शनिवार, 21 दिसंबर 2013

बहकने के बहाने

चित्र साभारः गूगल
प्यारे, बहकने की कोई उम्र नहीं होती। उम्र के किसी भी पड़ाव या मोड़ पर बहका जा सकता है। बहकने के लिए सेलिब्रिटी होना अवश्यक नहीं है। हां, बहक कर आप सेलिब्रिटी की श्रेणी में जरूर आ सकते हैं। बहका हुआ बंदा जब सेलिब्रिटी की श्रेणी में आता है तो वो मशहूर नहीं बल्कि महान हो जाता है। उसकी महानता के चर्चे जगह-जगह होते हैं। मीडिया से लेकर मार्केट तक में उसको हीरो बनाकर पेश किया जाता है। वो कैसे, क्यों और किस कारण बहका इस पर बहस होती है। इस बहस में सबसे अधिक प्रतिशत घोषित नैतिकतावादियों और शुचितावादियों का ही रहता है। रही-सही कसर संस्कृति-रक्षक पूरी कर देते हैं।

बहकना किसी एक निश्चित वस्तु, चीज या पदार्थ पर निर्भर नहीं करता। किसी भी क्षेत्र या चीज में बहकने की स्वतंत्रता आपके कने होती है। जैसे-जैसे समय बदलता है, बहकने के अंदाज भी बदलते रहते हैं। बदलना चाहिए भी। नहीं हो तो एक जैसा बहकना यथास्थितिवादी का प्रयाय बन जाएगा। ज्यादातर किस्से सुनाई व पढ़ाई में पीकर बहकने के ही सामने आते हैं। लेकिन ऊंचे या बुद्धिजीवि टाइप के लोग पीकर जब बहकते हैं, तो उसका रंग-ढंग ही कुछ और होता है। न न वे पीकर किसी नाली या नाले में नहीं लुढ़कते बल्कि 'दिललगी' का शिकार हो जाते हैं। यकायक जवानी उन्हें दीवाना बना देती है। जवानी पर बहकते वक्त वे उम्र का नहीं केवल खुमारी का ख्याल रखते हैं। खुमारी में की गईं हरकतें उन्हें जिंदगी का खूबसूरत एहसास-सा लगती हैं। लेकिन जब खुमारी के तेवर ढीले पड़ते हैं, तो मियां कोर्ट-कचहरी में उलझे नजर आते हैं।

मानना पड़ेगा कि बुढ़ापा बुरी चीज होती है। किसी को भी नहीं आना चाहिए। जिंदगी की रंगीनियत एवं रोमानियत बुढ़ापे के बीच कसमसा कर रह जाती हैं। मगर फिर भी बुढ़ापे में बंदा दांव खेलने से नहीं चूकता। अब तो मेडिकल सांइस ने इत्ती तरक्की कर ली है कि बुढ़ापे में भी बूढ़ेपन का एहसास नहीं होता। शरीर और सेहत हर वक्त उत्साहित व उत्तेजित ही रहते व दिखते हैं।

देखिए न, एक बाबा जी ने तो बुढ़ापे की काट के लिए तमाम प्रकार की पौरूष-बर्द्धक औषद्यियों का प्रयोग खुद पर ही किया। और भरे-पूरे बुढ़ापे में जो कमाल किए, हम सब के सामने हैं। हालांकि किए प्रयोगों की कीमत उन्हें जेल के भीतर रहकर चुकानी जरूर पड़ रही है लेकिन बुढ़ापे को धोखा तो दे ही दिया न। इस खेल में जित्ते बड़े खिलाड़ी बाप रहे, उत्ता ही उनका बेटा भी। फिलहाल, दोनों जेल के भीतर हैं।

न जाने ऐसा क्या हो गया है कि पचास साल पार लोग खूब बहक रहे हैं। न सिर्फ बहक रहे हैं बल्कि अपने बहकने को 'जस्टिफाई' भी कर रहे हैं। बाबा तो चलो भगवानत्त्व में बहके लेकिन संपादक महोदय और जज साहेब का क्या? आखिर ये दोनों तो बुद्धिजीवि वर्ग में आते हैं न! बताइए, जब बुद्धिजीवि ही ऐसे बहकेगा तो फिर साधारण वर्ग का क्या होगा प्यारे।
संपादक महोदय तो अब भी कह रहे हैं कि यह बहका-बहकी दोनों की सहमति से हुई। उन्हें राजनीति के तहत फंसाया गया है। खैर, जो हो। फिलहाल मियां बहकने की कीमत चुका रहे हैं।

कहिए कुछ भी पर बहकने के लाभ ही लाभ हैं। बहकना अब बदनामी की श्रेणी में नहीं आता। बदनाम होकर मिलने वाले नाम का मजा ही कुछ और होता है। बुढ़ापे में हासिल हुईं ये 'फौरी बदनामियां' हैं, पर इनका लाभ लंबा है। जो इन बदनामियों को झेल गया, समझो तर गया।

अंदर की बात बताऊं, कभी-कभी मेरा दिल भी करता है बहकने का, पर डरता हूं, कहीं इज्जत का फलूदा न बन जाए। बाबा और संपादक महोदय तो झेल गए मगर मैं कैसे झेल पाऊंगा। बहकने और बदनामी का स्वाद चखने के लिए कलेजा चाहिए होता है परंतु मैं तो छिपकली के नाम मात्र से ही डर जाता हूं। बहक कैसे सकूंगा। लेकिन फिर भी कोशिश करूंगा कि बहक जाऊं बाकी बाद में जो होगा देखा जाएगा प्यारे।

बादाम खाकर बुद्धिजीवि

चित्र साभारः गूगल
इन दिनों मैं बादाम खूब खा रहा हूं। न न दिमाग या सेहत बनाने के लिए बल्कि बुद्धिजीवि बनने के लिए। बाकी तो मैं सबकुछ हूं बस बुद्धिजीवि ही नहीं हूं। बीते पखवाड़े मुझको एक परम-ज्ञानी ने बतलाया था कि रोज सुबह-शाम पांच-सात बादाम खाओगे तो जल्द ही बुद्धिजीवि बन जाओगे। सो खा रहा हूं।

दरअसल, बुद्धजीवि बनना अब मेरे तईं बेहद जरूरी हो गया है। मैं बुद्धिजीवियों के मोहल्ले में रहता हूं। मेरे मोहल्ले में एक से बढ़कर एक शानदार किस्म के बुद्धिजीवि हैं। उनकी बुद्धिजीविता का जवाब नहीं। हर मामले में ऐसा बुद्धि-ज्ञान देते हैं, मानो उनकी बुद्धि केवल उनके ही इशारों पर नाचती हो। मैं अक्सर उनकी बुद्धिजीविता के आगे बौना साबित हुआ हूं। हालांकि मैं लेखक हूं, यह उन्हें मालूम है, मगर फिर भी वे मुझे बे-बुद्धि ही समझते हैं।

उनका मुझे दुत्कारना कुछ मायनों में सही भी है। क्योंकि मैंने देखा है, लेखन और साहित्य के क्षेत्र में परम-बुद्धिजीवियों की ही पूछ है। अगर वो बुद्धिजीवि वरिष्ठ है, तो फिर कहना ही क्या। वरिष्ठ बुद्धिजीवि यों भी अपनी बुद्धिजीविता को लेकर हर वक्त ऐंठा हुआ सा रहता है। उसे यकीन रहता कि इस संसार में उस जैसा काबिल बुद्धिजीवि कोई दूसरा हो ही नहीं सकता। साहित्य के क्षेत्र में वरिष्ठ बुद्धिजीवियों का दखल किसी गब्बर सिंह से कम नहीं होता। मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि वरिष्ठ बुद्धिजीवि न केवल बादाम खाता है बल्कि बादाम की मालिश भी करवाता है। इसीलिए वरिष्ठों के चेहरे चमकते-दमकते रहते हैं।

जीवन में मैंने कई बार कोशिशें की कि किसी वरिष्ठ की किरपा मुझ पर हो जाए। मेरा भी साहित्यिक भाग्य चमक जाए। मैं भी उनके साथ एक मंच पर आकर खड़ा हो सकूं। लेकिन ऐसा कहीं कुछ संभव नहीं हुआ। मुझे गले लाना तो दूर पास बैठालने तक को कोई राजी नहीं हुआ। जिसके मोहल्ले में इत्ते बुद्धिजीवि रहते हों, उसे ही बुद्धिजीवियों का स्नेह न मिले, है न दरिया में डूब मरने की बात। लेकिन मैं खामाखां दरिया में डूब भी नहीं सकता क्योंकि पत्नी का डर मेरे आगे आ जाता है।

मैं बादाम खाकर बुद्धिजीवि बनने की कोशिश भले ही कर लूं लेकिन पत्नी के डर को भगाने का कोई उपाय मेरे कने नहीं है।

इधर देखने-सुनने में आया है कि बुद्धिजीवि लोग अब दूसरे कामों में हाथ आजमाने लगे हैं। मसलन, कोई छेड़ा-छाड़ी की प्रक्टिस में लगा है, तो कोई बाबा के बचाव में। रात-दिन स्त्री-स्वतंत्रता का नारा बुलंद करने वाले भी बहती गंगा में हाथ धोने को उतावले हुए जा रहे हैं। मैं तो इन ऊंचे बुद्धिजीवियों का लाइफ-स्टाइल देखकर ही अक्सर अचंभे में पड़ जाता हूं। इन बुद्धिजीवियों के पास जाना तो दूर छूने में भी डर लगता है कि कहीं मैले न हो जाएं। देखते ही देखते बुद्धिजीवियों ने अपनी रंगत कित्ती बदल ली है।

जरूर ये ऊंचे बुद्धजीवि बादाम के साथ-साथ कुछ सेहत-बद्धक भी खाते होंगे।

हालांकि इनके टाइप जैसा बुद्धिजीवि मैं दस जन्म में भी नहीं बन सकता पर जो बन सकता हूं उसके प्रति तन-मन-धन से प्रयत्नरत हूं। मैं बस इत्ता चाहता हूं कि लोग मुझे बुद्धिजीवि कहकर बुलाएं-पुकारें। मेरे जाने के बाद मेरे नाम के साथ बुद्धिजीवि शब्द का प्रयोग करें। मेरे लिए बुद्धिजीवि बनना ठीक वैसा ही है, जैसे गधे के सिर पर सींग का उग आना।

परम-ज्ञानी महोदय की बात मानते हुए अब तलक कित्ते बादाम खा चुका हूं मैं खुद नहीं जानता। मगर बादाम खाने से पीछे नहीं हटूंगा। चाहे उधार लेकर ही क्यों न खाना पड़े। जब चचा गालिब उधार की पी सकते थे, तो फिर मैं क्यों नहीं...?

बादाम खाकर बुद्धिजीवि बना जा सकता है, इसे मैं साबित करके ही दम लूंगा। हरिबोल।

आप वालों के नाम एक खत

चित्र साभारः गूगल
प्रिय आप वालों,

माल करते हैं आप। एक जरा-सी सरकार नहीं बना पा रहे दिल्ली में। जब भी सरकार बनाने की बारी आती है, आप या तो ससुराल वालों की तरह शर्तें गिनाने बैठ जाते हो या फिर राय सहाबों की तरह जनता की राय लेने का बहाना बना देते हो। लेकिन सरकार बनाने की पहल फिर भी नहीं करते। साफ-साफ बताओ न क्या सरकार बनाने से डरते हो या फिर जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा जैसी उलझन में हो। क्यों...?

देखो मियां, मैंने अपनी जिंदगी में तमाम तरह के शेखचिल्लियों को ऊंची-ऊंची छोड़ते देखा-सुना है, क्या आप भी उन्हीं में से हो! क्योंकि जिस दिन से मैंने आपको देखा-सुना है, सिवाय ऊंची छोड़ने के आप ने कुछ खास नहीं किया है। जनलोकपाल पर आपने ऊंची छोड़ी। भ्रष्टाचार पर आपने ऊंची छोड़ी। बिजली-पानी-व्यवस्था पर आपने ऊंची छोड़ी। जीत के तुरंत बाद ऊंची छोड़ी कि न किसी दल को समर्थन देंगे, न लेंगे। साथ-साथ, अण्णा से असहमति जतलाते हुए ऊंची छोड़ी। ऐसे कब तलक ऊंची-ऊंची छोड़ते रहोगे मियां। अब जब जनता के वास्ते कुछ करने का मौका आया तो कह रहे हो कि पहले जनता की राय ले लें। कहीं ऐसा न हो राय लेते-लेते राय का रायता फैल जाए। और फिर सिमटाए न सिमट पाए।

जनता ने आपको अठ्ठाइस सीटें दिलवा कर अपनी राय बतला तो दी, अब राय लेने को क्या बचता है? उधर, कांग्रेस भी खुलकर समर्थन करने को तैयार है, फिर भी, आप आशिक की तरह कशमश में हो कि आइ लव यू कहूं या न कहूं। मियां, जब ओखली में सिर दिया है, तो मूसलों से क्या डरना?

ज्ञानी बतलाते हैं कि ज्यादा ज्ञान या ज्यादा राय समझिए बवाल-ए-जान। इस बवाल-ए-जान के चक्कर में न पड़िए, जनता को उसका हक दिलवाइए। और, दिल्ली के साथ-साथ पूरे देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कीजिए। सुना था कि आपने मात्र छह महीनों में ही तस्वीर बदल देने का दावा ठोंका था। लेकिन यहां तस्वीर बदलना तो दूर ठीक से आइना देखने-दिखाने में ही आप बिदक रहे हो।

आखिर आपकी पोलिटिक्स क्या है मियां।

मियां, राजनीति में रहकर तो बड़े-बड़े फैसले लेने पड़ते हैं। बड़े-बड़े लोगों से मिलना पड़ता है। बड़ी योजनाएं-परियोजनाएं बनानी पड़ती हैं। तो क्या इस सब के लिए भी आप बार-बार जनता की राय लेने उनके बीच जाएंगे? फिर तो बड़ी मुश्किल जाएगी। जनता का तो आधे से ज्यादा वक्त आपको राय देने में ही जाया हो जाएगा। फिर जनता कैसे खाना बना पाएगी। कैसे दफ्तर जा पाएगी। कैसे बच्चों को पढ़ा पाएगी। कैसे घर-परिवार चला पाएगी। क्यों खामखां जनता को डिस्टर्व कर रहे हैं। अपना फैसला आप ही लेने का हौसला लाइए। अब आप बच्चे थोड़े हैं!

क्या आपको नहीं लगता कि आपने शुद्धता और शुचितावाद का नारा कुछ ज्यादा ही बुलंद कर दिया है। दरअसल, आज के जमाने में शुद्धता और शुचिता का मिलना बड़ा कठिन हो गया है मियां। मैं अक्सर शुद्धता से दूर भागता हूं। न शुद्ध चीज खाता हूं न शुचितासंपन्न लोगों से मिलता हूं। जब तलक चीज या व्यक्ति में मिलावट न हो मुझे मजा ही नहीं आता। क्या करूं, मेरी जीभ और व्यवहार का स्वाद जो बदल गया है। इसलिए आप से भी कह रहा हूं, ज्यादा शुद्धता और ईमानदारी के चक्करों में न पड़िए आराम से दिल्ली में सरकार बनाइए। दिल्ली वालों को उनका हक उन्हें दिलवाइए। बात-बात में राय की बंदूक जनता के कंधों पर लादना छोड़कर इसे अब अपने कंधों पर ही रखिए। क्या समझे...।