बुधवार, 9 अक्तूबर 2013

एक बीमार आदमी की व्यथा-कथा

चित्र साभारः गूगल
अमूमन मैं बीमार नहीं पड़ता। शायद बीमारी मेरे कने आने से घबराती है। लेकिन जब बीमार पड़ता हूं, तो बीमारी की खबर सिर्फ अपने तक ही सीमित रखता हूं। क्योंकि मुझे मालूम है नाते-रिश्तेदार बीमारी में भी मुझे चैन नहीं लेने देंगे। बीमारी पूछ-पूछकर, हाल-चाल ले-लेकर मेरा वो हाल करेंगे कि मैं ठीक होकर भी बीमारी ही लगूं-दिखूंगा।

बहरहाल, इस दफा यही हुआ। इत्ता एतियात रखने के बावजूद मेरी बीमारी की खबर लीक हो गई। लीक होते ही तुरंत ब्रेकिंग न्यूज बन गई। अभी मैं अपनी बीमारी को ठीक से जान-समझ भी न पाया था कि नाते-रिश्तेदारों के सांत्वना संदेशों की झड़ी लग गई। और, सांत्वना संदेश भी ऐसे-ऐसे कि अगर मुर्दा सुन ले तो उठकर बैठ जाए। सांत्वना संदेशों के साथ-साथ मिलती हिदायतों ने तो मेरी बीमारी को और भी पेचीदा बना दिया। कुछ समय तलक तो मैं यह ही तय नहीं कर पाया कि बीमारी को लेकर डॉक्टर कने जाऊं या फिर मिल रही हिदायतों से ही काम चलाऊं। हिदायतें भी ऐसी कि अक्सर सुनते-सुनते मेरे कान लाल हो जाया करते थे मगर वहां से हिदायतें आना बंद नहीं होती थीं।

ऐसा नहीं है कि मैं पहले कभी बीमार नहीं हुआ। बीमार होता था, ठीक हो जाता था। किसी को कानों-कान खबर तक नहीं होती थी। चैन से अपनी बीमारी को एन्जॉय करता था। दरअसल, तब मोबाइल का इत्ता बोल-बाला नहीं था। बात या बीमारी घर की चार-दीवारी में ही सिमटकर रह जाती थी। लेकिन इधर जब से आदमी के बीच मोबाइल का रूतबा बढ़ा है, फिर तो पल-पल बातें हैं, खबरें हैं, हाल-चाल हैं, यहां-वहां की लगाई-बुझाई है।

सच कह रहा हूं, मेरी आधे से ज्यादा बीमारी को मोबाइल ने ही बढ़ाया। एक फोन कट नहीं पाता था कि वेटिंग में दूसरा लगा रहता था। उस पर फोन करने वाले का तुर्रा यह कि बीमारी में बातें कम करनी चाहिए। अब उसे क्या बताऊं कि मुझे कहां शौक है ज्यादा बातें करने का। एक दो दफा अपना मोबाइल बंद करके भी देखा लेकिन फोन फिर पत्नी के मोबाइल पर आने लगे। आखिर मरता क्या नहीं करता प्यारे।

इस सब के बीच मैं मूल बीमारी से तो निजात पा गया किंतु हाल-चाल लेने से संबंधित बीमारी अब भी बनी हुई है। लोग जाने कहां-कहां से खोज-खोजकर फोन कर रहे हैं और खोद-खोदकर मेरी बीमारी पूछ रहे हैं। फिर भी हर किसी की शिकायत यही है कि पहले हमें क्यों नहीं बताया। उस दिन बात हुई, तब भी न बताया। कम से कम एक फोन ही कर देते। अब तो हर नंबर पर फ्री-टाकिंग की सुविधा मिल रही है। अच्छा, वो वाला प्लान ले लो, फ्री में बातें होगीं। हाल-चाल देते रहना। मोबाइल अपने कने ही रखना। ज्यादा बातें मत करना क्योंकि बीमारी अभी गई नहीं है। गेट वैल सून।

कुछ फोन तो ऐसे भी आए, जिसमें डॉक्टर का बायोडाटा तक पूछ लिया गया। कौन डॉक्टर है? कहां बैठता है? कित्ते मरीज दिनभर में देख लेता है? कित्ती फीस लेता है? टेस्ट बाहर से करवाता है या अपने यहां से? हस्पताल उसका खुद का है या फिर वहां नौकरी बजाता है? शादीशुदा या सिंगल? खुद बेचारा डॉक्टर ने नहीं जानता होगा कि उसके बायोडाटा का हिसाब-किताब बाहर भी रखा जाता है।

फिर भी, हिदायत कि फलां डॉक्टर को ही दिखाना, अलां को नहीं। और हां जब दिखा दो तो मोबाइल पर मेरी बात जरूर करवा देना।

अब आप ही बतलाओ मियां कि इत्ती हिदायतें-बातें सुनने के बाद कौन बीमार भला बीमार रह पाएगा! हालांकि कहा नहीं लेकिन बीमारी ने भी सोचा अवश्य होगा कि किस मूर्ख के पल्ले पड़ गई। ससुरे ने मुझे 'विलेन' बनाकर रख दिया।

खैर, अभी तलक यह पता नहीं चल पाया है कि मुझे बीमारी क्या थी? मगर अब ठीक हूं। साथ ही, एक गुजारिश कर रहा हूं कि अपनी बीमारी की खबर जहां तक हो सके अपने कने ही रखना। गलती से कहीं अगर बीमारी मोबाइल हो गई, तो फिर आपका खुदा ही मालिक। हरिबोल...।

2 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ल ने कहा…

बीमारी का फ़ायदा यह हुआ कि एक ठो अच्छी से पोस्ट निकल के आ गयी सामने।

अब चूंकि आप बीमार तो रहे नहीं सो कोई सलाह तो न दे रहे बस यही कह रहे हैं -अच्छे बने रहें। शुभकामनायें।

www.womentrust.blogspot.com ने कहा…

सटीक व्यंग्य है.....