रविवार, 5 मई 2013

सबकुछ तो ठीक चल रहा है...


अजीब लोग हैं यहां के। अजीबो-गरीब से सवाल पूछते हैं मुझसे। जबकि जानते हैं, मुझसे उनके किसी सवाल का संतोषप्रद उत्तर नहीं मिलेगा। लेकिन फिर भी...। पूछते हैं, 'यह देश किधर जा रहा है? देश की राजनीति और देश के नेता किधर जा रहे हैं? आखिर ऐसा कब तलक चलेगा?' बताइए, उक्त सवालों का मैं क्या उत्तर दे सकता हूं? मैं कोई त्रिकालदर्शी या ज्योतिषी तो हूं नहीं कि मंत्र फूंका या यहां-वहां की लकीरें देखीं और बतला दिया कि ये यहां और वो वहां तलक ही जाएगा बस। फिर सब अपने-अपने रास्तों पर आ जाएंगे।

खामाखां की बात पूछते हैं।

अरे भाई, मुझसे क्या मतलब कि यह देश, राजनीति और नेता लोग कहां और किधर जा रहे हैं। जहां भी जा रहे हैं ठीक ही जा रहे होंगे। इत्ते भोले तो वे भी नहीं हैं, कि चल दिए और रास्ता नहीं मालूम। आजकल के जमाने में हर कोई अपने-अपने हिसाब से होशियार है। कोई अपनी होशियार जतलाकर नंबर बटोर ले जाता है तो कोई चुप रहकर नंबर बटोरता रहता है। और फिर देश से जुड़ी राजनीति, राजनीति से जुड़े नेताओं की तो बात ही निराली है, उन्हें सब मालूम रहता है कि देश-समाज-राजनीति-व्यवस्था-नीति-नियम-सिद्धांत कहां और किधर जा रहे हैं।

देखिए, मैं देश का हिस्सा जरूर हूं किंतु राजनीति और नेता लोगों में मेरा कतई इंट्रस्ट नहीं है। लेकिन मैं यह मानता हूं कि देश हमारा चकाचक चल रहा है। देश का चलना-फिरना मुझे साफ दिखता है। देश निरंतर प्रगतिपथ पर अग्रसर है। मुद्रास्फीति की दर ठीक है। अर्थव्यवस्था शेयर बाजार के कंधों पर टिकी हुई है। देश के गरीब-किसान खूब खा-पी रहे हैं। इधर, सुनने में आया भी था कि किसानों-गरीबों की इटिंग हैविट पहले से बढ़ी है।

देश की बाकी चीजों-बातों को नेता लोग अपनी-अपनी राजनीति के सहारे संभाल ही रहे हैं, काफी है।

लेकिन फिर भी बताए देता हूं कि मैं जानता कुछ नहीं हूं। यह तो मुझे वो पता है, जो मैंने यहां-वहां के लोगों द्वारा कही गई बातों को सुन रखा है। यों भी मैं, अतिरिक्त दिमाग खोटी न करना पड़े, इसीलिए सुनी-सुनाई बातों को ज्यादा तव्वजो देना उचित समझता हूं। ले-देके एक दिमाग मिला है, उसे भी हर वक्त बे-फालतू की बातों में लगाए रहो। यह दिमाग के साथ ना-इंसाफी है प्यारे।

कुछ लोगों से सुनने में आया है कि देश पर चीनी संकट आन खड़ा हुआ है। सुना है, चीनी फौजी कुछ किलोमीटर तक भारतीय सीमा के अंदर घुस आए हैं। तो इसमें इत्ता संकटप्रद या गंभीर होने की क्या आवश्यकता है प्यारे। जैसे आए हैं, वैसे ही चले भी जाएंगे। अपने नेता लोग हैं न बातचीत कर मसले को सुलटा लेंगे। जैसे पाकिस्तान से बातचीत का दौर चलता रहा है, अब चीन से भी चलने लगेगा। यह कोई नई बात थोड़े है। यों भी, ऐसे मसले सिर्फ बातचीत से ही सुलट जाते हैं, पुतले फूंकने या क्रांति-क्रांति चिखने-चिल्लाने से नहीं।

फिर भी जिनके दिल-जिगर-मन में जोश की भावना हर वक्त उमड़ती-घुमड़ती रहती है, उन्हें सलाह है कि वे तुरंत सीमा पर चले जाएं। शांति मिलेगी।

यह देखिए, कुछ न जानते हुए भी मैं इत्ता कुछ बतला गया। अब मुझसे कुछ और मत पूछिएगा। मैं फिर कह रहा हूं देश, राजनीति और नेता लोग के बीच सबकुछ ठीक चल रहा है। फिर भी मेरी कही बात का यकीन न हो तो अपने दिमाग की एनर्जी जाया करें मगर मुझे बख्शें। मेरे कने और भी काम हैं देश-दुनिया-समाज-राजनीति-व्यवस्था की चिंता करने के सिवाय।

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