शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

अमेरिका में तालाबंदी बनाम प्रगतिशीलों की खुशी

चित्र साभारः गूगल
मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील आजकल घी के दीए जला रहे हैं। दीवाली से पहले ही आतिशबाजी छोड़ रहे हैं। सबके चेहरों पर चमक है। दिल खोलकर सब एक-दूसरे को बधाईयां दे रहे हैं। न न ये बधाईयां या खुशियां मोहल्ले में 'लल्ला' होने की नहीं बल्कि अमेरिका में तालाबंदी की हैं। अब यह बतलाने की जरूरत नहीं कि अमेरिका और प्रगतिशीलों के बीच कित्ते का आंकड़ा है। अमेरिका में चाहे तालाबंदी हो या हदबंदी मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील बेहद खुश होते हैं। इत्ता खुश कि उनकी खुशी सिमटाए नहीं सिमटती।

हालांकि मैं मोहल्ले के प्रगतिशीलों की मंडली से दूर ही रहता हूं मगर नजर पूरी रखता हूं। इसलिए नहीं कि मैं उनका 'भेदिया' हूं बल्कि इसलिए कि उनकी 'कथनी-करनी' की हकीकत से वाकिफ हो सकूं। एक मेरे मोहल्ले के ही नहीं, मैंने तो साहित्य-समाज-राजनीति के बीच न जाने ऐसे कित्ते वाम-प्रगतिशील देखे-सुने हैं, जो कथनी में कुछ और करनी में कुछ होते हैं। जिन्हें केवल अपना कहा, अपना बोला, अपना लिखा ही 'श्रेष्ठ' लगता है बाकी सब 'बकवास'।

आजकल मोहल्ले के प्रगतिशील लगभग हर रोज चौपाल जमा रहे हैं। चौपाल में जमकर अमेरिका की नीतियों को गरियाया जाता है और मार्क्स के सिद्धांतों को अपनाने की तकरीरें चलती हैं। अति-उत्साही प्रगतिशील लगे हाथ बाजारवाद पर भी हाथ साफ कर लेते हैं। कहते हैं, भारत में बाजारवाद का जन्म अमेरिका के कारण ही हुआ है। अतः अमेरिका दोषी है।

असल में, प्रगतिशील उत्ते भोले होते नहीं, जित्ता दिखने-बनने की कोशिश करते हैं। बेशक विरोध वे अमेरिका का कर लें लेकिन अमेरिका से मिलने वाले सम्मान-पुरस्कार को लेने उलटे पैर दौड़ पड़ते हैं। तब उन्हें न खराब अमेरिकी नीतियां नजर आती हैं, न बाजारवाद का प्रेत परेशान करता है। फिर मार्क्स की बातें-सिद्धांत सब धूल खाते नजर आते हैं।

मियां, जब घोषित वाम-प्रगतिशीलों ने ही मार्क्स को दर-किनार कर दिया फिर अमेरिका क्यों उन्हें मानें?

देखो प्यारे, अमेरिका में तालाबंदी की बहुत-सी वजहें हैं। जो वजहें हैं उनसे अमेरिकी सरकार निपटे या ओबामा, वाम-प्रगतिशील क्यों माथे पर बल डाले हुए हैं। लेकिन, अमेरिका के मामले में प्रगतिशीलों को अपने माथे पर बल डालने में मजा आता है। वे यह दिखाना चाहते हैं कि हम दुनिया की कित्ती फिकर करते हैं। बाजारवाद-पूंजीवाद-पश्चिमी-सभ्यता कैसा आर्थिक नुकसान कर रही है, ये मरोड़े हर वक्त उन्हें परेशान किए रहती हैं। यही वजह है कि ज्यादातर प्रगतिशीलों के पेट का हाजमा खराब रहता है। न सुख उनसे पचता है, न बाजार, न विकास, न पूंजी।

यह तो चलो अमेरिका है, प्रगतिशीलों को अपने देश में कौन-सा अच्छा लगता है। यहां भी वे रह-रहकर अपनी ढपली, अपना राग अलापते रहते हैं। अव्वल तो उन्हें मंच मिलता नहीं मगर जब मिलता है, तो सिवाय पूंजी, बाजार और अमेरिका की बुराई के उन्हें कुछ नहीं सूझता। मुझे याद नहीं पड़ता कि आज तलक किसी प्रगतिशील ने किसी बात या विकास को 'अच्छा' कहा हो। मुंह बिगाड़े रखने की आदत-सी पड़ गई है उन्हें।

बात चुभेगी किंतु है सत्य। वामवादियों ने ही मार्क्स को जन और विचार से दूर किया है।

फिलहाल, मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील अपनी चौपालों में यही दुआ मना रहे हैं कि अमेरिकी तालाबंदी का असर देर तलक रहे ताकि दुनिया को सबक मिले। यह मैं नहीं जानता कि अमेरिकी तालाबंदी से दुनिया कित्ता सबक लेगी मगर हां प्रगतिशीलों को समझना चाहिए कि किसी की मजबूरी या तकलीफ में तालियां नहीं बजाते। कम से कम मार्क्स ने तो ऐसा नहीं बताया या लिखा होगा।

वैसे, प्रगतिशीलों को अमेरिका की चिंता छोड़, अपने देश की फिकर करनी चाहिए। क्या नहीं...?

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

साहित्य के नोबेल की खातिर

चित्र साभारः गूगल
अपने मोहल्ले का मैं एक मात्र 'बड़ा लेखक' हूं। इस नाते मोहल्ले के प्रत्येक घर में मेरी खूब पूछ है। मोहल्ले वाले मेरा ही नाम लेकर जागते व सोते हैं। एक तरह से मैं उनका 'गॉडफादर' हूं। देखा-दाखी, आस-पड़ोस के मोहल्लों में भी मुझे आयोजन व गोष्ठियों में बुलाया जाता है। बेहद ध्यान से लोग मुझे सुनते हैं और तालियां बजाते हैं। केवल अपनी काबिलियत के दम पर ही मुझे साहित्य के तमाम बड़े-छोटे पुरस्कार मिल चुके हैं। बता दूं, मिलता हुआ सम्मान या पुरस्कार मैं कभी छोड़ता नहीं। सम्मान या पुरस्कार के वास्ते अगर 'जुगाड़' भी बैठानी पड़े, तो कभी पीछे नहीं हटता। न ही कभी यह देखता हूं कि सम्मान या पुरस्कार दे कौन रहा है।

दरअसल, मैं उन सियाने लेखकों में से नहीं हूं, जो पुरस्कार लेने के बाद लौटाने की नौटंकी करते हैं। या फिर विपरीत विचाराधारा वाले व्यक्ति से लेना पसंद नहीं करते। चूंकि मैं विचाराधारा या व्यक्ति को कतई तरजीह नहीं देता इसलिए ऐसे नाटक-नौटंकियों से बचा रहता हूं।

फिलहाल, मेरे मोहल्ले में से आवाज उठी है कि इस बार साहित्य का नोबेल मुझे ही मिलना चाहिए। साहित्य के नोबेल के वास्ते मैं एकदम 'परफैक्ट लेखक' हूं। मोहल्ले वालों ने मुझसे वायदा किया है, चाहे जमीन-आसमान एक क्यों न करना पड़े, इस दफा साहित्य का नोबेल मुझे दिलवाकर ही दम लेंगे। मैं मेरे मोहल्ले वालों की भावनाओं एवं दृढ़-इच्छाशक्ति का पूरा सम्मान करता हूं। साथ ही, मैं उन्हें यकीन दिलाता हूं कि साहित्य का नोबेल लेने के वास्ते 'जुगाड़' में कोई कसर बाकी नहीं रख छोड़ूंगा। चाहे नोबेल पुरस्कार बांटने वाली जूरी की जेब ही क्यों न गर्म करनी पड़े! हरिबोल।

अमां, लेखक-साहित्यकार टटपूंजिए से पुरस्कारों के वास्ते जाने क्या-क्या, कैसी-कैसी जोड़-जुगाड़ बैठा लेते हैं अगर मैं साहित्य के नोबेल लिए जुगाड़ में लगा हूं, तो क्या गलत कर रहा हूं? गलत से ही सही का रास्ता प्रशस्त होता है। क्या समझे...।

वैसे, मुझे अपनी तारीफ करने में कभी शर्म महसूस नहीं होती। इसलिए पुनः कह रहा हूं कि साहित्य का नोबेल मुझे ही मिलना चाहिए। इत्ता बड़ा लेखक हूं। दर्जनों के हिसाब से मेरी किताबें हैं। बोरी भरके सम्मान-पुरस्कार हैं। स्कूलों-कॉलेजों के कोर्स में मुझे पढ़ाया जाता है। देश के साहित्यिक हलकों के मध्य मेरी पूछ व पहुंच है। ऊंचे नेता से लेकर बड़े अफसर तक मेरा मिलना-जुलना है। तमाम पुरस्कार मेरे नाम पर चल रहे हैं। माता-पिता एवं अध्यापक बच्चों को मेरे जैसे बनने और मेरे बताए-समझाए रास्तों पर चलने को प्रेरित करते हैं। न केवल अपने मोहल्ले में बल्कि नाते-रिश्तेदारों के बीच मैं 'पूजा' जाता हूं।

अब आप ही बतलाइए कि मुझे जैसे इत्ते बड़े व महान लेखक को साहित्य का नोबेल क्यों नहीं मिलना चाहिए? साहित्य का नोबेल मुझे देकर नोबेल का ही मान बढ़ेगा। यों भी, मुझ जैसे ख्यातिलब्ध लेखक अब मिलते ही कहां हैं?

बहरहाल, पूरे जोश के साथ मेरी और मोहल्ले वालों की कोशिशें जारी हैं साहित्य के नोबेल के वास्ते। जाहे कैसे भी दंद-फंद इस्तेमाल क्यों न करने पड़ें पर साहित्य का नोबेल चाहिए ही चाहिए। एक दफा साहित्य का नोबेल मेरी झोली में आन गिरा न, तो मैं 'इंटरनेशनल लेखक' हो-बन जाऊंगा। अरब की खाड़ी से लेकर बंगाल की खाड़ी तलक मेरा नाम ही नाम होगा। साहित्य के जित्ते भी अरिष्ठ-वरिष्ठ-गरिष्ठ लेखक-साहित्यकार हैं, सब मेरे आगे पानी भरेंगे। फिर मेरा रूतबा ही कुछ और होगा प्यारे।

बस, इंतजार कीजिए मेरे नाम की घोषणा होने का। हरिबोल।

बुधवार, 9 अक्तूबर 2013

एक बीमार आदमी की व्यथा-कथा

चित्र साभारः गूगल
अमूमन मैं बीमार नहीं पड़ता। शायद बीमारी मेरे कने आने से घबराती है। लेकिन जब बीमार पड़ता हूं, तो बीमारी की खबर सिर्फ अपने तक ही सीमित रखता हूं। क्योंकि मुझे मालूम है नाते-रिश्तेदार बीमारी में भी मुझे चैन नहीं लेने देंगे। बीमारी पूछ-पूछकर, हाल-चाल ले-लेकर मेरा वो हाल करेंगे कि मैं ठीक होकर भी बीमारी ही लगूं-दिखूंगा।

बहरहाल, इस दफा यही हुआ। इत्ता एतियात रखने के बावजूद मेरी बीमारी की खबर लीक हो गई। लीक होते ही तुरंत ब्रेकिंग न्यूज बन गई। अभी मैं अपनी बीमारी को ठीक से जान-समझ भी न पाया था कि नाते-रिश्तेदारों के सांत्वना संदेशों की झड़ी लग गई। और, सांत्वना संदेश भी ऐसे-ऐसे कि अगर मुर्दा सुन ले तो उठकर बैठ जाए। सांत्वना संदेशों के साथ-साथ मिलती हिदायतों ने तो मेरी बीमारी को और भी पेचीदा बना दिया। कुछ समय तलक तो मैं यह ही तय नहीं कर पाया कि बीमारी को लेकर डॉक्टर कने जाऊं या फिर मिल रही हिदायतों से ही काम चलाऊं। हिदायतें भी ऐसी कि अक्सर सुनते-सुनते मेरे कान लाल हो जाया करते थे मगर वहां से हिदायतें आना बंद नहीं होती थीं।

ऐसा नहीं है कि मैं पहले कभी बीमार नहीं हुआ। बीमार होता था, ठीक हो जाता था। किसी को कानों-कान खबर तक नहीं होती थी। चैन से अपनी बीमारी को एन्जॉय करता था। दरअसल, तब मोबाइल का इत्ता बोल-बाला नहीं था। बात या बीमारी घर की चार-दीवारी में ही सिमटकर रह जाती थी। लेकिन इधर जब से आदमी के बीच मोबाइल का रूतबा बढ़ा है, फिर तो पल-पल बातें हैं, खबरें हैं, हाल-चाल हैं, यहां-वहां की लगाई-बुझाई है।

सच कह रहा हूं, मेरी आधे से ज्यादा बीमारी को मोबाइल ने ही बढ़ाया। एक फोन कट नहीं पाता था कि वेटिंग में दूसरा लगा रहता था। उस पर फोन करने वाले का तुर्रा यह कि बीमारी में बातें कम करनी चाहिए। अब उसे क्या बताऊं कि मुझे कहां शौक है ज्यादा बातें करने का। एक दो दफा अपना मोबाइल बंद करके भी देखा लेकिन फोन फिर पत्नी के मोबाइल पर आने लगे। आखिर मरता क्या नहीं करता प्यारे।

इस सब के बीच मैं मूल बीमारी से तो निजात पा गया किंतु हाल-चाल लेने से संबंधित बीमारी अब भी बनी हुई है। लोग जाने कहां-कहां से खोज-खोजकर फोन कर रहे हैं और खोद-खोदकर मेरी बीमारी पूछ रहे हैं। फिर भी हर किसी की शिकायत यही है कि पहले हमें क्यों नहीं बताया। उस दिन बात हुई, तब भी न बताया। कम से कम एक फोन ही कर देते। अब तो हर नंबर पर फ्री-टाकिंग की सुविधा मिल रही है। अच्छा, वो वाला प्लान ले लो, फ्री में बातें होगीं। हाल-चाल देते रहना। मोबाइल अपने कने ही रखना। ज्यादा बातें मत करना क्योंकि बीमारी अभी गई नहीं है। गेट वैल सून।

कुछ फोन तो ऐसे भी आए, जिसमें डॉक्टर का बायोडाटा तक पूछ लिया गया। कौन डॉक्टर है? कहां बैठता है? कित्ते मरीज दिनभर में देख लेता है? कित्ती फीस लेता है? टेस्ट बाहर से करवाता है या अपने यहां से? हस्पताल उसका खुद का है या फिर वहां नौकरी बजाता है? शादीशुदा या सिंगल? खुद बेचारा डॉक्टर ने नहीं जानता होगा कि उसके बायोडाटा का हिसाब-किताब बाहर भी रखा जाता है।

फिर भी, हिदायत कि फलां डॉक्टर को ही दिखाना, अलां को नहीं। और हां जब दिखा दो तो मोबाइल पर मेरी बात जरूर करवा देना।

अब आप ही बतलाओ मियां कि इत्ती हिदायतें-बातें सुनने के बाद कौन बीमार भला बीमार रह पाएगा! हालांकि कहा नहीं लेकिन बीमारी ने भी सोचा अवश्य होगा कि किस मूर्ख के पल्ले पड़ गई। ससुरे ने मुझे 'विलेन' बनाकर रख दिया।

खैर, अभी तलक यह पता नहीं चल पाया है कि मुझे बीमारी क्या थी? मगर अब ठीक हूं। साथ ही, एक गुजारिश कर रहा हूं कि अपनी बीमारी की खबर जहां तक हो सके अपने कने ही रखना। गलती से कहीं अगर बीमारी मोबाइल हो गई, तो फिर आपका खुदा ही मालिक। हरिबोल...।