बुधवार, 31 दिसंबर 2014

नए साल के संकल्प

नए साल के पहले दिन लोग तरह-तरह के 'संकल्प' लेते हैं। कोई सिगरेट-शराब त्यागने का संकल्प लेता है। कोई दूसरे की बीवी पर शरारती निगाहें न डालने का संकल्प लेता है। कोई अच्छा एवं नेक इंसान बनने का संकल्प लेता है। कोई रिश्वत न मांगने और भ्रष्टाचार न फैलाने का संकल्प लेता है। कोई विवादों में न पड़ केवल रचनात्मक लेखन करने का संकल्प लेता है। कोई स्मार्टफोन की बैट्री या चर्जर बदलने का संकल्प लेता है। कोई फेसबुक, टि्वटर पर गंदी बातें न करने का संकल्प लेता है। कोई चाय की जगह ग्रीन-टी पीने का संकल्प लेता है। आदि-आदि।

मतलब, जित्ती तरह के लोग उत्ती तरह के उनके संकल्प। हालांकि- अपवादों को छोड़कर- नए साल पर लिए गए संकल्प महीने का अंत आते-आते 'धूल खाते' नजर आते हैं। क्योंकि संकल्पों को त्यागना हमारा 'पुश्तैनी अधिकार' जो है। और, संकल्प लेने में न पैसे लगते हैं न ही टैक्स देना पड़ता है। इसीलिए तो नए साल का सबको इंतजार रहता है।

अब 'देखा-देखी' कह लें या फिर 'फैशन का हिस्सा' नए साल पर मैंने भी 'मात्र तीन' संकल्प (!) ले ही लिए हैं।

मेरे संकल्प ये हैं-

संकल्प नं. वन- छिपकली एवं कॉकरोच प्रजाति से न डरूंगा।

मुझे लाइफ में सबसे अधिक डर छिपकली और कॉकरोच से ही लगता है। घर-बाहर उनके एहसास भर से मेरे 'रोंटे' खड़े हो जाते हैं। फिर न मैं सही से कुछ खा पाता हूं, न पहन पाता हूं, न लिख पाता हूं, न सो पाता हूं, न हवा-पानी को जा पाता हूं। हर वक्त यही डर दिल में बैठा रहता है कि कोई छिपकली या कॉकरोच कहीं से न निकल आए और मुझे 'नुकसान' न पहुंचा दे। इसीलिए मैं अपने कने हर समय फरस्ट-एड बॉक्स रखता हूं। इस डर की वजह से एकाध बार तो मैं 'डिप्रेशन' में भी जा चुका हूं।

लेकिन अब बहुत हुआ। डर की भी एक सीमा होती है पियारे। वो धोनी महाराज ने कित्ता उचित कहा है कि डर के आगे जीत है। इसीलिए नए साल पर मैं संकल्प लेता हूं- चाहे जित्ता ही नुकसान क्यों न हो जाए- छिपकली और कॉकरोच से नहीं डरूंगा। न उन पर 'हिट' की बौछार करूंगा, न 'लक्ष्मण-रेखा' खीचूंगा, न कहीं 'मोरपंखी' रखूंगा। अगर नजर आए तो सीधा हाथों से पकड़कर बोतल में बंद कर दूंगा। फिर पूछूंगा- बताओ, पाटनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? बात-बेबात मुझे डराते थे, अब बोतल में बंद रहकर खुद डरो।

संकल्प नं. दो- चिंताप्रधान लोगों से दूर रहूंगा।

मुझे हर वक्त की चिंता करने वालों से बड़ी 'एलर्जी' है। खास बात यह है कि वे अपनी चिंता बहुत कम दूसरे (मतलब पड़ोसी) की चिंता अधिक किया करते हैं। जित्ता बेफिकर वे अपनी निजी एवं पारिवारिक जिंदगी में कुछ न जानने के लिए रहते हैं, उससे कहीं बेकरार दूसरी की जानने में रहते हैं। दखलअंदाजी यों करते हैं मानों वे दूसरे के 'गॉडफादर' हों।

इसीलिए मैं संकल्प लेता हूं- ऐसे सियाने चिंताप्रधान लोगों से नए साल से 'उचित दूरी' बनाकर रहूंगा। न अपनी चिंता उन्हें बताऊंगा, न ही उनकी चिंता का सबब जानूंगा। अपने में ही 'मस्त' रहना, मुझे खुद की सबसे बड़ी आजादी लगती है।

तीसरा और अंतिम संकल्प- घर वापसी करूंगा।

न न चौंकिए नहीं। मैं वो (धर्म वाली) घर वापसी की बात नहीं बल्कि 'राजनीतिक' घर वापसी की बात कर रहा हूं। अमां, बहुत अरसा हो गया पन्ने रंगते-रंगते। अब थोड़ा राजनीति करके भी देख ली जाए। आखिर जनसेवा के बहाने निजसेवा करने में क्या हर्ज है! सब कर रहे हैं।

अतः मैं संकल्प लेता हूं कि मैं घर वापसी उसी पार्टी में करूंगा जिसका सिक्का आजकल सबसे अधिक मजबूत है। हो सकता है, इस बहाने मेरी लाइफ भी बन जाए, जैसे अन्य नेताओं-मंत्रियों-विधायकों की बनी है। राजनीति में जाने में हर्ज ही क्या है? लेखक भी भला राजनीति से कौन-सा अलग हैं? नेता जनता की राजनीति कर रहा है और लेखक लेखन की।

नए साल पर मैंने ये तीन संकल्प ले तो लिए हैं। अब आप भी दुआ कीजिए कि मैं लिए गए संकल्पों पर 'खरा' उतरूं। संकल्प कहीं 'फैशन' बनकर ही न रह जाएं। बाकी तो जो है सो है ही पियारे।

मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

कोई शिकायत नहीं 2014 से

अब जिन्हें हो उनकी वे जानें पर मुझे जाते हुए साल (2014) से कोई 'शिकायत' नहीं। शिकायत अगर होगी भी तो उसमें साल बिचारा क्या कर लेगा? न मेरी शिकायत में 'हथेली' लगा लेगा न फार्मूला लगाकर 'सॉल्व' कर देगा। मेरी शिकायत का निपटारा मुझे ही करना होगा पियारे। अपनी शिकायत का लोड खामखां साल के मथ्थे क्यों डालूं?

लोग बाग फिर भी नहीं मानते अपनी शिकायत का गुबार साल को गरियाकर निकालते हैं। वाह! गलतियां तुम करो और जब न संभाल पाओ तो साल को बुरा-भला कहने लगो। यह कौन-सी और कहां की 'अक्लमंदी' है पियारे। साल तो हमें चांस देता है- हर दिन, हर पल, हर मूममेंट को भरपूर जीने का। अब हम ही न जी पाएं तो इसमें भला साल की क्या गलती?

इसीलिए अपने लेबल से जित्ता हो सकता था मैंने साल 2014 को 'भरपूर जिया'। घर-परिवार के साथ जिया। समाज के साथ जिया। लेखन के साथ जिया। हंसी-ठहाकों-व्यंग्य के साथ जिया। हॉलीवुड-बॉलीवुड की सुंदरमत सुंदरियों को देखकर जिया। सोशल नेटवर्किंग के प्लेटफार्म पर जिया। यारों-दोस्तों, असहमति-आलोचना रखने वालों के साथ जिया। कभी रायता फैलाकर तो कभी रायता सिमेटकर जिया। कभी अपनी बेटियों के साथ मुस्कुराकर जिया। अपने में 'महानता' का नहीं 'साधारण व्यक्ति' का विश्वास रखकर जिया। साल को रचनात्मकता के साथ जीना ही तो जिंदगी है पियारे। नहीं तो अपनी-अपनी जिंदगियां हम यों भी जीते ही रहते हैं।

साल 2014 में बनी हवाबाजियों और किस्म-किस्म के बेतुके विरोधों को मैंने 'एंजॉय' ही किया। एंजॉय करते रहने से दिमाग पर लोड कम पड़ता है न। देखिए, ईमानदारी पर कैसी-कैसी ऊंची हवाएं बांधी थीं केजरीवालजी ने मगर जनता ने उनका ही बोरिया-बिस्तरा समेट दिया। काला धन के बहाने अच्छे दिन लाने वाली सरकार फिलहाल अभी तलक तो 'काले' का 'क' भी न ला सकी है। हां, तीर-तुक्के खूब पेल के छोड़े जा रहे हैं। घर वापसी पर तरह-तरह के नाटकनुमा विवाद कायम हैं।

और, साल के खत्म होते-होते मनोरंजन में मसाला इत्ता बढ़ा दिया गया कि पीके 'अड़ियल किस्म' के विवादों में आकर घिर गई। लोगों ने फिल्म को फिल्म की तरह न लेकर 'धर्म की तौहिन' के तहत ले लिया। बहस का केंद्र बिचारा 'ट्रांजिस्टर' नहीं, अब 'धर्म' है। कमाल है पियारे कमाल। भांति-भांति के भक्त भांति-भांति के करतब करने पर उतारू हैं।

पर मुझे क्या, मैं तो लल्ला बनकर सबकुछ को एंजॉय कर रहा हूं। किसी से किसी तरह की कोई शिकायत न किए हुए। क्योंकि यह समय और जमाना अब शिकायत वाला रहा ही नहीं! जरा देर में तो यहां चक्कू-भाले निकल आते हैं। तो पियारे जो चल रहा है, उसे चलते रहने दो क्योंकि समय सबकी 'हिस्ट्री' लिख रहा है।

फिलहाल, जाते हुए साल 2014 को 'हंसकर अलविदा' बोलो और नए साल 2015 का 'खुलकर स्वागत' करो। हां, उम्मीद बनाए रखो कि बिगड़ी चीजें एक दिन जरूर सुधरेंगी।

रविवार, 28 दिसंबर 2014

कंबल बनाम रजाई

ठंड में कंबल मुझे रजाई से अधिक 'सुख' देता है। कंबल में गर्मी का एहसास रजाई से 'दोगना' होता है। कंबल 'सर्वहारा' की निशानी है जबकि रजाई 'प्रगतिशीलता' की प्रतीक। कंबल का वजन रजाई के मुकाबले कम पर सहने लायक होता है। कंबल के साथ धोने-निचोड़ने की 'सुविधा' रहती है जबकि रजाई को सिर्फ 'धुना' जा सकता है, धोया नहीं। खास बात, कंबल- चाहे हल्की ठंड हो या हाड़तोड़- तापमान के अनुरूप 'मस्त मजा' देता है जबकि रजाई का ज्यादातर उपयोग हाड़तोड़ ठंड में ही किया जाता है। कंबल को तीन-चार तहों में सिमेट कर आसानी से पलंग के भीतर सरकाया जा सकता है मगर रजाई हाथी के आकार सी जगह लेती है। इसीलिए परिवारों में अब रजाई के मुकाबले कंबल की 'डिमांड' तेजी से बढ़ी है। बाजार भी अब कंबल की तरफ 'आकर्षित' हो रहा है।

किंतु व्यंग्य-लेखन में कंबल को अभी उत्ती जगह नहीं मिली पाई है, जित्ती की रजाई को। ठंड में ज्यादातर व्यंग्यकारों को रजाई की तो याद रहती है मगर कंबल को भुला देते हैं। कंबल पर व्यंग्य लिखना तो छोड़िए, अपने फेसबुक स्टेटस पर भी उसका जिक्र नहीं करते। रजाई में चिंतन, रजाई की जरूरत, सर्दी और रजाई, रजाई में मस्तियां टाइप तो लिखते रहते हैं मगर कंबल को 'उपेक्षित' रख छोड़ देते हैं। जबकि- मेरा दावा है- रजाई से कहीं ज्यादा बेहतरीन चिंतन कंबल में बैठकर किया जा सकता है। पर क्या कीजिएगा, लेखक का मन है, कब, कहां, किस पर डोल जाए!

जो हो- पर न मेरी निगाह न मेरे लेखन में- कंबल कभी 'उपेक्षित' नहीं रहा। कंबल की गर्महाट को मैंने व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक जीवन में बरकरार रखा है। सच कहूं, ठंड में मेरा ज्यादातर लेखन और चिंतन कंबल की 'गुलाबी गर्माहट' में से ही निकलता है। चाहे पारा माइनस में ही क्यों न पहुंच जाए या चाहे कोहरा कित्ता ही अपनी आगोश में क्यों न ले ले पर मेरे कंबल के आगे सब 'फेल' हैं। एक दफा कंबल में घुस जाओ फिर ठंड तो क्या ठंड का बाप भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। कंबल ठंड को ऐसे 'पछाड़' लगाता है जैसे- बाजार यथास्थितिवादियों की।

रजाई चूंकि 'प्रगतिशीलता' की प्रतीक है इसीलिए ज्यादातर प्रगतिशील लोग ही उसमें बैठकर 'चिंतन' किया करते हैं। यही वजह है, जाड़ों में उनका चिंतन और लेखन ज्यादा भारी और अपच-सा हो जाता है। दरअसल, लिखते वक्त अपनी विचाराधारा के साथ-साथ रजाई का वजन भी वे अपने दिमाग पर ओढ़ लेते हैं। अब ठंड में इत्ता भारी-भरकम लेख लिखेंगे तो पियारे ऐसा कैसे चलेगा? ठंड में दिमाग, शरीर, चिंतन और लेखन जित्ता 'हल्का' रहे उत्ता ही भला।

मगर कंबल के साथ ऐसा कोई रगड़ा नहीं है। कंबल के भीतर बैठकर आराम से जित्ता चाहे उत्ता हल्का-फुलका चिंतन एवं लेखन कीजिए- मजा आएगा। कंबल किसी किस्म का न कोई बोझ देता है न लेता। इसीलिए तो रैन-बसेरों से लेकर गरीब-मजदूरों तक के घरों में कंबल ही अधिक पाए जाते हैं। सरकार भी, ठंड में, गरीबों-बेसहारों को- कैमरों के आगे- कंबल ही तो बांटती-बंटवाती है। कथित समाजसेवक भी कंबल बांटकर ही अपनी समाजसेवा के वजन को बढ़ाते हैं।

कवियों-कहानीकारों की जाने दीजिए पर व्यंग्यकारों को कंबल पर 'उचित फोकस' करना चाहिए। लिखें रजाई पर भी लिखें पर कंबल के असर को भी साथ लेकर चलें। कंबल में बैठकर रजाई की तारीफ करना, कंबल के प्रति 'सौतेला' व्यवहार सा लगता है। सोचिए, अगर कंबल न होते तो आज पूरी कायनात ही ठंड में सिमटी-सिकुड़ी बैठी होती। रजाई में गर्माहट की अपनी सीमाएं हैं पियारे।

इस कड़कड़ाती व कोहरायुक्त ठंड में मेरा व्यंग्य लेखन कंबल को ही 'समर्पित' है। यह कंबल की गर्माहट का ही असर है, जो इत्ती ठंड में भी मेरे लेखन में गर्माहट बनी हुई है। बाकी तो जो है सो है ही। क्यों पियारे...।

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

खुदा बचाए वरिष्ठों की सोहबत से

मेरे मोहल्ले में एक से बढ़कर एक वरिष्ठ (प्रगतिशील) हैं। सभी की आपस में खूब यारी है। लगभग हर रोज मोहल्ले के नुक्कड़ पर वरिष्ठों (प्रगतिशील) की मीटिंग जुड़ा करती है। मीटिंग में आपस में न कोई हंसता है न मुस्कुराता। हर किसी के चेहरे पर 'गंभीरता' का गहरा भाव ही विराजमान रहता है। मानो, अभी-अभी किसी मुरदे को शमशान का रास्ता दिखाकर आए हों।

खैर, मीटिंग में 'साहित्यिक' चर्चाएं न के बराबर पर 'राजनीतिक' चर्चाएं खूब होती हैं। खासकर, वर्तमान सरकार पर। यों भी, वर्तमान सरकार और प्रधानमंत्री से उनका 'साढ़े छत्तीस' का आंकड़ा है। इसीलिए वे चर्चा में ऐसा कोई अवसर अपने हाथों से जाने नहीं देते, जब वर्तमान सरकार के काम-काज से 'असहमति' न जतलाते हों। उनकी असहमतियां भी इत्ती 'विकट' किस्म की होती हैं कि अगर सरकार सुन ले तो, कमस से, 'गश' खा जाए।

हालांकि मेरी कोशिश उनके ग्रुप से दूर ही रहने की रहती है फिर भी कभी-कभार 'समय काटने' के लिए उनके साथ हो लेता हूं। इस नाते वे भी मुझे 'आंशिक' किस्म का 'प्रगतिशील' ही समझते हैं। (बतला दूं, अभी मेरे वरिष्ठ होने में बहुत समय है।) लेकिन, इत्ता मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वरिष्ठों की सोहबत में रहना 'हंसी-खेल' नहीं है। एक्चुली, वरिष्ठ लोग 'पकाते' बहुत हैं। हंसते बहुत कम बस मुंह ही बिगाड़े रहते हैं। न समाज, न साहित्य, न राजनीति, न परिवार, न फिल्म, न उत्सव उन्हें कुछ 'अच्छा' ही नहीं लगता। हर वक्त हर किसी में कोई न कोई 'नुक्स' निकालने बैठ जाते हैं। और, नुक्स भी ऐसे-ऐसे कि न सिर दर्द की गोली न लेना पड़े तो मेरा नाम बदल दीजिएगा!

अरे, मैं तो उनके ग्रुप में जरा-बहुत देर ही रहकर इत्ता पक जाता हूं कि घर आकर दिमाग को 'कूल' करने के वास्ते मुझे सनी लियोनी की फिल्म देखनी पड़ती है। तब कहीं जाकर दिमाग थोड़ा नॉर्मल हो पाता है।

वरिष्ठों (प्रगतिशीलों) का बस चले तो पूरी दुनिया केवल अपने दम और अपनी विचारधारा पर चलाएं। अव्वल तो ऐसा संभव नहीं लेकिन अगर कभी ऐसा हुआ तो दुनिया में दो चीजें कभी न रह पाएंगी; एक- 'हंसी' और दूसरी- 'प्रगति'। वरिष्ठों को इन्हीं दो चीजों से सबसे अधिक 'एलर्जी' रहती है। बदलाव से 'डरते' हैं इसीलिए 'यथास्थितिवाद' के साथ रहना ज्यादा पसंद करते हैं।

इसीलिए मैं हर किसी से यही कहता हूं कि चाहे 'बदनाम' की सोहबत कर लेना किंतु 'वरिष्ठों' (प्रगतिशील) की सोहबत में कभी न पड़ना। कसम से, न केवल दिमाग बल्कि चेहरा भी 'मातमी' हो जाएगा। (चाहो तो एक दफा आजमा कर देख लो...)

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

मैं और मेरा कंबल

...मगर मुझे मेरा ही कंबल सबसे प्रिय है। जी हां 'कंबल', 'रजाई' नहीं। मेरा कंबल मुझे न केवल 'सर्दी' बल्कि 'आवारार्दी' से भी बचाता है। न जाने कित्ते ही भयंकर से भयंकरतम जाड़े मैंने मेरे कंबल के साथ काट दिए। मजाल है, जो सर्दी ने मुझे एक दिन भी 'परेशान' किया हो। मुझे मेरे कंबल में बैठकर वो सुकून मिलता है, जो महंगी से महंगी और गर्म से गर्मतर रजाई नहीं दे सकती।

सच बोलूं, अपने लेखकीय और पारिवारिक जीवन में आज जो कुछ भी मैं हूं सिर्फ मेरे कंबल के कारण ही हूं। अपने जीवन की पहली कविता और पहला व्यंग्य मैंने कंबल में बैठकर ही लिखा था। जित्ते किस्म के 'आइडिए' मुझे कंबल में रहकर आते हैं, उत्ते रजाई में बैठकर नहीं। रजाई दिमाग के साथ-साथ लेखन पर भी भारी 'बोझ' डालती है। रजाई में प्रगतिशील चिंतन एवं लेखन तो आराम से किया जा सकता है किंतु सर्वहारा-लेखन कंबल में ही आकार लेता है।

कंबल जन और समाज से जुड़ने की 'स्वतंत्रता' देता है। हल्का होने के कारण न दिमाग पर अतिरिक्त बोझ डालता है न कलम पर। इसीलिए मैं न केवल अपने बल्कि प्रत्येक कंबल पर 'गर्व' करता हूं।

हम लेखकों ने कंबल के साथ कुछ कम 'अन्याय' नहीं किए हैं। सर्दियों में लेखन चाहे कंबल में बैठकर किया हो मगर जिक्र रजाई का ही आया है। न जाने कित्ते ही व्यंग्य, कथाएं, कविताएं, किस्से रजाईयों को समर्पित किए हैं। कंबल को यों 'उपेक्षित' रख छोड़ा मानो यह कोई बिरादरी से बाहर की चीज हो। जबकि जित्ती 'ताकत' कंबल की 'गर्माहट' से मिलती है, उत्ती रजाई में कहां! कंबल के प्रति लेखक-बिरादरी का 'सौतेलापन' मुझे हर पल 'अखरता' रहा है।

नेताओं और कथित समाजसेवकों ने भी कंबल का कम 'शोषण' नहीं किया है। अक्सर सर्दियों में ही उन्हें कंबल के बहाने गरीबों-मजबूरों की याद आती है। कैमरों के आगे कंबल बांट-बंटवाकर वे अपनी राजनीति और कथित समाजसेवा को चमकाते हैं। खुद चाहे घरों में रजाईयों में सोते हों मगर बाहर कंबल की तारीफ में कसीदे गढ़ते हैं। कंबल को गरीबों-बेसहारों का 'मसीहा' बताते हैं। लेकिन कंबल-उद्योग के लिए दिल से कभी कुछ करते हुए नहीं दिखते।

फिर भी, हमारे कंबलों का दिल बहुत बड़ा है। कंबलों का हमेशा एक ही उद्देश्य रहा है- गरीबों-मजबूरों-बेसहारों को सर्दियों में गर्माहट देना। इसीलिए मेरा दिल भी हमेशा कंबल के करीब रहने का ही करता है। मुझे किसी तरह की रजाई की दरकरार नहीं। मैं मेरे कंबल के साथ 'खुश' हूं। मेरा कंबल सर्दियों की जान और मेरे लेखन की पहचान है।

जय हो।

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

जीरो महंगाई दर और आम आदमी

अजीब विडंबना है पियारे। महंगाई दर बढ़े तो मुश्किल। घटे तो मुश्किल। सब परेशान। सबसे ज्यादा परेशान, आम आदमी है, जिसे महंगाई दर का क ख ग तक नहीं मालूम। मगर परेशान है। अखबार हाथ में थामे महंगाई दर पर खबर पढ़ता रहता है। जैसा अखबार लिख देता है, उसी हिसाब से महंगाई दर पर सोचने-विचारने लग जाता है। कभी सरकार को कोसता है। कभी अमीरों को। कभी पहले और अब के जमाने को। यों भी, कहने, सोचने और कोसने पर टैक्स थोड़े है।

महंगाई दर पर खबर के हिसाब से वो अपने घर-बाहर के बजट का ग्राफ तैयार करता है। कभी बाहर की चीजों में कटौती करता है, कभी अपनी आदतों में। तब भी, महंगाई दर उसे और उसके बजट को पछाड़ ही जाती है। वो उसके जोड़-घटाने पर मन ही मन मुस्कुराती है। अब मुस्कुराने के अतिरिक्त वो कर भी क्या सकती है? दरअसल, उसे आम आदमी की बेचारगी पर मुस्कुराने पर बड़ा मजा आता है। नेताओं की तरह वो भी जानती है कि यहां का आम आदमी हमेशा ऐसे ही रोता-कलपता रहेगा। इसे कम मिले तब भी रोएगा और ज्यादा मिले तब भी। रोना-झिकना आम आदमी की फितरत जो है।

महंगाई और महंगाई दर को सबसे ज्यादा आम आदमी ही बदनाम कर रहा है। बिना कुछ जाने-समझे वो उस पर अपनी राय कायम कर देता है। सीधी-सी बात है, जब तलक महंगाई नहीं बढ़ेगी अमीरों के शुभ-लाभ में बढोत्तरी कैसे होगी? उनकी तिजोरियां कैसे वजनदार होंगी? कैसे उनका समाज और देश में 'सबसे बड़े अमीर' के रूप में रूतबा बढ़ेगा? अब महंगाई आम आदमी के लिए भले ही दुख का सबब हो, परंतु नेताओं और अमीरों को इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। वे महंगाई दर के बढ़ने और घटने दोनों में सुखी और मस्त हैं।

अरे, आम आदमी को तो महंगाई दर के जीरो होने पर खुशी जतानी चाहिए। महंगाई दर का जीरो होना उसकी सफलता है। अब अगर महंगाई दर के जीरो होने पर भी महंगाई कम नहीं हो रही तो इसमें भला महंगाई दर का क्या दोष? महंगाई दर ने तो अपना काम कर ही दिया न! आम आदमी की आम आदमी जाने।  

देखिए न, आम आदमी खूब दबाकर खा-पचा रहा है फिर भी रो रहा है हाय महंगाई। अगर आम आदमी वकाई महंगाई से त्रस्त है, तो जीना क्यों नहीं छोड़ देता? न रहेगा सांप, न टूटेगी लाठी। हमें यह सच स्वीकार कर लेना चाहिए कि महंगाई हकीकत है। महंगाई का काम ही महंगा होना है। फिर उस पर इत्ता रोना-झिकना क्यों? हमें महंगाई दर को नहीं आम आदमी की मानसिकता को कोसना चाहिए। क्या नहीं...?

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

क्यों न खुदकुशी ही कर ली जाए!

बैठे-ठाले, यों ही, एक विचार दिमाग में आ गया- क्यों न खुदकुशी कर ली जाए। क्या हर्ज है...? यों भी, खुदकुशी करना अब न 'पाप' रहा न 'अपराध'! हालांकि मैं मरने से बहुत डरता हूं पर बिना सजा अगर कोई अपराध करने की छूट मिल रही है, तो क्यों न करूं। दो चीजें छोड़ना मैं कभी पसंद नहीं करता- एक मुफ्त में मिल रहा माल और दूसरा- बिन सजा का अपराध। जब सरकार ही खुदकुशी को अपराध मानने के कानून को खत्म करने का मन बना चुकी है फिर मैं क्यों अपने दिल-दिमाग पर ज्यादा 'लोड' लूं या अपराध-बोध जैसा महसूस करूं। खुदकुशी करने में अगर सफल हो गया तो दुनिया से निकल लेंगे नहीं तो जिंदगी जीएंगे ही। बाद में, फिर कभी, मन बनने पर दोबारा ट्राइ मार लेंगे। अब तो 'खुली छूट' है।

खुदकुशी के मसले पर सरकार ने काफी देर से 'संज्ञान' लिया जबकि मैं तो हमेशा से ही खुदकुशी के पक्ष में रहा हूं! सच्ची...। पता है, खुदकुशी करना एक गंभीर कविता या एक हिट कहानी लिखने से कहीं ज्यादा कठिन काम है। जित्ते पापड़ बीवी को मनाने में नहीं बेलने पड़ते, उससे कहीं ज्यादा मन को खुदकुशी के लिए मनाने में बेलने पड़ते हैं। क्या पता कब-किस वजह से मन बिदक जाए और खुदकुशी की कोशिश 'सपना' ही बनकर रह जाए। इसीलिए खुदकुशी करने से पहले दिमाग से कहीं ज्यादा जरूरी है मन को मनाना। मन चंगा तो प्यारे हर-हर गंगा।

न जी न मैं खुदकुशी पर केवल बातें ही नहीं छौंक रहा- एक दफा ऐसा करने की कोशिश खुद भी कर चुका हूं। पर क्या करूं, मन ने किस्म-किस्म के डर-अपराध का रायता फैला दिया और मैं एक नेक काम को अंजाम देते-देते नाकाम रह गया।

पता है, मैं खुदकुशी क्यों करना चाहता था। मैं खुदकुशी इसलिए करना चाहता था क्योंकि दर्जा दस में मैं पांच दफा फेल हो चुका था। एक ही क्लास में- वो भी पांच दफा- फेल होने वाले बंदे की मनोस्थिति को आप समझ ही सकते हैं। जित्ता मुझे घर में सुनने को नहीं मिल करती थी, उससे कहीं ज्यादा बाहर वाले सुनाते थे। अपने बच्चों के फेल होने की फिक्र से कहीं ज्यादा चिंता मेरे फेल होने की किया करते थे। फेल होने के तुरंत बाद जब भी मुझे छत पर पतंग उड़ाते या गली में गुल्ली-डंडा खेलते हुए देख लेते थे, तुरंत पिताजी के कान भर देते थे कि आपका 'बेशर्म लड़का' फेल होने के बावजूद पतंग उड़ा रहा है और गिल्ली-डंडा खेल रहा है। उसके बाद पिताजी मेरा जो 'हाल' किया करते थे, यहां बतला पाना बेहद मुश्किल है।

इसीलिए मन बनाया था कि क्यों न खुदकुशी कर सारे झंझटों पर ही खाक डाल दी जाए। न रहेगा बांस, न बजेगी बंसुरी। मगर क्या करूं, मन ने बीच में साथ देने से मना कर दिया और खामखां मुझे अपनी खुदकुशी की कोशिश को 'कैंसल' करना पड़ा।

अब एक दफा फिर से सरकार के मार्फत खुदकुशी करने की लाइन क्लियर सी हुई है। सोच रहा हूं, इस बार पक्की ट्राई मार ही ली जाए। किंतु अभी तलक मेरे हाथ ऐसा कोई कारण नहीं आ पाया है, जिनके दम पर मैं खुदकुशी करने का मन बना सकूं। मैं एंवई, बेफालतू मुद्दे पर, खुदकुशी नहीं करना चाहता। खुशकुशी के लायक कोई 'मस्त कारण' तो हो। ताकि लोग-बाग भी मेरी खुदकुशी पर आंसू बहाने के बजाए जश्न मना सकें। सरकार के कानों तलक भी यह बात पहुंचे कि बंदे ने खुदकुशी कित्ती 'एंजॉयफुली' की है।

तो आगे से अगर किसी मजदूर, किसान या गरीब की खुदकुशी की खबर अखबार में छपी मिले तो उस पर 'अफसोस' न जतलाइएगा, बस यह मानकर 'संतोष' कर लीजिएगा कि यह तो 'सरकार का वरदान' और 'बिन दर्द का एहसास' है। फिर कोई भी खुदकुशी 'खुदकुशी' न लगकर 'खुशखबरी' जैसी ही लगेगी। संभव है, मेरी खबर भी ऐसी ही लगे!

फिलहाल, मैं अपनी खुदकुशी की वजह को तलाशने में लगा हूं।

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

आइफोन-6 और पत्नी की जिद्द

मुझे मेरी 'औकात' मालूम है इसीलिए न घर न बाहर न ज्यादा बोलता हूं न टहलता। यों भी, मुझे मेरी औकात में रहकर चीजों-बातों को देखने-पहचानने में ज्यादा 'सुकून' मिलता है। मगर पत्नी का क्या करूं, जिसे अपनी तो छोड़िए मेरी औकात का भी एहसास नहीं। एक दफा मुंह से जो बात निकल गई तो निकल गई। बात को पूरा करने की मेरी औकात चाहे हो या न हो पर जिद्द करनी है। मैं, सच कहूं, जित्ता अपनी औकात से नहीं घबराता उत्ता पत्नी की जिद्द से घबराता हूं।

मंगल ग्रह पर ब्यूटी पार्लर खोलने की जिद्द से जैसे-तैसे पार पाया हूं कि अब पत्नी ने आइफोन-6 लेने की ठान ली है। पत्नी ने दो-टूक कह दिया है कि उसे आइफोन-6 चाहिए ही चाहिए। चाहे कुछ करो।

पत्नी को कित्ती ही दफा प्यार-दुलार से समझा चुका हूं कि 'प्रिय, आइफोन-6 तो क्या नोकिया लूमिया तक लेने की मेरी औकात नहीं और तुम आइफोन-6 लेने की जिद्द कर रही हो। कुछ पता भी है, आइफोन-6 की कीमत के बारे में! जित्ती आइफोन-6 की कीमत है, इत्ता तो मैं दस जनम लिखकर भी न कमा सकता। मुझ जैसा टटपूंजिया किस्म का लेखक आइफोन-6 लेना तो छोड़ो देखने तक की कल्पना नहीं कर सकता। और तुमको आइफोन-6 चाहिए। यार, कुछ तो मेरी औकात का ध्यान रखा करो।'

मगर पत्नी कुछ सुनने-समझने को तैयार नहीं। कहती है, 'तुम्हारी औकात, बतौर लेखक, मुझे बहुत अच्छे से पता है। दुनिया जहान में बड़े-ऊंचे व्यंग्य-लेखक बने फिरते हो और पत्नी को आइफोन-6 दिलवाने के लिए तुम्हारे कने पैसे नहीं। अपनी किताब अपने खरचे पर छपवाने के लिए तुम्हारे कने पैसे हैं। यहां-वहां से छोटा-बड़ा पुरस्कार-सम्मान लेने के लिए तुम्हारे कने पैसे हैं। पैसा देकर अखबारों-पत्रिकाओं में व्यंग्य छपवाने के लिए तुम्हारे कने पैसे हैं। यारों-दोस्तों के साथ बार में रंगीन महफिलें सजाने के तईं तुम्हारे कने पैसे हैं। दहेज में मिली कार में तेल डलवाने के लिए तुम्हारे कने पैसे हैं। बस सिर्फ मेरी छोटी-छोटी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए तुम्हारे कने पैसे नहीं हैं।'

इत्ता ही नहीं, आगे भी पत्नी का लेक्चर जारी रहा, 'महज 55-60 हजार कीमत का आइफोन-6 ही तो मांगा है मैंने कौन-सी जमीन-जायदाद मांग ली है! तुम्हारी बड़े-बड़े संपादकों-लेखकों-साहित्यकारों से इत्ती जान-पहचान है, ले लो किसी से कुछ उधार। बाद में अपने लेखों के पेमेंट में से कटवाते रहना। या फिर, बैंक से लोन ले लो। अब पांच मिनट से ज्यादा नहीं लगते बैंक से लोन लेने में। जमाना जाने कहां से कहां पहुंच चुका है मगर तुम हो कि अभी भी टिपिकल हिंदी के लेखक (व्यंग्यकार) बने हुए हो।'

अब पत्नी क्या जाने हिंदी के लेखक की व्यथा-कथा। मैं चार-पांच बड़े अखबारों में छप क्या लेता हूं, वो समझती है कि मैं चेतन भगत जित्ता बड़ा लेखक हो गया हूं। आइफोन-6 लेना मेरे बाएं हाथ का खेल है। जैसे पूरी हिंदी बिरादरी के लेखक-संपादक मुझे ही उधार देने को बैठे हैं। आज जमाना चाहे कित्ता ही क्यों न बदल गया हो पर हिंदी के लेखक का आर्थिक दायरा उत्ता नहीं बदल पाया है प्रिय।

कभी-कभी सोचता हूं, हिंदी के लेखक को शादी करनी ही नहीं चाहिए। या फिर उसे हिंदी छोड़कर अंगरेजी में लिखना चाहिए। अंगरेजी में पैसा खूब है।

बहरहाल, डरते-डरते पत्नी को बोल दिया है कि 'मेरी औकात नहीं तुम्हें आइफोन-6 दिलवाने की। चाहो तो सस्ता-सा कोई फोन ले सकती हो, दिलवा दूंगा।'

इत्ता सुन पत्नी ने भी साफ बोल दिया है, 'ठीक है। कोई नहीं। अब घर में सोने को और मेरे हाथ का बना खाना तुम्हें तब ही मिलेगा जब मुझे आइफोन-6 दिलवा दोगे। तुम्हें क्या पता आइफोन-6 न होने पर बिरादरी में मेरी कित्ती 'बेइज्जती' होती है। मेरी फ्रैंड्स मेरे बारे में जाने क्या-क्या कहती हैं। अगर आइफोन-6 दिलवाना हो तो बोलो नहीं तो कट लो।

क्या कहूं, कुछ कहने की स्थिति में ही नहीं हूं। जित्ता गुस्सा मुझे पत्नी पर नहीं आ रहा, उससे कहीं ज्यादा स्मार्टफोन बनाने वालों पर आ रहा है, ससुरे इत्ता महंगा फोन बनाते ही क्यों है कि मुझे जैसे गरीब पतियों की शादी-शुदा जिंदगी खतरे में पड़ जाए। आइफोन-6 न हुआ, कोहिनूर हो गया।

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

टाइम मैगजीन और मेरी पर्सनेल्टी

मेरे भीतर हर वो खूबी है, जिसके दम पर मैं टाइम मैगजीन का पर्सन ऑफ द इयर खिताब पा सकता हूं। मगर टाइम मैगजीन वालों की नजर अभी तलक मुझ पर क्यों नहीं पड़ी, इस पर मुझे 'आश्चर्य' है! हो सकता है, निगाह पड़ने के बावजूद, भूल गए हों। या फिर मेरी पर्सनेल्टी का वजन मैगजीन के अनुरूप फिट न बैठा हो। या फिर, क्या भरोसा, किसी ने मेरे खिलाफ चुगली-शुगली ही कर दी हो। जैसा, अभी मोदीजी के साथ हुआ। अच्छा खासा मोदीजी का नाम सलेक्ट होने के बावजूद निकाल दिया गया। संभव है, ऐसा 'अंदरूनी पॉलिटिक्स' के कारण हुआ होगा!

यहां एक-दूसरे की प्रतिष्ठा से जलने-भुनने वालों की कोई कमी थोड़े न है। हर कोई इस जुगाड़ में तैयार बैठा है कि बस उसका काम बन जाए फिर दुनिया जाए भाड़-चूल्हे में। किसी और का क्या कहूं, इस मामले में, मेरे अनुभव ही बहुत हैं। न जाने कित्ती ही दफा मुझे घोषित हुए पुरस्कारों-सम्मानों पर दाएं-बाएं के लोगों ने भांजी मार ली है। न जाने कित्ती दफा ऐसा हुआ है कि मेरे नाम का इस्तेमाल लोगों ने अपनी जुगाड़ के लिए कर लिया।

किंतु मैंने कभी किसी पॉलिटिक्स का बुरा नहीं माना। बुरा मानकर खामखां खुद का ही खून जलाने से क्या फायदा? मेरी पर्सनेल्टी ऐसी-वैसी बातों या राजनीति का बुरा मानने की है भी नहीं। अरे, कहां मैं और कहां दूसरे लोग।

पर टाइम वालों को तो मेरे नाम पर विचार अवश्य ही करना चाहिए था! मुझे पर्सन ऑफ द इयर चुनकर न केवल टाइम बल्कि मेरे देश, मेरे शहर का मान भी बढ़ता। लेखकीय बिरादरी में मेरा पौव्वा और अधिक ठसक के साथ जमता। घर-परिवार, नाते-रिश्तेदारों के बीच अच्छी-खासी पूछा-पाछी बढ़ती सो अलग। टाइम मैगजीन का पर्सन ऑफ द इयर बनना कोई हंसी-ठिठोली थोड़े है। बंदे के भीतर प्रसिद्धि का माल-मसाला भी देखना पड़ता है। जोकि मेरे भीतर पहले से मौजूद है।

मोदीजी का नाम कट जाने का मतलब यह नहीं है कि कोई भारतीय पर्सन ऑफ द इयर का खिताब पा ही नहीं सकता। इसके लिए मैं हूं न। दोबारा से मैंने टाइम वालों के यहां जुगाड़ बैठाई है। मुझे पक्की उम्मीद है कि टाइम वाले मान जाएंगे। आखिर मेरी पर्सनेल्टी में कम दम थोड़े है।

जहां इत्ते बड़े-बड़े सम्मान-पुरस्कार मुझे मिल गए, एक टाइम मैगजीन का पर्सन ऑफ द इयर और सही। इस बहाने सूची में एक सम्मान और बढ़ जाएगा। है कि नहीं।

फिलहाल, प्रतीक्षा की कतार में हूं।

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

शादी और नागिन डांस

नागिन डांस करने का मुझे हल्का-सा अनुभव है- सिर्फ अपनी शादी का। उसके बाद फिर कभी मैंने नागिन डांस किया हो, ऐसा ख्याल नहीं पड़ता। हां, जब कभी खुद की 'बेवकूफियों' पर हंसने का दिल करता है तो अपनी शादी में किए गए नागिन डांस की तस्वीरें-विडियो देखने बैठ जाता हूं। बनाने वाले ने भी कहीं कोई कसर बाकी नहीं रख छोड़ी थी, मेरे नागिन डांस को कैमरे में उतारने की। तब न जाने कहां से अंदर इत्ता 'जोश' भर गया था कि नागिन डांस खुद-ब-खुद हुए चला जा रहा था। यों भी, अपनी शादी में दुल्हे द्वारा किया गया हर डांस 'नागिन डांस' की श्रेणी में ही आता है! क्योंकि फिर ताउम्र उसे अपनी पत्नी के कहे पर डांस जो करना होता है।

बहरहाल...।

समय और इंसान चाहे कित्ती ही क्यों न बदल गया हो किंतु शादियों में नागिन डांस करने का 'स्टाइल' अब भी वही है। चाहे दुल्हा हो या बाराती या घराती या दोस्त-नाते-रिश्तेदार- एक दफा जब नागिन डांस करने उतरते हैं तो फिर अपनी पूरी उतारकर ही दम लेते हैं। खास बात, लगा लेने के बाद नागिन डांस की मस्ती और भी अधिक बढ़ जाती है। फिर चाहे आप कोई सा भी डांस करें, खुद-ब-खुद नागिन डांस में परिवर्तित हो ही जाता है।

सच बोलूं, मैं शादियों में जाता ही इसलिए हूं ताकि नागिन डांस करते लोगों को देख 'एंजॉय' कर सकूं। नागिन डांस का असली लुत्फ सड़क पर आड़े-तिरछे हाथ-पैर मारकर करने में है, वो डीजे पर थिरकने में नहीं। डीजे पर आप उत्ती 'बेसुधगी' और 'आवरगी' के साथ डांस कर ही नहीं सकते जैसा सड़क पर कर सकते हैं। दोनों हाथों को नागिन स्टाइल में सिर पर रख, कोट उतार, टाई की नॉट को ढीला कर, मस्त नागिन धुन पर डांस करने में जो 'आनंद' मिलता है, उसे शब्दों में बयां करना वाकई मुश्किल है। उस वक्त नागिन डांस करने वाला भले ही आपको बेवकूफ-सा नजर आए पर होता कमाल का है।

मैंने देखा है, अब तो लड़कियां-औरतें भी शादियों में सड़क पर नागिन डांस करने लगी हैं। पर वे अपने नागिन डांस में थोड़ी 'शीलनता' बरतती हैं। फिर भी कोशिश उनकी यही रहती है कि नागिन डांस की मस्तियों का खुलकर आनंद लिया जाए। शादियों में जिसने डांस करने में कोताही बरती या शर्म-हया का ख्याल रखा फिर उसने कुछ भी एंज‌‌ॉय नहीं किया। शादियां सिर्फ लिफाफा देने या बढ़िया खाना खाने के लिए ही नहीं होतीं मस्त नागिन डांस के साथ-साथ अपने भीतरी डांसिंग हुनूर को सामने लाने के लिए भी होती हैं।

उन लोगों के प्रति मैं 'सम्मान' का भाव रखता हूं, जो शादी चाहे किसी की भी हो मगर डांस या नागिन डांस करना नहीं भूलते। न केवल खुद पूरे जोश के साथ नाचते हैं बल्कि आजू-वाजू वालों को भी नचाते हैं। भीड़ में से खिंचकर किसी बंदे या बंदी को लाना और उससे डांस करवाना वाकई बहुत 'क्रांतिकारी टास्क' है। उनके किए नागिन डांस को खुद अगर नागिन कहीं देख ले, तो मेरा दावा है, 'शर्मा' जाएगी।

मेरे विचार में- नागिन डांस पर 'गहन शोध' की आवश्यकता है। नागिन डांस पर न केवल गोष्ठियां बल्कि अखबारों-पत्रिकाओं में बहसतलब लेख भी जरूर आने चाहिए। ताकि जिन्होंने शादियों में कभी नागिन डांस न किया हो, उन्हें ऊर्जा मिल सके, इसको करने की। खास बात, शादी के कार्ड में भी नागिन डांस करने का जिक्र अवश्य होना चाहिए। ताकि बंदा-बंदी घर से ही प्रिपेयर होकर चले। क्योंकि शादियों का सबसे 'हिट डांस' तो 'नागिन डांस' ही है।

रविवार, 7 दिसंबर 2014

दाएं-बाएं की कमाई वाले यादव सिंह

ऐसा लोगों को लगता है कि सरकारी पद पर रहकर 'दाएं-बाएं' से पैसा कमाना बहुत 'आसान' होता है जबकि यह इत्ता आसान होता नहीं। तमाम तरह की नजरों और संबंधों का खास ख्याल रखना पड़ता है। हर प्रकार की जवाबदेही हर वक्त सिर पर सवार रहती है। अगर औहदा ऊंचा है फिर तो जिम्मेवारी और अधिक बढ़ जाती है।

लेकिन फिर भी यादव सिंह जैसे वीर सरकारी बाबू दाएं-बाएं से बड़ी होशियारी से पैसा कमा ही जाते हैं। और, थोड़ा-बहुत नहीं कमाई का आंकड़ा करोड़ों में पहुंचा देते हैं। कमाल यह है कि दाएं-बाएं से कमाए धन की रत्तीभर 'शिकन' उनके चेहरे पर नजर नहीं आती। न स्वभाव न व्यवहार में ही कभी लगता है कि मियां इस या उस कमाई से 'परेशान' हैं। हर वक्त हंसते-मुस्कुराते और अपने पद की जिम्मेवारी को मुस्तैदी से निभाते रहते हैं! सरकारी पदों की कमाईयुक्त प्रतिभा एवं प्रतिष्ठा यादव सिंहों के कारण ही तो बरकरार है! पिछले दिनों शायद इसी को लेकर नेताजी ने सरकार एवं अधिकारियों को चेताया व हड़काया था। मगर यहां अपनी 'कमाईखोर आदतों' से बाज कौन आया है?

इसी व्यवस्था में कुछ जलनखोर टाइप के लोग भी होते हैं, जिन्हें दाएं-बाएं से कमाई गई दौलत 'पाप' नजर आती है। यह जलनखोरों की 'कु-दृष्टि' का ही नतीजा रहा कि बेचारे यादव सिंह की अभी तलक दाएं-बाएं से कमाई दौलत को 'ग्रहण' लगा गया। यादव सिंह की काली कमाई का सारा चिट्ठा अब सरकार और जनता के सामने है। दाएं-बाएं से कमाई करने के मामले में यादव सिंह ने ऊंचे-ऊंचे अधिकारियों तक को मात दे दी। दो किलो हीरे और 11 करोड़ तो नगद ही मिले हैं। बाकी लाखों की तो बात ही छोड़िए।

वाकई इत्ती कमाई करने में यादव सिंह को कित्ती 'मेहनत' करनी पड़ी होगी! कित्ते ही अफसरों-अधिकारियों-बाबूओं-नेताओं-मंत्रियों का 'ख्याल' रखना पड़ा होगा! न जाने कित्ती ही दफा ईश्वर को भी 'खुश' करना पड़ा होगा! भजन-जागरण-दान न जाने क्या-क्या करना-करवाना पड़ा होगा! मुझे यादव सिंह की इस दाएं-बाएं से की गई कमाई पर 'फख्र' है! ऐसी 'स्मार्टनेस' हर किसी में न होती है प्यारे।

जरूर यह 'भेदिया' यादव सिंह की 'लंका' का ही रहा होगा- जो आज उन्हें फंसाकर खुद 'हंस' रहा होगा।

फिलहाल, अभी यादव सिंह को कुछ दिनों 'रोना' होगा। थोड़े दिनों बाद लोग बाग सब भूल जाएंगे। फिर कोई नया यादव सिंह अपनी करोड़ों की कमाई के साथ सामने आ जाएगा और सारा ध्यान उस पर केंद्रित हो लेगा। हमारे यहां प्रायः ऐसा ही होता चला आया है। इसीलिए तो भ्रष्टाचार अपने पर हर समय हंसता-मुस्कुराता रहता है।

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

ज्योतिष और शिक्षा मंत्री

चित्र साभारः गूगल
तो क्या हुआ अगर वो शिक्षा मंत्री हैं? तो क्या हुआ अगर वो हाथ दिखलाने ज्योतिषी महाराज कने चली गईं? तो क्या हुआ अगर उनके हाथ और भाग्य में 'राष्ट्रपति' बनने की 'लकीरें' हैं? तो क्या हुआ अगर उनकी ज्योतिष और ज्योतिषी में 'अगाध श्रद्धा' है?

लेकिन मीडिया को इस सब से क्या! उसे तो बस हर बात और हर मुद्दे को 'ब्रेकिंग न्यूज' बनाकर चलाने से मतलब। 'टीआरपी' बढ़नी चाहिए, चाहे शिक्षा मंत्री के ज्योतिषी के पास जाने से बढ़े या अपने चैनलों पर कथित ज्योतिषियों को बैठाकर। जबकि शिक्षा मंत्री खुलकर यह कह चुकी हैं कि उनका ज्योतिषी महाराज कने जाना, हाथ दिखलाना, भाग्य जानना, ज्योतिष में आस्था रखना नितांत 'व्यक्तिगत' मामला है। पर भाई लोगों को तो 'चिकोटी' काटने से मतलब। जिसके जो मन में आ रहा है- फेसबुक और टि्वटर पर कथित फोटू को शेयर कर लिखे चला जा रहा है। बताइए, क्या समय आ गया है, मंत्री लोग व्यक्तिगत तौर पर ज्योतिषियों या बाबाओं के पास भी नहीं जा सकते? उनसे कथित आर्शीर्वाद भी नहीं ले सकते? हद है यार।

वैसे, ज्योतिषियों और बाबाओं से नेताओं-मंत्रियों-फिलमी सितारों का पुराना नाता-रिश्ता रहा है। ऐसे तमाम नेता-मंत्री-फिलमी लोग हैं, जो अपने 'अच्छे' की शुरूआत पंडित-ज्योतिषी-बाबा से पूछकर ही किया करते हैं। ग्रहों की चाल-ढाल की जानकारी जित्ती खुद ग्रहों को नहीं रहती, उनके ज्योतिषियों को रहती है। चंद्रास्वामी से लेकर संत रामपाल तक लंबी फेहरिस्त है। और सभी के साथ किस्म-किस्म की कहानियां-विवाद जुड़ें हैं। मगर फिर भी शिक्षा मंत्री का ज्योतिषी महाराज कने जाना, व्यक्तिगत मामला भले ही हो, किंतु उद्देश्य तो 'अगला पद' कौन-सा ही रहा होगा?

कोई आश्चर्य नहीं अगर शिक्षा मंत्री ज्योतिष से प्रभावित होकर संस्कृत की तरह ज्योतिष को भी पाठ्यक्रम में शामिल करवाने की पहल कर दें। आखिर भाग्य जानने की तमन्ना किसके दिल में नहीं होती? अगर इस बहाने ज्योतिषियों की दुकानदारी और अच्छे से चल पाती है तो क्या हर्ज है? आखिर बाजार में कमाई का हक सबको है।

बात जब चली है तो फिर मैं क्यों छिपाऊं कि मेरी 'आस्था' भी ज्योतिष और ज्योतिषियों में अपार है। मैं तो हर हफ्ते सनिचर वाले दिन अपने मोहल्ले के ज्योतिषी महाराज कने जाया करता हूं, अपने भाग्य का उलटा-सीधा जानने। आज जो मैं इत्ता बड़ा लेखक बन पाया हूं, यह सब मेरे मोहल्ले के ज्योतिषी महाराज की किरपा से ही है। उन्होंने बहुत समय पहले ही मेरा हाथ देखकर मुझे बतला दिया था- 'बेटा, एक दिन तुम जरूर 'ऊंचे दर्जे' के लेखक बनोगे। हर अखबार में छपोगे। लेखन से तुम्हें वो प्रसिद्धि मिलेगी, जैसे बड़े-बड़े लेखकों को मिला करती है। बस प्रत्येक सनिचर तुम नीला वस्त्र धारण किया करो। सांप को दूध और गाय को देसी घी की डेढ़ रोटी खिलाया करो। फिर देखना तुम्हारा भाग्य और ग्रह हर वक्त तुम पर 'मेहरबान' रहेंगे।' तब से अब तलक मैं लगातार यही करता चला आ रहा हूं। ज्योतिषी महाराज की किरपा से मेरी लेखन की दुकान मस्त चल रही है। (लेकिन यह मेरा नितांत व्यक्तिगत मामला है। कृपया, इसमें राजनीति कतई न खोजें।)

देख लीजिएगा, अगर शिक्षा मंत्री के ज्योतिषी महाराज ने कहा है कि वे राष्ट्रपति बनेंगी तो अवश्य बनेंगी। क्योंकि नेता-मंत्री लोगों के ज्योतिषी कभी झूठ (!) नहीं बोलते। राजनीति में जाने कित्ती कुर्सियां ज्योतिषियों की भविष्यवाणी पर ही टिकी हैं।

भाई लोगों दिमाग पे अधिक लोड न लो। वे देश की शिक्षा मंत्री हैं। उन्हें मालूम है कि शिक्षा का भाग्य और उनके हाथों की लकीरें ज्योतिष से कैसे संवर-सुधर सकती हैं।

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

न नजरें मिलीं न मिले हाथ

चित्र साभारः गूगल
दुआ न सलाम। न हाय न हैलो। न हाल न चाल। न मुस्कुराहट न रिस्पेक्ट। यानी, दोनों के दिलों में इत्ती 'तल्खियां' बढ़ गईं कि एक दूसरे को नजर भर देखा तलक नहीं। ऐसा व्यवहार प्रेमी-प्रेमिकाओं के बीच तो समझ में आता है किंतु दो देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच ऐसा... लाहौल वला कूवत।

सार्क के बहाने मिले चांस को दोनों ने यों गवां दिया- मानो अब से न हम तुम्हें जानें, न तुम हमें। अमां, ऐसा भी कहीं होता है! रिश्तों में थोड़ी 'गर्मी' की गुंजाइश तो बनी रहनी ही चाहिए। दिल से बेशक न मिलते किंतु नजरों-नजरों में हल्की मुस्कुराहट के साथ तो मिल ही सकते थे। पर गालिब वो भी मिले।

माना कि तल्खियां दोनों तरफ हैं। माना कि रिश्तों में दरारें गहरी हैं। माना कि तोपें अक्सर दोनों तरफ से तन जाती हैं। माना कि कट्टरपंथियों-चरमपंथियों की पौ बारह है। मगर फिर भी एक बड़े मंच पर दो देशों के आला मालिक पहुंचे और एक दूसरे को देखें भी नहीं... मन के भीतर 'तिल्ली' सी लग गई, कसम से। घर के बच्चे रह-रहकर सवाल पूछ रहे हैं कि क्या इत्ते बड़े-बड़े नेताओं के बीच भी कट्टा-कुट्टी चलती है? इत्ता तो हम स्कूल में अपने साथियों के साथ भी नहीं करते। देर-सवेर देख और हंस-बोल लेते ही हैं। अब उनको क्या समझाएं कि यहां माजरा ही दूसरा है। दोनों देशों के अहम इस कदर 'हरे' हो चुके हैं कि गुंजाइश खत्म-सी हो गई है।

बड़े भाई और छोटे भाई के बीच 'समाप्त' होता यह 'शिष्टाचार' दिल पर कई-कई छुरियां चला रहा है। मगर मीडिया या अति-राष्ट्रवादियों को इससे क्या? वो तो जैसे हर बात, हर तल्खी पे बस 'मजा' लेने के लिए ही बने हैं। मोदी-शरीफ के बीच आई बेरूखी को कुछ यों दिखलाया जा रहा है कि मानो यह दुनिया का 'आठवां आश्चर्य' हो। इसे गिनिज बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज करवाया ही जाना चाहिए। इस देश के मीडिया और उस देश के मीडिया के बीच टीवी पर जमकर 'बचकानी किस्म' की बहसें हो-चल रही हैं। बहसों को देखकर लग रहा है कि किसी सब्जी मंडी में खड़े हैं और आलू-प्याज पर जबरन मौल-भाव हो रहे हैं। मिले आपस में वे दोनों नहीं हैं, दर्द इनके और उनके पेटों में उठा रहा है। हद है प्यारे।

यों भी, भारत-पाकिस्तान के बीच कुछ होने या न होने वाला मीडिया के लिए महज 'मसाला' भर होता है। ऊपर से सोने पे सुहागा विकट किस्म के देशप्रेमी लोग कर देते हैं। अभी कुछ दिनों तलक मीडिया इसी बेरूखी के बहाने हमें-आपको पकाएगा।

कहें कुछ न मगर मियां नवाज शरीफ चेहरे से और चाल में काफी बुझे-बुझे से नजर आ रहे थे। मानो- कोई उनके खेत से मूली चुराकर ले भागा हो। मियां को गलती का एहसास है मगर कबुलेंगे क्यों कर... नाक न छोटी हो जाएगी उनकी। सारा मसला तो आखिरकार नाक की चौधराहट का ही है। मियां चाहते हैं, उनकी नाक पाकिस्तान से लेकर कश्मीर तलक ऐसे ही फैली रहे। वे नुथने फुलाते रहें और हम 'सहम' से जाते रहें। हम दोस्ती का हाथ दें और वे ऐंठ में झिड़क दें।

मियां ऐसे तो न चलेगा। आखिर हम भी लोकतांत्रिक मुल्क हैं। हमारी भी साख है दुनिया में। साख को यों शर्मसार कर क्या हासिल?

खैर, इस दफा हमारी-उनकी न नजरें न हाथ मिले पर इत्ती सलाकत तो दोनों के दरमियां रहनी ही चाहिए कि मन भर मुस्कुरा दें। उम्मीद ही कर सकते हैं कि आगे ये आपसी कड़वाहटें थोड़ी कम होकर रिश्तें सुधरेंगे। बाकी तो जो है सो है ही प्यारे।

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

बग्घी पर सवार समाजवाद

चित्र साभारः गूगल
बबुआ, धीरे-धीरे आने वाले समाजवाद के दिन लद चुके। अबकी समाजवाद विक्टोरियाई शैली की बग्घी पर सवार होकर आया है। बग्घी पर समाजवाद पूरी शान, पूरी ताकत के साथ आया है। और, क्यों न आए? जमाने में जब वक्त के साथ सबकुछ अदल-बदल रहा तो क्या समाजवाद नहीं बदलेगा? अमां, कब तलक समाजवाद बैलगाड़ी या रिक्शे की सवारी करता रहेगा? समजावाद ने खुद को लैपटॉप से लेकर मेट्रो ट्रेन तक खूब बदला है। न न अब इस मुद्दे पर बहस बे-मानी है कि बदले हुए इस समाजवाद ने समाज या जनता का कित्ता भला किया? ऐसी बहसों में समाजवादियों का मन नहीं लगता।

बग्घी पर सवार होकर आए समाजवाद को 'सामंती' कतई न कहें। यह हमारे नेताजी के 75 के होने का 'सुअवसर' था। 75 का होना और इत्ते सालों तलक समाजवाद को देश-समाज के भीतर जिंदा (!) रखना, कोई 'मजाक' थोड़े था प्यारे। लोग बाग जाने कहां-कहां जाकर अपना बर्थ डे मानते हैं। मगर नेताजी ने तो इसे हमारे (जनता के) बीच बग्घी पर सवार होकर मनाया। 75 फुट लंबा केक भी काटा। और, बर्ड डे को नाम दिया- 'समता दिवस'। यानी, नेताजी बर्ड डे पर भी समता, समानता और जनता को न भूले! बड़ी बात।

अब कहने वाले नेताजी के बर्ड डे को लेकर कुछ भी कहते रहें। यहां कौन-सा समाजवाद या समाजवादी की सेहत पर कोई 'फर्क' पड़ रहा है। जब बड़ा पेड़ हिलता है, तो कुछ अवाज तो होती ही है। और फिर बबुआ यह समाजवाद है समाजवाद। समाजवादी राज में जो कुछ भी किया जाता है जनता के हितों और समाजवाद को मजबूती देने के लिए ही किया जाता है। बग्घी पर आए इस समाजवाद को जनता के हित में ही देखा-समझा जाना चाहिए!

जनता के पैसे का इससे बेहतर 'समाजवादी इस्तेमाल', मुझे नहीं लगता, दूसरा कुछ होगा! नेताजी केवल समाजवाद के नेता थोड़े ही हैं, जनता के भी तो नेता हैं। तो क्या जनता का मन नहीं करता, अपने प्रिय नेताजी के तईं थोड़ा-बहुत खर्च करने का। सो, 'समता दिवस' (बर्ड डे) के बहाने कर दिया। समाजवाद को मजबूती देने में जनता का बहुत बड़ा हाथ रहा है। बग्घी पर सवार होकर नेताजी ने सबको यह बता-दिखा दिया है।

मुझे पक्का विश्वास है कि बग्घी पर सवार समाजवाद को देखकर लोहिया की 'आत्मा' जरूर 'निहाल' हुई होगी! मन में एक दफा सोचा जरूर होगा कि काश! ऐसा समाजवाद हमारे समय में आ पाता। लेकिन लोहिया ने दूसरे ही पल संतोष कर लिया होगा- तब के समाजवाद और अब के समाजवाद में वक्त के साथ बदलाव तो आएगा ही। अब जो है वो बस यही है।

लोहिया के दौर को बीतते साफ देख पा रहा हूं। यह दौर एक नए समाजवाद का है। जोकि बग्घी पर सवार होकर आता है और बर्ड डे भी सेलिब्रेट करता है। जय हो समाजवाद की।

रविवार, 23 नवंबर 2014

संकट में बाबा लोग

चित्र साभारः गूगल
पहले बाबा आसाराम अब बाबा रामपाल। एक-एक कर हमारे देश के बाबा लोग अगर यों ही अंदर होते रहे तो संपूर्ण बाबा-बिरादरी पर 'संकट के बादल' गहरा जाएंगे! सबकुछ 'तहस-नहस' हो जाएगा। सनातनी परंपरा बिन बाबा लोगों के 'बेसहारा' हो जाएगी। धर्म का क्या होगा? भक्त लोग किस बाबा के दरबार अपना और अपने कष्टों का निवारण करवाने को जाएंगे।

कभी सपने में भी न सोचा था कि बाबा लोगों का ऐसी 'दुर्गत' होगी। आलिशान आश्रमों में रहने वाले बाबा लोग जेल की काल-कोठरी में रहेंगे। भक्त-समाज को उसके कष्टों से मुक्ति दिलाने वाले बाबा लोग आज खुद ही कष्ट में हैं। जेल के भीतर खड़े इत्ते बेचारे नजर आ रहे हैं- मानो कोई 'शातिर अपराधी' खड़ा हो। ऐसे में तो ध्यान लगाने पर भी आंखें बंद न होती होंगी उनकी।

निश्चित ही यह बाबा लोगों की इज्जत पर संकट का समय है। ताज्जुब है, संकट के इस समय में उनका ईश्वर भी कोई चमत्कार-वमत्कार नहीं दिखा रहा। जिस ईश्वर की किरपा की खातिर बाबा लोगों ने अपनी इत्ता बड़ी सल्तनत खड़ी की। देश से लेकर विदेश तक में इत्ते सारे भक्त-चेले बनाए। इत्ती जमीन और धन अर्जित किया। राजनीति और नेताओं के बीच पक्की सांठ-गांठ स्थापित की। इत्ता सब करने के बाद भी ईश्वर बाबा लोगों के संकट में उनके साथ नहीं है। हद है। फिर काहे की बाबागिरी और काहे की ईश्वर-भक्ति?

यह सही है कि अब बाबा लोग पहले जमाने जैसे न रहे। काफी बदल गए हैं। आराम-तलबी और एय्याशी बाबागिरी के साथ-साथ चलती रहती है। तो क्या हुआ...। जमाना बदला, वक्त बदला तो क्या बाबा लोग नहीं बदलेंगे? बाबा लोगों के रहन-सहन का इस्टाइल न बदलेगा। आखिर बाबा लोगों का भी तो मन करता ही होगा भौतिक एवं सामाजिक सुखों को भोगने का। बाबागिरी तो पूरे जनम का खेला है ही। ऐसे में अगर बाबा लोग कुछ संपत्ति या अपने आश्रम को महलनुमा बना लेते हैं, तो क्या गलत करते हैं। यह सब उनके भक्तों का ही तो दिया होता है। दुकान चलाने के लिए संसाधनों की जरूरत तो पड़ती ही है। क्या नहीं...।

बेचारे रामपाल की अच्छी-खास चलती दुकान को पलभर में जमींदोज करवा दिया। आलिशान आश्रम को कबाड़ बना दिया। भक्तों को निकाल बाहर किया। और, संत रामपाल को सलाखों के पीछे खड़ा कर दिया। सलाखों के पीछे खड़े रामपाल किसी हारे हुए जुआरी से कम न लग रहे थे। देखते ही देखते दुकान भी गई और संतई भी। मिला क्या... जेल की हवा और चक्की का आटा।

यही समय है बाबा लोगों के एकजुट होने का। सरकार के साथ-साथ बाबा-विरोधियों का 'प्रतिकार' करने का। तलाब में अगर एक मछली गंदी निकल आई इसका मतलब यह थोड़े है कि पूरा तलाब ही 'अपवित्र' हो गया। यों भी, गलतियां किससे नहीं होतीं। कभी-कभी बाबा लोग भी गलतियां कर बैठते हैं। लेकिन दुकानदारी तो बंद नहीं होनी चाहिए न। अगर बाबागिरी की दुकान बंद हो गई तो अंध-भक्त श्रद्धालु लोग कहां जाएंगे? मेहनत की कमाई (!) किसको दान करेंगे? किसके आगे दंडवत्त हो आर्शीर्वाद लेंगे।

बाबा लोगों की पीड़ा मुझसे देखी नहीं जाती। इत्ती मेहनत करके तो बाबा बने। अब जब बाबागिरी की दुकान चलाने का समय आया तो धरकर अंदर कर दिया। ऐसे ही अगर चलता रहा तो एक दिन हमारे देश में बाबा लोग ढूंढें से न मिलेंगे। फिर मंदिरों और मठों का क्या होगा? ईश्वर भी अकेले पड़ जाएंगे तब तो।

मेरी चिंता को यों हलके में न लें। केस को समझें। बाबा लोगों के दम पर ही हमारी सभ्यता-संस्कृति और धर्म की बुनियाद टिकी है। बाबा लोगों पर आया संकट समूची बाबा-बिरादरी के तईं खतरे की घंटी है। दुआ करें, यह घंटी अधिक तेज न हो। बाकी तो जो है सो है ही।

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

काले धन का रूतबा

चित्र साभारः गूगल
काले धन ने अपना क्या 'रूतबा' गांठा है। आज हर किसी की जुबान पर बस काले धन के ही चर्चे हैं। चाहे किसी के पास हो या न हो लेकिन 'चाहत' यही है कि थोड़ा काला धन हमारे पास भी होना चाहिए था! काला धन पास होता तो सरकार से लेकर मीडिया तक में नाम के चर्चे होते। चार लोग एक-दूसरे को जानते। न केवल देश बल्कि विदेशी अखबारों में भी मय सेल्फी नाम छपता।

न जी न अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस मामले में किस तरह से 'बदनाम' हो रहे हैं। बदनामी बंदों के लिए अब 'सेकेंडरी' चीज हो गई है। मतलब तो नाम होने से है। चाहे काला धन रखने पर हो या कोयला। तरह-तरह के घपलों-घोटालों में अब तलक न जाने कित्तों के नाम सामने आए हैं, कुछ तो जेल की हवा भी खा आए हैं लेकिन मजाल है उनके चेहरों पर किसी ने 'शिकन' तक देखी हो। या उन्हें अपनी बदनामी का अहसास भी हुआ हो। चाहे जेल जाकर ही सही पर नाम तो हुआ न। अब नाम होना बदनाम होने से कहीं ज्यादा जरूरी है प्यारे।

देखिए न, कित्ता हंगामा मच रहा है काले धन पर। तमाम तरह की चीजें-बातें एक-एक कर सामने आ रही हैं। काला धन रखने वालों के कुछ नाम भी सामने आए हैं। समाज के ईमानदार लोग उन पर 'लानत' भेज रहे हैं। मगर क्या उनकी 'सेहत' पर कोई असर पड़ा? क्या उनके चेहरे बुझे हुए से दिखे? क्या उन्हें अपने करेक्टर की चिंता हुई? नहीं न। तो फिर हम-आप क्यों परेशान हैं कि हाय! उनके कने काला धन है। हाय! उनके पास नंबर दो की कमाई है।

सच यह है कि अब कोई अपनी बदनामी पर 'शर्मसार' नहीं होता। बदनामी अब 'उच्च-चरित्र' का 'प्रमाणपत्र' बन गई है। बेशक आपके कने काला धन हो या आपकी करतूतें काली हों- समाज में 'इज्जत' आपकी वैसी ही बनी रहेगी। यहां आपसे आपकी बदनामी का सबब पूछने कोई नहीं आएगा। क्योंकि लोगों कने इत्ता समय ही कहां है, जो बेफालतू के कामों में अपना कीमती समय खोटी करें।

यह तो सिर्फ काला धन है समाज में अपने रूतबे की ठसक बरकरार रखने के लिए इंसान क्या-क्या नहीं करता। रूतबा गांठने के लिए वो अपने घर का कूड़ा पड़ोसी के दरवाजे पर डालने तक में शर्म महसूस नहीं करता। चाहे विधायक या सभासद ही क्यों न हो- रूतबा गांठने के लिए उसे अपनी गाड़ी की नेमप्लेट पर लिखना कभी नहीं भूलता।

प्यारे, पूरी दुनिया ही रूतबे के जलवे के बल पर चल रही है। रूतबा चाहे काला धन रखकर बने या काला जादू चलाकर कौन 'परवाह' करता है यहां?

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

अजी, भगवान रोहित शर्मा बोलिए

चित्र साभारः गूगल
बस मौका मिलना चाहिए हम तुरंत अपने 'भगवान' गढ़ लेते हैं। भगवान गढ़ने के लिए हमें ज्यादा सोचना-समझना नहीं पड़ता। जहां बाजार का रूख और दीवानों की चाहत होती है, उसी में से एक भगवान निकल आता है। फिर जमकर भगवान को दोनों तरफ से भुनाया जाता है। मीडिया से लेकर विज्ञापन जगत तक में भगवान की पूछ होती है।

अभी तलक हमारे कने सचिन तेंदूलकर नाम के भगवान हुआ करते थे। कुछ समय विराट कोहली में भी भगवान का अक्स देखा गया। लेकिन श्रीलंका के खिलाफ 264 रन की 'चमकदार' पारी खेलकर अब हमें रोहित शर्मा के रूप में एक 'नया भगवान' मिला है। आइए, हम सब क्रिकेट के इस नए भगवान का स्वागत-सत्कार करें।

सही है न, कुछ दिन रोहित शर्मा को भी 'आनंद' ले लेने दीजिए अपने भगवान सरीखा होने का। कुछ दिन मीडिया को रोहित शर्मा के बहाने अपनी टीआरपी बढ़ाने और बाजार व विज्ञापन जगत को अपने नए ब्रांड हीरो से नोट कमा लेने दीजिए। क्या हर्ज है। बाजार का सीधा-सा फंडा है, जो चमकता है वो ही बिकता है।

रोहित शर्मा ने श्रीलंका के खिलाफ 264 रन ही नहीं बनाए बल्कि अपनी तरक्की, अपने मजबूत पैर जमाने के तमाम रास्ते खोले दिए हैं। देखते रहिए, अब रोहित शर्मा की पहचान एक क्रिकेटर के रूप में कम विज्ञापन के एंटरटेनर के रूप में ज्यादा होगी। क्योंकि हमारी टीम इंडिया के खिलाड़ियों का यह गुडलक रहा है कि वे अच्छी परफारमेंस देने के बाद तुरंत किसी न किसी कंपनी के ब्रांड या विज्ञापन जगत के हीरो हो-बन जाते हैं। यह परंपरा सचिन से लेकर विराट कोहली तक कायम है।

जबकि अन्य खेलों में खिलाड़ी कित्ता ही जोर क्यों न लगा ले उसे केवल जरूरत के मुताबिक ही पूछा या समझा जाता है। कुछ इनाम-इकराम देकर उस खिलाड़ी से किनारा कर लिया जाता है।

किंतु क्रिकेट के खिलाड़ी होने का अपना अलग ही सुख है। यहां एक अच्छी पारी में ही बंदा भगवान और बुरी पारी में खाक में मिला दिया जाता है। बेचारे अपने वीरेंद्र सहवाग को ही देख लो। आज सहवाग न बाजार में है न विज्ञापन में। मगर सचिन रिटायर्ड होने के बाद भी दोनों जगह डटे हुए हैं। भगवान होने का फायदा।

बहुत संभव है कि अब कुछ रोहित शर्मा जैसा बनना चाहते चाहेंगे। उनके जैसा खेलना चाहेंगे। क्यों न हो, आखिर रोहित शर्मा ने वन डे में 264 रन जो ठोके हैं। जो ठुकाई करेगा उसे पूजा जाएगा। यही क्रिकेट की चाहत का रूल है प्यारे।

चलो खैर रोहित अभी तुम कुछ दिन खुद में भगवान होने जैसा फील करो। हमने तुम्हें भगवान जैसा मान लिया है। तुम्हारी असली किस्मत तो अभी बाजार और विज्ञापनों की चकाचौंध से चमकने वाली है। हम क्रिकेट के गढ़े हुए भगवानों को प्रायः ऐसे ही सिर पर बैठाते हैं।

अगर सरकार न होती तो जनता भी कहां होती!

चित्र साभारः गूगल
भला ऐसी कौन-सी सरकार होगी जो जनता की चिंता न करती हो? दिन-रात जनता की फिक्र में न लगी रहती हो? जनता के जागने से पहले न जागती और जनता के सोने से पहले न सोती हो? जनता की तरक्की पहले अपने हित बाद में देखती हो?

जी हां, यकीन कीजिए, बरसों से हम ऐसी शालीन-सुशील सरकारों के बीच ही तो रहते चले आए हैं! न जी मैं झूठ नहीं सौ टका सच बोल रहा हूं। सरकार है तो जनता हैं। वरना, जनता को कौन पूछता है?

खैर जाने दीजिए पिछली सरकार ने जो किया सो किया। वैसे इत्ता बुरा भी न किया! ठीक है.. कुछ घपले-घोटाले अवश्य किए पर बदले में मनरेगा, आधार, आरटीआइ आदि भी तो दिया। यों, कमियां किस सरकार या नेता में नहीं होतीं। जनता का फर्ज है, सरकार और नेता लोगों की कमियों पर परर्दा डाल केवल अपने काम से मतलब रखना। भई, मैं तो यही करता हूं। अपनी इज्जत के माफिक ही सरकार को इज्जत देता हूं। आखिर सरकार मेरी माई-बाप जो ठहरी।

अब वर्तमान सरकार को ही लीजिए। क्या 'चकाचक' सरकार (अ-भक्तों से माफी साहित) है। पहले दिन से ही- प्रधानमंत्री के साथ- सिर्फ और सिर्फ जनता के भले में जुट गई है। गजब यह है कि सरकार से कहीं ज्यादा, जनता के प्रति फिकरमंद, प्रधानमंत्री हैं। पहले दिन उन्होंने संसद की सीढ़ियों पर मत्था क्या टेका जनता उनकी 'मुरीद' हो गई। न केवल अपनी बल्कि विदेशी घरती पर भी अपनी छवि की धाक जमा आए। आजकल जिधर देखो उधर बस प्रधानमंत्री के ही चर्चे हैं। अब सरकार से ज्यादा महत्त्वपूर्ण प्रधानमंत्री हो गए हैं। इससे भक्त लोग भी खासा खुश हैं।

मगर फिर भी सरकार जनता के तईं अपना काम निरंतर कर रही है। चुनावों में किए गए वायदों को भिन्न-भिन्न तरीकों-तकनीकों के माध्यम से पूरा करने की कोशिशों में लगी है। न न 'हंसिए' मत। खुली आंखों से देखिए सरकार के कामों को।

प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किया गया सफाई अभियान ही देख लीजिए। सोशल नेटवर्क के साथ-साथ पब्लिक डोमेन में भी कित्ता हिट जा रहा है। टीवी और अखबार में सेल्फियों के साथ कित्ते ही बड़े-बड़े नेता-सेलिब्रिटी-बिजनेसमैन झाड़ू लिए देखने को मिल रहे हैं। गली-मोहल्लों तक में हर कोई झाड़ू थामे सेल्फियों के साथ सफाई करने-करवाने में जुटा है। सबका एक ही उद्देश्य है- सड़क और घर-बाहर को गंदगी-कचरा मुक्त रखना। अभियान को झाड़ू और सेल्फी के साथ 'प्रमोट' किया जा रहा है। यह बड़ी बात है प्यारे।

जन-धन योजना में भी सरकार की मंशा जनता-हित ही तो है। सरकार चाहती है कि हर किसी का बैंक में अकाउंट हो। अपनी कमाई बैंक में रखे। आड़े-टेढ़े वक्त में बैंक की सहायता ले। इसीलिए उसने गरीबों को भी बीमा की सुविधा दी है। ताकि मरने पर परिवार को कोई 'आर्थिक-गम' न हो। अब इसे सरकार का जनता के प्रति मोह या हित न कहें तो और क्या कहेंगे।

काले धन पर सरकार ने जनता से किया वायदा निभाया। चक्करबाजी में उसे कोर्ट की करारी फटकार तक सहनी पड़ी। लेकिन काला धन वापस लाना है तो लाना है। खुद प्रधानमंत्री भी बोल चुके हैं कि पाई-पाई काला धन लाकर ही चैन की सांस लेंगे। अब इससे ज्यादा सरकार और क्या करे।

सरकार ने सबसे बड़ा चमत्कार महंगाई दर में कमी करके किया है। हमें 'सस्ताई के युग' में लाकर खड़ा कर दिया। खबरिया चैनल वाले और अखबार बता रहे हैं कि यहां-वहां महंगाई कम हुई है। मसलन, सोना-चांदी सस्ता हुआ है। कच्चा तेल सस्ता हुआ है। स्मार्टफोन सस्ते हुए हैं। कंप्यूटर से लेकर साड़ी-चप्पल तक सस्ती हुई है। दूध-आटा-दाल-तरकारी-मकान भी शायद जल्द ही सस्ते होगें। चिंता न करें, सरकार प्रयासरत है। सेंसेक्स में बनी भीषण तेजी हमें एक नए 'गुलाबी आर्थिक युग' में ले जाएगी। सेंसेक्स की बढ़त पर दलाल पथ से लेकर दलालों तक के चेहरे खिले हुए हैं। बेतरतीब पैसा आ रहा है। हम सरकार के कारण ही आर्थिक स्तर पर मजबूती पा रहे हैं।

इत्ता सब सरकार जनता के लिए ही तो कर रही है। सरकार है इसीलिए तो जनता का अपना वजूद है! क्या नहीं...। 

बुधवार, 19 नवंबर 2014

28 हजारी सेंसेक्स

चित्र साभारः गूगल
दलाल पथ पर घी के दीए जलाइए। मिठाइयां बांटिए। जश्न मनाइए। आतिशबाजी छोड़िए। क्योंकि... हमारा प्यारा सेंसेक्स 28 हजारी हुआ है। स्टॉक मार्केट में 2008 के बाद फिर से तेजी का माहौल बनने लगा है। लोगों के चेहरों पर पड़ी हताशा की धूल छंटने लगी है। लंबे समय बाद अर्थव्यवस्था में 'गुलाबी सुधार' के 'अच्छे दिन' दिखना शुरू हुए हैं। महंगाई ने अपने तेवर ढीले किए हैं। घर का बजट भी अब संभलने लगा है।

सेंसेक्स को यों 'मुस्कुराते मूड' में देखना कित्ता सुखद प्रतीत होता है, यह कोई मुझसे पूछे। पिछली काले दिनों को बिसरा सेंसेक्स अपनी गति बढ़ता ही चला जा रहा है। सेंसेक्स में खुद को संवारने का जित्ता साहस दिखता है, उत्ता तो हम इंसानों में नहीं होता। एक लिमिट के बाद हम इंसान भी 'डू' बोल देते हैं मगर सेंसेक्स का न केवल खुद से बल्कि बिगड़ैल आर्थिक परिस्थितियों से भी संघर्ष करना जारी रहता है। यह लगातार संघर्ष करते रहने का ही परिणाम है कि आज हमारा सेंसेक्स 28 हजार के शिखर पर है। अमेरिकी और यूरोपिए बाजारों से खासा आगे।

पेट्रोल-डीजल के दामों का लगातार कम होना और महंगाई दर का लुढ़ना, साफ बताता है, कि सेंसेक्स में बनी तेजी कित्ता असर जमा रही है। हर ओर से हमारे सेंसेक्स की शान में तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही है। मौहल्ले के नुक्कड़ से लेकर चौकी चौराहे तलक हर किसी की जुबान पर बस सेंसेक्स के ही चर्चें हैं। लोग बाग सेंसेक्स की तेजी में अब अपना 'भविष्य' देखने लगे हैं। जिन दीवानों ने अभी तलक शेयर बाजार में अपनी पूंजी को डूबोया ही डूबोया था, अब कमाई के फंडे तैयार करने में जुटे हैं।

देखा दुनिया वालों ऐसे आते हैं 'अच्छे दिन'! अब तो मानोगे न, प्रधानमंत्री का अच्छे दिनों का नारा कोरी हवाबाजी नहीं था। जब पूरी दुनिया प्रधानमंत्री के काम को मान रहिए तो क्या हमारा सेंसेक्स न मानेगा! सेंसेक्स की अच्छी चाल हमेशा अच्छे कामों पर ही निर्भर रही है। सेंसेक्स जब चलता है तभी अर्थव्यवस्था का इंजन भी दौड़ता है। अर्थव्यवस्था के इंजन के दौड़ने में ही आम आदमी की तरक्की के रास्ते खुलते हैं।

कोई शक नहीं कि सेंसेक्स को सरकार का मूड भा गया है। सेंसेक्स की सरकार के साथ जुगलबंदी निभने लगी है। तो अच्छा ही है न। इत्ते सालों बाद सेंसेक्स को सरकार के रूप में एक 'सहारा' मिला है, जिसे वो अपना कह सकता है। वरना पिछली सरकार ने तो बेचारे सेंसेक्स की कमर ही तोड़कर रख दी थी। सेंसेक्स न इधर का रहा था न उधर का। दुनिया भर में भद्द पिटी थी सो अलग।

टूटी कमर को फिर से सीधा करने में सेंसेक्स ने सात साल का समय जरूर लिया पर अंततः करके दिखा ही दिया। एक ही झटके में मंदड़ियों को ऐसा ध्वस्त किया कि अब बाजार में नजर ही नहीं आते। बुल-बियर की दौड़ में फिर से बुल आगे निकल गया। बेचारा बियर अपनी किस्मत पर रो रहा है कि हाय! मैं बियर क्यों हुआ।

गुजरे समय और खराब वक्त पर खाक डालते हुए यह समय सेंसेक्स के 28 हजारी होने पर 'सेलिब्रेट' करने का है। नई-नई उम्मीदें बांधने का है। अर्थव्यवस्था की गुलाबियत बरकार रहे, यह 'दुआएं' मांगने का है। सेंसेक्स के सहारे आम आदमी के चेहर पर बनी हंसी पर कुर्बान जाने का है। काली अंधेरी कोठरी में से उजले सवेरे की किरणें देखने-दिखाने का। उत्साह जगाने और उमंगें पैदा करने का। यह सब सिर्फ और सिर्फ प्यारे सेंसेक्स के ही तो कारण है।

बाजार में हमारे सेंसेक्स की 'बादशाहत' यों ही बरकरार रहे। बस यही दुआ है।

बुधवार, 12 नवंबर 2014

अच्छे दिनों में सेंसेक्स

चित्र साभारः गूगल
बहुत देख लिए प्यारे सेंसेक्स ने बुरे दिन अब 'अच्छे दिन' देखने का समय है। शिखर पर पहुंचकर इठलाता हुआ सेंसेक्स एक अलग ही फीलिंग दे रहा है। यह फीलिंग अर्थव्यवस्था को गुलाबी रंगत दे रही है। सेंसेक्स के सुर में अर्थव्यवस्था ने अपना भी सुर मिला लिया है। तब ही तो पेट्रोल-डीजल से लेकर महंगाई तक में अच्छे दिन आना शुरू हो चुके हैं। चलो आम आदमी के सिर का कुछ तो बोझ कम हुआ।

मुझे अपने से ज्यादा सेंसेक्स को 'खुश' देखना अच्छा लगता है। सेंसेक्स की खुशी पर ही तो अर्थव्यवस्था की बुनियाद टिकी है। सेंसेक्स जब सरपट-सरपट भागता है तो अर्थव्यवस्था भी उसी गति से भागती है। सरकार भी राहत की सांस लेती है। आम आदमी को महंगाई कम होने से 'सुकून' मिलता है। घर का बजट संभलता। पत्नी के चेहरे पर चमक बढ़ती और किचन की रंगत बदलती है। लोन-शोन का भार भी कुछ कम होता है। नौकरी के तमाम रास्ते खुलते हैं। यह सब प्यारे सेंसेक्स की 'किरपा' का ही तो 'चमत्कार' है।

अब आप लोगों से क्या छिपाना, मैंने तो अपने कमरे में सेंसेक्स महाराज की मूर्ति ही स्थापित कर ली है। दिन में दो टाइम सेंसेक्स महाराज की 'आरती' किया करता हूं। बस यही दुआ मांगता हूं कि हे! प्यारे सेंसेक्स महाराज अब हमेशा अच्छे दिनों में ही रहना। कभी अपना मूड न बिगाड़ना। मुझे और मेरे देश की अर्थव्यवस्था पर अपनी किरपा बनाए रखना। तुम ही हमारा 'वर्तमान' और तुम ही 'भविष्य' हो।

पूरी दुनिया को मैं यह बतला देना चाहता हूं कि हां, मेरी 'संपूर्ण आस्था' सेंसेक्स में है। इसका मुझे 'गर्व' है।

सेंसेक्स की सबसे बड़ी खूबी उसका खुद पर कतई 'घमंड' न करना है। सेंसेक्स एकदम 'कूल मूड' में रहता है। सोना-चांदी-डॉलर की तरह हर वक्त घमंड में नहीं दिखता। हर वक्त घमंड में रहने वालों का 'हश्र' देख लीजिए न आज 'औंधे मुंह' पड़े हैं। न कोई पूछ रहा है न खरीद रहा। सोने-चांदी की फितरत पर कुर्बान रहने वाला वर्ग अब सेंसेक्स की ओर हसरत भरी निगाहों से देख रहा है। मुझे पक्की उम्मीद है, सेंसेक्स उन्हें 'निराश' नहीं करेगा।

अच्छे दिनों के बीच सेंसेक्स की किरपा हम पर ऐसे ही बनी रहे। शेयर बाजार दिन दूनी रात चौगनी तरक्की करता रहे। अर्थव्यवस्था के साथ-साथ आम आदमी के चेहरों पर गुलाबियत कायम रहे। इसके अतिरिक्त हमें और क्या चाहिए! सेंसेक्स बढ़ेगा तो हम सब भी बढ़ेंगे। है कि नहीं...।

सोमवार, 10 नवंबर 2014

पत्नी और आत्मकथा

चित्र साभारः गूगल
जिंदगी में मैंने कभी 'कथा' नहीं लिखी, 'आत्मकथा' क्या लिख पाऊंगा? लेकिन पत्नी का हुकम है- मैं आत्मकथा लिखूं। वो भी अंगरेजी में। आत्मकथा की मार्केटिंग चेतन भगत स्टाइल में करूं। आत्मकथा का विमोचन सचिन तेंदुलकर स्टाइल में।

पत्नी को कित्ती ही दफा प्यार से समझा चुका हूं- आत्मकथा लिखना मेरे बस की बात नहीं। न ही मेरे जीवन में ऐसा कुछ घटा है, जिसे आत्मकथा में दर्ज करवा सकूं। अरे, आत्मकथा तो वे लोग लिखते हैं जिनके जीवन में तमाम तरह के प्रसंग, किस्म-किस्म के संघर्ष, तरह-तरह के अनुभव होते हैं। या फिर वे लिखते हैं, जिन्हें महसूस होने लगता है कि बस जीवन और लेखन का यही 'दी ऐंड' है, अब आत्मकथा लिख ली जाए।

किंतु प्रियवर, मेरे साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं है। मैंने आत्मकथा के लायक न जीवन जिया है न ही लेखन में ऐसा कोई बड़ा तीर मारा है। वो तो 'संपादकों के रहम' और 'भगवान की किरपा' के भरोसे मेरे लेखन की गाड़ी चल रही है। वरना, मेरी औकात तो लेखन का 'ल' लिखने तक की नहीं।
और, तुम कहती हो, मैं अंगरेजी में आत्मकथा लिखूं। अंगरेजी और मैं...। क्या तुम्हें पता नहीं कि बेटी की स्कूल डायरी में तुम्हारे नाम की स्पेलिंग तुमसे पूछकर लिखता हूं? क्या तुम्हें पता नहीं कि मोहल्ले की सोसाइटी-मीटिंग में मैं सिर्फ इसलिए नहीं जाता कि वहां सब अंगरेजी में टॉक-शॉक करते हैं? क्या तुम्हें पता नहीं कि मैं अक्सर अपने नाम की स्पेलिंग भी भूल जाया करता हूं? क्या तुम्हें पता नहीं कि मैं अंगरेजी फिल्में वॉल्यूम बंद करके देखता हूं? क्या तुम्हें यह भी नहीं पता कि हमारी शादी के कार्ड में मेरी बेअक्ली के कारण तुम्हारे पिताजी के नाम की स्पेलिंग गलत छप गई थी? तब कित्ता हंगामा हुआ था बिरादरी में। सबने कहा था, दामाद बाबू का हाथ अंगरेजी में कित्ता तंग है। इत्ते पर भी तुम कहती हो कि मैं आत्मकथा जैसी 'ऊंची चीज' अंगरेजी में लिखूं। यार, क्यों लेखक बिरादरी के बीच मेरी भद्द पिटवाने पर तुली हुई हो। कुछ तो रहम करो मेरी रेप्यूटेशन पर।

मेरे इत्ता समझाने का पत्नी पर कोई असर न था। उसका एक ही हुकम है- मैं आत्मकथा लिखूं केवल अंगरेजी में।

उसने फिर से अपनी टोन में मुझे हड़काया- तुम न केवल शक्ल बल्कि अक्ल से भी हिंदी के ही लेखक नजर आते हो। जरा दिमाग लगाया करो। अगर अंगरेजी नहीं आती तो 'ट्रांसलेट' करवा लो। मैंने कब कहा- आत्मकथा में अपने जीवन या संघर्ष का चिट्ठा खोलकर रख दो। आत्मकथा में अपने लेखन के सबसे विवादस्पद (कंट्रोवशल) हिस्से को लिखो। कब, कहां, किस संपादक, लेखक, साहित्यकार, पाठक से तुम्हारी झड़पें हुईं। किस नुक्कड़ या चौराहे पर तुमको तुम्हारे लेखक साथियों द्वारा हड़काया गया। किन-किन लोगों ने तुम्हारी हूटिंग-बूटिंग की। किस प्रकाशक ने तुम्हारी किताब को छापने से मना कर दिया। किसने तुम्हारी रॉयल्टी का पैसा हजम कर लिया। किस समीक्षक या आलोचक ने तुम्हारे संपूर्ण लेखन को कूड़ा-करकट करार दिया। मतलब, आत्मकथा में कुछ ऐसा 'सनसनीखेज' हो जिसकी खबर बने। रातों-रात विवादों के सहारे तुम स्टारर लेखन पहचाने जाने लगो।

प्यारे पतिदेव, 'कंट्रोवर्सी' ही लेखक को 'ऊंचा' और 'महान' बनाती है। देख लो, सचिन को। एक आत्मकथा के दम पर ही सचिन ने हिंदी-अंगरेजी के बड़े से बड़े लिक्खाड़ लेखकों को पछाड़ दिया है। अपनी किताब की ऐसी मार्केटिंग की- आज हर तरफ सचिन ही सचिन है। सचिन खिलाड़ी होकर भी आज लेखक के रूप में जाना-पहचाना जा रहा है। वही हाल चेतन भगत का है। 'हाफ गर्लफ्रेंड' लेखन जगत में तहलका मचाए हुए है। इन लेखकों के हिसाब से अपना लेखन तय करो।

और हां एक बात कान खोलकर अच्छी तरह से सुन लो- आत्मकथा तो तुम्हें लिखनी ही पड़ेगी (अंगरेजी) में। वरना, तलाक से नीचे अब बात न होगी। समझे।

लेखक होने की इत्ती बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ेगी प्यारे कभी सोचा न था।

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

दांतों की फिक्र में...

चित्र साभारः गूगल
दंत्त-डॉक्टर ने मुझे चेताया है- 'मेरे दांतों पर पान-मसाले का 'पीलापन' लगातार बढ़ता जा रहा है। दांत देखने में भद्दे और चेहरा उजड़ा सा लगने लगा है। अगर दांतों पर गंदगी यों ही बढ़ती गई तो धीरे-धीरे कर मैदान साफ हो लेगा। फिर मैं कहीं का भी नहीं रहूंगा।'

दंत्त-डॉक्टर की चेतावनी के बाद से दांतों के प्रति मेरी 'फिक्र' बढ़ गई है। मैं रात-दिन दांतों के 'भविष्य' के बारे में सोचने लगा हूं। मेरा अत्याधिक सोचना मुझे धीरे-धीरे कर 'डिप्रेशन' की ओर धकेल रहा है। मुझे दांतों पर पड़े पीलेपन की इत्ती फिक्र नहीं है, जित्ती कि झड़ने की। मैं दांत ही क्या, किसी भी प्रकार के झड़ने-झगड़ने से घबराता हूं।

दांतों के प्रति मेरी फिक्र तब और दोगुनी हो जाती है, जब मैं मेरे मोहल्ले के पोपलों को देखता हूं। भाग्य या दुर्भाग्य से- मेरे मोहल्ले में जित्ते पोपले हैं, उत्ते ही गंजे भी। बिन चारे पोपलों को जुगाली भरते और बिन बाल गांजों को खोपड़ी पर हाथ फेरते जब देखता हूं, तो वीपी यकायक 'लो' हो जाता है। मुझे अजीब-अजीब से ख्याल आने लगते हैं। उनमें खुद को देखना शुरू कर देता हूं।

अभी मेरी उम्र ही क्या है? और अभी से दांतों की जुदाई, बर्दाशत से बाहर है प्यारे। इसीलिए मैंने मोहल्ले के पोपलों और गंजों के बीच उठना-बैठना 'न' के बराबर कर दिया है। कभी कहीं किसी पोपले ने मेरे दांतों के बाबत पूछ ही लिया तो...।

मैं बार कोशिश कर चुका हूं पान-मसाले से छूटकारा पाने की। लेकिन ससुरा छूटता ही नहीं। जिस दिन न खाओ, ऐसा लगता है, कोई बेहद 'महत्त्वपूर्ण चीज' खाने-चबाने से रह गई। मैं जानता हूं, मेरे किए की सजा, मेरे दांत भुगत रहे हैं। लेकिन आदत तो आदत है, क्या कीजिएगा। एकाध दफा तो मैं पल्ले मोहल्ले के झाड़-फूंक विशेषज्ञ कने भी जा चुका हूं मगर उससे भी कुछ हासिल नहीं हुआ। घर-परिवार में मजाक और बनने लगी कि मैं झाड़-फूंक में यकीन करता हूं। अब उन्हें क्या समझाऊं, जब पड़ती है तो इंसान सब में यकीन करने लग जाता है।

फिर सोचता हूं, मुझे ले-देके मात्र एक ही तो शौक है- पान-मसाले का। और दांतों की फिक्र में उसे भी छोड़ दूं! कल को ऊपर वाले को क्या मुंह दिखाऊंगा! कहीं उसने मुझसे मेरे 'प्रिय शौक' के बारे में पूछ लिया तो... क्या मना कर दूंगा, मेरा कोई शौक नहीं! तब कित्ती 'भद्द' पिटेगी मेरी उसके सामने।

लेकिन दूसरी तरफ दांतों पर पड़े पीलेपन की फिक्र भी मुझे दुबला किए जा रही है। फिलहाल, उधेड़-बुन में हूं कि दांतों की फिक्र करूं या शौक को जिंदा रखूं। अगर आप राय दे सकें तो बेहतर होगा। इंतजार में...।

बुधवार, 5 नवंबर 2014

'जॉली मूड' में सेंसेक्स

चित्र साभारः गूगल
चढ़ते सेंसेक्स ने केवल दलाल पथ बल्कि अर्थव्यवस्था का मूड भी 'जॉली' बना दिया है। जित्ती रौनक दलाल पथ पर देखने को मिली रही है, उत्ती ही अर्थव्यवस्था में भी। ऊपर से कच्चे तेल का नरम पड़ना और पेट्रोल-डीजल की कीमतों का घटना, साफ बता रहा है कि अब 'अच्छे दिन' आने से कोई माईकालाल नहीं रोक सकता। देखते जाइए, महंगाई अपनी किस्मत पर रोने लायक भी नहीं रहेगी। और, सोने-चांदी के खराब हुए दिमाग जल्द ही ठिकाने आ जाएंगे।

अब दलाल पथ पर जो भी मिलता है बड़े 'जॉली मूड' में दिखता है। हर तरह की आर्थिक फिक्र से बेफिक्र। चेहरे की रंगत गुलाबी और चलने का ढंग नबाबी। बंबई स्टॉक एक्सचेंज की बिल्डिंग को कुछ इस नजाकत से देखता है, मानो बहुत जल्द उसका भी कद इत्ता ही ऊंचा होने वाला है। सेंसेक्स के दम पर दुनिया हमारे कदमों में आने वाली है। क्यों न हो, अब तो अमेरिका भी हमारे सेंसेक्स का 'लोहा' मानने को मजबूर हो गया है।

इसमें कोई शक नहीं कि जब सेंसेक्स का मूड जॉली होता है तो अंदर-बाहर बहुत कुछ बदलता है। सेंसेक्स हमारी अर्थव्यवस्था का 'बूस्टर' है प्यारे। सेंसेक्स की तेज चाल को अब राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तरजीह मिलने लगी है। न केवल हमारे देश बल्कि अन्य देशों के लोग भी हमारी ओर उम्मीद भरी निगाहों से देखने लगे हैं। जाहिर है, उम्मीद रखने से ही किस्मत बदलती है।

लोग ऐसा मानते नहीं पर सेंसेक्स हमेशा हमारा भला सोचता है। अपने लुढ़ने से उसमें नाराजगी रहती है पर उठने की उम्मीद कभी नहीं त्यागता। सेंसेक्स की इसी 'पॉजीटिविटी' का तो मैं कायल हूं। अगर सोच और इरादे पॉजीटिव हैं फिर महंगाई तो क्या दाऊद को भी गिराया जा सकता है। सेंसेक्स ने यह करके दिखला भी दिया है।

आज मेरे भीतर जो 'पॉजीटिविटी' है सब सेंसेक्स के 'जॉली मूड' की ही देन है। सेंसेक्स के मूड से ही मैंने सीखा है, 'कूल' रहना और खामखां के पचड़ों से दूरी बनाए रखना। हां, सेंसेक्स का मूड बिगड़ता तब ही है, जब बेकारण कॉन्ट्रावर्सी पैदा होती है। तब फिर सेंसेक्स को वित्तमंत्रालय तो क्या वित्तमंत्री भी काबू नहीं कर पाते। हर तरफ हाहाकार-सा मच जाता है। कलेजा मुंह को आ जाता है कि हाय! सेंसेक्स ने यह क्या किया।

वैसे सेंसेक्स हमेशा 'जॉली मूड' में रहता है। अच्छे नजीतों पर झूमता है और अच्छी योजनाओं का खुश होकर स्वागत करता है।

हमें सेंसेक्स का यही 'जॉली मूड' तो चाहिए। ताकि बुरे दिन फिर से वापस न लौट सकें।

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

पाई-पाई काला धन!

चित्र साभारः गूगल
अब तो कलेजे में 'ठंडक' पड़ी होगी न। अब तो प्रधानमंत्रीजी ने स्वयं सीना ठोककर कह दिया कि पाई-पाई काला धन लाकर रहेंगे। या अब भी कोई शक-वक बचा है दिल-दिमाग में?

अमां, इत्ते दिनों से सरकार और प्रधानमंत्री एंवई हवा में थोड़े फेंक रहे थे कि काला धन वापस लाएंगे। इसी नारे और वायदे के दम पर ही उन्हें इत्ता विशाल जन-समर्थन मिला है। पार्टी के दिन बहुरे हैं। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं। जनता में उम्मीदें जागी हैं। फिर भला वो कैसे उम्मीदों पर पानी फेर सकते हैं? अगर पानी फेरा तो जनता अगले चुनावों में पानी के साथ-साथ फेरों का भी हिसाब चुकता कर लेगी। इस मामले में देश की जनता बहुत समझदार है। कब, कहां, किससे, कैसा बदला लेना है, सब जानती है। काम करने वाले और काम न करने वाले नेता-मंत्री-विधायक-सभासद सबको पहचानती है। जनता की निगाह से बचके कहां जाइएगा साहेब।

लग तो साफ रहा है कि काले धन के 'भूत' ने न केवल सरकार बल्कि प्रधानमंत्री को भी काफी परेशान किया हुआ है। सरकार के भीतर और विपक्ष ने बाहर दिन-रात काले धन पर 'बहस' छेड़ रखी है। हर कोई सवाल पर सवाल दागे जा रहा है कि मान्यवर, कब तलक ला पा रहे हैं काला धन वापस? बहुतों ने तो वो लाख रुपए की रकम भी अब मांगना शुरू कर दी है, जिसका वायदा मोदीजी ने अपने किसी भाषण में काला धन वापस लाने पर किया था।

न जी न जनता कुछ नहीं भूलती। इसको सब याद रहता है कि किस नेता ने कब और कहां क्या बोला था। यही तो जनता की खूबी है।

खैर इसमें रत्तीभर शक नहीं कि काले धन के मसले ने सरकार की नाक में नकेल डालकर रख दी है। ऊपर से कार्ट की हड़काई के बाद से तो मसला और भी 'पंगात्मक' हो गया है। सरकार ने सोचा था कि सात-आठ नाम खोलकर बात रफा-दफा हो जाएगी। लेकिन क्या मालूम था कि इस तरह से उल्टी पड़ जाएगी। अब सरकार के प्रत्येक नेता-मंत्री को सपने भी काले धन के ही आते होंगे? क्या कीजिएगा, जो वायदा किया, वो निभाना तो पड़ेगा ही। नहीं तो पिछली सरकार महंगाई पर गाई, यह सरकार कहीं काले धन पर न हिल जाएगी!

अब यह भी एक बड़ा मसला है कि पाई-पाई काला धन वापस कैसे आएगा? पाई-पाई का मतलब है न एक पैसा इधर न एक पैसा उधर। हिसाब-किताब एकदम चोखा। लेकिन अभी तो सौंपी गई लिस्ट में ही पूरे नाम नहीं हैं। जित्ते का वायदा किया गया था, उससे भी कम हैं। किसके कने कित्ता काला धन है न यह बात जनता को अभी मालूम चली है। अभी यहां-वहां सिर्फ हवा में ही तीर छोड़े जा रहे हैं। फिर भी, सरकार कह रही है कि काला धन लाएंगे। जरूर लाएंगे। काला धन रखने वालों को सबक भी सिखाएंगे।

यों भी, हमारे देश में किसी बात या मुद्दे का जल्द हकीकत में तब्दील होना इत्ता आसान नहीं होता। कोई न कोई पेंच या पंगा फंस या फंसा ही जाता है। रौ में आकर नेता लोग वायदे बहुत ऊंचे-ऊंचे कर जाते हैं किंतु जब निभाने का नंबर आता है, सिट्टी-पिट्टी गुम। फिर बगलें झांकते फिरते हैं कि कहां मुंह छिपाएं। सब जानते हैं, मुंह छिपाने की कला में हमारे देश के नेताओं का जवाब नहीं। महंगाई, घोटाले, बदजुबानी, अफसरशाही, काला धन आदि पर कोई न कोई रास्ता तलाश ही लेते हैं मुंह छिपाने का।

फिलहाल, प्रधानमंत्री के कहे 'पाई-पाई' शब्दों को हम 'दिमाग' और 'ध्यान' में रखे हुए हैं। उनके किए गए वायदे पर भरोसा बैठाए हुए हैं। काला धन जब पाई-पाई के साथ वापस आ जाएगा तब ही समझेंगे कि उनके कहे पाई-पाई शब्द 'सार्थक' हुए। वरना... तो जो है सो है ही प्यारे।

मैं गधा हूं

चित्र साभारः गूगल
हालांकि यह कहने का मुझे शौक तो नहीं लेकिन इधर कुछ दिनों से मुझे ऐसा महसूस होने लगा है। मेरी सोच, मेरी हरकतों में गधेपन की मात्रा निरंतर बढ़ती ही जा रही है। मसला चाहे सामाजिक हो या साहित्यिक या फिर आर्थिक मैं अपने गधेपन का परिचय दे ही देता हूं। अभी उस रोज भरी सभा में मैंने कह दिया कि 'मैं समाज को अपने दम पर हांक चाहता हूं। साहित्य को दुलत्ती मारना चाहता हूं। आर्थिक समस्या को अपनी पीठ पर ढोना चाहता हूं।' तब ही एक बंदे ने खीझकर कहा कि 'बंधु, आप गधे हैं। आपकी सोच में गधापन व्याप्त है। जाकर किसी अच्छे जानवरों के डॉक्टर से इलाज करवाएं। या फिर अपने मुंह को बंद रखा करें।'

इसका मतलब मेरी बीवी सही कहती थी कि 'मैं गधा हूं'। मैं बीवी के कहे पर ज्यादा कान इसलिए नहीं देता था कि वो फेंकती है। लेकिन उस बंदे की झाड़ ने अब मुझे सौ फीसद यकीन दिलवा दिया है कि, मैं वाकई गधा ही हूं। साथ ही, मैं यह भी मानने लगा हूं कि पतियों के बारे में बीवीयों की राय हर वक्त 'गलत' नहीं होती प्यारे।

वैसे मैं मेरे गधा होने को बेहद 'सहजता' से लेता हूं। इंसानों के बीच एक मैं बंदा हूं, जो गधा प्रजाति के काफी करीब है। वरना, किसी बंदे से एंवई कहकर देख लीजिए- 'गधा' या 'कुत्ता', कसम से आपके सिर पर सवार हो बैठेगा। अरे, कुछ लोग तो 'पागल' शब्द पर ही विदक से जाते हैं। किंतु मैं मेरे गधे होने जैसे का कतई बुरा नहीं मानता। बुरा क्यों मानूं, अब जो हूं सो हूं।

गधा जैसा होकर मैं खुद को किशन चंदर की एक गधे की आत्मकथा के बेहद नजदीक पाता हूं। यह किशन चंदर ही थे, जिन्होंने गधे को इत्ती नेमती बरती कि गधा पाठकों और दुनिया के बीच 'सुपर-हीरो' बन गया। मुझे तो जहां भी कोई गधा नजर आ जाता है, बेहद श्रद्धा के साथ उसके समक्ष नतमस्तक हो जाता हूं। और, उससे गुजारिश करता हूं कि प्यारे अपने गधेपन का असर मुझ पर कायम रखना।

बात थोड़ी कड़वी लग सकती है मगर है सौ टका सत्य कि हम बहुत से मामलों में अभी भी गधे ही हैं। पारंपरिक रूढ़ियों और मानसिक यथास्थितिवाद को खत्म करने की हम हिम्मत कर ही नहीं पाते। जबकि अब हम मंगल पर कदम रख चुके हैं। स्त्री को गुलाम और अहंकार को अपना अधिकार मानते-समझते हैं। कभी-कभी तो हम गधे से भी बदत्तर हो जाते हैं।

गधा होकर गधेपन के साथ रहने में मुझे 'आनंद' आता है। इसे मैं अपने भीतर एक विशेष प्रकार की खूबी मानता हूं। यह खूबी मुझमें ताउम्र बरकार रहे। आमीन।

गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

काले रंग का भय

चित्र साभारः गूगल
इधर, काले रंग और काली चीजों से 'भय' खाने लगा हूं। निगाह जब भी किसी काली चीज पर पड़ जाती है, मन में तरह-तरह की 'शंकाएं' बनने लगती हैं। काली चीज के रूप में कहीं काला धन तो नहीं! काली चीज का बीच रास्ते दिख या मिल जाना कहीं किसी की 'साजिश' तो नहीं। हालांकि मुझे मालूम है कि मेरे कने न काला धन है न काले लोगों के साथ रिश्ते। मगर फिर भी ध्यान तो रखना ही पड़ता है न। क्या पता कब कोई लपेटे में ले ले। जमाना खराब है।

काले को खुद से दूर रखते हुए मैंने घर में पली काली बिल्ली को भी जंगल में छुड़वा दिया है। अपनी काली मोटरसाइकिल बेच दी है। घर के दरवाजों-खिड़कियों पर पड़े सभी काले पर्दें को तत्काल प्रभाव से हटवा दिया है। काले से संबंधित जित्ती रद्दी थी, सब रद्दी-वाले को मुफ्त में दे दी है। पत्नी को साफ बोल दिया है कि घर में- जब तलक अदालत को सौंप गया सील-बंद लिफाफा खुल नहीं जाता और काले नाम पता नहीं लग जाते- किसी प्रकार के काले रंग का इस्तेमाल न करे। सब्जी में न काला बैंगन बनाए न छत पर काले कऊए को ही बैठने दे।

अभी दो रोज पहले सिर के जिन बालों को काला करवाया था, वापस सफेद करवा लिया है। और पत्नी से भी कहा है कि वो भी अपने काले बाल सफेद करवा ले। मेरे और उसके काले कपड़े गरीबों को दान में दे दे। काले रंग से उत्ती ही दूरी बनाकर रखे जित्ती वामपंथी राष्ट्रवादियों से बनाकर रखते हैं। न करीब जाओ, न करीब आने दो। तुम अपने घर खुश, हम अपने।

काले रंग और चीजों के प्रति मेरी सनक को देखकर मोहल्ले में मेरी मजाक बनना भी शुरू हो गई है। पर मैं ज्यादा ध्यान नहीं देता। मजाक बनती है तो बना करे। एक दफा मैंने काले रंग से तौबा कर ली तो कर ली। मोहल्ले वालो का क्या है, उनकी तो आदत है बात-बात में हंसी-ठिठोली करने और मजाक बनाने की। उनकी मजाक पर 'सेंटी' होकर मुझे अपनी भद्द थोड़े न पिटवानी है।

देखिए न, काला धन रखने वाले कैसे फंसते नजर आ रहे हैं। सोचा था कि सात समंदर पार काला धन छिपाकर रख लेंगे, यहां किसी को पता भी नहीं चलेगा। आराम से अपनी काली कमाई पर ऐश करेंगे। न सरकार को खबर होने देंगे न आयकर विभाग को। लेकिन अब पड़ उलटी गई। उधर कोर्ट ने सरकार के कान क्या उमेंठे, तुरंत 627 नामों की लिस्ट का सील-बंद लिफाफा सौंप दिया। फिलहाल, अभी मालूम नहीं चला पाया है कि सील-बंद लिफाफे में कित्ते 'काले नाम' हैं, मगर प्यारे काला तो काला ही है। काला धन और काला धंधा 'गंध' बहुत मारता है।

काले धन के मामले ने बहुतों की नीदें उड़ाकर रख दी हैं। चैन से वो सो भी न पा रहे हैं, जिनके कने काला धन तो खैर नहीं है पर काला दिल जरूर रखते हैं। काले दिल से अब तलक जाने कित्तों को चकमा दे चुके हैं। उन्हें डर है, कहीं काला धन वालो के साथ-साथ काले दिल वालो के खिलाफ भी कोई जांच-वांच शुरू न हो जाए। अब तो काले का नाम लेना ही 'गुनाह' लगता है।

इसीलिए प्यारे काले रंग और काली चीजों से जित्ता बच सकते हो बच लो। एक दफा अगर चेहरे पर 'कालिख' पुत गई तो फिर हनुमानजी भी आनकर न बचा पाएंगे। फिलहाल, मैंने अपना बीच-बचाव शुरू कर दिया है। बाकी आप जानो।

मंगलवार, 28 अक्तूबर 2014

खोदी खान, निकले केवल 'आठ' नाम

चित्र साभारः गूगल
देख लिया न, सरकार काला धन के प्रति कित्ती सजग थी। इत्ती मशक्त और इत्ते इंतजार के बाद आखिरकार सरकार ने आठ नाम बतला ही दिए। नाम भी खुद ही बतलाए और पीठ भी खुद ही थपथपा ली। अब इत्ती बड़ी सफलता का खुद 'क्रेडिट' लेना तो बनता है न। पिछली सरकार ने क्या किया- सिर्फ वायदा ही करती रही- 'आज नहीं कल बताएंगे, कल नहीं नरसों बताएंगे, अच्छा चुनाव निपट लेने दीजिए फिर बतला देंगे। और हां, इत्ता यकीन रखिए कि काला धन रखने वालो को बख्शा कतई नहीं जाएगा। दूध का दूध, पानी का पानी होकर रहेगा।'

खैर, मनमोहन सरकार कहते-कहते ही निपट ली, मोदी सरकार ने कहे तो 'सच' साबित कर दिखाया। इससे पता चलता है कि सरकार जनता से किए गए वायदों के प्रति कित्ती 'प्रतिबद्ध' है!

ओफ्फो, तो क्या हुआ अगर आठ नामों में किसी नेता का नाम नहीं है। किसी नेता कने काला धन होगा ही नहीं, इसीलिए सरकार ने बतलाया नहीं! अगर होता तो क्या सरकार न बतलाती? जरूर बतलाती। सरकार के लिए कोई छोटा-बड़ा नहीं होता! चाहे नेता हो या व्यापारी। यों भी, अभी आठ नाम ही तो सामने आए हैं। हो सकता है, आगे जो खुलासा हो उसमें किसी नेताजी का नाम भी आ जाए! भई, काले धन के प्रति 'मोह' किसका नहीं होता। अगर मेरे कने होता तो क्या मैं अपना काला धन स्विस बैंक में न रखता। जरूर रखता। इससे मेरे 'स्टेटस' में श्रीवृद्धि ही होती।

यू नो, मेरा दिल कहता है कि हमारे देश के 'ईमानदार नेताओं' कने काला धन होगा ही नहीं! बेचारे सारा टाइम तो जन-हित और जन-सेवा जैसे मामलों में बिजी रहते हैं। उन्हें खुद के बारे में सोचने की 'फुर्सत' मिल नहीं पाती, फिर भला काला धन (वो भी स्विस बैंक में) क्या रखेंगे? अरे, काला धन तो नेता लोगों के लिए 'पाप' समान है! है कि नहीं।

अब गौड़ाजी जैसे दो-चार नेता लोगों कने अगर आय से अधिक संपत्ति है भी तो क्या हुआ- कम से कम काला धन तो नहीं है न। सारा माल-मसाला है तो देश में ही न। वो भी नेताजी के खाते में।

नेता लोग राजनीति में काला धन रखने वालो के नामों को उजागर करने और बेईमानी को देश-समाज-जनता के बीच से दूर भगाने ही तो आते हैं! वो भला खुद क्यों काला धन रखने लगे? हालांकि वित्तमंत्रीजी ने पिछली सरकार के एकाध नेता-मंत्री के पास काला धन होने के 'संकेत' जरूर दिए थे किंतु अभी उजागर तो नहीं किया न। हो सकता है, ऐसा उन्होंने 'थोड़ा शक' के आधार पर बोल दिया हो। कभी-कभी राजनीतिक रस्साकशी के कारण ऐसे बोल मुंह से निकल ही जाते हैं। और अगर एकाध नेता या मंत्री का नाम सामने आ भी जाता है तो भी इत्ता हैरान-परेशान होने की जरूरत नहीं क्योंकि पांचों उंगलियां एक जैसी नहीं होतीं।

अब विपक्ष के साथ-साथ कुछ सियाने किस्म के बुद्धिजीवि लोग सरकार के खुलासे पर तरह-तरह के सवाल खड़े कर रहे हैं। मजाक बना रहे हैं। जनता से किए गए वायदों के साथ 'धोखा' बता रहे हैं। कह रहे हैं कि मोदीजी ने खोदी खान, निकले केवल आठ नाम। देखो जी, यह दुनिया है। दुनिया में भांति-भांति के लोग हैं। और लोगों का काम है कहना। तो जिन्हें कहना है उन्हें कहने दीजिए न। किसी के कहने भर से सरकार अपने हितों से समझौता थोड़े ही न कर सकती है। जो नाम सरकार को मालूम पड़े, देश-जनता के सामने रख दिए। एक तो सरकार ने नेता लोगों की 'इज्जत' बचा ली। और ऊपर से वही नेता लोग सरकार की 'नीयत' पर 'शक' कर रहे हैं। कमाल है प्यारे।

चलिए, खान खोदने के बाद अगर आठ नाम निकलकर सामने आए हैं तो क्या इस साहस के लिए सरकार की पीठ नहीं ठोकी जानी चाहिए। बिल्कुल ठोकी जानी चाहिए। ध्यान रखिए, सरकार हमेशा देश-जनता के भले की ही सोचती है।

अब सामने आए इन नामों ने देश-जनता का कित्ता भला होगा- यह आगे देखेंगे- हम लोग। 

सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

सेल्फी का है जमाना

चित्र साभारः गूगल
सेल्फी का क्रेज हमारे बीच निरंतर बढ़ता जा रहा है। अवसर चाहे खुशी का हो या गम का या फिर तीज-त्योहार का एक सेल्फी तो बनती है प्यारे। सेल्फी की सार्थकता केवल अपने फोन या कैमरे में सहेज लेना भर नहीं है। उसे फेसबुक, टि्वटर या वॉट्सएप पर चढ़ाया जाना भी जरूरी है। ताकि सेल्फी पर मिलने वाले लाइक और कमेंट उसकी सार्थकता को दोगुना कर सकें।

किस्म-किस्म के स्मार्टफोन सेल्फी के लिए 'वरदान' साबित हो रहे हैं। जिसके कने जित्ता महंगा स्मार्टफोन, उसकी सेल्फी उत्ती ही मस्त। सेल्फी के तईं कोई, किसी तरह का मूड बनाने की आवश्यकता नहीं। सेल्फी में मूड स्वतः ही बन जाता है। अब चेहरे के व्यक्तित्व की पहचान सेल्फी है। सुना है, ज्योतिषी लोग भी अब सेल्फी के आधार पर ही चेहरे को पढ़ने-वांचने लगे हैं। सब समय के साथ बदलती तकनीक का प्रभाव है प्यारे।

इधर, जब से प्रधानमंत्री का स्वच्छता अभियान क्या शुरू हुआ है, सेल्फियों की बाढ़-सी आ गई है। अब झाड़ू और सेल्फी एक-दूसरे के पूरक बन गए हैं। सियाने लोग झाड़ू बाद में लगाते हैं, पहले सेल्फी पर हाथ साफ करते हैं। हाथों में दस्ताने पहने और बेहद करीने से झाड़ू पकड़े सेलिब्रिटी लोगों के सेल्फी क्या मस्त होते हैं। उनके द्वारा उठाया जाने वाला कचरा भी 'शाश्वत' किस्म का होता है। सबसे खास बात, न वे कभी अकेले कूड़ा-कचरा उठाते हैं, न झाड़ू ही पकड़ते हैं। कुछ खास लोगों का हुजूम उनके साथ बना रहता है, ताकि सेल्फी में जन-समूह के साथ सहभागिता भी दिख सके। क्या जमाना आ गया है कि लोग अब सहभागिता को भी सेल्फी में कैश करने लगे हैं। बढ़िया है।

अभी हाल प्रधानमंत्री की पत्रकारों से हुई मेल-मुलाकात में भी सेल्फियों का दबदबा कायम रहा। कुछ पत्रकारों ने प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी ली और उसे अपने फेसबुक-टि्वटर पेज पर चिपकाया। प्रधानमंत्री ने भी झाड़ू के बहाने कलमबाजों की तारीफ कर उनकी बेरूखी का रूख बदल ही दिया। कलम का झाड़ू के साथ यह मेल-मिलाप खासा सुर्खियों में रहा। हर ओर से तरह-तरह की बातें-विश्लेषण सुनने में आते रहे। कुछ तो पत्रकारों की इन सेल्फियों पर इत्ता नाराज हुए कि मन ही मन अपना मन मसोस कर रह गए। हालांकि दुख उन्हें भी बहुत है कि हाय! हम प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी में क्यों न हुए। चूंकि वे प्रगतिशील विचारों के मालिक हैं फिर कहें किस मुंह से।

लेकिन जो बदलते वक्त के साथ अपनी सेल्फियों के हाव-भाव नहीं बदल पा रहे, जमाना उन्हें अब पूछ भी बहुत कम रहा है। पुरानी सेल्फियों को नई सेल्फियों के साथ कदमताल करनी ही चाहिए ताकि समय के साथ मुंह जोड़कर चला जा सके। जमाना अब सेल्फी का है। जिसकी सेल्फी जमेगी, यहां अब वही टिका रह पाएगा।

फेसबुक-टि्वटर पर हर पल चढ़ती-उतरती सेल्फियां बताती हैं कि हम सेल्फी के प्रति कित्ता क्रेजी हैं। कुछ दीवाने ऐसे भी हैं, जो थोड़ी-बहुत देर में अगर अपनी सेल्फी लेकर फेसबुक-टि्वटर पर न चढ़ाएं तो उनका बल्ड-प्रेशर बढ़ना शुरू हो जाता है। खाना खाने से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है अब सेल्फी लेना। आगे आने वाले समय में इंसान की सेहत का राज सेल्फी से ही जाना-पहचाना जाएगा।

सफाई अभियान, झाड़ू-कलम मिलन और सोशल नेटवर्किंग पर लगातार हिट पाती सेल्फियां अपने जमाने की कहानी खुद कह रही हैं। सेल्फियों के अभी कई प्रकार के रूप हमारे सामने आना बाकी हैं तब तलक मौजूदा सेल्फियों का 'आनंद' लीजिए।

बुधवार, 22 अक्तूबर 2014

सेंसेक्स संग दिवाली

चित्र साभारः गूगल
सेंसेक्स संग दिवाली मनाने का 'आनंद' ही कुछ और है प्यारे। दिवाली पर सेंसेक्स सेंसेक्स न रहकर 'रॉकेट' बन जाता है। दिवाली पर बाजार से ज्यादा सेंसेक्स की मर्जी चलती है। इस दिन सेंसेक्स किसी को निराश नहीं करता। खुद खुश रहता है और दलाल पथ को भी खुश रखने की कोशिश करता है।

सेंसेक्स देश की अर्थव्यवस्था का 'रोल-मॉडल' होने के साथ-साथ बाजार का 'दिल' भी है। अर्थव्यवस्था के चेहरे पर आया गुलाबीपन और बाजार को मिली एनर्जी सेंसेक्स के कारण ही तो बरकरार है। सेंसेक्स जब इठलाता हुआ चलता है, पूरी दुनिया का तन-मन डोलता है। अमेरिका भी हमारे सेंसेक्स के दम भरने पर मन ही मन मुस्कुराता है। क्यों न मुस्कुराएगा, अब हम भी प्रगतिशील देशों की सूची में बहुत आगे तक निकल आए हैं। यह सब हमारे सेंसेक्स की मेहनत का नतीजा है प्यारे।

सेंसेक्स ने बाजार को एक नई पहचान, नई परिभाषा दी है। बताया है, चाहे खुशी हो या गम कैसे मस्त रहा जाता है। त्योहार को 'मार्केट-ओरियंटिड' कैसे बनाया जाता है। अब हर त्योहार पर बाजार की अपनी अलग पहचान है। ग्राहक के बीच खरीदने-बेचने की आदत तो सेंसेक्स की ही देन है। इसीलिए तो दिवाली पर सेंसेक्स और बाजार दोनों की इत्ती पूछ रहती है।
 
मौके को भुनाने की कला सेंसेक्स अच्छे से जानता है। मौका चाहे चुनावी नतीजों का हो या कंपनियों के रिजल्ट का- सेंसेक्स उस हिसाब से अपने मूड को ढाल लेता है। अभी आए चुनावी नतीजों पर सेंसेक्स ने जिस प्रकार की मस्त चाल दिखलाई, हर कोई तर गया। दिवाली से पहले ही सेंसेक्स ने दलाल पथ को अपनी चाल से 'जगमग' कर दिया। अपने चाहने वालों को अतिशबाजी का पूरा मौका दिया। यही तो सेंसेक्स की खूबी है।

नई सरकार और नए आर्थिक फैसलों ने सेंसेक्स को 'बूस्टर' देने का काम किया है। नई सरकार आने के बाद से बहुत कम ऐसे चांस आए हैं, जब सेंसेक्स का मूड बिगड़ा हो। मूड तब ही बिगड़ा है, जब सेंसेक्स पर अतिरिक्त बोझ पड़ा हो। नहीं तो सेंसेक्स अपनी चाल में मस्त हर दिन एक नया मुकाम बनाने में व्यस्त रहता है। दुनियादारी की अधिक परवाह नहीं करता, अपने दम पर देश की अर्थव्यवस्था को संवारने में लगा रहता है। सरकार साथ दे तो 'सोने पे सुहागा'।

दरअसल, सेंसेक्स संग दिवाली मनाना मुझे इसीलिए भी काफी पसंद है क्योंकि उसके कने 'पॉजीटिव एनर्जी' बहुत है। अप्रत्याशित गिरावट में मूड को लाइट रखने और कहा-सुनी पर न के बराबर कान देने की कला सेंसेक्स की लाजवाब है। मैंने तो देश की अर्थव्यवस्था के बुरे दिनों में भी सेंसेक्स को 'कूल' रहते करीब से देखा है। इत्ते दवाबों के बीच सेंसेक्स किस तरह से खुद को बुरे दिनों में से निकालकर अच्छे दिनों में लाया है, वो ही जानता है।
इसीलिए तो आज हम सब अच्छे दिनों के बीच सेंसेक्स संग मस्त दिवाली मना रहे हैं।

खुशहाल-समृद्ध सेंसेक्स मन को बहुत भाता है। अपनी मस्त चाल में इठलाता सेंसेक्स मन में दोगुना उत्साह भर देता है। सेंसेक्स की कामयाबी ने दलाल पथ का चेहरा ही बदल दिया है। दलाल पथ पर हर वक्त दिवाली का सा माहौल रहता है। इसी उत्साह ने ही तो हमें और बाजार को 'उत्सवधर्मी' बने रहने का मंत्र दिया है। छोटी-बड़ी खुशियों और त्योहार को उत्सव बना लेना ही तो कला है।

अपनी उत्सवधर्मिता को जीवंत बनाए रखते हुए इस दफा अपनी दिवाली सेंसेक्स संग।

मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

स्वच्छता अभियान के बहाने

चित्र साभारः गूगल
इधर, जब से 'अच्छे दिन' (!) आए हैं भगवान अधिक सक्रिय हो गए हैं। यों तो भगवान धरती और इंसान की हर अंदरूनी-बाहरी हकीकत को जानते हैं फिर भी स्वर्ग से आंखों-देखा हाल लेते रहते हैं। जब कभी लाइव नहीं देख पाते तो अपने फेसबुक, टि्वटर या व्हाट्सएप पर वीडियो मांगवाकर देख लेते हैं। आप क्या समझते हो सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर एकांउट केवल आप ही का है, जी, अब भगवान भी यहां मौजूद हैं। क्यों न होंगे, 21वीं सदी में अब भगवान भी 'हाइटेक' हो चले हैं। फेसबुक, टि्वटर, व्हाट्सएप, यू-टयूब का वे भी उत्ता ही इस्तेमाल कर रहे हैं, जित्ता कि आप-हम।

आजकल भगवान की खास नजरें धरती पर प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किए गए 'स्वच्छता अभियान' पर ज्यादा टिकी हुई हैं। 24x7 अपने स्मार्टफोन की 'विशेष एप' से जायजा लेते रहते हैं, कहां, किधर, कित्ती सफाई हुई! किसने झाड़ू वाकई सफाई के लिए थामी हुई है और किसने सिर्फ सेल्फी के लिए। कौन कॉरपोरेट अपनी कंपनी के प्रचार या कौन फिल्मी सेलीब्रिटी अपनी फिल्म के प्रोमोशन के लिए झाड़ू लगा रहा है। उन्हें उन आला मंत्रियों-नेताओं-विधायकों-सभासदों के चेहरे तक मालूम हैं, जिन्होंने 02 अक्तूबर वाले दिन ही कैमरों के सामने झाड़ू उठाई थी, उसके बाद से नदारद हैं। चूंकि वो भगवान हैं, जाहिर है, इसीलिए मेरी-तेरी इसकी-उसकी इधर-उधर की खबर रखते हैं। लेकिन हम इंसान लोग खुद को 'होशियार' मानकर यह समझते हैं कि भगवान को कुछ पता ही न होगा। जबकि हममें से आधे से ज्यादा लोग हर रोज भगवान के आगे धूप-बत्ती जलाते हैं और घंटों पाठ करते हैं। फिर भी भगवान को पटा नहीं पाते।

दरअसल, भगवान खुद बहुत दुखी है धरती पर पसरी गंदगी को देखकर। जित्ती गंदगी धरती पर पसरी है, उससे कहीं ज्यादा इंसान के मन में जमी है। भगवान ने अक्सर मुझसे व्यक्ततिगत मुलाकातों में धरती और इंसान की गंदगी पर विस्तार से बात की है। जाने कित्ते ही स्टेटस फेसबुक और टि्वटर पर अपडेट कर डाले हैं। मगर धरती वाले भगवान की बात सुनते ही कहां हैं? आजकल तो उनमें झाड़ू लेकर जगह-जगह जाकर अपनी सेल्फियां फेसबुक और टि्वटर पर अपलोड करने की हिरस लगी हुई है। जिन्होंने जिंदगी में कभी झाड़ू की सींक तलक न पकड़ी होगी, वो ऐसे झाड़ू लगाते हुए मिल रहे हैं मानो पूरी गली-मोहल्ले-शहर की स्वच्छता का दरोमदार उन्हीं पर है।

धरती पर स्वच्छता को लेकर की जा रही नाटक-नौटंकियां ही भगवान को कष्ट दे रही हैं। भगवान ने अपने ट्वीट्स में लिखा भी है- धरती पर स्वच्छता कम 'स्वच्छ चेहरे' अधिक दिखाई पड़ रहे हैं। जित्ती गंदी सड़कें हैं, उससे कहीं ज्यादा गंदी तो नालियां और कूड़ेदान हैं। लोग-बाग घर का कूड़ा पड़ोसी के या अपने घर के आगे डालकर ही संतुष्ट हो लेते हैं। कमाल है, धरती का इंसान जेब में पचास हजार का स्मार्टफोन तो शौक से रखता है किंतु पांच रुपए सफाई वाले को देने में आनाकानी करता है। नेता लोग गांव-देहात में शौचालय बनवाने के बजाए, पैसा अपनी जेब में सरका लेते हैं। शहर के बाबू लोग तो और भी सियाने हैं, कपड़े साफ पहनते हैं किंतु गली-मोहल्ला गंदा रखते हैं।

भगवान को यह भी शिकायत है कि धरती वाले मन के बहुत मैले हैं। जाने कित्ते जन्म से इंसान अपनी गंदगी ऊपर ला रहा है। क्या करें बर्दाशत कर रहे हैं, इसके सिवाय कोई चारा भी तो नहीं।

सच कहूं तो भगवान की चिंता और शिकायत वाजिब है। यहां स्वच्छता अभियान के तहत झाड़ू लगाना महज 'फैशन' बना हुआ है। लोग-बाग इस फैशन को सोशल नेटवर्किंग पर सेल्फी के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। झाड़ू अब स्वच्छता की नहीं, सेल्फी की प्रयाय बनती जा रही है। भगवान इस स्वच्छता को देख रहे हैं।