सोमवार, 6 मई 2013

फेसबुक पर कविता


सुनो प्यारे, इन दिनों मैं गहरे अवसाद में हूं। यह अवसाद न पारिवारिक है न सामाजिक। यह कविता-संबंधित अवसाद है। न.. न.. ऐसा मत समझियो कि मैं कोई कविता लिखने की कोशिश कर रहा हूं। कविता-लेखन से तो मेरा न दूर का कोई रिश्ता है न पास का। कवि और कविता से जित्ता अधिक बचकर रहा जाए उत्ता ही दिमागी-स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।
लेकिन क्या करूं, दूरी बनाए रखने के बाद भी कवि और कविता मेरा पीछा नहीं छोड़ते।

दरअसल, कवि जब से फेसबुक पर अवतरित हुआ है, उसने कविता को आइटम-सांग जैसा बना दिया है। फेसबुक के कवि को तो कविता लिखने से मतलब। अब कविता का सिर-पैर-हाथ-कान-नाक-मुंह कहां और किधर जा रहे हैं, इससे उसे कोई सरोकार नहीं। फिर एक समस्या यह भी है कि फेसबुक के कवि से कविता के बाबत आप कुछ कह नहीं सकते। उसकी कविता में मीन-मेख नहीं निकाल सकते। उसे शब्दों की हेरा-फेरा पर राय नहीं दे सकते।

दरअसल, फेसबुक का कवि ऐंग्री-यंग से कम नहीं होता है। जहां जरा-सा टोक नहीं कि आपका खाना खराब। कविता पर आपके सामान्य-ज्ञान को वो पलभर में खारिज करने की क्षमता रखता है। बिना टोके, बिना चिढ़े आप बस उसकी कविता को पढ़िए। उसे बधाई दीजिए। उसे मुक्तिबोध, निराला से बड़ा और बेहतर कवि बतलाइए। फिर देखिए फेसबुक का कवि कैसे आपको टैग कर-करके आपके फेसबुक की दीवार की साना-पोती करता है।

हालांकि फेसबुक मित्रों के समक्ष कविता पर मैं अपनी राय जाहिर करता रहता हूं। कई दफा कह व लिख चुका हूं कि कविता की मुझे कतई तमीज नहीं। बावजूद इसके, फेसबुक के स्थापित कवि कहां मानने वाले हैं। आए दिन वे मेरे संदेश-बक्से में अपनी कविता पढ़ने और राय देने का लिंक डालते रहते हैं। आग्रह में उनके आग्रह कम दुराग्रह ज्यादा झलकता है। मतलब, कविता पढ़ो और तुरंत राय दो नहीं तो टैग होने को तैयार रहो।

अब मैं कविता का अज्ञानी भला क्या पढ़ूं और क्या राय दूं! यहां अपने लिखे पर कभी खुद की राय ले नहीं पाता। जित्ता लिखता हूं सब का सब छप-छपाकर अगले दिन तक रद्दी हो जाता है। ऊपर से पत्नी ताना मारती है कि तुम्हें लिखना नहीं आता।

फेसबुक के कवियों की कविताओं को झेल-झेलकर मैं अवसादग्रस्त-सा होने लगा हूं। रात को सोते वक्त भी कविता की चार लाइनें मुझे परेशान किए रहती हैं। ऐसा लगता है, कवि और कविता की दुनिया में मुझे जबरन ठेला जा रहा है।

कभी-कभी खुद पर गुस्सा भी बहुत आता है कि मैंने बेकार ही फेसबुक की दुनिया में कदम रखा। बेकार ही मैं लेखक हुआ। अगर इनमें से कुछ न होता तो आज चैन की बंसी बजा रहा होता। फेसबुक के कवि की कविता को न झेल रहा होता। यों फेसबुक पर रहने के कई फायदें हैं किंतु यहां के कवि की कविता को झेलना सबसे कर्रा काम है। पर क्या करूं फेसबुक पर कविता से पिंड छुड़ाना इत्ता आसान भी तो नहीं है।

वैसे फेसबुक के कवि स्वीकार तो नहीं करेंगे किंतु सच यही है कि फेसबुक पर कविताएं लिखी नहीं पेली और ठेली जाती हैं। यहां दिन भर कविताओं में शब्दों की बाजीगीरी चलती रहती है। यहां मौजूद हर कवि खुद को किसी वरिष्ठ लेखक-साहित्यकार से कम नहीं समझता। आए दिन किसी न किसी से लड़ता-भिड़ता ही रहता है। बस एक ही जिद, मेरी कविता पढ़ो और तुरंत राय दो।

खुदा बचाए फेसबुक के कवियों और उनकी ठेला-पेली युक्त कविताओं से। वो तो यह अच्छा है कि मैं खुद कवि नहीं हूं। नहीं तो मैं भी फेसबुक के कवियों की तरह इस-उस को टैग कर अपनी कविताएं यहां-वहां ठेल-पेल रहा होता।

1 टिप्पणी:

अनूप शुक्ला ने कहा…

फेसबुक का कवि अद्भुत होता है। :)