गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

साहित्य के नोबेल की खातिर

चित्र साभारः गूगल
अपने मोहल्ले का मैं एक मात्र 'बड़ा लेखक' हूं। इस नाते मोहल्ले के प्रत्येक घर में मेरी खूब पूछ है। मोहल्ले वाले मेरा ही नाम लेकर जागते व सोते हैं। एक तरह से मैं उनका 'गॉडफादर' हूं। देखा-दाखी, आस-पड़ोस के मोहल्लों में भी मुझे आयोजन व गोष्ठियों में बुलाया जाता है। बेहद ध्यान से लोग मुझे सुनते हैं और तालियां बजाते हैं। केवल अपनी काबिलियत के दम पर ही मुझे साहित्य के तमाम बड़े-छोटे पुरस्कार मिल चुके हैं। बता दूं, मिलता हुआ सम्मान या पुरस्कार मैं कभी छोड़ता नहीं। सम्मान या पुरस्कार के वास्ते अगर 'जुगाड़' भी बैठानी पड़े, तो कभी पीछे नहीं हटता। न ही कभी यह देखता हूं कि सम्मान या पुरस्कार दे कौन रहा है।

दरअसल, मैं उन सियाने लेखकों में से नहीं हूं, जो पुरस्कार लेने के बाद लौटाने की नौटंकी करते हैं। या फिर विपरीत विचाराधारा वाले व्यक्ति से लेना पसंद नहीं करते। चूंकि मैं विचाराधारा या व्यक्ति को कतई तरजीह नहीं देता इसलिए ऐसे नाटक-नौटंकियों से बचा रहता हूं।

फिलहाल, मेरे मोहल्ले में से आवाज उठी है कि इस बार साहित्य का नोबेल मुझे ही मिलना चाहिए। साहित्य के नोबेल के वास्ते मैं एकदम 'परफैक्ट लेखक' हूं। मोहल्ले वालों ने मुझसे वायदा किया है, चाहे जमीन-आसमान एक क्यों न करना पड़े, इस दफा साहित्य का नोबेल मुझे दिलवाकर ही दम लेंगे। मैं मेरे मोहल्ले वालों की भावनाओं एवं दृढ़-इच्छाशक्ति का पूरा सम्मान करता हूं। साथ ही, मैं उन्हें यकीन दिलाता हूं कि साहित्य का नोबेल लेने के वास्ते 'जुगाड़' में कोई कसर बाकी नहीं रख छोड़ूंगा। चाहे नोबेल पुरस्कार बांटने वाली जूरी की जेब ही क्यों न गर्म करनी पड़े! हरिबोल।

अमां, लेखक-साहित्यकार टटपूंजिए से पुरस्कारों के वास्ते जाने क्या-क्या, कैसी-कैसी जोड़-जुगाड़ बैठा लेते हैं अगर मैं साहित्य के नोबेल लिए जुगाड़ में लगा हूं, तो क्या गलत कर रहा हूं? गलत से ही सही का रास्ता प्रशस्त होता है। क्या समझे...।

वैसे, मुझे अपनी तारीफ करने में कभी शर्म महसूस नहीं होती। इसलिए पुनः कह रहा हूं कि साहित्य का नोबेल मुझे ही मिलना चाहिए। इत्ता बड़ा लेखक हूं। दर्जनों के हिसाब से मेरी किताबें हैं। बोरी भरके सम्मान-पुरस्कार हैं। स्कूलों-कॉलेजों के कोर्स में मुझे पढ़ाया जाता है। देश के साहित्यिक हलकों के मध्य मेरी पूछ व पहुंच है। ऊंचे नेता से लेकर बड़े अफसर तक मेरा मिलना-जुलना है। तमाम पुरस्कार मेरे नाम पर चल रहे हैं। माता-पिता एवं अध्यापक बच्चों को मेरे जैसे बनने और मेरे बताए-समझाए रास्तों पर चलने को प्रेरित करते हैं। न केवल अपने मोहल्ले में बल्कि नाते-रिश्तेदारों के बीच मैं 'पूजा' जाता हूं।

अब आप ही बतलाइए कि मुझे जैसे इत्ते बड़े व महान लेखक को साहित्य का नोबेल क्यों नहीं मिलना चाहिए? साहित्य का नोबेल मुझे देकर नोबेल का ही मान बढ़ेगा। यों भी, मुझ जैसे ख्यातिलब्ध लेखक अब मिलते ही कहां हैं?

बहरहाल, पूरे जोश के साथ मेरी और मोहल्ले वालों की कोशिशें जारी हैं साहित्य के नोबेल के वास्ते। जाहे कैसे भी दंद-फंद इस्तेमाल क्यों न करने पड़ें पर साहित्य का नोबेल चाहिए ही चाहिए। एक दफा साहित्य का नोबेल मेरी झोली में आन गिरा न, तो मैं 'इंटरनेशनल लेखक' हो-बन जाऊंगा। अरब की खाड़ी से लेकर बंगाल की खाड़ी तलक मेरा नाम ही नाम होगा। साहित्य के जित्ते भी अरिष्ठ-वरिष्ठ-गरिष्ठ लेखक-साहित्यकार हैं, सब मेरे आगे पानी भरेंगे। फिर मेरा रूतबा ही कुछ और होगा प्यारे।

बस, इंतजार कीजिए मेरे नाम की घोषणा होने का। हरिबोल।

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