगल के गीत सुनता है या फिर मिर्जा गालिब की गजलों में डूबकर अपने गम को गलत करता है। देशी व विदेशी ठर्रे की बिक्री भी इस दिन खूब होती है।

लेकिन कुछ अंकल लोग इस पर्व को अच्छा नहीं मानते। वे इसे गंदी निगाह से देखते हैं। उनके अनुसार वेलैंटाइन डे का पर्व हमारी महान भारतीय सभ्यता-संस्कृति के अपमान का प्रतीक है। यह पर्व हमारे देश के लड़का-लड़की को गलत राह पर ले जा रहा है। अंकल लोग इस पर्व का विरोध तरह-तरह से करते हैं। संत वेलैंटाइन का पुतला जलाते हैं, विदेश सामान का बहिष्कार करते हैं, लड़का-लड़की को मुर्गा भी बनाते हैं।

इस पर्व पर प्रत्येक शहर में उत्ती ही पुलिसिया सख्ती रहती है, जित्ती कि गणतंत्र दिवस वाले दिन। सभी थानों को विशेष आदेश होते हैं- गड़बड़ी मिलने पर तुरंत एक्शन लें।

वैसे जिन अंकलों को वेलैंटाइन डे का पर्व अच्छा नहीं लगता, उन्हें इस पर अधिक ध्यान नहीं देना चाहिए। बस अपने काम से मतलब रखना चाहिए। कुछ खराब अंकलों के कारण ही वेलैंटाइन डे का पर्व गुंडई का प्रतीक बनता जा रहा है।

वेलैंटाइन डे पर्व से हमें प्रेम करने के साथ-साथ खुश रहने की प्ररेणा भी मिलती है। प्रत्येक को यह दिवस प्रेम के प्रतीक के रूप में मनाना चाहिए। विरोध से सिवाय जंग-हंसाई के कुछ प्राप्त नहीं होता।

अंत में, हमें संत वेलैंटाइन को हृदय से धन्यवाद देना चाहिए कि उन्होंने इत्ता खूबसूरत दिन बनाया। हम सब को आपस में प्रेम एवं भाईचारे के साथ ही रहना चाहिए। हैप्पी वेलैंटाइन डे।

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

लव गुरु और वेलेंटाइन डे

मेरे मोहल्ले के लव गुरु तंगहाल हैं। बा-मुश्किल गुजारा कर पा रहे हैं। अब न कोई आशिक, न मजनूं, न दीवाना, न मस्ताना उनके कने नहीं आता सलाह लेने को। भूले-भटके जो चले आते हैं, वो लव पर नहीं तलाक पर सलाह लेने आते हैं। हालांकि तलाक पर सलाह देना लव गुरु का काम नहीं लेकिन, फिर भी, वे दे देते हैं। क्या करें, मद्दे में ये ही भला।

मोहल्ले में आते-जाते एकाध दफा मुझ भी पकड़ कर बोले हैं कि सलाह ले लो। चाहे मुफ्त ही सही। ताउम्र काम आएगी। मैं मना कर देता हूं। मुझे अब किसी लव गुरु की सलाह की जरूरत नहीं। बिना सलाह ही मेरी लव-लाइफ मस्त चल रही है। सलाह तरह-तरह की टेंशन देती हैं। सलाह लेने के बाद बंदा न प्रेमिका का रह पाता है न प्रेम का। बीच में लटककर रह जाता है- पेंडुलम की तरह।

लेकिन प्यारे मैं मोहल्ले के लव गुरुओं का वो 'गोल्डन पीरियड' भूला नहीं हूं, जब उनके घर के आजू-वाजू लाइनें लगी रहती थीं- लव पर सलाह लेने वालों की। क्या जवान, क्या बूढ़ा, क्या कुंआरा, क्या शादीशुदा हर कोई लव गुरु के चरणों में नतमस्तक रहता था। जो उलटा-सीधा, आड़ा-तिरछा लव गुरु बता देते थे, अंतिम सत्य मानकर बंदे पालन किया करते थे। उस वक्त लव गुरु की फीस इत्ती होती थी कि क्या डॉक्टर की होगी। तब लव गुरु के कदम धरती पर पड़ते ही कहां थे। हर वक्त दिमाग चौथे आसमान पर और ध्यान कमाई पर लगा रहता था। न मोहल्ले में किसी से सीधे मुंह बात करते थे, न किसी के घर आया-जाया करते थे। पूछो तो कहते थे- अगला मेरे स्टेटस का नहीं, तो क्यों जाऊं। मैं कोई खाली थोड़े हूं।

मगर अब यह हाल है कि लव गुरु नुक्कड़ से पकड़-पकड़ कर लाते बंदों को और फीस भी नहीं मांगते।

इधर जाने कित्ते वेलेंटाइन डे निकल गए पर सलाह लेने एक भी बंदा लव गुरु कने नहीं फटका। इस बार भी वही हाल है। वेलेंटाइन डे पर अपनी दुकान सजाए बैठे हैं लव गुरु मगर कोई आता ही नहीं। नुक्कड़ पर बसी गिफ्ट शॉप पर तो जवान लड़के-लड़कियों की भीड़ रहती है मगर हमारे लव गुरु निठ्ठले।

दरअसल, जब से स्मार्टफोन का जमाना आया है, तब से एक मेरे मोहल्ले के ही नहीं, देश भर के लव गुरुओं की दुकान ठंडी-सी पड़ गई है। कोई मजबूरी में जरूर चला जाता हो लव गुरुओं कने लेकिन स्मार्टफोन वाला बंदा नहीं ही जाता होगा। जाकर करेगा भी क्या? स्मार्टफोन में मौजूद हर प्रकार की एप उसकी मुफ्त में सहायता कर तो रही हैं। डे चाहे वेलेंटाइन का हो या हग का हर तौर-तरीका मौजूद है एप में। अमां, जब एप भूले को सही रास्ता बतला सकती हैं, मौसम का सही हाल-चाल दे सकती हैं, बच्चों की परवरिश के अंड़े-फंडे बता सकती हैं, फिर ये तो लव है। लव पर हजारों तरह की सलाहें-जानकारियां मौजूद हैं इंटरनेट और स्मार्टफोन पर। फिर लव गुरु कने जाकर क्यों खाली-पाली दिमाग और नोट खर्च करना?

वैसे, स्मार्टफोन-युक्त जनरेशन खुद ही इत्ती स्मार्ट है, उसे भला क्या जरूरत किसी लव-शव गुरु की। अब तो वो लव गुरुओं को सलाह देने का हौसला रखती है। किसी जमाने में लव गुरु जिस सलाह को हौले से कान में दिया करते थे, अब वो यंग-जनरेशन के लिए आम बात है। अब प्यार का इजहार खत से नहीं, एसएमएस या वॉट्सएप पर होता है। वी-चैट और स्काईपे ने तो काम और भी आसान कर दिया है।

मेरे विचार में, लव गुरुओं को सलाहगिरी छोड़कर स्मार्टफोन पर आ जाना चाहिए। खुद को जनरेशन के हिसाब से स्मार्ट बनाना चाहिए। तब ही बचे रह सकते हैं उनके लव फंडे, नहीं तो दुकान यों ही फीकी रहेगी प्यारे।

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

56 इंच का सीना

चित्र साभारः गूगल
मेरे मोहल्ले में केवल 56 इंच का सीना रखने वालों का ही दबदबा है! 56 इंच से कम सीने वालों को कोई पूछता तक नहीं। राजनीति से लेकर साहित्य तक में 56 इंच के सीने वाले ही हैं। चूंकि मेरा सीना 56 तो छोड़िए 36 का भी नहीं है, इसलिए मैं हमेशा हाशिए पर रहता हूं। 56 इंच के सीने वाले मेरे आगे से छाती चौड़ी करके ऐसे निकल जाते हैं, जैसे गधे के आगे से हाथी। जी हां, मोहल्ले में मेरी गिनती चुने हुए गधों में होती है। मैं मेरे गधा होने का बुरा नहीं मानता लेकिन इस उम्मीद पर जरूर जीता हूं कि एक दिन गधे के दिन भी फिरेंगे।

56 इंच का सीना रखने वालों की एक खासियत होती है कि वे फेंकते बहुत ऊंची-ऊंची हैं। कभी-कभी तो इत्ती ऊंची फेंक देते हैं कि इतिहास-भूगोल तक शर्मा जाते हैं। फेंकने के चक्कर में वे यह तक भूल जाते हैं कि पटना कहां है और तक्ष्शीला कहां? हर बात में 'मैं ही मैं' का जिक्र करते-करते अक्सर उनका अहम चेहरे पर आ जाता है।

अब चूंकि वे 56 इंच का सीना रखते हैं इसलिए उन्हें रोका-टोका भी नहीं जा सकता। आराम से कानों में तेल डालकर बस सुना जा सकता है। यही मैं करता हूं। मैं मेरे मोहल्ले के 56 इंच का सीना-प्रधान वीरों को बस सुनता हूं; न उनसे बहस करता हूं, न उन्हें टोकता। खामखां, कहीं बुरा मान गए तो मुझे तो 'मसल' ही डालेंगे। हल्का-सा ढेंचू करके चुप हो जाता हूं।

कहा यही जाता है कि जिनका सीना 56 इंच का होता है, विकास की बात वही कर सकता है। लेकिन मेरे मोहल्ले का हिसाब-किताब कुछ अलहदा है। बेशक मोहल्ले में अधिकतर लोगों का सीना 56 इंच का है। पर विकास के नाम पर सीना हमेशा सिकुड़ा-सिकुड़ा सा रहता है। दरअसल, वे अपने घर की साफ-सफाई व विकास को ही 56 इंच के सीने की संज्ञा देते हैं। उनके घर-आंगन का विकास हो गया, समझो पूरे मोहल्ले का विकास हो गया। अक्सर यही पता नहीं चल पाता कि मोहल्ले की सड़क नालियों के भीतर हैं या नालियां सड़क के भीतर। गड्डो की तो पूछिए ही मत। कई बार तो मैं ही उनमें गिर चुका हूं।

मैं चाहे नाली में गिरूं या गड्डों में, गधा होने के नाते, मुझ पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। लेकिन फर्क उन्हें भी कहां पड़ता है, तो जगह-जगह 56 इंच का सीना लिए फिरते हैं। केवल अपने ही घर के विकास का महिमामंडन पूरे देश में जा-जाकर करना कौन-सी '56 इंची' है प्यारे! मुझे ही देख लो न, मैं अपने गधेपन का रोना कहीं जाकर रोता हूं? गधा हूं, तो हूं। गधे का काम ही ढेंचू-ढेंचू करना है। यह मैं ऐसे ही करता रहूंगा।

बहरहाल, देख रहा हूं, राजनीति में 56 इंच के सीने वालों की डिमांड निरंतर बढ़ती जा रही है। कल तलक जीना सीना 30 से कम हुआ करता था, वे भी अपना सीना चौड़ा करके चलने लगे हैं। धरना-प्रदर्शन कर सीने की चौड़ाई को बढ़ाने में लगे हैं। समझौते किए चले जा रहे हैं फिर भी दावा यही कर रहे हैं कि ईमानदार केवल हम ही हैं बाकी सब...।

लेकिन मुझे क्या, मैं तो गधा बनकर हर तमाशे को चुपचाप देख-सुन रहा हूं। ढेंचू

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

शुक्र है, भैंसें मिल गईं

चित्र साभार- गूगल
अखबार के पहले पन्ने पर छपी खबर देखकर पता चला कि मंत्रीजी की लापता भैंसों का पता चल गया है। भैंसें सा-सुरक्षित मिल गई हैं। बधाई। मंत्रीजी के साथ-साथ तबेले की अन्य भैंसों ने भी राहत की सांस ली। मंत्रीजी ने राहत की सांस इसलिए ली कि भैंसे 'आप' में शामिल होने से बच गईं। और तबेले की अन्य भैंसों ने इसलिए कि उनके बिछड़े साथी घर लौट आए।

सुना है, भैंसें मिलने की खुशी में मंत्रीजी के घर लड्डू बांटे-बंटवाए गए और तबेले को झालरों से सजाया-संवारा गया। कुछ-कुछ नाच-गाना होने की खबरें भी आई हैं, ताकि भैंसों को संगीतमय दिमागी सुकून मिल सके। अच्छा है। भैंसे जित्ता खुश रहेंगी, उत्ता ही दूध देंगी।

चूंकि भैंसें समाजवादी थीं इसलिए पुलिस-प्रशासन का चिंतित होना लाजिमी था। और, उन्हें किसी भी कीमत पर खोजकर लाना बेहद जरूरी। इत्ते पर भी बेचारे तीन पुलिसवालों को लाइन हाजिर होना पड़ा। पर कोई नहीं। इससे पता चलता है कि भैंस के लापता होने में हुई लापरवाई की सजा ऐसे ही मिलती है।

अरे भई, एक रसूखदार मंत्रीजी की भैंसों का लापता होना कोई मामूली बात थोड़े थी! और वो भी इत्ते गुस्सैल मंत्रीजी की। जिनके गुस्से से न केवल सरकारी महकमा बल्कि तबेले की भैंसे तक थर-थर कांपती हैं। गुस्से में भरकर मंत्रीजी एक दफा आंख दिखा दें, तो पतलून गिली हो जाए। मैंने तो यह तक सुना है कि भैंसे मंत्रीजी के गुस्से के खौफ पर ही, बिना टांग मारे या उचकाए, आराम से दूध दे देती हैं।

एक मेरी बकरी है, जो बिना नाक रगड़वाए, बिना व्यंग्य सुने, दूध तो क्या मेरे कने नहीं आती। ज्यादा कुछ कह दूं तो तुरंत 'आप' में शामिल होने की धमकी देती है। क्या करूं, मेरी मजबूरी है कि मैं न बीवी से ऊंचा बोल सकता हूं न बकरी से। आजकल दोनों का ही मन केजरीवालजी के मफलर और सादगी में बसता है।

खैर, अच्छा हुआ जो भैंसें मिल गईं। नहीं तो समाजवाद कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रह जाता। सारे वादों में ले देके एक समाजवाद ही है, जिसमें समाज का प्रत्येक वर्ग सुरक्षित (!) महसूस करता है। समाजवाद न केवल जनता बल्कि भैंसों को भी समाज का एक अहम हिस्सा मानता है। अगर न मानता तो इत्ती जल्दी भैंसों का क्या पता चलता?

देखिए न, सारा का सारा पुलिसिया महकमा लग लगया भैंसों की खोजा-खाजी में। और समय रहते मिल भी गईं। खुदा-न-खास्ता, कहीं 'आप' वाले बहका कर ले जाते तो? ससुरी ईमानदार होने के साथ-साथ ऐंठवान और हो जातीं। 'आप' में क्या कम ऐंठूंओं की कमी है!

चलिए, लापता चीज का मिल जाना किसी नेमत से कम नहीं होता। सोच रहा हूं, बरसों पहले मेरे शहर के बाजार में जो झुमका गिरा था, उसको ढूंढवाने की बात मंत्रीजी के समक्ष रखूं, शायद कुछ बात बन जाए। क्या नहीं...?