बुधवार, 1 मई 2013

क्योंकि मैं मूर्ख हूं


हां, मैं मूर्ख हूं! ऐसा-वैसा नहीं, बहुत बड़ा वाला मूर्ख हूं। अपनी मूर्खता का ‘प्रमाणपत्र‘ जेब में लिए घूमता हूं। मूर्खता के सहारे कई दफा पागलखाने के चक्कर भी लगा आया हूं। खुद को पागलों के बीच पाकर मुझे असीम खुशी मिलती है। मैं पागलों की वैचारिकता एवं बुद्धिजीविता का कायल हूं।

खुद मूर्ख होकर ही मैं मूर्खता के मर्म को समझ-जान पाया हूं। दुनिया में मूर्खता से बड़ी न कोई विचारधारा है न प्रगतिशीलता। जो लोग खुद को दुनिया-समाज का सबसे बड़ा बुद्धिजीवि घोषित करते-करवाते हैं, दरअसल, वे खुशफहमी का शिकार होते हैं। सच का सामना करने से घबराते हैं। हालांकि बुद्धिजीवि बिरादरी मानेगी नहीं लेकिन दस-बीस ग्राम की मूर्खता उनमें भी घुली रहती है। गाहे-बगाहे अपनी मूर्खता का प्रदर्शन वे भी करते रहते हैं फिर भी खुद को किसी तुर्रामखां से कम नहीं समझते।

लेकिन मुझे इससे क्या वे खुद को चाहे जो समझें मगर मैं खुद को मूर्ख ही मानता व समझता हूं।

दरअसल, मेरे भीतर मूर्खता वाले लक्षणों को सबसे पहले मेरी पत्नी ने पहचाना। मुझे भिन्न-भिन्न कोणों व दृष्टिकोणों से जांचा-परखा। मेरी विचारधारा और मूर्ख की विचाराधारा को एक समान रखकर देखा। मेरी बौद्धिक एवं वैचारिक प्रगतिशीलता को जमीनी स्तर पर आजमाया। मेरी शाब्दिक लफ्फबाजियों का सरेआम प्रदर्शन किया। मेरी दिमागी संरचना का पोस्टमार्टम करके पत्नी ने पाया कि मेरे अंदर सिर्फ आधा ग्राम बुद्धि को छोड़कर बाकी सब मूर्खता ही मूर्खता भरी हुई है। स्पष्ट शब्दों में कह सकते हैं कि मेरे दिमाग में आत्याधिक मात्रा में भूसा भरा है।

लेकिन मुझे खुद के मूर्ख होने पर जरा भी रंज नहीं, पत्नी को भी नहीं है। पत्नी का साफ कहना है कि उसे मूर्खों को बाहर देखने जाने की जरूरत नहीं, यहां तो घर में ही मौजूद है। पत्नी ने बाकायदा मेरी मूर्खता के प्रमाणपत्र छपवाएं हैं। जिन्हें सभी रिश्तेदारों और मिलने-जुलने वालों के बीच बांटा हैय जिनमें से एक मैं हमेशा अपनी जेब में रखता हूं। ताकि भूल-चूक होने पर माफी मिल सके।

संभवता, मैं ऐसा पहला खुशनसीब पति होऊंगा जिसे पत्नी से मूर्ख होने का प्रमाणपत्र हासिल है। नहीं तो मैंने देखा-सुना है कि पति लोग मूर्ख होते हुए भी खुद को मूर्ख नहीं मानते। मगर मैं केवल सच्चाई में विश्वास करता हूं।

जानता हूं, मूर्ख को लोग-बाग बेहद ‘हेय‘ दृष्टि देखते हैं। मूर्ख कहकर उनका मजाक उड़ाते हैं। वैचारिक स्तर पर उन्हें अल्प-बुद्धि समझते हैं। चलते-फिरते कहीं भी उन्हें दुत्कार देते हैं। दरअसल, नादान होते हैं लोग। जानते ही नहीं कि वे क्या कर और कह रहे हैं। मूर्ख होना कतई हेय नहीं बल्कि बेहद सम्मान की बात है। मूर्ख लोग बुद्धिजीवियों-प्रगतिशीलों की तरह शब्दों का आडंबर नहीं रचते, जो जैसा होता है उसे वैसा ही कहते हैं। खामाखां के विवादों-बहसों से हट-बचकर चलते हैं। और, खुद को भीड़ में अंतिम पायदान पर रखते हैं। इसे मैं मूर्ख बिरादरी की श्रेष्ठता मानता हूं। यही कारण है कि मैं एक ‘सर्वश्रेष्ठ मूर्ख‘ हूं।

मुझे बुद्धि की दरकार नहीं। मूर्खों के लिए तो मूर्खता ही उनकी बुद्धि होती है। मूर्ख बने रहकर जित्ती सरलता से चीजों को देखा-समझा जा सकता है, उत्ता बुद्धिजीवि बने रहकर नहीं। मूर्ख बने रहकर मस्त बने रहना किसी उपलब्धि से कम नहीं है मेरे तईं।

फिलहाल, खुश हूं कि मैं मूर्ख हूं। इसमें पत्नी की भागीदारी को चाहकर भी नहीं भूला सकता। अगर आप मूर्ख नहीं है, तो जल्द से जल्द बनने का कष्ट करें। फिर देखिएगा कि यह दुनिया, यह समाज कित्ता रंगीन और मस्त नजर आएगा।

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