शनिवार, 21 दिसंबर 2013

बादाम खाकर बुद्धिजीवि

चित्र साभारः गूगल
इन दिनों मैं बादाम खूब खा रहा हूं। न न दिमाग या सेहत बनाने के लिए बल्कि बुद्धिजीवि बनने के लिए। बाकी तो मैं सबकुछ हूं बस बुद्धिजीवि ही नहीं हूं। बीते पखवाड़े मुझको एक परम-ज्ञानी ने बतलाया था कि रोज सुबह-शाम पांच-सात बादाम खाओगे तो जल्द ही बुद्धिजीवि बन जाओगे। सो खा रहा हूं।

दरअसल, बुद्धजीवि बनना अब मेरे तईं बेहद जरूरी हो गया है। मैं बुद्धिजीवियों के मोहल्ले में रहता हूं। मेरे मोहल्ले में एक से बढ़कर एक शानदार किस्म के बुद्धिजीवि हैं। उनकी बुद्धिजीविता का जवाब नहीं। हर मामले में ऐसा बुद्धि-ज्ञान देते हैं, मानो उनकी बुद्धि केवल उनके ही इशारों पर नाचती हो। मैं अक्सर उनकी बुद्धिजीविता के आगे बौना साबित हुआ हूं। हालांकि मैं लेखक हूं, यह उन्हें मालूम है, मगर फिर भी वे मुझे बे-बुद्धि ही समझते हैं।

उनका मुझे दुत्कारना कुछ मायनों में सही भी है। क्योंकि मैंने देखा है, लेखन और साहित्य के क्षेत्र में परम-बुद्धिजीवियों की ही पूछ है। अगर वो बुद्धिजीवि वरिष्ठ है, तो फिर कहना ही क्या। वरिष्ठ बुद्धिजीवि यों भी अपनी बुद्धिजीविता को लेकर हर वक्त ऐंठा हुआ सा रहता है। उसे यकीन रहता कि इस संसार में उस जैसा काबिल बुद्धिजीवि कोई दूसरा हो ही नहीं सकता। साहित्य के क्षेत्र में वरिष्ठ बुद्धिजीवियों का दखल किसी गब्बर सिंह से कम नहीं होता। मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि वरिष्ठ बुद्धिजीवि न केवल बादाम खाता है बल्कि बादाम की मालिश भी करवाता है। इसीलिए वरिष्ठों के चेहरे चमकते-दमकते रहते हैं।

जीवन में मैंने कई बार कोशिशें की कि किसी वरिष्ठ की किरपा मुझ पर हो जाए। मेरा भी साहित्यिक भाग्य चमक जाए। मैं भी उनके साथ एक मंच पर आकर खड़ा हो सकूं। लेकिन ऐसा कहीं कुछ संभव नहीं हुआ। मुझे गले लाना तो दूर पास बैठालने तक को कोई राजी नहीं हुआ। जिसके मोहल्ले में इत्ते बुद्धिजीवि रहते हों, उसे ही बुद्धिजीवियों का स्नेह न मिले, है न दरिया में डूब मरने की बात। लेकिन मैं खामाखां दरिया में डूब भी नहीं सकता क्योंकि पत्नी का डर मेरे आगे आ जाता है।

मैं बादाम खाकर बुद्धिजीवि बनने की कोशिश भले ही कर लूं लेकिन पत्नी के डर को भगाने का कोई उपाय मेरे कने नहीं है।

इधर देखने-सुनने में आया है कि बुद्धिजीवि लोग अब दूसरे कामों में हाथ आजमाने लगे हैं। मसलन, कोई छेड़ा-छाड़ी की प्रक्टिस में लगा है, तो कोई बाबा के बचाव में। रात-दिन स्त्री-स्वतंत्रता का नारा बुलंद करने वाले भी बहती गंगा में हाथ धोने को उतावले हुए जा रहे हैं। मैं तो इन ऊंचे बुद्धिजीवियों का लाइफ-स्टाइल देखकर ही अक्सर अचंभे में पड़ जाता हूं। इन बुद्धिजीवियों के पास जाना तो दूर छूने में भी डर लगता है कि कहीं मैले न हो जाएं। देखते ही देखते बुद्धिजीवियों ने अपनी रंगत कित्ती बदल ली है।

जरूर ये ऊंचे बुद्धजीवि बादाम के साथ-साथ कुछ सेहत-बद्धक भी खाते होंगे।

हालांकि इनके टाइप जैसा बुद्धिजीवि मैं दस जन्म में भी नहीं बन सकता पर जो बन सकता हूं उसके प्रति तन-मन-धन से प्रयत्नरत हूं। मैं बस इत्ता चाहता हूं कि लोग मुझे बुद्धिजीवि कहकर बुलाएं-पुकारें। मेरे जाने के बाद मेरे नाम के साथ बुद्धिजीवि शब्द का प्रयोग करें। मेरे लिए बुद्धिजीवि बनना ठीक वैसा ही है, जैसे गधे के सिर पर सींग का उग आना।

परम-ज्ञानी महोदय की बात मानते हुए अब तलक कित्ते बादाम खा चुका हूं मैं खुद नहीं जानता। मगर बादाम खाने से पीछे नहीं हटूंगा। चाहे उधार लेकर ही क्यों न खाना पड़े। जब चचा गालिब उधार की पी सकते थे, तो फिर मैं क्यों नहीं...?

बादाम खाकर बुद्धिजीवि बना जा सकता है, इसे मैं साबित करके ही दम लूंगा। हरिबोल।

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