शनिवार, 21 दिसंबर 2013

आप वालों के नाम एक खत

चित्र साभारः गूगल
प्रिय आप वालों,

माल करते हैं आप। एक जरा-सी सरकार नहीं बना पा रहे दिल्ली में। जब भी सरकार बनाने की बारी आती है, आप या तो ससुराल वालों की तरह शर्तें गिनाने बैठ जाते हो या फिर राय सहाबों की तरह जनता की राय लेने का बहाना बना देते हो। लेकिन सरकार बनाने की पहल फिर भी नहीं करते। साफ-साफ बताओ न क्या सरकार बनाने से डरते हो या फिर जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा जैसी उलझन में हो। क्यों...?

देखो मियां, मैंने अपनी जिंदगी में तमाम तरह के शेखचिल्लियों को ऊंची-ऊंची छोड़ते देखा-सुना है, क्या आप भी उन्हीं में से हो! क्योंकि जिस दिन से मैंने आपको देखा-सुना है, सिवाय ऊंची छोड़ने के आप ने कुछ खास नहीं किया है। जनलोकपाल पर आपने ऊंची छोड़ी। भ्रष्टाचार पर आपने ऊंची छोड़ी। बिजली-पानी-व्यवस्था पर आपने ऊंची छोड़ी। जीत के तुरंत बाद ऊंची छोड़ी कि न किसी दल को समर्थन देंगे, न लेंगे। साथ-साथ, अण्णा से असहमति जतलाते हुए ऊंची छोड़ी। ऐसे कब तलक ऊंची-ऊंची छोड़ते रहोगे मियां। अब जब जनता के वास्ते कुछ करने का मौका आया तो कह रहे हो कि पहले जनता की राय ले लें। कहीं ऐसा न हो राय लेते-लेते राय का रायता फैल जाए। और फिर सिमटाए न सिमट पाए।

जनता ने आपको अठ्ठाइस सीटें दिलवा कर अपनी राय बतला तो दी, अब राय लेने को क्या बचता है? उधर, कांग्रेस भी खुलकर समर्थन करने को तैयार है, फिर भी, आप आशिक की तरह कशमश में हो कि आइ लव यू कहूं या न कहूं। मियां, जब ओखली में सिर दिया है, तो मूसलों से क्या डरना?

ज्ञानी बतलाते हैं कि ज्यादा ज्ञान या ज्यादा राय समझिए बवाल-ए-जान। इस बवाल-ए-जान के चक्कर में न पड़िए, जनता को उसका हक दिलवाइए। और, दिल्ली के साथ-साथ पूरे देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कीजिए। सुना था कि आपने मात्र छह महीनों में ही तस्वीर बदल देने का दावा ठोंका था। लेकिन यहां तस्वीर बदलना तो दूर ठीक से आइना देखने-दिखाने में ही आप बिदक रहे हो।

आखिर आपकी पोलिटिक्स क्या है मियां।

मियां, राजनीति में रहकर तो बड़े-बड़े फैसले लेने पड़ते हैं। बड़े-बड़े लोगों से मिलना पड़ता है। बड़ी योजनाएं-परियोजनाएं बनानी पड़ती हैं। तो क्या इस सब के लिए भी आप बार-बार जनता की राय लेने उनके बीच जाएंगे? फिर तो बड़ी मुश्किल जाएगी। जनता का तो आधे से ज्यादा वक्त आपको राय देने में ही जाया हो जाएगा। फिर जनता कैसे खाना बना पाएगी। कैसे दफ्तर जा पाएगी। कैसे बच्चों को पढ़ा पाएगी। कैसे घर-परिवार चला पाएगी। क्यों खामखां जनता को डिस्टर्व कर रहे हैं। अपना फैसला आप ही लेने का हौसला लाइए। अब आप बच्चे थोड़े हैं!

क्या आपको नहीं लगता कि आपने शुद्धता और शुचितावाद का नारा कुछ ज्यादा ही बुलंद कर दिया है। दरअसल, आज के जमाने में शुद्धता और शुचिता का मिलना बड़ा कठिन हो गया है मियां। मैं अक्सर शुद्धता से दूर भागता हूं। न शुद्ध चीज खाता हूं न शुचितासंपन्न लोगों से मिलता हूं। जब तलक चीज या व्यक्ति में मिलावट न हो मुझे मजा ही नहीं आता। क्या करूं, मेरी जीभ और व्यवहार का स्वाद जो बदल गया है। इसलिए आप से भी कह रहा हूं, ज्यादा शुद्धता और ईमानदारी के चक्करों में न पड़िए आराम से दिल्ली में सरकार बनाइए। दिल्ली वालों को उनका हक उन्हें दिलवाइए। बात-बात में राय की बंदूक जनता के कंधों पर लादना छोड़कर इसे अब अपने कंधों पर ही रखिए। क्या समझे...।

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